आज जब मैं यह लिख रहा हूं, तब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र उमर खालिद पांच साल से बिना किसी सुनवाई के दिल्ली की तिहाड़ जेल में और लद्दाख के पर्यावरणविद् शिक्षक सोनम वांगचुक कोई डेढ़ सौ दिन से जोधपुर जेल में बंद हैं। संयोग नहीं है कि ये दोनों नाम उस ‘न्यू इंडिया’ की आंखों की किरकिरी हैं, जिसे गढ़ने की कोशिश भारतीय जनता पार्टी की सरकार कर रही है।
इतिहास गवाह है कि छात्रों, शिक्षकों और बौद्धिकों ने जब-जब शब्दों को प्रतिरोध का हथियार बनाया है, हुकूमत ने उन्हें तोड़ने की हर मुमकिन कोशिश की है। मेरे लिए तो यह इतिहास का पढ़ा हुआ सबक नहीं, बल्कि निजी अनुभव है। मेरा शरीर आज भी 2019 के उन पैंतीस दिनों को याद करता है जो मैंने सेंट्रल जेल नैनी में बिताए थे। मेरा अपराध? इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लोकतंत्र के लिए आवाज उठाना! कारागार के वे दिन मुझे यह बताने के लिए काफी थे कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है, तो सबसे पहले अपने नागरिकों को ही मुल्ज़िम में बदलती है।
उनमें कुछ ऐसे होते हैं जो टूट जाते हैं और माफी मांग लेते हैं। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो कभी नहीं टूटते। यह कहानी ऐसे ही एक शख्स की है। राम सिंह जाखड़– एक ऐसा छात्र नेता जिसने अंग्रेजी हुकूमत के सबसे क्रूर अत्याचार सहे, कोड़े खाये, एकांतवास में रहा, लेकिन लाहौर से लेकर रोहतक तक उसने जेल को ‘स्टडी सर्कल’ के जरिये प्रतिरोध की पाठशाला बना दिया। यह कहानी स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह जाखड़ के संघर्षपूर्ण जीवन को पुनर्जीवित करने और उस वैचारिक बहस को उभारने का एक प्रयास है जो जाखड़ ने जेल की सलाखों के पीछे शुरू की थी।
राम सिंह जाखड़ की कहानी

आज से 110 साल पहले 22 फरवरी 1916 को रोहतक जिले के लडायन गाँव में जन्मे राम सिंह जाखड़ अदम्य ग्रामीण चेतना का प्रतीक हैं। उनका जन्म सीमित साधनों वाले एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता चौधरी श्रीराम एक समर्पित आर्यसमाजी और राष्ट्रवादी थे। घर का वातावरण ऐसा था जहां दैनिक श्रम के साथ-साथ देश की आजादी की चर्चा जीवन का अभिन्न अंग थी। इसीलिए जाखड़ का राजनीतिकरण बचपन में ही शुरू हो गया था।
केवल सात वर्ष की अवस्था में वे आर्यसमाज की स्थानीय सभाओं में ‘विश्वमित्र’ और ‘अर्जुन’ जैसे समाचारपत्रों के माध्यम से देश की परिस्थिति को समझने लगे थे। 1920 के दशक के अंत तक वे क्षेत्रीय सम्मेलनों में मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू जैसे राष्ट्रीय नेताओं के भाषण सुनकर प्रभावित हो चुके थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू होने तक राम सिंह एक मुकम्मल राजनीतिक कार्यकर्ता बन चुके थे। जेल जाने का उनका सिलसिला 1930 के नमक सत्याग्रह से शुरू हुआ। पहली बार उन्हें चार महीने की सजा हुई और वे रोहतक जेल भेजे गए।
हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को असली ताकत बड़े नेताओं के ओजस्वी भाषणों के अलावा अंधेरी कोठरियों के मौन त्याग ने दी थी, जहां बंद सेनानियों ने अपनी पहचान से ऊपर देश की आजादी को रखा। छात्र नेता राम सिंह जाखड़ का जेल वृत्तांत हमें बताता है कि 1930 और 1940 के दशक में जेलें केवल दमन का केंद्र नहीं थीं, बल्कि वे वैचारिक विमर्श और चरित्र निर्माण का सबसे बड़ा केंद्र थीं। आज जब हम शैक्षणिक परिसरों में अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं, तो हमें जाखड़ के साहस को याद करना बनता है।
भगत सिंह की शहादत के बाद 1932 में जब देश सन्नाटे में था, जाखड़ ने नौजवान भारत सभा के मंच से एक नज़्म पढ़ी थी। वह नज़्म ब्रिटिश राज के खिलाफ सीधा युद्धघोष थी:
ये बेशकीमती लाल क्या यूँ ही लुटाया जाएगा,
क्या पता था भगत सिंह फाँसी चढ़ाया जाएगा।
काट कर चर्चिल का सिर इर्विन और कैरार का,
रख नोक पर भाले की ये हरसू यूँ घुमाया जाएगा।
इस कविता के लिए उन्हें दस बेंत मारे जाने की सजा मिली थी। तीन बेंत पड़ने पर वह बेहोश होकर गिर पड़े। उनका प्रतिरोध सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहा। रिहाई के बाद डिप्टी कमिश्नर की कोर्ट से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराना यह दिखाता है कि दमन ने उनके हौसले को तोड़ने के बजाय और निखार दिया था।
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औपनिवेशिक जेलों का ढांचा कैदी के मनोबल को तोड़ने के लिए बनाया गया था। जाखड़ का विवरण जेल के अमानवीय जीवन का कच्चा चिट्ठा है। रोटी का आकार ‘हाथी के कान’ जैसा होता था, मोटी और बेस्वाद। सब्जी के नाम पर सिर्फ ‘घासफूस’ परोसी जाती थी। यह भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि इंसान को जानवर जैसा महसूस कराने के लिए था। जेल में मशक्कत का नियम था। बड़ों को 18 सेर (लगभग 17 किलो) आटा पीसना पड़ता था या कोल्हू चलाना होता था। जाखड़ जैसे कम उम्र के छात्रों से मूँज कुटवाई जाती थी।
प्रतिरोध यहां भी था। जब रिफॉर्मेट्री जेल (सुधारगृह) में उन्हें सजा के तौर पर 12 सेर चना पीसने को दिया गया, तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया और उसे नाली में फेंक दिया। यह ‘श्रम की हड़ताल’ थी, यह संदेश था कि आप हमारे शरीर को कैद कर सकते हैं, लेकिन हमारी इच्छाशक्ति को गुलाम नहीं बना सकते।
राम सिंह जाखड़ के वृत्तांत का सबसे सशक्त हिस्सा सुधारगृह का है। वहां अंग्रेजों ने मानसिक गुलामी थोपने की कोशिश की। खाने से पहले एक दुआ पढ़नी अनिवार्य थी: “ऐ परवरदिगार, तूने हमें ऐसी सरकार के सुपुर्द किया जिसने हमारा पालन-पोषण किया…”! एक क्रांतिकारी उस सत्ता की खैर कैसे मांग सकता है जिसे वह उखाड़ फेंकना चाहता हो? जाखड़ और उनके साथियों ने दुआ पढ़ने से इनकार कर दिया। इसके बदले उन्हें डंडे मारे गए। उन्होंने अंग्रेज अधिकारी श्री बैटमैन को सलाम करने से भी मना कर दिया।
जेल बनी पाठशाला
