BK-5: बिना सुनवाई, बिना चार्जशीट, एक अनंत कैद के पांच साल

तीन साल पहले जिस बंबई हाइकोर्ट ने गौतम नवलखा के चश्‍मे के मामले में इंसानियत का हवाला दिया था उसी ने वरवरा राव को जमानत पर मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाने के लिए हैदराबाद जाने से रोक दिया। भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में कैद सोलह में से पांच की गिरफ्तारी को पांच साल बीते 6 जून को पूरा हो गया। सुनवाई शुरू होने के अब तक कोई संकेत नहीं हैं। यह कैद अनंत होती जा रही है

पांच साल में सरकारें बदलें न बदलें, लेकिन इतना समय दुनिया को बदलने के लिए कितना काफी होता है यह कोरोना की महामारी ने हमें दिखा दिया है। नहीं बदलती है तो उन लोगों की जिंदगी, जिन्‍होंने दुनिया बदलने में अपनी जिंदगी खपा दी। भारत में ऐसे 16 लोगों को अलग-अलग समय पर बीते पांच साल में जेल में डाला गया, जिन्‍हें बीके-16 के नाम से जाना गया। बीके यानी भीमा कोरेगांव, जहां साढ़े पांच साल पहले 31 दिसंबर, 2017 को हुई यलगार परिषद की बैठक में शामिल होने और साजिश रचने के आरोप में इन्‍हें गिरफ्तार किया गया। इनमें लेखक, कवि, शिक्षक, सामाजिक कर्मी, पत्रकार, आदि हैं।

ऐसे 16 लोगों में से अब क‍ेवल 15 बच रहे हैं। फादर स्‍टेन स्‍वामी की मौत हो चुकी है। इन्‍हीं पंद्रह में से शुरुआती पांच की गिरफ्तारी को पांच साल पूरे हुए हैं। शेष 11 में से तीन को किसी तरह जमानत मिली है- वकील सुधा भारद्वाज, कवि वरवरा राव और आलंद तेलतुम्‍बड़े। वरवरा राव को मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाने हैदराबाद जाना था। सोमवार को बंबई उच्‍च न्‍यायालय ने इस संबंध में उनकी अर्जी खारिज कर दी। इस घटना से पत्रकार गौतम नवलखा के चश्‍मे का प्रसंग ताजा हो गया।

दिसंबर 2020 में नवलखा को उनके परिवार ने चश्‍मा भेजा था। जेल अधिकारियों ने उन्‍हें यह चश्‍मा देने से इनकार कर दिया था। इस पर बंबई उच्‍च न्‍यायालय ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि ‘’ऐसा लगता है कि अब जेल अधिकारियों को मानवता सिखाने के लिए कार्यशाला चलानी पड़ेगी’’।

गौतम का चश्‍मा जेल में 27 नवंबर, 2020 को चोरी हो गया था। उसके बाद तीन दिन तक उन्‍हें अपने परिवार को फोन नहीं करने दिया गया। उनकी पत्‍नी ने बाद में जब चश्‍मा डाक से भेजा, तो जेल अधिकारियों ने उसे लेने से इनकार कर दिया। इसी घटना पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा, ‘’मानवता सबसे बड़ी चीज है।‘’

इस टिप्‍पणी के दौरान कोर्ट भीमा कोरेगांव के दो अन्‍य आरोपियों सागर गोरखे और रमेश गायचोर की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एमएस कार्णिक ने इसी बीच गौतम के केस पर टिप्‍पणी की थी। इससे पहले फादर स्‍टेन स्‍वामी को सिपर और स्‍ट्रॉ देने के लिए मना किया गया था।

अबकी वरवरा राव की आंख के ऑपरेशन का मामला था तो इंसानियत का तकाजा डिवीजन बेंच पर शिफ्ट कर दिया गया। मुंबई से हैदराबाद जाने के लिए बंबई हाइकोर्ट ने उनसे कहा है कि वे हाइकोर्ट की डिवीजन बेंच पर अर्जी लगाएं।

