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Existential threat of AI

अगले दो से तीन साल में AI समूचे मीडिया को निगल जाएगा, मनुष्य को विस्थापित कर देगा!

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ के दौरान विद्याथिर्यों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समझदारी भरे उपयोग का आग्रह करते हुए कहा है कि वे उस पर निर्भर न हों, बल्कि केवल दिशानिर्देश के लिए सहयोग लें। यह बात सुनने में जितनी अच्‍छी लगती है, उतनी ही सदिच्‍छा भरी है। AI जितनी तेजी से मानवीय उद्यमों की जगह छेकता जा रहा है, आने वाले दो से तीन साल में तकरीबन समूचे पारंपरिक मीडिया में वह मनुष्‍य की भूमिका का खत्‍म कर देगा। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के AI संपादक चार्ल्‍स फर्गुसन ने AI कंपनियों के प्रमुखों से इस विषय में बात कर के एक चेतावनी भरा लेख लिखा है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए

MAGA rally US, Courtesy Project Syndicate

किताबी फासीवाद : अपने वैचारिक वारिसों के लिए बीसवीं सदी के फासिस्टों की नुस्खा-पर्ची कैसी होगी?

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जो नाज़ीवादी और फासीवादी ताकतें बीसवीं सदी में चले लोकतांत्रिक संघर्षों में खत्‍म हो गई मानी जा रही थीं, उनका इक्‍कीसवीं सदी में नई शक्‍ल में उभार यह सोचने को विवश करता है कि उनकी योजना क्‍या है और आने वाली दुनिया की सूरत कैसी होगी। प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से प्रसिद्ध अर्थशास्‍त्री यानिस वारूफाकिस की एक कल्‍पना, जिसमें वे गिनवा रहे हैं कि आज के फासिस्‍टों के पूर्वज अगर किसी तिजोरी में कोई नुस्‍खा-पर्ची छोड़ गए रहे हों तो उस पर क्‍या-क्‍या लिखा होगा।

Joaquin Phoenix in a still from Joker (2019)

हँसना मना है : फ़रमाँ-बरदारी की पूंजी-केंद्रित संस्कृति में धूमिल पड़ता सार्वजनिक हास्यबोध

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हँसी मनुष्‍य की सबसे सहज अभिव्‍यक्ति है; हँसी हर दर्द की दवा है; लेकिन हँसना ही मर्ज बन जाए तब? पहली बार इमरजेंसी के दौरान हँसने पर रखी जा रही निगाह और लोकतंत्र के अंतिम क्षण पर निकलती निरंकुश हँसी की बात रघुवीर सहाय ने की थी। तब से लेकर अब तक, समाज में हँसी सहज नहीं रही है। अब हँसने के प्रयत्‍न करने पड़ते हैं, जैसा परसाई ने बरसों पहले कहा था, कि शीत और गर्मी के बीच से जो जितना वसंत निकाल सके, निकाल ले। दो पाटों के बीच फँसे ‘घायल वसंत’ में चोटिल हास्‍यबोध के सामाजिक इतिहास पर श्रीप्रकाश की नजर

Time Cover, Dec 29, 2025

TIME का वार्षिकांक कवर: गरमाती धरती और AI की ख़ब्‍त के बीच हवा में फिर भोज

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प्रसिद्ध समाचार पत्रिका टाइम ने महामंदी के दौर की 1932 की एक तस्‍वीर को चेहरे बदलकर 2025 का अपना अंतिम कवर बनाया है। बेचेहरा मजदूरों की जगह उसने दुनिया में AI के सरताज कारोबारियों को चिपका कर सामूहिक रूप से ‘पर्सन ऑफ द ईयर’ घोषित किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भयंकर तेजी, लगातार गरमाती और मनुष्‍ता के लिए खतरा पैदा करती धरती, तथा संस्‍थागत व नैतिक मानदंडों के साथ बेमेल होते प्रौद्योगिकीय ढांचे पर साल के अंत में अंतरा हालदर की जरूरी टिप्‍पणी, प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से

Indian historical figures depicted in Gyanendra Pandey's book

पुस्तक समीक्षा : भारतीय समाज के ऐतिहासिक किरदार अपने घर की औरतों के लिए कैसे ‘मर्द’ थे?

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बहुत लंबे समय तक लैंगिकता के प्रश्‍न का अध्‍ययन औरतों को केंद्र में रखकर किया गया। आज भी भारतीय नारीवाद खुद को ज्‍यादातर औरतों के सवालों तक ही सीमित रखता है, हालांकि पुरुषों को समझने के लिए उनको केंद्र में लाने का चलन पश्चिम में काफी पहले शुरू हो चुका था। सबाल्‍टर्न इतिहासकार ज्ञानेंद्र पाण्‍डेय की इस साल आई नई किताब ‘मेन ऐट होम’ भारत की कुछ नायकीय विभूतियों के घरेलू व्‍यवहार की पड़ताल कर के घर और बाहर के बीच मर्दानगी की फांक को समझने की कोशिश करती है। इस किताब की समीक्षा अतुल उपाध्‍याय ने की है, जो लोकसंगीत में मर्दानगी के तत्‍वों पर खुद शोध कर रहे हैं

2025 Nepalese Gen Z movement protesters celebrating

हमारी उद्देश्यपूर्ण सामाजिक कार्रवाइयों के परिणाम क्या हमारे नियंत्रण से बाहर निकल चुके हैं?

