इस वर्ष की शुरुआत देश में श्रमिक असंतोष से हुई। बिहार (बरौनी), हरियाणा (पानीपत रिफाइनरी), मध्यप्रदेश (सिंगरौली), छत्तीसगढ़ (कोरबा), आंध्र प्रदेश (अल्ट्राटेक) और तमिलनाडु समेत अनेक राज्यों में स्थित उद्योगों में श्रमिकों और खासतौर पर ठेका मजदूरों ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने, काम के घंटे तय करने और दोगुना ओवरटाइम व बोनस देने जैसी मांगों को लेकर धरना, प्रदर्शन और हड़ताल किया। कुछ औद्योगिक कंपनियों में श्रमिकों को आश्वासन या राहत मिली तो दूसरी जगहों पर संघर्ष को और तेज करने की प्रेरणा भी मिली।
धीरे-धीरे मजदूरों के ये सवाल हरियाणा के गुड़गांव-मानेसर, गुजरात के सूरत, उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर नोएडा और फिर उत्तराखंड तक पहुंच गए। अप्रैल 2026 के पहले सप्ताह से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के श्रमिकों के बड़े आंदोलन देखे गए। उन पर पुलिस प्रशासन और कंपनी प्रबंधकों के गुर्गों द्वारा बड़े पैमाने पर संयुक्त हमले, लाठीचार्ज, आगजनी और गिरफ्तारियों की घटनाएं भी सामने आईं। खास तौर से नोएडा में श्रमिकों का बड़े पैमाने पर दमन और गिरफ्तारियां हुईं।
मीडिया में श्रमिक असंतोष को सरकार के हवाले से पाकिस्तान-प्रायोजित और देश-विरोधी कह कर प्रचारित किया गया। इस पृष्ठभूमि में नागरिक अधिकार संगठन ‘जन हस्तक्षेप’ ने एक तथ्यान्वेषी टीम नोएडा और गुड़गांव-मानेसर भेजकर मौजूदा हालात और सभी घटनाओं का संपूर्णता में अध्ययन किया। दो अलग-अलग जांच दल बनाए गए। एक टीम 24 अप्रैल 2026 को नोएडा गई और दूसरी ने 17 मई 2026 को गुड़गांव-मानेसर का दौरा किया। इसके अलावा, नोएडा और गुड़गांव से गिरफ्तार किए गए कई श्रमिक कार्यकर्ताओं व नेताओं ने जमानत पर छूटने के बाद जांच दल से मुलाकात कर तथ्यों की जानकारी दी। गुड़गांव-मानेसर और नोएडा के श्रमिक आंदोलन और दमन पर जन हस्तक्षेप की जांच की समग्र रिपोर्ट दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में 19 जून को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सार्वजनिक की गई।

दिल्ली एनसीआर: मजदूर और कारोबार
दिल्ली एनसीआर बीते दशकों में देश का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र और नतीजतन भारी-भरकम श्रमिक आबादी वाला क्षेत्र बन गया है। एनसीआर के भीतर गुरुग्राम, मानेसर, फरीदाबाद, ग्रेटर नोएडा, नोएडा, गाजियाबाद, बहादुरगढ़, नारायणा, वजीरपुर, मायापुरी, बवाना, नरेला सहित कुल 24 मान्यता-प्राप्त औद्योगिक क्षेत्र हैं। इसके अलावा एनसीआर में सैकड़ों औद्योगिक क्लस्टर भी हैं। बहुत सारे लघु उद्योग पंजीकृत भी नहीं हैं, जो रिहायशी इलाकों में चलते हैं। इसलिए वहां कोई श्रम कानून लागू नहीं होता। इस तरह यहां छोटी बड़ी हजारों औद्योगिक इकाइयों, निर्माण क्षेत्रों सहित 80 लाख से डेढ़ करोड़ स्थाई और अस्थाई श्रमिक काम करते हैं। कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जो बता सके कि कितनी औद्योगिक इकाइयां हैं और उनमें कितने श्रमिक हैं। मीडिया रिपोर्ट, निजी अध्ययनों और इंटरनेट पर उपलब्ध आंकड़े ही एकमात्र अनुमानित स्रोत हैं।
