MNREGA के 17 साल बाद मजदूर आंदोलन क्यों कर रहे हैं?

मनरेगा मजदूरों की मांग है कि इस स्कीम के तहत मिलने वाले दैनिक भत्‍ते में बढ़ोतरी हो, काम के दिनों को बढ़ाया जाए और हाल ही में लागू किए गए ऑनलाइन हाजिरी सिस्टम के चलते उनके सामने आ रही दिक्कतों का समाधान किया जाए।

महात्मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की आजकल देश में बहुत चर्चा है। इसकी वजह एक तो हाल ही में आया केंद्र सरकार का बजट है जिसमें पिछले बजट के मुकाबले मनरेगा पर होने वाले खर्च में भारी कटौती की गई है। इसके अलावा देश भर के मनरेगा मजदूर भी इन दिनों अपनी तीन बड़ी मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं और अब यह आंदोलन दिल्ली के जंतर मंतर तक पहुंच गया है। मनरेगा मजदूरों की मांग है कि इस स्कीम के तहत मिलने वाले दैनिक भत्‍ते में बढ़ोतरी हो, काम के दिनों को बढ़ाया जाए और हाल ही में लागू किए गए ऑनलाइन हाजिरी सिस्टम के चलते उनके सामने आ रही दिक्कतों का समाधान किया जाए।

केंद्र सरकार ने इस बार मनरेगा के लिए 60 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा है। यह पिछले 2022-23 के बजट की तुलना में 17.8 फीसदी कम है।

केंद्र सरकार का मनरेगा बजट और कुल खर्च

वित्त वर्षआवंटित (अ)संशोधित (ब)कुल खर्च (स)अंतर (अ – स)
2018 – 1955,00061,08461,81512.39%
2019 – 2060,00071,00271,68719.47%
2020 – 2161,5001,11,5001,11,17080.76%
2021 – 2273,00098,00098,46834.88%
2022 – 2373,00089,40022.46%
2023 – 2460,000

अगर 2018 से लेकर 2023 तक मनरेगा पर हुए कुल खर्च पर गौर करें तो पाएंगे कि सरकार मनरेगा के लिए जितना भी बजट आवंटित करती है उससे कई गुना ज्यादा उसे बाद में खर्च करना पड़ता है. यानी लगातार बढ़ते खर्च के बीच भी सरकार ने इस वर्ष मनरेगा बजट को 17 प्रतिशत कम किया है। उसके इस फैसले पर ही सवालिया निशान है। अगर आवंटित बजट और कुल खर्च को देखें तो इनके बीच का अंतर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। आवंटित और कुल खर्च में जहां 2018-19 में 12.39 प्रतिशत अधिक का खर्च आया वहीँ 2019-20 में 19.47 प्रतिशत अधिक का खर्च आया। 2020-21 में आवंटित और कुल खर्च में अब तक का सर्वाधिक 80.76 प्रतिशत अंतर रहा है। 2021-22 में 34.88 प्रतिशत का अंतर रहा, 2022-23 में 22.46 प्रतिशत का अंतर रहा है। हैरानी की बात ये है कि इतने वर्षों से चले आ रहे इस अंतर के बावजूद मनरेगा बजट में कटौती का सरकार के पास कोई खास जवाब भी नहीं है।

बजट आने के बाद वित्त मंत्री ने भुवनेश्वर में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि ‘मनरेगा के लिए धन आवंटन में कोई कमी नहीं आई है। यह मांग पर आधारित योजना है। जब भी मांग बढ़ती है, अधिक धन का प्रावधान कर दिया जाता है।’ एक तरफ तो देश की वित्त मंत्री मनरेगा बजट को मांग के आधार पर बढ़ाने की बात कह रही हैं और दूसरी तरफ लगातार आवंटित और कुल खर्च के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। ऐसे में सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

मनरेगा की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि फ़रवरी 2022 में ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थाई समिति ने सरकार से सिफारिश की थी कि मनरेगा के तहत मिलने वाले काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 150 दिन किया जाए। साथ ही मनरेगा में अलग-अलग राज्यों में मिल रही दिहाड़ी को भी एक समान कर दिया जाए क्योंकि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले जरूरतमंद लोगों के लिए मनरेगा ही आखिरी उम्मीद है।