जाखड़ ने अपने जेल के अनुभव को बड़े दिलचस्प तरीके से बयां किया है। वे कहते थे कि जेल एक तरह से “मच्छरों, कनखजूरों और बिच्छुओं का ससुराल” थी। जेलें कच्ची मिट्टी की बनी होती थीं। सोने के लिए कच्चा चबूतरा होता था। वहीं कोने में शौच के लिए मिट्टी का एक कुंडा रखा होता था। गंदगी इतनी थी कि बीमारी और कीड़े-मकोड़े कैदियों के साथी बन गए थे।
जाखड़ का अनुभव यह भ्रम तोड़ता है कि जेल में सिर्फ अनपढ़ लोग हुआ करते थे। जेलें वास्तव में क्रांतिकारियों के लिए ‘स्टडी सर्कल’ थीं। सुधारगृह में एक रिटायर्ड मास्टर कैदियों को पढ़ाते थे। जाखड़ ने वहां उर्दू और हिंदी का अध्ययन किया।
वहां रोज दो-तीन घंटे बहस होती थी। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि झगड़ा इस पर नहीं था कि अंग्रेजों को कैसे भगाना है (उस पर तो सब एकमत थे), बल्कि इस बात पर था कि “राज आएगा तो कौन से सिद्धांत चलेंगे?” गांधीवादी कहते थे उनके सिद्धांत चलेंगे, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट अपने तर्कों के साथ आते थे।
जाखड़ ने जेल के अंदर की सामाजिक विषमता को भी रेखांकित किया है। राजनीतिक कैदियों को जान-बूझ कर ‘इख्लाकी कैदियों’ (जेबकतरे, चोर) के साथ रखा जाता था ताकि उनका नैतिक पतन हो सके। जाखड़ ने वहां देखा कि कैसे जेबकतरे हुनरमंद थे और खुली चुनौती देते थे। यह अनुभव एक युवा छात्र के लिए महत्वपूर्ण था- समाज के उस अंधेरे कोने को समझना जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है। उन्होंने वहाँ रहकर भी अपना चरित्र बनाए रखा।
विद्रोह की सजा के तौर पर राम सिंह जाखड़ और उनके तीन साथियों को दस दिनों के लिए ‘तन्हाई’ (एकांतवास) में डाल दिया गया था। वह सजा रूह कँपा देने वाली थी: “8 फुट लंबी और 7 फुट चौड़ी कोठरी, लगातार 10 दिनों तक उन्होंने सूरज की रोशनी नहीं देखी, नहाना, धोना, खाना, और शौच सब कुछ उसी छोटी-सी कोठरी के अंदर, वे एक-दूसरे की शक्ल नहीं देख सकते थे, बस छत की जाली से आवाज देकर बात कर लेते थे।”
हर तीसरे दिन जेल अधिकारी आते और कहते “माफीनामा लिख दो, छोड़ देंगे।” जिद्दी छात्रों ने माफीनामा लिखने से साफ़ इनकार कर दिया। राम सिंह जाखड़ ने अपने जीवन का संपूर्ण समय भारत के स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षों में समर्पित कर दिया। ऊपर दिए गए तथ्य और वृत्तान्त उनकी पत्नी मुक्तियारी देवी और बेटी शकुंतला देवी से हुई बातचीत के आधार पर हैं। साथ ही, इसमें वे तथ्य भी शामिल हैं जो नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी, नई दिल्ली में संरक्षित राम सिंह जाखड़ के अभिलेखों से प्राप्त हुए हैं।
कोई एक दशक पुराने स्वतंत्रता संघर्ष के राजनीतिक बंदियों के जेल वृत्तान्त से जो बातें और अनुभव निकल कर आते हैं, काफी बाद में उसे फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको ने सैद्धांतिक रूप दिया। फूको के सिद्धांत को भी अब पचास बरस हो चुके हैं। हम पाते हैं कि 2026 के भारत में सरकार ने फूको के सिद्धांत को एक भयानक मोड़ दे दिया है, जहां अनुशासन का मतलब है चुप रहना!