पांच साल, पांच आदमी

भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में सबसे पहले गिरफ्तार किए गए पांच कार्यकर्ताओं को सलाखों के पीछे होने के पांच साल 6 जून, 2023 को पूरे हो गए। अब इनके बारे में खबर भी नहीं आती। ऐसा लगता है कि लोगों की स्‍मृति बहुत छोटी हो चली है। इनमें विस्थापन विरोधी अभियान चलाने वाले महेश राउत हैं, जो सबसे कम उम्र के हैं। दूसरे राजनीतिक कैदियों के हक में प्रचार करने वाले कार्यकर्ता रोना विल्सन हैं, जो पॉन्डिचेरी युनिवर्सिटी के गोल्‍ड मेडलिस्‍ट हैं। तीसरी, नारीवादी कार्यकर्ता और प्रोफेसर शोमा सेन हैं, जो वर्धा युनिवर्सिटी में पढ़ाती थीं। चौथे दलित अधिकार कार्यकर्ता सुधीर ढवले हैं। पांचवें वकील सुरेंद्र गाडलिंग हैं, जो इंडियन असोसिएशन ऑफ पीपुल्‍स लॉयर चलाते थे और बिना पैसे लिए गरीबों-मजलूमों के मुकदमे लड़ते थे। इन पांच शुरुआती गिरफ्तारियों के बाद अगस्‍त से 2020 के बीच अन्‍य 11 गिरफ्तारियां हुई थीं।  

महाराष्ट्र पुलिस ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत 6 जून, 2018 को पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी से पहले 17 अप्रैल, 2018 को कई शहरों में छापे मारे गए थे।  8 जून, 2018 को पुणे पुलिस ने प्रेस को एक पत्र दिखाया, जिसे उसने अप्रैल के छापे से बरामद करने का दावा किया। अप्रैल 2017 की तारीख वाले इस पत्र में ‘कॉमरेड प्रकाश’ को ‘आर’ ने राजीव गांधी की शैली में प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने का आग्रह किया था। 15 नवंबर, 2018 को प्रधानमंत्री की हत्या के उद्देश्य से एक कथित साजिश में शामिल सभी पांच “शीर्ष शहरी माओवादी गुर्गों” के खिलाफ 5000 पन्नों का आरोप पत्र दायर किया गया। आरोप पत्र में दावा किया गया कि पांच कार्यकर्ता हथियार खरीदने और 31 दिसंबर, 2017 को माओवादी समर्थित यलगार परिषद की बैठक को जुटाने में शामिल थे।

इसके अतिरिक्त, इसी मामले में 28 अगस्त, 2018 और 10 अक्टूबर, 2020 के बीच मृतक फादर स्टेन स्वामी सहित 11 और व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया था। कुल मिलाकर दो आरोप पत्र और एक पूरक याचिका दायर की गई। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने जनवरी 2020 में इस मामले को अपने हाथ में लिया, हालांकि मुकदमे की सुनवाई शुरू होने के अब तक कोई संकेत नहीं हैं और भीमा कोरेगांव मामले में 15 जीवित आरोपियों की निरंतर कैद का कोई अंत नहीं दिख रहा है।

सिलसिलेवार उल्‍लंघन

  • पुलिस की बेलगाम शक्तियां: समाचारपत्रों की रिपोर्टों से पता चलता है कि पुलिस के पास उचित अदालती आदेश नहीं था, न ही उसने अप्रैल 2018 में छापे मारने से पहले आवश्यक प्रोटोकॉल का पालन किया था।  मामला विचाराधीन होने के बावजूद पुलिस ने 31 अगस्त, 2018 को (गिरफ्तारी के दूसरे दौर के बाद) एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की।
  • आरोपितों के अधिकारों में कटौती: इस मामले में डिजिटल साक्ष्य के महत्व के बावजूद अब तक क्लोन प्रतियों का 60 प्रतिशत सभी आरोपियों के साथ  साझा नहीं किया गया है (जून 2018 के बाद गिरफ्तार किए गए 11 सहित)।    
  • जमानत से इनकार: यूएपीए के तहत जमानत असंभव है, जैसा कि शीर्ष अदालत के हालिया फैसले से रेखांकित किया गया है। सभी पांच कार्यकर्ता अब भी सलाखों के पीछे हैं।
  • कथ उत्पीड़न: जमानत आवेदन अक्सर न्यायिक देरी और कई चार्जशीट और विविध अभियोजन एजेंसियों के बीच फंस जाते हैं। जनवरी 2023 में शोमा सेन की जमानत याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था क्योंकि उसने इस तथ्य का कोई संज्ञान नहीं दिखाया था कि जांच एनआइए को स्थानांतरित कर दी गई थी और बाद में अपने आरोप पत्र में नए सबूत दिखाए थे। उच्च न्यायालय ने उन्हें एनआइए अदालत में वापस जाने के लिए कहा। सेन ने उच्च न्यायालय द्वारा जमानत खारिज किए जाने को इस आधार पर उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है कि मामला स्थानांतरित कर दिया गया है जबकि उनकी जमानत याचिका उच्च न्यायालय में सुनवाई का इंतजार कर रही है और उनके खिलाफ कोई नया आरोप नहीं लगाया गया है।   
  • मुकदमे के बिना दंडित: इस मामले में अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं। अगस्त 2021 में एनआइए ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि अगस्त 2025 तक आरोप तय नहीं किए जाएंगे। अगस्त 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने एनआइए को तीन महीने के भीतर आरोप तय करने पर फैसला करने के लिए कहा। नवंबर 2022 में एनआइए ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आरोप तय करने पर फैसला करने में एक साल और लगेगा।
  • बंदी अधिकारों से इनकार: जेल में बुनियादी स्वास्थ्य अधिकारों से इनकार का मुद्दा चौंकाने वाला रहा है और फादर स्टेन स्वामी की संस्थागत हत्या ने जेल अधिकारियों की आपराधिक लापरवाही को उजागर किया है। जेल अधिकारियों का मनमाना और भेदभावपूर्ण रवैया इस तथ्य से स्पष्ट है कि जेल में बंद कार्यकर्ताओं को  बुनियादी सुविधाओं के लिए बार-बार अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।                