यदि देशभर में मनरेगा मजदूरों की संख्या को देखें, तो केंद्र सरकार द्वारा जारी आकड़ों के मुताबिक 2023 तक देश में लगभग 15 करोड़ 2 लाख 11 हजार 773 सक्रिय मजदूर हैं जिन्हें इस वक्त काम मिल रहा है, जबकि देश में पंजीकृत मजदूरों की संख्या 28 करोड़ 79 लाख 95 हजार 680 के करीब है। अगर राज्यवार पंजीकृत मजदूरों की संख्या को देखा जाए तो सर्वाधिक मनरेगा मजदूर उत्तर प्रदेश में हैं जिनकी संख्या 3 करोड़ 9 लाख 86 हजार 661 है। दूसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल है जहां 2 करोड़ 84 लाख 83 हजार 602 सक्रिय मजदूर हैं। इसके बाद महाराष्ट्र में 2 करोड़ 74 लाख 54 हजार 621 मजदूर पंजीकृत हैं जबकि राजस्थान में 2 करोड़ 59 लाख 12 हजार 887 पंजीकृत मजदूर हैं। इसी तरह देश के अन्य राज्यों में भी मनरेगा मजदूरों की संख्या लाखों–करोड़ों में है।

मजदूर किसान संघर्ष समिति के सदस्य और मनरेगा मजदूरों के लिए काम करने वाले निखिल डे ने मनरेगा बजट में हुई कटौती पर कहा है कि अलग-अलग राज्यों में मनरेगा के तहत जो पैसे मिलते हैं, यदि सभी मनरेगा मजदूरों को 100 दिन का भी काम दे दिया जाए तो करीब 2.72 लाख करोड़ रुपए बजट की जरूरत पड़ेगी। उनका कहना है कि अगर कम से कम दिन भी यानी कि 40 दिन भी सभी लोगों को काम दिया जाए तो भी करीब 1.24 लाख करोड़ रुपए बजट की जरूरत पड़ेगी जबकि सरकार ने इस बार मनरेगा बजट को सिर्फ 60 हजार करोड़ तक ही रखा है।

निखिल डे बताते हैं, “मनरेगा के तहत वित्त वर्ष 2022-23 में जनवरी तक करीब 16 हजार करोड़ रुपए का भुगतान नहीं हो पाया है जो कि साल खत्म होने तक 25 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है.”

कोरोनाकाल में जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा था तो जिन प्रवासी मजदूरों की नौकरी छिन गई थी उनके लिए मनरेगा योजना वरदान साबित हुई थी। 2020-21 में कोरोना के दौरान 389 करोड़ लोगों को मनरेगा के तहत रोजगार मिला जो अब तक का रिकॉर्ड है। 2021-22 में 363 करोड़ लोगों को काम मिला था। इन आंकड़ों को देखते हुए सरकार द्वारा मनरेगा के बजट को लगातार कम करते जाना अपने आप में चिंता का विषय है।

हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नरेगा मजदूर यूनियन के बैनर तले सैकड़ों मजदूरों ने धरना प्रदर्शन किया। पंजाब से आई नरेगा मजदूर यूनियन की महिला नेता का कहना है कि ‘हमारी एक दिन की दिहाड़ी करीब 282 रुपए है। हमको 100 दिन रोजगार मिलने की बात कही जाती है वो भी हमें पूरे 100 दिन नहीं मिल पाती है। अलग-अलग राज्यों में अलग वेज मिलते हैं।’

उनका कहना है कि नरेगा मजदूरों की दिहाड़ी 700 रुपए तक की जाए और ये रेट सभी राज्यों में समान रूप से लागू किया जाए। वे कहती हैं, ‘जो 282 रुपए डेली के मिलते हैं इतनी महंगाई में उतने से कैसे गुजारा होगा। काम करने जाओ, तो न तो वहां पानी का प्रबंध है, न नवजात बच्चों को देखने-भालने का कोई प्रबंध, काम कैसे करें? कोई भी ऐसी सुविधा का प्रबंध इस नरेगा कानून में नहीं है। महंगाई कितनी बढ़ गई है, इतने से पैसे में हमें सब कुछ करना है। हमारी मांग है कि 100 दिन की दिहाड़ी को बढ़ाकर 250 दिन किया जाए।’

