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Jan Gustaf Troell

Jan Troell : रूपहले परदे पर वंचितों के सपनों को पिरोने वाला एक फिल्मकार

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कामगार तबके की कहानियां परदे पर उतारने वाले स्‍वीडिश फिल्‍मकार यान गुस्‍ताफ़ त्रोएल 23 जुलाई, 2026 को 95 साल के पूरे हो गए। आधुनिक यूरोपीय सिनेमा में उनके जोड़ के उम्‍दा फिल्‍मकार बमुश्किल कुछ ही हैं। उस पर भी जीवित फिल्‍मकारों में एकाध ही। तकरीबन एक सदी तक मजदूरों, वंचितों और मेहनतकशों के प्रति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और कलात्‍मक संजीगदी को लेकर जी जाना इतना आसान नहीं होता। भारत में उम्‍दा सिनेमा के प्रेमियों को त्रोएल के काम के बारे में जरूर जानना चाहिए, विद्यार्थी चटर्जी की कलम से

Prof. Arun Kumar

पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया? अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का व्याख्यान

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मौजूदा दुनिया में जब भी मजदूरों की बात होगी, सबसे बुनियादी अंतर्विरोध पूंजी बनाम श्रम से ही बात उठेगी। पिछले सौ साल में कैसे पूंजी की बढ़ती हुई ताकत ने श्रमिकों को संगठित होने से रोका, कमजोर किया, कभी उनके संगठित होने का फायदा उठाया तो कभी उन्‍हें बिखेर दिया, यह न सिर्फ पूंजीवाद बल्कि मजदूर आंदोलन का भी इतिहास है। इसी इतिहास की रोशनी में और भारत के असंगठित मजदूरों के खास संदर्भ में आज की दुनिया और भविष्‍य के खतरों पर अर्थशास्‍त्री प्रो. अरुण कुमार ने दिल्‍ली में 5 जून 2026 को एक लंबा व्‍याख्‍यान दिया। व्‍याख्‍यान जेएनयू में उनके सहपाठी रहे शिक्षाविद अनिल चौधरी की स्‍मृति में था। उस व्‍याख्‍यान का लिप्‍यंतरित, संक्षिप्‍त और संपादित रूप

आंदोलन, दमन और बेकारी: दिल्ली NCR के मजदूर आंदोलन पर जन हस्तक्षेप की जांच रिपोर्ट

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दिल्‍ली से सटे नोएडा, गुड़गांव और मानेसर में बीते अप्रैल में भड़के मजदूरों के गुस्‍से और राज्‍य द्वारा दमन की पूरी कहानी सुनाई जानी अभी बाकी है। जो हजार से मजदूर गिरफ्तार किए गए थे, उन्‍हें अब भी कोई नहीं जानता। जो बंद हैं, उनमें भी चार-पांच सार्वजनिक चेहरे ही पोस्‍टरों पर हैं। अनाम और बेनाम मजदूर जो गांव लौट गए थे, वापस आकर बेरोजगार पड़े हैं। जो भीतर हैं, उनके परिजन जेल के चक्‍कर काट रहे हैं। मजदूर आंदोलन और दमन पर नागरिक मंच ‘जन हस्‍तक्षेप’ ने एक जांच रिपोर्ट दिल्‍ली में 19 जून को जारी की है। उसके कुछ संपादित अंश

A still from Farmers Movement 2020-21

किसान आंदोलन: पांच किताबें जिनमें दर्ज है अन्नदाता की बगावत और किस्मत का इतिहास

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स्‍वतंत्र भारत के इतिहास में उसकी राजधानी की चौहद्दी पर सबसे लंबे समय तक चले किसान आंदोलन को अब पांच साल पूरे हो गए हैं। आजकल पांच साल में स्‍मृतियां धुंधली पड़ जाती हैं। नई घटनाएं तो दिमाग पर तारी हो ही जाती हैं, ऊपर से अतीत को बदलने की कोशिशें भी हो रही हैं। फिलहाल बड़े जन आंदोलनों से तकरीबन खाली हो चुके इस समाज में पांच साल पहले घटे एक व्‍यापक आंदोलन को कैसे याद रखा जाए, कैसे समझा जाए और आगे उस समझ का क्‍या किया जाए, यह सवाल अहम है। किसान आंदोलन पर कुछ किताबें हैं, दस्‍तावेज हैं और पत्रिकाएं भी, जो इस काम को आसान बना सकती हैं। बीते पांच बरस में छपी ऐसी पांच चुनिंदा किताबों का जिक्र कर रहे हैं अभिषेक श्रीवास्‍तव

उत्तराखंड की सुरंग से लीबिया की डूबी नाव तक मरते मजदूर सरकारों के लिए मायने क्यों नहीं रखते!

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देश भर में सीवर में घुट कर मरते सफाईकर्मी हों, मेडिटेरेनियन सागर में नाव डूबने से मरते प्रवासी श्रमिक हों या फिर उत्‍तराखंड की चारधाम परियोजना के चलते सुरंग में दो हफ्ते से फंसे 41 मजदूर, ये सभी घटनाएं एक ही बात की ओर इशारा करती हैं कि सरकारों और कारोबारियों के मुनाफे की राह में कामगारों की जान का कोई अर्थ नहीं है। मजदूर किसी की प्राथमिकता में कहीं नहीं हैं। मजदूरों की सुरक्षा की उपेक्षा पर अरुण सिंह

आवारा सर्वहारा

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आज जैसे हालात हैं, उनमें कह सकते हैं कि कामगार किसी कमतर ईश्वर के बनाए हुए नहीं हैं बल्कि उनको बनाने वाला ईश्वर ही अब वजूद से बाहर है। हक्सर इस लिहाज से श्रेय की पात्र हैं कि वे कामगारों को बचा ले जाने का एक सार्थक और सृजनात्मक प्रयास करती हैं, जो सामूहिक स्मृतिभ्रंश का त्रासद शिकार हो चुके हैं।

MNREGA के 17 साल बाद मजदूर आंदोलन क्यों कर रहे हैं?

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मनरेगा मजदूरों की मांग है कि इस स्कीम के तहत मिलने वाले दैनिक भत्‍ते में बढ़ोतरी हो, काम के दिनों को बढ़ाया जाए और हाल ही में लागू किए गए ऑनलाइन हाजिरी सिस्टम के चलते उनके सामने आ रही दिक्कतों का समाधान किया जाए।