अर्बन नक्‍सल बनाम हिंदू राष्‍ट्रवादी

भीमा कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले का एक गांव है जहां 1818 में ब्रिटिश फौज के दलित सैनिकों, मुख्यतः महारों ने स्थानीय ब्राह्मण शासक पेशवा बाजीराव द्वितीय की टुकड़ियों को बुरी तरह से परास्त किया था। 2018 की पहली जनवरी को हर साल की तरह महाराष्ट्र के दलित, मुख्यतः महार, इस घटना की सालगिरह मनाने के लिए इकट्ठा हुए। इसकी पूर्वसन्ध्या पर पुणे में हुई यलगार परिषद में, जिसके आयोजकों में दो सेवानिवृत्त न्यायाधीश भी शामिल थे, वक्ताओं ने हिन्दुत्व के एकरूपता थोपने की मुहिम का विरोध किया और नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना की। पुलिस का आरोप है कि यही भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के लिए उकसावा था- आयोजन के भागीदारों पर उच्च-जाति के हिन्दू राष्ट्रवादियों ने हमला किया। जवाब में उन्होंने भी कार्रवाई की और इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई।

एक दलित कार्यकर्त्ता ने दो लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज की- एक था संभाजी भिडे, जिसका पहले संघ परिवार से संबंध रहा है, और दूसरा था मिलिंद एकबोटे, एक भूतपूर्व भाजपा कॉरपोरेटर जो कई बार जेल जा चुका है। एक बार उसे सांप्रदायिक हिंसा में शामिल होने के आरोप में जेल हुई थी। एकबोटे को इस बार भी थोड़े समय के लिए जेल हुई, लेकिन पुलिस ने ‘एक सुनियोजित साजिश’ में दोनों के शामिल होने की रिपोर्ट होने के बावजूद भिडे के एक शिष्य तुषार दामगुडे द्वारा शिकायत दर्ज करने के बाद एक अलग ऐंगल से घटना को देखना शुरू किया। जल्दी ही पुलिस ने नयी गिरफ्तारियां कीं- आरोपितों को ‘अर्बन नक्सल’ के तौर पर पेश किया गया।

‘अर्बन नक्सल’ शब्द ग्रामीण इलाक़ों, मुख्यतः आदिवासी क्षेत्रों के मुक़ाबले शहरों में मौजूद कथित माओवादियों के लिए इस्तेमाल होता है। इस अभिव्यक्ति को अरुण जेटली ने 2014 में मुख्यधारा के एक राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी के लिए गढ़ा था, लेकिन इसकी मौजूदा प्रयुक्ति का श्रेय काफी कुछ बॉलीवुड फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री को जाता है जिन्होंने अर्बन नक्सल को ‘एक ऐसे बौद्धिक और कार्यकर्त्ता के रूप में’ परिभाषित किया ‘जो भारत का अदृश्य शत्रु है’।