अनुशासन का दंड
फूको अपनी किताब ‘डिसिप्लिन ऐंड पनिश‘ में कहते हैं कि आधुनिक राज्य शरीर को दंडित करने के बजाय ‘आत्मा को अनुशासित’ करना चाहता है। फूको कहते हैं कि सत्ता व्यक्ति को वर्गीकृत भी करती है।
जेल का अनुभव पुलिस की गाड़ी में बैठने से ही शुरू हो जाता है। एक पल पहले आप छात्र होते हैं जो देश के संविधान की बात कर रहा होता है और अगले ही पल आप एक ‘मुल्ज़िम’ बन जाते हैं। जब इलाहाबाद पुलिस ने हमें 2019 में विश्वविद्यालय के गेट से उठाया था, तो वह सिर्फ कानून व्यवस्था का सवाल नहीं था। वह एक राजनीतिक संदेश था। हम छात्र थे, हम मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों से थे, और हम सवाल पूछ रहे थे। जैसे ही हम पुलिस वैन में बैठे, हमारा ‘नागरिक’ रूप जाता रहा। हम सहसा वह ‘सब्जेक्ट’ (प्रजा) बना दिए गए, जिसकी बात फूको ने की है। यही ‘सब्जेक्ट’ बताता है कि आप कैसी प्रजा हैं- राजापूजक या राजद्रोही। यही फूको का वर्गीकरण है। भाजपा के राज में यह वर्गीकरण बहुत स्पष्ट है: या तो आप ‘देशभक्त’ हैं या ‘देशद्रोही’।
मुझे याद है जब हमें नैनी जेल ले जाया जा रहा था, तब मेरे मन में शारीरिक चोट का डर नहीं था, बल्कि एक गहरा सामाजिक भय था। मेरे ज़हन में सबसे पहले मेरे माता-पिता का चेहरा आया। मुझे लगा कि मैंने उन्हें निराश कर दिया है। क्या अब मुझे कभी सरकारी नौकरी मिलेगी? क्या मेरा सिविल सेवा में जाने का सपना खत्म हो गया? जेल के दरवाजे पर पहुंचते ही आपको महसूस कराया जाता है कि अब आप दोयम दर्जे के नागरिक हैं। यह हीन भावना भरना राज्य की पहली जीत है।
फूको ने नागरिकों को अनुशासित करने वाले आधुनिक समाज को समझाने के लिए पनॉप्टिकॉन का मुहावरा इस्तेमाल किया है। पनॉप्टिकॉन एक ऐसी जेल है जहां सत्ता की अदृश्य नजर हमेशा आपके ऊपर होती है। नैनी जेल का वह विशिष्ट वातावरण साक्षात पनॉप्टिकॉन था। हमें राजनीतिक बंदी होने के बावजूद हत्यारों, लुटेरों और बलात्कारियों के साथ एक ही बैरक में रखा गया था। मुझे याद है, सुबह के चार बज रहे थे। पूरी जेल सो रही थी, लेकिन मैं और मेरे साथी जाग रहे थे। डर इतना गहरा था कि हम पलक झपकाने से भी कतरा रहे थे।
फूको का जैव-राजनीति का सिद्धांत कहता है कि सत्ता शरीर की जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है। सत्ता जेलों के अंदर जैव-राजनीति का सबसे क्रूर खेल खेलती है। नैनी में हमारी बैरक के शौचालय टूटे हुए थे। टॉयलेट की सीट काली हो चुकी थी। जहां हम बैठे थे वहीं बगल में तीन फुट की मेढ़ लगाकर एक शौचालय बनाया गया था। गंदगी इतनी थी कि इंसान अपनी कुदरती जरूरतों को रोकने पर मजबूर हो जाए। खाने में हमें पीला पानी मिलता था। सरकार उसे ‘दाल’ कहती है। रोटियां चमड़े जैसी सख्त होती थीं। हम अक्सर अपनी थाली में यह तय नहीं कर पाते थे कि सब्जी में तैरने वाली काली चीज़ मसाला है या कीड़ा। हम उसे ‘नाममात्र’ का खाना कहते थे।
जेल की पहली रात आपकी आत्मा को तोड़ देती है, लेकिन हमने टूटने से इनकार कर दिया। हमें गांधीजी की सीख याद थी- प्रतिरोध का अंतिम किला हमारा शरीर होता है। हमने अपने शरीर को ही अपना हथियार बनाया। हमने पहली रात को ही भूख हड़ताल शुरू की। हम केवल नींबू पानी पिये। यह हमारा तरीका था फूको के ‘अनुशासित शरीर’ को नकारने का। भूख हमारा सत्याग्रह थी, यह बताने के लिए कि आप हमें कैद कर सकते हैं, लेकिन हमारी चेतना को नहीं।
