अगले दो से तीन साल में AI समूचे मीडिया को निगल जाएगा, मनुष्य को विस्थापित कर देगा!

Existential threat of AI
Existential threat of AI
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ के दौरान विद्याथिर्यों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समझदारी भरे उपयोग का आग्रह करते हुए कहा है कि वे उस पर निर्भर न हों, बल्कि केवल दिशानिर्देश के लिए सहयोग लें। यह बात सुनने में जितनी अच्‍छी लगती है, उतनी ही सदिच्‍छा भरी है। AI जितनी तेजी से मानवीय उद्यमों की जगह छेकता जा रहा है, आने वाले दो से तीन साल में तकरीबन समूचे पारंपरिक मीडिया में वह मनुष्‍य की भूमिका का खत्‍म कर देगा। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के AI संपादक चार्ल्‍स फर्गुसन ने AI कंपनियों के प्रमुखों से इस विषय में बात कर के एक चेतावनी भरा लेख लिखा है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब ‘कंटेंट’ के पीछे आ रहा है, यानी विज्ञापन और उपन्‍यासों से लेकर फिल्‍मों और पत्रकारिता तक सबके पीछे। नतीजा, बहुत जल्‍द ही वह एक साथ भीषण, शानदार, हताशाजनक और उत्तेजक हो जाएगा। उससे जो विध्‍वंस पैदा होगा वह केवल वैसा नहीं होगा जिसे रचनात्‍मक कहते हैं। वह बेमतलब का विशुद्ध विध्‍वंस होगा, वो भी ठीकठाक मात्रा में।

अपना अधिकांश वयस्‍क जीवन मैंने शोध करने, पत्रकारिता और डॉक्‍युमेंट्री बनाने में बिताया है। मैंने तमाम उपन्‍यास पढ़े हैं, फिल्‍में देखी हैं। इसलिए क्रिएटरों (रचनात्‍मक लोगों) के लिए मेरे मन में बहुत सहानुभूति है, लेकिन बीते तीन साल में मैंने जो AI में निवेश किया और इस क्षेत्र में उद्यमी पूंजीपति बना, उसका अनुभव लेकर मैं यहां एक संदेश देने आया हूं। यह संदेश सबके लिए है- पत्रकारिता, प्रकाशन, संगीत, विज्ञापन और हॉलीवुड तक के लिए। आप यदि इस तकनीक की ताकत को नजरअंदाज कर रहे हों, तो बला आपकी है।



सबसे पहले हॉलीवुड पर बात करते हैं। फिल्‍म और टीवी उद्योग पिछले कुछ वर्षों से सिकुड़ता चला जा रहा है, चूंकि मीडिया के ऐसे नए-नए रूप (जैसे स्‍ट्रीमिंग सेवाएं) उभर कर आए हैं जो इंटरनेट, लैपटॉप, टैबलेट और मोबाइल फोन के बगैर सक्षम नहीं हो सकते। केबल टीवी और डीवीडी का पतन कई कारकों को दिखाता है, जैसे वीडियो स्‍ट्रीमिंग, यूजर जनरेटेड कंटेंट (उपभोक्‍ता द्वारा निर्मित सामग्री) में उभार, सस्‍ते कैमरों और सॉफ्टवेयर के चलते कंटेंट निर्माण के क्षेत्र में आया लोकतांत्रीकरण और इनके परिणामस्‍वरूप यूट्यूब, फेसबुक और टिकटॉक पर ज्‍यादा से ज्‍यादा दर्शकों को जुटा लेने की मची होड़। 

बीते एक दशक के दौरान हुए इस संकुचन के बाचजूद वीडियो प्रोडक्‍शन की बुनियादी तकनीकों में बहुत ज्‍यादा फर्क नहीं आया। अब तक आप असली कैमरों से वास्‍तविक लोगों और चीजों को फिल्‍म करते आए हैं। बहुत जल्‍द ही हालांकि ये वास्‍तविक चीजें अप्रासंगिक हो जाने वाली हैं। AI इनकी जगह ले लेगा। इस नई दुनिया के प्रणेता निरपवाद रूप से ऐसे स्‍टार्टअप होंगे जिनमें से कुछ की उम्र तो साल भर भी नहीं हुई है। एक भी पुराना स्‍टूडियो, प्रोड्यूसर या डिस्ट्रिब्‍यूटर AI फिल्‍म-निर्माण या वितरण के मोर्चे पर मौजूद नहीं है। ऐसा पहला स्‍टार्टअप रनवे आठ साल पहले बना था, उसके बाद से अर्काना, फ्लिक, कोयल, जिंगरोल, और ऐसी ही तमाम स्‍टार्टअप कंपनियों की लाइन लग चुकी है।