इसमें नोएडा और ग्रेटर नोएडा को उत्तर भारत के सबसे बड़े औद्योगिक क्लस्टरों में गिना जाता है। नोएडा अथॉरिटी और उद्योग संगठनों के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार नोएडा में लगभग 11000 औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें से 9700 यूनिट चालू स्थिति में हैं और लगभग 7500 फैक्ट्री कानून के तहत पंजीकृत हैं। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे क्षेत्र में स्थित औद्योगिक इकाइयों की संख्या 15000 के आसपास हैं। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, कपड़ा, ऑटोमोबाइल पार्ट, आइटी हार्डवेयर, निर्माण, गोदाम, निर्यात उद्योग से संबंधित छोटी-बड़ी मिलाकर 15 से 20 हजार औद्योगिक इकाइयां यहां हैं।
इन इकाइयों में लगभग 17 लाख श्रमिक कार्यरत हैं। इनमें तीन से पांच लाख नियमित और 10 से 12 लाख ठेका श्रमिक हैं यानी ठेका मजदूरों की संख्या 75 प्रतिशत से ज्यादा है। नोएडा में कुल श्रमिक और औद्योगिक निर्माण क्षेत्रों को मिला कर 8 से 12 लाख श्रमिक काम करते हैं। यहां सेक्टर 63, 64, 65, फेज वन इंडस्ट्रियल एरिया, फेज 2 इंडस्ट्रियल एरिया, नोएडा स्पेशल इकोनॉमिक जोन, ईकोटेक 1-12, सूरजपुर इंडस्ट्रियल एरिया, कासना इंडस्ट्रियल एरिया, और ग्रेटर नोएडा इंडस्ट्रियल बेल्ट हैं जहां मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ से आने वाले प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में काम करते हैं। कोविड के समय श्रम विभाग ने सिर्फ 38000 निर्माण श्रमिकों का पंजीकरण किया था।
हरियाणा का गुड़गांव और मानेसर क्षेत्र देश के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल, ऑटो पार्ट, कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स और निर्यात केंद्रित उद्योग के लिए जाना जाता है। हरियाणा श्रम विभाग के डेटाबेस के अनुसार गुड़गांव में लगभग 20 हजार छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें सरकारी और निजी औद्योगिक क्षेत्र तथा पुराने औद्योगिक क्लस्टर शामिल हैं। हरियाणा के औद्योगिक संगठनों और श्रम विभाग के अनुमानों के अनुसार गुडगांव-मानेसर बेल्ट में कुल औद्योगिक श्रमिक लगभग 10 लाख हैं। इनमें तीन लाख श्रमिक स्थाई और सात लाख ठेका पर काम करते हैं। केवल आइएमटी मानेसर में ही उद्योग संगठनों के अनुसार लगभग 3000 कारखाने हैं जहां साढ़े तीन से चार लाख श्रमिक काम करते हैं। गुड़गांव के अनियमित औद्योगिक इलाकों दौलताबाद, बसई, कादीपुर, बहरामपुर में 5000 से अधिक लघु और मध्यम औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें लगभग एक लाख से अधिक श्रमिक ठेके पर काम करते हैं। मानेसर की अनेक फैक्ट्रियों में ज्यादातर ठेका श्रमिक हैं। ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट उद्योग में पिछले डेढ़ दशक के दौरान ठेका श्रमिकों का अनुपात तेजी से बढ़ा है।
एनसीआर में बड़ी संख्या में कामगार अनौपचारिक हैं क्योंकि कंपनी में वे कच्चे रजिस्टर में दर्ज हैं। बोनस, ईपीएफ, ईएसआइ, अवकाश जैसी जरूरी सुविधाएं उन्हें नहीं मिलती हैं, तो उनका कोई सरकारी रिकॉर्ड भी नहीं है। इसलिए वास्तविक आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पाते।
हरियाणा: जहां से चिंगारी उठी…

जन हस्तक्षेप की चार सदस्यीय टीम 17 अप्रैल 2026 को गुड़गांव पहुंची। जांच दल के सदस्यों में हिंदू कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर ईश मिश्र, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सिद्धार्थ, जन हस्तक्षेप के सह-संयोजक और वरिष्ठ पत्रकार अनिल दुबे, तथा टीवी पत्रकार हैदर नकवी शामिल थे। टीम ने प्रभावित मजदूरों और भोंडसी जेल में बंद श्रमिक कार्यकर्ताओं की स्थिति, जेल से छूटे श्रमिक नेताओं, कार्यकर्ताओं और गिरफ्तार लोगों के परिजनों से मिल कर विस्तृत बातचीत की।