इस तरह की साजिश के विचार को संघ परिवार के द्वारा प्रचारित किया गया। 2019 की एक पुस्तिका में, जिसका श्रेय आरएसएस को दिया जाता है और जिसमें विवेक अग्निहोत्री ने भी लेखकीय योगदान किया है, यह कहा गया है कि अर्बन नक्सलों ने न सिर्फ़ ‘पुलिस, सैन्य बल, नौकरशाही और सिविल सेवाओं में घुसपैठ बना ली है,’ बल्कि ‘भारत सरकार का तख्तापलट करने का अभियान’ भी छेड़ा है और ‘सभी वाम रुझान वाले प्रोफेसर तथा पत्रकार नक्सल समर्थक हैं और यहां तक कि नक्सल समूहों की हिंसा का भी समर्थन करते हैं…।’

सितंबर 2018 में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने चेतावनी दी थी कि नक्सलाइट लोग ‘शहरों में आ गए हैं और लोगों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।’ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में विद्यार्थियों को यह विचार करने को कहा कि क्या ‘अर्बन नक्सल्स, कुछ लोग जो अपने को बुद्धिजीवी समझते हैं, आपके कंधों पर बंदूक रखकर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं […] आपको यह देखना होगा कि कहीं यह आपके जीवन को तबाह करने की साजिश तो नहीं। वे मोदी से नफरत करने के अलावा कुछ और सोच ही नहीं सकते।’

जून 2018 में महाराष्ट्र पुलिस ने- जब राज्य में भाजपानीत गठबंधन का शासन था- भीमा कोरेगांव की जांच के सिलसिले में पांच ‘अर्बन नक्सल्स’ को गिरफ्तार किया। उन पर सिर्फ हिंसा भड़काने का आरोप नहीं था (जबकि उनमें से दो ही यलगार परिषद में शामिल हुए थे), बल्कि ‘राजीव-गांधी-स्टाइल’ में मोदी की हत्या करने की साजिश का भी आरोप था। उनके प्रोफाइल अग्निहोत्री के विवरणों से मेल खाते थे: सुरेन्द्र गाडलिंग एक वकील थे, शोमा सेन अंग्रेजी की सेवानिवृत्त प्रोफेसर, सुधीर ढवले कवि और प्रकाशक और महेश राउत तथा रोना विल्सन मानवाधिकार कार्यकर्ता थे। दो महीने बाद पुलिस ने कवि-कार्यकर्ता वरवर राव, वकील और ट्रेड-यूनियनिस्ट सुधा भारद्वाज तथा मानवाधिकार-कार्यकर्त्ता के साथ-साथ लेखक-स्तंभकार अरुण फरेरा और वरनन गोनसालविस को गिरफ़्तार किया।

दो और ‘अर्बन नक्सल्स’ की गिरफ्तारी अप्रैल 2020 में हुई: आनंद तेलतुंबड़े, जो भारत पेट्रोलियम के भूतपूर्व एग्जि‍क्यूटिव, ‘इकनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली’ के नियमित लेखक, गोवा इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट के प्रोफेसर और ‘रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट’ समेत कई किताबों के लेखक हैं; और फिर गौतम नवलखा, जो ‘इकनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली’ के भूतपूर्व संपादकीय सलाहकार और ‘पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स’ के सदस्य हैं। इसी महीने माओवादियों के साथ जुड़ाव होने के आरोप में स्‍टेन स्वामी की गिरफ्तारी हुई जो झारखंड के आदिवासियों के बीच काम करते रहे हैं और जेल में रहने के दौरान अब गुजर चुके हैं।

सितंबर 2019 के चुनावों के बाद भाजपानीत सरकार की जगह शिव सेना-एनसीपी-कांग्रेस की महाविकास अघाड़ी सरकार महाराष्‍ट्र में आई। जिस दिन इस नयी सरकार ने यह तय किया कि इन आरोपितों के खिलाफ़ दायर चार्जशीट की समीक्षा की जाएगी, उसके अगले ही दिन केंद्र के गृह मंत्रालय ने तफ्तीश एनआइए को सौंप दी।

ताजा घटनाक्रम

इस मामले में सबसे ताजा घटनाक्रम यह है कि बहुजन विकास अघाड़ी के अध्‍यक्ष और दलित कार्यकर्ता प्रकाश आंबेडकर ने भीमा कोरेगांव कमीशन से तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को तलब करने की मांग उठाई है। वे पहले भी ऐसी बात कर चुके हैं। फडणवीस फिलहाल महाराष्‍ट्र की भाजपा सरकार में उपमुख्‍यमंत्री हैं।  