इन सभी कंपनियों के संस्‍थापकों और वरिष्‍ठ अधिकारियों से मैंने हाल के महीनों में बात की है। इन सब से मैंने एक ही सवाल पूछा: तकनीक न जानने वाले किसी व्‍यक्ति को बेहतरीन चरित्रों और प्रोडक्‍शन-मूल्‍य वाली बिलकुल हॉलीवुड जैसी लंबी AI फीचर-फिल्‍म बनाने में अभी कितना वक्‍त बाकी है? उनके जवाब एक से तीन साल के बीच थे। यानी औसतन दो साल। सामान्‍य शॉर्ट फिल्‍मों या विज्ञापनों को बनाना तो अब भी संभव है।

ऐसा ही एक युक्रेन का स्‍टार्टअप होलीवाटर जो 2020 में बना था, किसी को भी वर्टिकल शॉर्ट फिल्‍म (खासकर फोन के लिए) बनाने की सहूलियत देता है। इसके लिए वह AI से पहले ढेर सारी टेक्‍स्‍ट स्‍टोरी बनाता है, फिर उनकी लोकप्रियता के आधार पर फिल्‍म का निर्माण होता है। होलीवाटर की कमाई 10 करोड़ डॉलर को पार कर चुकी है और सालाना दोगुना हो रही है। इसी तरह, 2024 में बनी कंपनी वाइड वर्ल्‍ड्स लोगों को उनकी पसंद के फिक्‍शन से चीजें लेकर शॉर्ट फिल्‍में बनाने में सक्षम कर रही है।

इसके बाद 60 अरब डॉलर वाले डिजिटल विज्ञापन उद्योग की बारी आती है। AI विज्ञापनों के निर्माण में अग्रणी स्‍टार्टअप हिग्‍सफील्‍ड 2023 में स्‍थापित हुआ था लेकिन उसका कारोबार इतने विस्‍फोटक ढंग से फैला है कि हर महीने उसकी कमाई दोगुना हो रही है। इस साल वह एक अरब डॉलर को पार कर जाएगी।    


रनवे AI फिल्‍म फेस्टिवल में ग्रैन्ड प्राइज़ विजेता रही फिल्‍म टोटल पिक्‍सेल स्‍पेस

ज्‍यादा लंबी और जटिल सिरीज़ या फिल्‍मों की तकनीक अब तक नहीं आई है, लेकिन बहुत तेजी से वह विकसित हो रही है। एक दशक के भीतर ही अभिनेता, सिनेमटोग्राफर, स्‍टन्‍ट कलाकार, आर्ट डायरेक्‍टर, कॉस्‍ट्यूम डिजाइनर, लाइन प्रोड्यूसर, और लोकेशन खोजने वाले- यानी सारे इंसान इतिहास की चीज हो जाएंगे। बेशक कुछ पुराने स्‍टूडियो चुपचाप AI का पर्याप्‍त इस्‍तेमाल कर रहे हैं (लायन्‍सगेट का अकसर जिक्र आता है) लेकिन ज्‍यादातर हॉलीवुड इस सूनामी से निपटने के लिए कुछ नहीं कर रहा। स्‍टूडियो, प्रोड्यूसर, वितरक और एजेंसियां ख्‍वाब देख रही हैं (या ऐसा नाटक कर रहे हैं) कि AI भी केबल टीवी, डीवीडी, सीजीआइ और स्‍ट्रीमिंग की तरह प्रौद्योगिकी की महज एक लहर ही है।

इसके उलट, अभिनेताओं, लेखकों, आर्ट डायरेक्‍टरों और इंडस्‍ट्री के अन्‍य पेशेवरों की नुमाइंदगी करने वाली यूनियनें घबराई हुई हैं। इस घबराहट में उन्‍होंने आंख मूंद कर AI के तमाम प्रयोगों का विरोध कर डाला है, जिसका कोई अर्थ नहीं बनता। तकनीक इतनी तेज रफ्तार से बढ़ रही है कि भौतिक वीडियो से AI वीडियो के उत्‍पादन तक बदलाव बेहद संक्षिप्‍त और बर्बर होने वाला है, जो रातोरात हजारों लोगों के करियर और कंपनियों को निगल जाएगा। मैंने खुद अपने दोस्‍तों को इंडस्‍ट्री छोड़ते हुए देखा है।