हरियाणा में पुलिस प्रशासन ने 44 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिसमें 22 महिलाएं भी थीं। कुल 95 एफआइआर दर्ज की गई थीं। बाद में गिरफ्तार लोगों को जमानत पर छोड़ दिया गया। इसके अलावा 94 एफआइआर के तहत 17 लोग हिरासत में लिए गए थे। इनमें से कई को धारा 307 के तहत भोंडसी जेल में रखा गया। जांच दल के लौटने के दूसरे दिन 18 अप्रैल 2026 को बेलसोनिका यूनियन के जनरल सेक्रेटरी अजीत सिंह की जमानत हुई। शेष लोग रिपोर्ट लिखे जाने तक जेल में थे और उनकी जमानत की कोशिशें जारी थीं।
जाच दल की 17 मई को बेसोनिका यूनियन के महासचिव अजीत सिंह से मुलाकात नहीं हो सकी थी क्योंकि तब वह जेल में थे। जेल से छूटने के बाद 28 मई को जांच दल ने उनसे संपर्क किया। उन्होंने बताया कि मजदूरों के भीतर लंबे समय से असंतोष पनप रहा था क्योंकि श्रमिकों और ठेका मजदूरों का न्यूनतम वेतन हरियाणा सरकार ने दस वर्षों से नहीं बढ़ाया था। उन्हें 11200 रुपये का वेज मिलता है। इस वेज में कोई महंगाई भत्ता नहीं जुड़ता। साथ ही यह वेतन भी पूरा श्रमिक के हाथ में नहीं आता क्योंकि ईएसआइ और फंड के नाम पर कंपनी पैसा काट लेती है, जबकि ठेके पर होने के कारण उन्हें मेडिकल, बीमा या फंड की कोई सुविधा भी नहीं मिलती। इस तरह कटने के बाद 11000 या उससे कम ही वेतन उनके हाथ आता है।
मजदूरी की बढ़ोतरी के लिए गुड़गांव-मानेसर औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक ट्रेड यूनियनें निरंतर विरोध प्रदर्शन कर रही थीं। कम वेतन, बेतहाशा बढ़ रही महंगाई और गैस की कीमत चौगुनी होने से श्रमिक त्रस्त हो चुके थे। श्रमिकों के असंतोष को देखते हुए 2025 में मजदूरी बढ़ाने को लेकर राज्य सरकार ने एक कमेटी बनाई थी। इसमें कंपनियों का प्रबंधन एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन और श्रम विभाग के प्रतिनिधि सदस्य शामिल थे। अंतिम बैठक दिसंबर में हुई, जिसमें न्यूनतम मजदूरी वृद्धि पर सहमति बनी जिसे 1 अप्रैल 2026 से लागू करना था। बाद में हरियाणा सरकार ने कमेटी की रिपोर्ट में संशोधन करते हुए 3 अप्रैल को 15220 रुपए न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने पर सहमति दी और फिर 8 अप्रैल को उसका नोटिफिकेशन जारी किया। इसी दौरान हरियाणा सरकार ने गुड़गांव-मानेसर सहित कई जिलों में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक तबादले किए।
इससे ठीक पहले 2 अप्रैल को होंडा ऑटोमोबाइल कंपनी के ठेके पर काम करने वाले श्रमिकों ने कंपनी के गेट परहड़ताल की थी। उनकी चार मांगें थीं- वेतन 11000 रुपये से बढ़ाकर 20000 रुपया किया जाए, ओवरटाइम दोगुना किया जाए, बोनस ऐक्ट के तहत दीपावली से पहले बोनस दिया जाए और कार्यस्थलों पर उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए। इस पर कंपनी ने पांच सदस्यीय एक कमेटी बनाई, जिसमें जिला प्रशासन, कंपनी प्रबंधन, श्रम विभाग और श्रमिकों के प्रतिनिधि शामिल थे। कमेटी ने बातचीत के बाद 1500 रुपये की वेतन बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया, जिसे श्रमिकों ने ठुकरा दिया। रात को श्रमिक अपने घर चले गए और 3 अप्रैल को वापस आए तो प्रशासन ने उन्हें गेट पर धरना देने से रोक दिया। श्रमिक वहां से उठकर तहसील स्थित पार्क में आ गए, जहां परंपरागत रूप से आंदोलनकारी बैठते रहे हैं। इसके बाद प्रशासन और कंपनी प्रबंधन ने फिर से नई कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया और अपने प्रतिनिधि भेजे। दो घंटे की वार्ता हुई जिसमें न्यूनतम मजदूरी 16000 रुपये का प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। उसमें डबल ओवरटाइम और बोनस देने के अलावा रात की ड्यूटी करने पर अतिरिक्त भत्ता देने पर भी सहमति बनी। कंपनी प्रबंधन ने यह भी वादा किया कि दो दिन की हड़ताल में शामिल किसी भी ठेका श्रमिक को नौकरी से नहीं निकाला जाएगा और न ही उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की जाएगी।