वर्चस्व के विरुद्ध
मुसोलिनी की जेल में कैद ग्राम्शी ने लिखा था कि असली लड़ाई तो वैचारिक वर्चस्व (हेजेमनी) के खिलाफ है। आज के भारत में उमर से लेकर सोनम तक जेल में बंद लोग दरअसल वैचारिक वर्चस्व के ही खिलाफ खड़े थे। राम सिंह जाखड़ भी अंग्रेजों के वर्चस्व को ही चुनौती दे रहे थे। हमने भी अपने तरीके खोज लिए थे।
जब हमारे शरीर कैद थे, हमने अपने दिमाग को किताबों के जरिये आजाद किया। हमने भगत सिंह को पढ़ा, यह याद करने के लिए कि बर्बर राज्य के खिलाफ लड़ना हमारी विरासत है। हमने महात्मा गांधी की ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग‘ को पढ़ा ताकि हम नफरत के दौर में भी सत्य पर टिके रहें। हमने रामचंद्र गुहा की किताबें पढ़ीं, यह समझने के लिए कि हमारे भारत का मूल विचार हमारी सरकार के संकीर्ण विचार से कितना बड़ा है। शाम को होने वाला वॉलीबॉल हमारे लिए वर्चस्व का प्रतिरोध रचने का खेल था। उस एक घंटे के दौरान हम मुल्ज़िम नहीं, खिलाड़ी होते थे। जब हम हवा में उछलते थे, तो जेल की दीवारों से भी खुद को ऊँचा समझते थे।
प्रतिरोध और शहादत की प्रेरक कहानियां
न्गुगी वा थ्योंगो : जिन्हें नोबेल मिलना भारत की मुक्तिकामी आवाजों को शायद बचा ले जाता!
तानाशाही सत्ताओं से कैसे न पेश आएं? केन सारो-वीवा की शहादत के तीसवें साल में एक जिंदा सबक
सत्ता का वर्चस्व तोड़ने, उसके साथ जीने और उसे चुनौती देने के अपने-अपने ढंग होते हैं। जेल में मैंने वह देखा जो सरकारी फाइलों में कभी दर्ज नहीं होता। वहां मुझे ऐसे कैदी मिले जो समाज की नजर में तो अपराधी थे, पर हमारे साथ तंबाकू साझा करते थे। जब सत्ता लोगों को अलग-थलग कर देती है, तब हाशिये पर पड़े वे लोग आपस में ही अपनापन ढूंढते हैं। मैंने वहां खूंखार कैदियों को जानवर (बिल्ली और नेवले) पालते हुए देखा। वे अपने हिस्से की रोटी बचाकर उन्हें खिलाते थे।
कमजोरों पर ताकतवर के वर्चस्व का सबसे घिनौना स्वरूप भी जेल में ही देखने को मिलता है- यौन शोषण। मैंने बैरक में नए, युवा कैदियों के प्रति पुराने कैदियों का एक शिकारी जैसा यौनाकर्षण देखा। फूको ने कामुकता को भी सत्ता का ही हथियार माना था। यह एक ऐसा सच है जिस पर सामान्यत: कोई भी बात नहीं करता।
जहां सत्ता, वहीं प्रतिरोध
आज जब मैं अपनी पैंतीस दिन की कैद को याद करता हूं तो मेरी रूह कांप जाती है। जरा उमर के बारे में सोचिए, जो करीब 2000 दिन से बिना कोई दोष साबित हुए बंद है! यदि पीली दाल और टूटे शौचालयों ने मुझको बुरे सपने दिए, तो पांच साल का वक्त किसी नौजवान के साथ क्या कर सकता है?
नैनी सेंट्रल जेल की दीवारों ने कभी हमारी सिसकियां सुनी थीं। आज वही दीवारें जोधपुर और तिहाड़ में किसी और की गवाही दे रही हैं। बरसों पहले लिखा राम सिंह जाखड़ का दस्तावेज आज के दौर को समझने के लिए एक आईना है, जो बताता है कि सत्ता चाहे गोरी हो या काली उसका चरित्र नहीं बदलता, न ही उस चरित्र के खिलाफ खड़े होने वाले युवाओं का साहस।
यह कहानी सिर्फ़ जाखड़, उमर या सोनम की नहीं है। यह कहानी हम में से किसी की भी हो सकती है- थोड़ा पीछे या थोड़ा बाद में। सौ साल की इस कहानी का सार वही है जो फूको ने कहा था- जहां सत्ता होगी, वहां प्रतिरोध होगा।