हॉलीवुड तो केवल एक उदाहरण है कि AI को अगर थोड़ा मानवीय ढंग से सावधानीपूर्वक नहीं बरता गया (जिसके संकेत नहीं के बराबर हैं) तो उससे आया सैलाब व्‍यापक सामाजिक पीड़ा का कारण बन जाएगा। ऐसी ही बातें गल्‍प लेखन, व्‍यावसायिक फोटोग्राफी, रेडियो और सबसे बढ़कर संगीत के बारे में कही जा सकती हैं, जहां तेजी से उभरते हुए कई स्‍टार्टअप (जैसे ऊडियो, सुनो और मोज़ार्ट) उन लोगों को संगीत पैदा करने में सक्षम बना रहे हैं जो संगीत नहीं जानते।  

ऊडियो और सुनो तो हाल ही में बड़े पैमाने पर आइपी चोरी में लिप्‍त पाए गए थे। उन पर मुकदमा हुआ, फिर उन्‍होंने बड़ी संगीत कंपनियों के साथ सुलहनामा किया। इसके बावजूद कोई भी पुरानी संगीत कंपनी AI के मोर्चे पर नहीं खड़ी है। वे बस मुकदमे ठोंक रही हैं।

यानी, AI क्रांति अब कलाओं में आ रही है और विरासती उद्योगों में जो तबाही मचने वाली है वह दर्दनाक होगी। इस विनाश के बाद का दृश्‍य कैसा दिखेगा? यह कहीं ज्‍यादा जटिल सवाल है।

निजी स्‍तर पर, एक पूर्व और भावी फिल्‍मकार के बतौर, मैं AI से फिल्‍म बनाने को लेकर उत्‍साहित हूं। फिल्‍मों की ट्रीटमेंट और स्‍क्रीनप्‍ले लिखने में मुझे आनंद आएगा, उन्‍हें मैं अपने AI स्‍टूडियो में डालूंगा और वापस मुझे जो रफ कट मिलेगा उसे मैं AI से तब तक तराशूंगा जब तक मुझे वैसी फिल्‍म न मिल जाए जैसी मैंने चाही थी- जिसमें एक-एक किरदार, दृश्‍य, गति, संवाद अदायगी और कैमरा ऐंगल परफेक्‍ट हो। किसी से पैसा मांगने की जरूरत नहीं होगी, किसी प्रोड्यूसर की महिला मित्र को उपकृत नहीं करना पड़ेगा, किसी दम्‍भी फिल्‍मस्‍टार को झेलना नहीं पड़ेगा और इस बात की चिंता नहीं करनी होगी कि कहीं कोई जिंदा कारतूस से लैस बंदूक लेकर मेरे सेट पर तो नहीं आ गया है।

फिर भी, बौद्धिक सम्‍पदा और उसके निर्माताओं की सुरक्षा के लिए नए कानूनों, व्‍यवस्‍थाओं और संस्‍थाओं की तत्‍काल आवश्यकता है। इस संदर्भ में सबसे ज्‍यादा बहस उन पारंपरिक रचनाकारों को भरपाई पर चल रही है जिनके अतीत में किए काम का इस्‍तेमाल AI मॉडलों को प्रशिक्षित करने में किया जा रहा है। साथ ही AI की रचनाओं और उनके रचनाकारों को भी बचाए जाने की जरूरत होगी।

यह खयाल, कि AI जनित कला को सुरक्षित नहीं किया जाना चाहिए या नहीं किया जा सकता, भ्रामक है। जिस तरह पारंपरिक औजारों के माध्‍यम से नई रचना करने वाले मनुष्‍य को संरक्षण की जरूरत है, उसी तरह से AI का इस्‍तेमाल कर के नई चीजें बनाने वाले मनुष्‍य को भी सुरक्षा चाहिए, चाहे वह लेखक हो, छायाकार या फिल्‍म निर्देशक।

