TIME का वार्षिकांक कवर: गरमाती धरती और AI की ख़ब्‍त के बीच हवा में फिर भोज

Time Cover, Dec 29, 2025
Reproduction of Lunch Atop a Skyscraper, 1932 in 2025 Time Person of the Year issue
प्रसिद्ध समाचार पत्रिका टाइम ने महामंदी के दौर की 1932 की एक तस्‍वीर को चेहरे बदलकर 2025 का अपना अंतिम कवर बनाया है। बेचेहरा मजदूरों की जगह उसने दुनिया में AI के सरताज कारोबारियों को चिपका कर सामूहिक रूप से ‘पर्सन ऑफ द ईयर’ घोषित किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भयंकर तेजी, लगातार गरमाती और मनुष्‍ता के लिए खतरा पैदा करती धरती, तथा संस्‍थागत व नैतिक मानदंडों के साथ बेमेल होते प्रौद्योगिकीय ढांचे पर साल के अंत में अंतरा हालदर की जरूरी टिप्‍पणी, प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से

टाइम पत्रिका ने अपना ‘पर्सन ऑफ द ईयर’ वाला जो वार्षिकांक अबकी निकाला है उसके कवर पर महामंदी के दौर की उस प्रसिद्ध तस्‍वीर को दोबारा जिंदा कर दिया है जिसमें मैनहैटन के आकाश में लटकी हुई एक बीम पर कतारबद्ध बैठे स्‍टील कारखाना के मजदूरों को खाना खाते दिखाया गया था। उनके पैरों के नीचे दिख रहा शहर लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा था। उसे देखकर आभास होता है कि वह तस्‍वीर हवा में बैठने के खतरे को न सिर्फ सहज बना रही है, बल्कि आकर्षण पैदा कर रही है।

सबके सिर के ऊपर हवा में बैठकर लंच करने का वक्‍त फिर आ गया है। फर्क बस इतना है कि इस बार तस्‍वीर में दिख रहे चेहरे अनाम-अज्ञात निर्माण मजदूरों के नहीं हैं। टाइम ने जिस डिजिटल पेंटर जेसन सीलर को कवर तैयार करने का काम दिया था, उन्‍होंने पुरानी वाली तस्‍वीर के ऊपर “AI के वास्‍तुकारों”- एनवीडिया के जेनसन हुआंग, ओपेनएआइ के सैम आल्‍टमैन, एक्‍सएआइ के एलन मस्‍क, मेटा के मार्क जुकरबर्ग, गूगल डीपमाइंड के डेमिस हसाबिस, एंथ्रोपिक के दोरियो अमोदेई, स्‍टैनफर्ड की फेई-फेई ली, और एडवांस्‍ड माइक्रो डिवाइसेज की लीसा सू- को चिपका दिया है। यह कवर जितना चतुराई भरा है उतना ही विवादास्‍पद भी है। कॉमेडियन जिमी किमेल ने इसे ‘कयामत के आठ मूर्ख’ नाम दिया है। स्‍टील की गगनचुम्‍बी इमारतों से लेकर सोचने वाली मशीनों तक प्रौद्योगिकीय विकासक्रम को अगर हम देखें, तो यह तस्‍वीर और बहुत कुछ कहती है, जैसा इस पत्रिका के संपादकों ने भी शायद नहीं सोचा होगा।


This 1932 photo has been reproduced with changes as TIME 2025 last cover
Lunch atop a Skyscraper, 1932 [Wikipedia]

मूल तस्‍वीर वहां खींची गई थी जहां आज रॉकफेलर सेंटर है। वह तस्‍वीर आधुनिकता के युग में एक खास पल को कैद करती है, जिसमें यह विश्‍वास कैद था कि इंजीनियरिंग की तरक्‍की अंतत: सभी खतरों को दूर कर सकती है; कि तकनीकी प्रगति के पास आपकी चिंताओं के सारे जवाब मौजूद हैं; कि कोई न कोई कहीं न कहीं तो है जिसने किसी भी तरह के खतरे की आशंका को नाप-जोख कर गलती को दुरुस्‍त कर दिया होगा। उस तस्‍वीर में क्‍या नहीं दिख रहा था? वह मचान, चबूतरा, सुरक्षाजाल, या फिर वे संस्‍थाएं, जो सुरक्षा की तकनीकें पैदा होने के पहले से ऐसे उद्यमों को टिकाये रखे हुए थीं- जैसे फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्‍ट का न्‍यू डील कार्यक्रम और बेवेरिज रिपोर्ट, जिसने ब्रिटेन में नेशनल हेल्‍थ सर्विस को जन्‍म दिया। इनमें से कुछ तो वाकई सहारा थीं, कुछ रूपक के तौर पर।      