मनरेगा में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पैसे फिक्स हैं। अगर ज्यादा मजदूरी देने वाले राज्यों की लिस्ट को देखें तो शीर्ष पर हरियाणा है जहां एक दिन की दिहाड़ी के लिए सर्वाधिक 331 रुपए मिलते हैं। गोवा में 315 रुपए, केरल में 311 रुपए, कर्नाटक में 309 रुपए और पंजाब में 282 रुपए मिलते हैं। मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ में सबसे कम मजदूरी मिलती है। यहां पर प्रतिदिन 204 रुपए दिहाड़ी है, वहीँ झारखण्ड और बिहार में 210 रुपए और त्रिपुरा में 212 रुपए दिहाड़ी है। सबसे अधिक और सबसे कम दिहाड़ी वाले राज्यों का अंतर देखा जाए तो ये औसतन 127 रुपए पड़ता है। इस अंतर को खत्म करने के लिए फरवरी 2022 में ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट में सरकार से सिफारिश की गई थी कि सभी राज्यों में मिलने वाली दिहाड़ी को एक समान किया जाए।

इन सबके बीच एक अहम मुद्दा जिसके लिए मनरेगा मजदूर दिल्ली के जंतर-मंतर के अलावा अलग-अलग राज्यों में भी धरना प्रदर्शन कर रहे हैं वो है ऑनलाइन हाजिरी प्रक्रिया के तहत आने वाली दिक्कतें।. दरअसल, मई 2021 में नरेगा मजदूरों की ऑनलाइन हाजिरी के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वार NMMS (National Mobile Monitoring Software)  नामक एक ऐप लांच की गई। इस ऐप पर दिन में दो टाइम हाजिरी भरनी होती है, सुबह 6 बजे से 11 बजे के बीच और दोपहर 2 बजे से 5 बजे के बीच। इसमें मजदूरों के नाम फीड किए जाते हैं और काम पर आए हुए मजदूरों के नाम के आगे टिक करके उनकी हाजिरी लगाई जाती है। इसके अलावा काम पर आए हुए मजदूरों की सुबह और शाम दोनों टाइम एक ग्रुप फोटो खींचकर ऐप पर अपलोड भी करनी होती है। खास बात ये है कि इस ऐप पर हाजिरी निर्धारित समय के बीच ही लगती है, समय बीत जाने के बाद हाजिरी लगाने का विकल्प बंद हो जाता है।

बिहार के मुजफ्फरपुर से जंतर-मंतर पर धरना देने आईं अनीता देवी कहती हैं:

ऑनलाइन हाजिरी में बहुत सी दिक्कते आती हैं, कभी कभी पांच दिन की हाजिरी में तीन दिन के ही पैसे आते है। कभी नेटवर्क के चलते हाजिरी सही नहीं हो पाती तो काम के पैसे नहीं मिल पाते हैं। नेटवर्क खराब होने से हाजिरी लग नहीं पाती है। कभी मोबाइल बंद हो जाता है। इन तमाम दिक्कतों के बीच परेशानी तो हम मजदूरों को ही होती है। पैसे तो हमारे ही कटते हैं। सरकार को हमारी दिक्कतों की कोई सुध नहीं है।

यूपीए सरकार के दौरान 2005 में लागू हुई मनरेगा स्कीम अपने अस्तित्‍व के 17 साल पूरे कर चुकी है। सवाल उठता है कि भारी-भरकम बजट के साथ करोड़ों लोगों को टारगेट करने वाली इस योजना को जिस उद्देश्य के साथ लाया गया था उस पर यह कितना खरी उतरी है? क्या यह योजना मजदूरों के लिए रोजगार का एक स्थाई विकल्प बनने में सफल रही है? इन दोनों सवालों का जवाब अगर हम अब तक के जारी आकड़ों में ढूंढने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि यह योजना अपने उद्देश्य से काफी दूर है। इस सबके बीच एक मुख्य सवाल ये भी है कि मनरेगा मजदूरों का जो पिछला बकाया (16 हजार करोड़) है वो ही सरकार नहीं दे पाई है, उस पर से बजट में कटौती एक बड़ा सवाल है।



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