मैं तो वास्तव में यह उम्‍मीद कर रहा हूं कि AI ऐसा वातावरण बना दे जिसमें मेधावी कलाकार और कला के नए-नए विषय पैदा हों। मैं जो कहना चाहता हूं, उसकी एक झलक के लिए आप रनवे AI फिल्‍म फेस्टिवल को देख सकते हैं, खासकर इसमें ग्रैन्ड प्राइज़ विजेता रही शानदार फिल्‍म टोटल पिक्‍सेल स्‍पेस को देखिएगा। ऐसे काम दिखाते हैं कि मैं कला सर्जन के क्षेत्र में AI का स्‍वागत क्‍यों कर रहा हूं, यह पहचानते हुए भी कि कला में AI की लाई क्रांति के अहम नुकसान होने हैं। तमाम अच्‍छे लोग, मने सैकड़ों हजारों या शायद लाखों लोग बिना किसी चेतावनी के अपने करियर के बीचोबीच या ढलान पर अचानक बेरोजगार हो जाएंगे।

इसके अलावा, AI से बनी घटिया दरजे की सामग्री का सैलाब आ जाएगा- हर साल लाखों नए उपन्‍यास, गाने और फिल्‍में- जो नए हुनरमंद कलाकारों को खड़ा होने में मुश्किल पैदा करेगा। स्‍वाभाविक है, इस बाढ़ में ज्‍यादा से ज्‍यादा AI गर्लफ्रेंड और AI पोर्नोग्राफी भी आएगी, साथ ही कुछ घृणास्‍पद रचनाएं भी देखने को मिलेंगी, जैसे नाजियों के पुनर्जन्‍म से लेकर बाल उत्‍पीड़न के भयावह दृश्‍य।

मेरे लिए कहीं ज्‍यादा भयावह वह है जो नॉन-फिक्‍शन की दुनिया में हो रहा है, यानी खबरों, सूचना के स्रोतों, और संदर्भ सेवाओं में। यहां हम तथ्‍य और उसको तोड़े-मरोड़े जाने के बीच धुंधलाते फर्क को काफी पहले से महसूस कर रहे हैं, जो अब इस हद तक पहुंच चुका है कि तथ्‍य और मिलावट के बीच अंतर कर पाना संभव नहीं रह गया है। कला के क्षेत्र में AI का युग मुझे चिंतित करने के बजाय उत्‍साहित ज्‍यादा करता है, लेकिन जब सच और वास्‍तविकता की बात आती है तो यह संतुलन गड़बड़ा जाता है। इस मामले में AI क्‍या-क्‍या कर सकता है, उससे मैं आतंकित हूं, भले ही जश्‍न मनाने को और बहुत सी चीजें हों।

हॉलीवुड की ही तरह पत्रकारिता भी सिकुड़ चुकी है। इंटरनेट ने दैनिक अखबारों, सापताहिक पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी, सबको एक ही बाजार में धकेल दिया है। उसने क्‍लासिफाईड विज्ञापनों से होने वाली कमाई को नष्‍ट कर दिया है जिस पर हमारे अखबार निर्भर थे और निम्‍न दर्जे के हजारों नए खिलाड़ियों का इसमें प्रवेश करवा दिया है। पहले ज्‍यादातर लोग समाचारों के लिए जिन स्रोतों पर भरोसा करते थे- जैसे टाइम और न्‍यूज़वीक पत्रिका, नेटवर्क टेलिविजन की खबरें, आदि- उन सबको सोशल मीडिया, यूट्यूब और एग्रीगेटरों ने तबाह कर दिया है। इन्‍होंने खबरों को संक्षेप में पेश करना शुरू किया। अगर ये खबरें सच हों तो इन पर कॉपीराइट उल्‍लंघन का मुकदमा हो जाए, वरना ये आम तौर से केवल कचरा और झूठ परोसते हैं। इस तरह इन्‍होंने सामान्‍य आबादी द्वारा उपभोग की जाने वाली खबरों की गुणवत्ता को मिट्टी में मिला दिया है।

इस वजह से कई बार तकरीबन मौत के कगार पर पहुंच चुके अंग्रेजी के कुछ उच्‍च गुणवत्ता वाले समाचार संगठन बाद में कहीं ज्‍यादा ताकतवर होकर उभरे। पहले से ज्‍यादा उनके वैश्विक श्रोता और दर्शक बन गए। जैसे, न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स, फाइनेंशियल टाइम्‍स, गार्डियन, ब्‍लूमबर्ग न्‍यूज, इकॉनॉमिस्‍ट, पॉलिटिको और रायटर्स तथा एपी की वायर सेवाएं। ये प्रतिष्‍ठान हालांकि आबादी के छोटे से हिस्‍से तक ही पहुंच पाते हैं। इनमें खबरें बनाना बहुत लागत का काम होता है। इनकी वित्तीय हाल भी नाजुक रहती है। AI न सिर्फ उच्‍च गुणवत्ता वाली पत्रकारिता के बचे-खुचे संस्‍थानों के लिए खतरा पैदा कर रहा है, बल्कि बुनियादी रूप से लोगों तक सच्‍ची सूचनाएं पहुंचाने और विवेकपूर्ण फैसले लेने का सामर्थ्‍य रखने वाली सूचित जनता को बनाए रखने की क्षमता को जोखिम में डाल रहा है।