पुरानी वाली तस्‍वीर से नदारद इन सुरक्षात्‍मक उपायों की अहमियत AI के नियमन को लेकर आज चल रही गरमागरम बहसों के बीच ज्‍यादा समझ में आती है। एक बार फिर हम खुद को एक संकरी बीम पर बैठा हुआ पा रहे हैं, जो AI की संभावनाओं तथा संस्‍थागत मूर्छा व गरमाती धरती की वास्‍तविकताओं के बीच लटकी पड़ी है। इसके बावजूद, बहुत से लोगों ने AI के वास्‍तुकारों का जश्‍न मनाना चुन लिया है और एक ज्‍यादा अहम सवाल को दरकिनार कर डाला है कि आखिर इस निर्माण का मालिक कौन है? वह अंतत: चाहता क्‍या है?

संदर्भ के लिए, टाइम पत्रि‍का के जश्‍न और इस साल हुए संयुक्‍त राष्‍ट्र जलवायु परिवर्तन सम्‍मेलन (COP30) की मौन नाकामी के बीच फर्क को देखिए, जो अबकी पेरिस समझौते की दसवीं वर्षगांठ थी। स्थिति यह है कि जहां AI के तंत्र महीनों के भीतर प्रशिक्षित, तैनात और संवर्द्धित कर दिए जा रहे हैं वहीं जलवायु से जुड़े राजकाज का काम प्रक्रियागत देरी में फंस कर दशकों घिसट रहा है। ऐसा इसके बावजूद है कि विज्ञान लगातार स्‍पष्‍ट चेतावनियां दे रहा है। अब खतरा केवल धरती के गरम होने का नहीं रह गया है। हम लोग उस हॉटहाउस परिदृश्‍य के करीब बढ़ रहे हैं, जिसका जिक्र जोहान रॉकस्‍ट्रोम करते हैं। इस परिदृश्‍य में ध्रुवों पर पड़ी बर्फ की चादरें पिघलने लगती हैं, जमीन गलने लगती है, जंगल गिरने लग जाते हैं। यानी यह ऐसा निर्णायक मोड़ है जो धरती को और ज्‍यादा गरम, अस्थिर अवस्‍था में धकेलत देता है। इस स्थिति में इंसानी नियंत्रण का कोई मतलब नहीं रह जाता।

यह स्थिति केवल इंटेलिजेंस की असफलता नहीं है, बल्कि उस चीज की है जो टाइम की कवर तस्‍वीर में रूपक की तरह मौजूद है। उसे अलाइनमेंट कहते हैं, यानी चीजों का सुमेल होना। एक दूसरे से सुसंगत होना। वास्‍तुकारी में अलाइनमेंट का मतलब होता है किसी ढांचे का स्‍वरूप, उसका काम और उससे जुड़े गणितीय मानक, सब एक ही दिशा में संरेखित हों। एक ठीकठाक सुमेल और संतुलित इमारत ऐसी होती है जो हर तरह की आवाजाही को सुगम बनाए, तमाम किस्‍म के भार को बराबर बांटे और सभी उद्देश्‍यों को समेकित करे। जो असंतुलित इमारत होती है वह जाम, तनाव और ढहने के खतरे पैदा करती है, चाहे वह कितनी ही भव्‍य क्‍यों न दिखे। आधुनिक समाज दरअसल असंतुलित और बेमेल इमारतों की तरह हैं, जहां प्रौद्योगिकियां हमारी संस्‍थाओं के मुकाबले कहीं ज्‍यादा गति से बढ़ती जा रही हैं और हमारी प्रौद्योगिकीय क्षमताएं हमारी सहमतियों को लगातार लांघ रही हैं।