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प्रौद्योगिकी ने बीते दो दशकों में सामूहिक कार्रवाई, गोलबंदी, और आंदोलन का स्‍वरूप बुनियादी रूप से बदल डाला है। निश्‍चित रूप से सामाजिक कार्रवाइयां सोद्देश्‍य ही की जाती हैं, लेकिन उनके नतीजे करने वालों के हाथ से फिसल भी जाते हैं। आज की दुनिया इस मामले में कहीं ज्‍यादा अनिश्चित हो चली है। जैसे, नेपाल में युवाओं की ताजा बगावत जिसने दो दिन में सत्ता तो पलट दी, लेकिन उस क्रम में हुई भारी हिंसा से युवाओं ने खुद को अलग भी कर लिया। जो अंतिम परिणाम निकला, क्‍या बगावत उसी उद्देश्‍य से थी? हम नहीं जानते। अप्रत्‍याशित नतीजों के समाजविज्ञान पर एडवर्ड टेनर की यह टिप्‍पणी शायद रोशनी दे

1984 by George Orwell

युद्ध ही शांति है : पचहत्तर साल पहले छपे शब्दों के आईने में 2025 की निरंकुश सत्ताओं का अक्स

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सर्वसत्तावाद, अंधराष्‍ट्रवाद, स्‍वतंत्रता पर बंदिशों, निरंकुशता और एक पार्टी के एकाधिकारी राज का संदर्भ जब-जब आता है, 1949 में प्रकाशित जॉर्ज ऑरवेल के उपन्‍यास 1984 की सहज याद हो आती है। पचहत्तर वर्ष बाद यह उपन्‍यास अपने लेखनकाल के मुकाबले कहीं ज्‍यादा प्रासंगिक हो चुका है, इतना कि आए दिन कोई न कोई नेता, अदालत या असहमत इसको उद्धृत करता है। ऑरवेल ने 1984 में अपने काल्‍पनिक किरदार इमानुएल गोल्‍डस्‍टीन की एक काल्‍पनिक पुस्‍तक ‘द थ्‍योरी ऐंड प्रैक्टिस ऑफ ओलिगार्चल कलेक्टिविज्‍म’ के तीसरे अध्याय में युद्ध पर सर्वसत्तावादी पार्टी के नजरिये से विचार किया था। निरंकुश सत्ताओं को समझने के लिए प्रस्‍तुत युद्धविषयक तकरीर को वर्तमान संदर्भों में पढ़ा जाना चाहिए

Pope Francis

अर्थशास्त्र की रोगग्रस्त आत्मा के ‘पापमोचन’ का आह्वान करने वाला एक धर्माचार्य

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कैथोलिक चर्च के सबसे बड़े धमार्चार्य पोप फ्रांसिस का बीते 21 अप्रैल को निधन हो गया। उनके 12 साल लंबे कार्यकाल का एक कम उजागर पक्ष उनके बदलावकारी आर्थिक विचारों में जाहिर होता है, जहां वे मौजूदा दुनिया को चलाने वाले आर्थिक विचार को गरीबों का हत्‍यारा करार देते हैं और अर्थशास्त्रियों से लोकमंगल के लिए काम करने का आह्वान करते हैं। पर्यावरण संकट से लेकर सामाजिक असमानता तक सबकी जड़ अर्थशास्‍त्र में देखने वाले फ्रांसिस की आर्थिक आलोचना पर अंतरा हालदर की टिप्‍पणी

Aristotle

भ्रमित नैतिकता और खंडित नागरिकता के इस दौर में अरस्तू कैसे प्रासंगिक हैं

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एक अच्‍छे जीवन का मतलब क्‍या होता है, इस पर विचार करते हुए अरस्‍तू ने एक रूपरेखा प्रस्‍तुत की थी। नैतिक्र भ्रम और नागरिक विखंडन के हमारे दौर के लिए वह रूपरेखा बहुत प्रासंगिक है। उन्‍होंने पहले ही देख लिया था कि हमारे बीच उभरने वाले तमाम मतभेदों के मूल में दरअसल उद्देश्‍य, आपसदारी और प्रतिष्‍ठा की एक साझा आस छुपी हुई है। इक्‍कीसवीं सदी के इनसानी, समाजी और सियासी संकट पर अरस्‍तू के यहां से एक वैचारिक और व्‍यावहारिक रास्‍ता बता रही हैं अंतरा हालदर

Plato and manuscript from the 3rd century AD, containing fragments of Plato's Republic.

US चुनाव: असमानता और लोकतंत्र के रिश्ते पर 2300 साल पुराने राजनीतिक दर्शन का एक सबक

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अमेरिका के राष्‍ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्‍याशी और पूर्व राष्‍ट्रपति‍ डोनाल्‍ड ट्रम्‍प की 5 नवंबर को हुई जीत से कुछ लोग अब तक चौंके हुए हैं। इस जीत के राजनीतिक कारणों से इतर, लोकतंत्र की राजनीति से जुड़ी कुछ पुरानी दार्शनिक स्‍थापनाएं भी हैं जो ट्रम्‍प की वापसी को स्‍वाभाविक रूप से देख-समझ रही हैं। येल युनिवर्सिटी में दर्शनशास्‍त्र के प्रोफेसर जेसन स्‍टैनली ने बहुत संक्षेप में समझाया है कि अमेरिका में चुनावों के रास्‍ते लोकतंत्र का पतन अवश्‍यम्‍भावी क्‍यों था।