स्‍वाभाविक रूप से, इस संदर्भ में सबसे ज्‍यादा चर्चा AI के डीपफेक पर हो रही है। यह वाकई बड़ी समस्‍या है, चूंकि सच या तथ्‍यात्‍मकता के मद्देनजर यूट्यूब, फेसबुक, स्‍नैप, एक्‍स और टिकटॉक के ऊपर काफी कम बाध्‍यताएं हैं। एलेक्‍स जोन्‍स जैसे कॉन्‍सपिरेसी थ्‍योरिस्‍ट अपनी बातों से चाहे जितना भी नुकसान पहुंचाते हों, कम से कम हम इतना तो जानते थे कि हमारे सामने एलेक्‍स जोन्‍स नाम का एक जीता-जागता इंसान बोल रहा है। अब तो बहुत जल्‍द किसी भी व्‍यक्ति और किसी भी आयोजन का हूबहू नकली संस्‍करण बनाना संभव हो जाएगा, जिससे असली और नकली का फर्क पकड़ना भी मुश्किल होगा।


TIME का वार्षिकांक कवर: गरमाती धरती और AI की ख़ब्‍त के बीच हवा में फिर भोज


सबसे ज्‍यादा सावधानी के साथ प्रशिक्षित किए गए AI मॉडलों का भी दुरुपयोग संभव है, और कुछ ओपेन-सोर्स AI मॉडलों पर तो कोई नियंत्रण ही नहीं है। चूंकि वे किसी को भी उपलब्‍ध हें, तो उन्‍हें तकरीबन किसी भी किस्‍म का टेक्‍स्ट या वीडियो पैदा करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। उनमें सावधानीपूर्वक तथ्‍य-परीक्षण की हुई उच्‍च दर्जे वाली सामग्री भी हो सकती है और विकृत माल भी।

इसके साथ ही AI ने लोगों को उपलब्‍ध खबरों और सूचनाओं की गुणवत्ता को काफी हद तक सुधारने का काम भी किया है, बशर्ते आप ध्‍यान से देखने में रुचि रखते हों। प्रमुख AI मॉडल (मुख्‍यत: ओपेनAI, एन्‍थ्रोपिक और गूगल) और उनके द्वारा समर्थित कई वैल्‍यू ऐडेड सेवाएं आज की तारीख में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। हैल्‍युसिनेशन बेशक अब भी एक बड़ी समस्‍या है, लेकिन साल भर पहले के मुकाबले अब काफी कम हो गई है। इन मॉडलों के साथ समाचार प्रतिष्‍ठानों ने समझौते भी किए हैं। ज्‍यादातर गुप्‍त हैं, लेकिन कुछ सार्वजनिक हैं। जैसे फाइनेंशियल टाइम्‍स का ओपेनAI के साथ समझौता है, न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने अमेज़न के साथ करार किया है और एपी की वायर सेवा का ओपेनAI और गूगल दोनों के साथ अनुबंध है।           

फिलहाल कोई एक अरब से ज्‍यादा लोगों के लिए AI के मॉडल ज्ञान हासिल करने की रहस्‍यमय खिड़की हैं। मैं खुद दिन में कम से कम दर्जन भर बार परप्‍लेक्सिटी का इस्‍तेमाल करता हूं। इस लेख को लिखने में मैंने पारंपरिक प्रकाशनों (या गूगल सर्च) के मुकाबले कहीं ज्‍यादा उसका बार-बार प्रयोग किया।

इसी तरह, विशिष्‍ट क्षेत्रों के लिए विशेषज्ञ AI सेवाओं का विस्‍फोट हुआ है जो वकीलों, वैज्ञानिकों, डॉक्‍टरों और मरीजों के लिए संदर्भ सेवा के काम आ रही हैं। अब तो AI थेरपिस्‍ट तक आ गए हैं1 ऐश और लोवोन जैसे सेवा प्रदाता इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। आप चाहें तो इस बात को हलके में ले सकते हैं, लेकिन कई दोस्तों ने मुझे बताया कि ऐश, लोवोन और यहां तक कि चैटजीपीटी भी जरूरत के वक्‍त आश्‍चर्यजनक रूप से ज्‍यादातर इंसानी थेरपिस्‍टों के मुकाबले बहुत मददगार साबित हुए हैं।   