होंडा की मुख्य कंपनी के श्रमिकों की इस जीत के बाद होंडा के लिए शाकर बनाने वाली उसकी सहायक कंपनी मुंजाल शोवा के ठेका श्रमिक भी धरने पर बैठ गए। उन्होंने भी वही मांगें दोहराईं। इसके बाद हीरो ऑटोमोबाइल कंपनी की वेंडर कंपनी सत्यम के ठेका श्रमिक जिनकी संख्या लगभग 1000 है, वे भी धरने पर बैठ गए। सभी कंपनियों के ठेका श्रमिक मानेसर तहसील पर जुटने लगे। इसमें 5 अप्रैल को रूप पॉलिमर के ठेकाकर्मी भी शामिल हो गए। इसके बाद 7 अप्रैल को गारमेंट सेक्टर की ऋचा ग्लोबल कंपनी और उसकी सहायक कंपनियों रिचिको, मोडोलमा के श्रमिक भी तहसील मुख्यालय पर धरना देने पहुंचे। सभी कंपनियों के ठेका कर्मचारियों की वही मांगें थीं, जिसे होंडा कंपनी अपने ठेका श्रमिकों के लिए मंजूरी दे चुकी थी।
कई कंपनियों के ठेका श्रमिकों के संयुक्त होते जा रहे आंदोलन से वार्ता के लिए जिला प्रशासन, श्रम विभाग और कंपनी प्रबंधन के प्रतिनिधि श्रमिकों के साथ बैठ कर वार्ता करते रहे। इस दौरान ट्रेड यूनियन या ठेका श्रमिकों के बीच काम करने वाले मजदूर कार्यकर्ताओं को धरनास्थल पर जाने से पुलिस प्रशासन और कंपनी प्रबंधन लगातार रोकता रहा। श्रमिकों के साथ हो रही वार्ताओं में किसी भी पंजीकृत मजदूर यूनियन को शामिल नहीं होने दिया गया।
फिर 7 अप्रैल को अजीत सिंह, श्यामवीर, हरीश, राजू और विकास के साथ ट्रेड यूनियन इंकलाबी मजदूर केंद्र से सम्बद्ध आकाश (जो मुंजाल शोवा कंपनी में ठेका श्रमिक के तौर पर कार्यरत हैं) को हरियाणा सरकार की क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (सीआइए) ने गिरफ्तार कर लिया। चार लोगों को धरनास्थल और दो को उनके घर से गिरफ्तार किया गया। देर रात पूछताछ के बाद उन्हें यह चेतावनी देकर छोड़ा गया कि “आप लोग मानेसर में दोबारा दिखाई न दें।“
इधर ठेका मजदूरों की हड़ताल 8 अप्रैल को भी जारी रही। कंपनियों ने पैसा बढ़ाने से इनकार कर दिया, लेकिन ओवरटाइम पर वार्ता करने की बात कही, हालांकि 8 अप्रैल को ही हरियाणा सरकार ने अकुशल श्रमिकों को 15200 और कुशल श्रमिकों को 18000 रुपये के न्यूनतम वेज की घोषणा कर दी। पुलिस प्रशासन ने पूरे इलाके में 9 अप्रैल को धारा 144 लगा दी। श्रमिकों को भी लगा कि उनकी मांगें मान ली गई हैं, इसलिए वे धरनास्थल पर नहीं आए। ऋचा ग्लोबल और मोगलामा एक्सपोर्ट के ठेका कर्मचारियों ने कंपनी प्रबंधन से कहा कि सरकार ने वेज बढ़ा दिया है, तो कंपनी वेज बढ़ोतरी की नोटिस बोर्ड पर लगा दे। प्रबंधन ने नोटिस लगाने से मना कर दिया। इसके तुरंत बाद प्रबंधन ने पुलिस बुला ली और फैक्ट्री गेट पर बैठे श्रमिकों पर बर्बर लाठीचार्ज कराया। लाठीचार्ज में महिलाएं बुरी तरह से घायल हुईं। पुलिस की मौजूदगी में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं होने लगी, जबकि श्रमिक लाठीचार्ज के बाद वहां से भाग गए थे।