आंबेडकर ने भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच कर रहे पैनल को एक पत्र लिखा है। पत्र में न केवल फडणवीस, बल्कि तत्‍कालीन अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव सुमित मलिक और पुणे के तत्‍कालीन पुलिस अधीक्षक सुवेज हक से भी पूछताछ करने की मांग की गई है।

हिंसा के वक्‍त आंबेडकर ने इसके लिए संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे को इसका जिम्‍मेदार ठहराते हुए 3 जनवरी 2018 को महाराष्‍ट्र बंद बुलाया था। जब राज्‍य सरकार जांच आयोग बैठा रही थी, उस वक्‍त मलिक को इसका सदस्‍य बनाए जाने पर भी आंबेडकर ने आपत्ति की थी।

उलटे, आयोग ने आंबेडकर को ही पूछताछ के लिए समन भेज दिया। बीते 5 जून को आंबेडकर से आयोग के समक्ष उपस्थित होकर एक हलफनामा देने को कहा गया था लेकिन उन्‍होंने पहले से तय कार्यक्रम का हवाला देते हुए वहां जाने से मना कर दिया और फडणवीस को तलब करने के संबंध में अपनी चिट्ठी भेज दी।   

बिंदु जो मामले के फर्जी होने की ओर इशारा करते हैं

  • बीके-16 को कथित तौर पर 31 दिसंबर, 2017 को यलगार परिषद की बैठक के अगले दिन हुई जातिगत हिंसा में उनकी भड़काऊ भूमिका के कारण गिरफ्तार किया गया था। यह याद रखना जरूरी है कि बैठक में उनमें से केवल एक या दो मौजूद थे, लेकिन उनमें से किसी का भी जातिगत हिंसा से कोई लेना-देना नहीं था। एक पुलिस अधिकारी ने स्पष्ट किया है, जिन्होंने भीमा कोरेगांव आयोग के समक्ष गवाही दी है, कि यलगार परिषद का हिंसा से कोई लेना-देना नहीं था। यहां तक कि चार्जशीट भीमा कोरेगांव हिंसा के अपराधियों और पीड़ितों के बारे में अस्पष्ट बनी हुई है।  
  • मामले के आसपास का प्रारंभिक प्रचार हत्या की साजिश थी। इस कथित पत्र को महाराष्ट्र पुलिस ने जून 2018 में मीडिया के साथ साझा किया था। 31 अगस्त, 2018 को गिरफ्तारी के दूसरे दौर के बाद, पुलिस ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान फिर से पत्र दिखाया, हालांकि एनआइए द्वारा बॉम्बे हाइकोर्ट को सौंपे गए 17 मसौदा आरोपों में हत्या की साजिश का कोई उल्लेख नहीं है! मुख्य उद्देश्य क्रांति के माध्यम से जनता सरकार की स्थापना करने का माओवादी राजनीतिक प्रयास बताया गया है। 
  • फरवरी 2021-जुलाई 2021 के बीच आरोपी के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में मैलवेयर के माध्यम से सबूत लगाने के संबंध में आर्सेनल की तीन रिपोर्ट प्रकाशित की गई। इसके अलावा, लीक डेटाबेस की समीक्षा से पता चला कि बीके के आरोपितों में से आठ के फोन नंबर पेगासस स्पाइवेयर द्वारा लक्षित किए गए थे। अभियोजन पक्ष ने प्रकाशित निष्कर्षों को खारिज कर दिया है जो एकत्र किए गए सबूतों पर संदेह पैदा करते हैं, जिसमें यह तथ्य भी शामिल है कि पुलिस की भागीदारी का सवाल  उठाया गया है।  
  • अगस्त 2022 में सुरेंद्र गाडलिंग ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें तलब करने के लिए ईडी की याचिका के समय पर सवाल उठाया, जिसे उसने सीपीआइ (माओवादी) के खिलाफ पिछले साल दायर किया था। गाडलिंग ने कहा कि चार साल से अधिक समय तक सलाखों के पीछे रहने के बावजूद ईडी ने आर्सेनल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद ही याचिका लगाई। गाडलिंग ने कहा कि ईडी का मकसद उन्हें और हिरासत में रखना था।

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