इस सबका हालांकि एक स्‍याह पक्ष है। AI मॉडल ज्ञान का उत्‍पादन नहीं करते हैं। वे ज्ञान की फसल काटते हैं और उसे बेहतरीन ढंग से बांटने का काम करते हैं, लेकिन वे दूसरों की गढ़ी सूचनाओं पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। हमें (और AI मॉडलों को भी) अब भी पॉलिटिको, न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स, फाइनेंशियल टाइम्‍स, कीव इंडिपेंडेंट, ईकैथिमेरिनी, गार्डियन, ला मॉन्‍डे, असाही शिम्‍बुन, एल पाएस, देर स्‍पीगेल, एपी, रायटर्स, प्रोपब्लिका, और ऐसे समाचार प्रतिष्‍ठानों के समूचे जगत की जरूरत है। इन संस्‍थानों के पास ही कमीशनिंग एडिटर, पूर्णकालिक पत्रकार, फैक्‍टचेकर, और जमीन पर काम करने वाले स्ट्रिंगरों, फिक्‍सरों व स्रोतों के जाल उपलब्‍ध हैं। AI के मॉडल अपने यहां खोजी पत्रकारों या युद्ध संवाददाताओं की भर्ती नहीं करते जो सच को पाने के लिए मेहनत करने और जोखिम उठाने को तैयार हों।

इसके बावजूद कि AI के मॉडल पारंपरिक पत्रकारिता पर निर्भर हैं, वे कम से कम दो तरीकों से उसके सामने जोखिम पैदा कर रहे हैं। जैसा कि हॉलीवुड के मामले में हमने देखा, यहां भी खतरा इसलिए बढ़ जाता है क्‍योंकि पारंपरिक पत्रकारिता उद्योग इन खतरों पर ध्‍यान नहीं दे रहा है।

पहली समस्‍या सीधी प्रतिस्‍पर्धा की है। अगर आप कुछ खास जानकारी चाहते हैं, किसी मुद्दे से अद्यतन रहना चाहते हैं, तो आपको अब किसी समाचार प्रकाशन की आवश्‍यकता नहीं है। आपको बस किसी AI मॉडल से सवाल पूछ देना है। आप जिस सवाल का जवाब चाहते हों, बिलकुल वही सवाल पूछिए। जितना विवरण जवाब में चाहते हों, उसे बता दीजिए। फिर आप चाहें तो उस जवाब से जुड़ा अपने पसंदीदा अखबार का हिस्‍सा या होमपेज भी उससे मांग सकते हैं। 

इतना ही नहीं, फिलहाल उपलब्‍ध AI मॉडल ऐसे कई सवालों के जवाब दे सकते हैं जो कोई समाचार प्रतिष्‍ठान नहीं दे सकता, फिर चाहे विषय किसी उपकरण की मरम्‍मत का हो, मनोवैज्ञानिक उपचार का या चिि‍कत्‍सीय परामर्श से जुड़ा। सबसे बुरी बात यह है कि ऐसे मॉडल बहुत सस्‍ते पडते हैं। मसलन, व्‍यक्तिगत उपयोग के लिए ये मॉडल औसतन दस डॉलर प्रतिमाह मांगते हैं जबकि न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स का सब्‍सक्रिप्‍शन प्रतिमाह करीब 25 डॉलर है। फाइनेंशियल टाइम्स और ब्‍लूमबर्ग न्‍यूज़ और महंगे हैं।

लागत के मामले में AI मॉडल इसलिए फायदे में हैं क्‍योंकि अव्‍वल तो अपनी स्थिर लागत को वे ग्राहकों की भारी संख्‍या के बीच बांट सकते हैं और दूसरे, वे ज्‍यादातर जो सूचनाएं इस्‍तेमाल करते हैं उसके बदले में पैसा नहीं चुकाते, जिससे उन्‍हें बहुत फायदा होता है। बड़े AI प्रदाता अपने सिस्‍टम को प्रशिक्षित करने के लिए बहुमूल्‍य प्रकाशनों, किताबों, समाचार पत्रिकाओं, आदि का बहुत अनैतिक ढंग से और बेरहमी से इस्‍तेमाल करते हैं। इसके बदले वे मूल लेखकों या प्रकाशकों को कोई मुआवजा नहीं देते या बेहद मामूली देते हैं।