The Alignment Problem is reflected in TIME cover on Person of the Year

वास्‍तु का यह मुहावरा प्रचुरता या आधिक्‍य के इस दौर पर भी सटीक लागू होता है। द अटलांटिक के योनी एपलबॉम और न्‍यू यॉर्क टाइम्‍स के एज़रा क्‍लीन जैसे टिप्‍पणीकारों ने आधिक्‍य के रूपक की तरह बिल्डिंग का इस्‍तेमाल किया है। AI को संभालने वाला समूचा भौतिक ढांचा तीव्र बाजार प्रतिस्‍पर्धा, प्रचुर पूंजी, भूराजनैतिक शत्रुता और रफ्तार की संस्‍कृति से निर्मित उसके अपने ही आंगन में तैयार किया जा रहा है। ये सभी ताकतें एक-दूसरे के साथ आपस में तो बहुत मजबूत मेल के साथ जुड़ी हुई हैं, लेकिन उन मौजूदा प्रणालियों के साथ बेमेल हैं जो लोकतांत्रिक जवाबदेही, दीर्घकालिक जोखिम प्रबंधन और लोकवैधता को सुनिश्चित करती हैं। उसी तरह, जलवायु प्रशासन से जुड़ी संस्‍थाओं का मेल धीमी गति वाली पुरानी उदार दुनिया के साथ है, उससे नहीं जिसका वर्णन रॉकस्‍ट्रोम ने किया है।

अपारदर्शिता इन बेमेल रिश्‍तों को और खतरनाक बनाती है। हम लोग आज ऐसे तंत्र के रहमोकरम पर जी रहे हैं जिसके भीतर क्‍या दर्ज हो रहा है हम नहीं जानते- चाहे वे ऋण और सूचना प्रवाह को आकार देने वाले अलगोरिथम हों, या फिर कूटनीतिक भाषा में अनुवाद के दरकार वाली जलवायु मॉडलिंग। यह तंत्र बिना कोई सफाई दिए केवल शक्ति पैदा कर रहा है। जब इस शक्ति के परिणाम हमारी समझ में नहीं आते या उन्‍हें चुनौती देना संभव नहीं हो पाता, तो वैधता जाती रहती है। लोकरंजकतावाद इसलिए नहीं फल-फूल रहा कि लोग विशेषज्ञों को खारिज कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि लोगों पर ऐसे तंत्र द्वारा राज किया जा रहा है जो उनसे अंधभक्ति की मांग करता है।    

बीम पर लंच वाली तस्‍वीर इस भाव को सटीक ढंग से कैद करती है। इसका संदेश यह है कि सारी गणित पहले ही बैठाई जा चुकी है। हमसे बस इतनी उम्‍मीद है कि हम लोग बिना कोई सवाल किए AI के नेताओं की बड़ाई करें, उनकी उंगलियों के निशान न खोजें। इतिहास हालांकि यहां एक चेतावनी की तरह उपस्थित होता है।

औद्योगिक क्रांति की संस्‍कृति भी राजकाज के ऊपर बिल्‍डरों को तरजीह देती थी। श्रम कानून बनने से पहले मशीनें आ चुकी थीं और पैसे की ताकत नियम-कायदों को लांघ चुकी थी। तो भी, उसके परिणाम कितने ही विनाशक रहे हों, नुकसान को अंतत: थाम लिया गया था। अबकी AI और जलवायु सम्‍बंधी जोखिमों के साथ गलती की गुंजाइश बेहद तंग है और गलती के नतीजे कहीं ज्‍यादा दीर्घकालिक होंगे। धरती को राख कर के अधिकतम रफ्तार से मुनाफा कमाने वाली सोच अब इंसानी वजूद के प्रति बेपरवाह हो चुकी है। इसलिए इक्‍कीसवीं सदी को परिभाषित करने वाला सवाल यह नहीं रह गया है कि मनुष्‍य असाधारण किस्‍म के तंत्र निर्मित कर सकता है या नहीं। सवाल यह है कि क्‍या हम तकनीकी, संस्‍थागत और नैतिक स्‍तर पर उन तंत्रों का मेल बैठा सकते हैं- इससे पहले कि वे हमारे नियंत्रण से फिसल जाएं!         

तब बीम पर बैठे लोग इसलिए बच सके थे क्‍योंकि उनके समाज ने साहसिक कृत्‍यों को संभव बनाने वाला एक अदृश्‍य ढांचा अंतत: खड़ा कर लिया था (सुरक्षा मानक, सुरक्षा उपाय, साझा जिम्‍मेदारी की संस्‍कृति)। किसी एक का नायकीय पौरुष वहां काफी नहीं होता। टाइम पत्रिका ने जो तस्‍वीर छापी है वह इतनी सशक्‍त है कि बेचैन करती है। वह पूंजीवाद के संकट के सबसे यादगार प्रसंग के साथ आज AI की अस्थिर धूम को नत्‍थी करते हुए हमसे सवाल पूछती है: क्‍या हम ऐसी संस्‍थाएं बनाएंगे जो इतनी ऊंचाइयों पर हमारे बचे रहने को संभव बना सकें, या फिर अपनी खब्‍तुलहवासी को स्‍वप्‍नदर्शिता मान बैठेंगे?


Copyright: Project Syndicate, 2025.


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