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के राजकाज के पांच वैश्विक सिद्धांत: AI पर UN की अंतरिम रिपोर्ट


अहम AI मॉडलों के बीच सबसे जिम्‍मेदार माने जाने वाले एन्‍थ्रोपिक ने हाल ही में 1.5 अरब डॉलर चुकाकर ऑथर्स गिल्‍ड के साथ अपना मुकदमा निपटाया है। न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने 2023 में ओपेनAI और माइक्रोसॉफ्ट पर मुकदमा किया था (दोनों का मुकदमा अब भी जारी है)। मैंने परप्‍लेक्सिटी की मदद से इस लेख को जब पूरा किया, उससे ठीक पहले इस कंपनी के ऊपर न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स और शिकागो ट्रिब्‍यून दोनों ने मुकदमा कर दिया था।   

AI मॉडल की सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को मूल रचनाकारों को भुगतान करने के लिए बाध्‍य करने के पीछे बहुत ठोस नैतिक और व्‍यावहारिक तर्क हैं, लेकिन इसे संभव करने के लिए नए कानूनों या अदालती फैसलों की दरकार होगी। इस दौरान यह खतरा बहुत वास्‍तविक रहेगा कि जब तक समाचार प्रतिष्‍ठानों, पत्रकारों, लेखकों और डॉक्‍युमेंट्री निर्माताओं को पर्याप्‍त मुआवजा नहीं दिया जाता, AI उद्योग उन मूल स्रोतों की ही हत्‍या कर देगा जिन पर वह सटीक नतीजे देने के लिए निर्भर है।

यहीं पर AI की पैदा की हुई दूसरी समस्‍या सामने आती है: AI से पैदा कचरे और फर्जी सामग्री के भारी प्रदूषण में भरोसेमंद समाचार स्रोतों के विनाश की संभावना। असंख्‍य AI सेवाएं जब उभर कर आ जाएंगी, तब बहुत मुमकिन है कि सर्वाधिक सतर्क समाचार संगठनों और AI के ही प्रमुख बुनियादी मॉडलों को वे झूठ रचने के अपने कौशल से धता बता दें, चूंकि उनके रचे झूठ को वास्‍तविकता से अलगा पाना संभव नहीं होगा। अब तक तो AI मॉडलों को वास्‍तविक चीजों के सहारे प्रशिक्षित किया गया है, लेकिन जल्‍द ही वह स्थिति आने वाली है जब ज्‍यादातर प्रशिक्षण सामग्री ही AI जनित होगी।         

इस आसन्न संकट की कुछ जिम्‍मेदारी पारंपरिक उद्योगों पर भी है। AI के मंडराते खतरे की सूरत में प्रमुख समाचार संगठनों ने बिलकुल वही रुख अपनाया है जैसा हॉलीवुड का था. किसी ने कुछ नहीं किया।

न्‍यूयॉर्क टाइम्स और फाइनेंशियल टाइम्‍स दोनों ही AI उद्योग को बड़े अच्‍छे से कवर करते हैं क्‍योंकि वे ऐसे रिपोर्टरों को भर्ती करते हैं जिन्‍हें पता होता है कि उस इंडस्‍ट्री में क्‍या चल रहा है। पर सवाल है कि क्‍या दोनों में से किसी के यहां भी चैट की सुविधा है ताकि सब्‍सक्राइबर सवाल पूछ सकें? नहीं है। आप बस एक बार न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स (या फाइनेंशियल टाइम्‍स, गार्डियन, या पॉलिटिको) की वेबसाइट पर दी हुई सर्च की सुविधा का इस्‍तेमाल कर के देखें और फिर उसकी तुलना चैटजीपीटी या पारंपरिक गूगल सर्च से ही कर लें। वह कहीं भी इनके करीब तक नहीं ठहरता। फिर किसी प्रकाशन में कुछ भी खोजने पर क्‍या बात की जाए!     

ज्‍यादातर समाचार संगठन AI का व्‍यापक इस्‍तेमाल भी नहीं करते। उनके पत्रकार बेशक चैट सेवाएं इस्‍तेमाल करते हों, लेकिन वे और बेहतर कर सकते थे। मसलन, वे खबरों से जुड़े घटनाक्रम को निरंतर पकड़ने, खबर का पहला ड्राफ्ट तैयार करने, लेखों में साइटेशन और फुटनोट देने (परप्‍लेक्सिटी यह करता है), फैक्‍ट चेकिंग को सुगम बनाने और कॉपी संपादन में AI सिस्‍टम का इस्‍तेमाल कर सकते हैं।

फिर, भाषाई अनुवाद का एक मसला है। न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स केवल चीनी और स्‍पैनिश भाषा में सीमित सेवाएं देता है, इसलिए आप अगर केवल अरबी, जापानी, पोलिश, युक्रेनी या वियतनामी पढ़ना जानते हों तो AI से अटपटे अनुवाद का मौजूदा स्‍तर देखते हुए कह सकते हैं कि आपकी किस्मत ही खराब है।

ज्‍यादातर पारंपरिक प्रकाशन अब भी अपने कंटेंट तक मूलभूत AI मॉडलों की पहुंच को रोके हुए हैं। अगर उन्‍हें लगता है कि ऐसा करने से हमले की रफ्तार थोड़ी थम जाएगी तो वे भ्रम में हैं। डिजिटल जगत का आकार किसी भी एक प्रकाशन के मुकाबले अतुलनीय रूप से विशाल है और AI मॉडल व उनके औजार अपनी जरूरत की हर सामग्री को खोज पाने में लगातार बेहतर होते जा रहे हैं। जिस तरह की ताकतों का हमला होने जा रहा है और जो कंपनियां इन हमलों के पीछे हैं, उनकी तुलना में पूरा का पूरा समाचार उद्योग भी ताकत में बेमेल है।


हमारी उद्देश्यपूर्ण सामाजिक कार्रवाइयों के परिणाम क्या हमारे नियंत्रण से बाहर निकल चुके हैं?


इस अंतिम बात को अब तक कम समझा गया है। 2024 में न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स कंपनी की कमाई तीन अरब डॉलर से थोड़ा कम थी। फाइनेंशियल टाइम्‍स, गार्डियन और इकॉनॉमिस्‍ट की संयुक्‍त कमाई दो अरब डॉलर से कम रही। कंवल ब्‍लूमबर्ग के पास कमाई की आसली ताकत है। यहां तक कि समूचे वैश्विक किताब प्रकाशन और वैज्ञानिक प्रकाशन उद्योग को मिला लें (जिस पर बार्टेल्‍समैन, स्प्रिंगर और एलसेवियर का कब्‍जा है) तो उनकी कुल कमाई 50 अरब डॉलर से कम ही पड़ती है।

इसके उलट, गूगल की सालाना कमाई करीब 400 अरब डॉलर है, माइक्रोसॉफ्ट की 300 अरब डॉलर, मेटा की 200 अरब डॉलर, अमेज़न की 700 अरब डॉलर, और ऐपल की 400 अरब डॉलर। अकेले गूगल का मुनाफा सालाना 100 अरब डॉलर को पार करता है। यहां तक कि ओपेनAI और एन्‍थ्रोपिक की कमाई किसी भी समाचार प्रतिष्‍ठान से कहीं ज्‍यादा हैं (ब्‍लूमबर्ग को छोड़कर)। न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की आय सालाना 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है जिसका मतलब है कि वह बाजार हिस्‍सेदारी बहुत तेजी से गंवाता जा रहा है। अब आप सोचिए कि इस धरती पर खुद को दिखाने की मची होड़ में कौन जीतेगा, खासकर ऐसी स्थिति में जब समाचार प्रतिष्‍ठान AI प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल करने में लगातार पिछड़ते जा रहे हों?

बस उम्‍मीद ही की जा सकती है कि समाचार प्रतिष्‍ठान नींद से जागेंगे, अदालतें और विधायिकाएं तथा सामान्‍यत: लोग यह दबाव बनाकर AI कंपनियों से मांग करेंगे कि वे पत्रकारों और शोधकर्ताओं को निष्‍पक्ष भुगतान करें, तथा AI उच्‍च गुणवत्ता वाली पत्रकारिता के एक नए उद्योग को जन्‍म देगा। यही उम्‍मीद गंभीर चिंता का भी बायस है, जैसे मैं चिंतित हूं, क्‍योंकि इसमें से कुछ भी नहीं होने वाला है।


प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट में AI संपादक चार्ल्‍स फर्गुसन प्रौद्योगिकी की कंपनियों में निवेशक हैं, नीति विश्‍लेषक हैं और ऑस्‍कर विजेता फिल्‍म इनसाइड जॉब सहित कई डॉक्‍युमेंट्री फिल्‍मों के निर्देशक भी हैं।

Copyright: Project Syndicate, 2026.
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