उसी समय लाठीचार्ज की घटना की निंदा करने के लिए बेलसोनिका यूनियन के महासचिव अजीत सिंह दोपहर 12 बजे ज्ञापन देने डिप्टी कलेक्टर ऑफिस गए। वहां से लौटते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इस बीच 30 ठेका श्रमिक जिनमें 10 महिलाएं भी शामिल थीं, असिस्टेंट लेबर कमिश्नर के पास लाठीचार्ज की शिकायत लेकर पहुंचे थे। उन सभी को काफी चोटें लगी थीं। ज्ञापन देकर लौटते समय उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। अजीत, हरीश, श्यामवीर को दोबारा गिरफ्तार करके सीआइए के आफिस ले जाया गया। इसी समय 11 श्रमिक भी गिरफ्तार करके वहां लाए गए। रात 11 बजे तीन लोगों की जमानत के बाद अजीत को छोड़ दिया गया। गांव में छापे मार कर पुलिस ने 44 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। रात भर पूरे इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप (आइएमटी) में पुलिस ने दहशत मचाए रखी।
फिर 12 अप्रैल को अजीत और उनके छह अन्य साथियों को उनके घर से उठाकर सीआइए के थाने लाया गया और दूसरे दिन मीडिया में उन्हें श्रमिकों को भड़काने और हिंसा के मास्टरमाइंड के बतौर प्रचारित किया गया। 94 एफआइआर के तहत गिरफ्तार 17 श्रमिकों में से 15 अभी भी जेल में हैं। बाद में 10 मई को भी दो कंपनियों में हड़ताल हुई है क्योंकि कई कंपनी ने बढ़ा वेतन देना शुरू नहीं किया है। हरियाणा इंडस्ट्रियल चैंबर ऑफ कॉमर्स ने साफ-साफ कह दिया है कि वे बढ़ा हुआ वेतन नहीं दे सकते।
कुछ गवाहियां
बेलसोनिका यूनियन के अध्यक्ष मोहिंदर कपूर ने बताया कि पुलिस ने दो महिला कांस्टेबल पर हमले के आरोप में जिन साथियों को गिरफ्तार किया है, उन पर हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं, लेकिन महिला कांस्टेबल की मेडिकल रिपोर्ट में किसी भी तरह की चोट अथवा उसका निशान होने का मेडिकल सर्टिफिकेट नहीं है।
कपूर ने यह भी बताया कि भोंडसी जेल में बंद लोगों से उनके परिजन तभी मुलाकात कर सकते हैं जब जेल में बंद व्यक्ति किस परिजन से मिलना चाहता है उसका ब्योरा परिजन और जेल प्रशासन को खुद दे। ऐसे में मुलाकात का संदेश परिवार तक भेजने में काफी समय लग रहा है और मुलाकात नहीं हो पाती। उन्होंने बताया कि पुलिस के लाठीचार्ज के बाद श्रमिक भंगरोला, नाहरपुर, बांसगांव आदि गांवों में जहां वह रहते थे अपने घरों में चले गए थे। पुलिस ने गांवों में घुसकर लोगों को पीटा और गिरफ्तार किया।
बेलसोनिका यूनियन के कोषाध्यक्ष पिंटू कुमार यादव को भी भोंडसी जेल में रखा गया है। उनकी पत्नी रुक्मणी ने बताया कि 12 अप्रैल को 12 बजे रात में सादे कपड़े में कुछ लोग आए और उनके पति को गिरफ्तार कर लिया। वे भद्दी गलियां दे रहे थे। उन्होंने गिरफ्तारी का कोई कागज नहीं दिखाया। सुबह यूनियन के लोगों के साथ वे सेक्टर 7 मानेसर थाने पर गईं तो वहां भी गालियां दी गईं और कुछ नहीं बताया गया। बाद में पता चला कि पिंटू कुमार को पुलिस लाइन में रखा है और 307 का केस लगाया गया है। इसी रात अजीत सिंह सहित अन्य लोग भी गिरफ्तार किए गए थे।
ठेका मजदूर आकाश की पत्नी दिव्या ने बताया कि उनके पति को भी रात में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के लिए गेट तोड़क पुलिसवाले गालियां देते हुए घर में घुस आए। इसके बाद उन्होंने 100 नंबर पर फोन किया, तो दूसरे दिन पता चला कि आकाश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। उनकी 15 अप्रैल को बहुत मुश्किल से जेल में आकाश से मुलाकात हो सकी। आकाश को दूसरे अन्य आपराधिक मामलों में बंद कैदियों के साथ रखा गया है। जेल में श्रमिकों को घर से साबुन, तेल, टूथपेस्ट आदि दैनिक उपयोग की वस्तुएं देने की भी अनुमति नहीं है और यह सब चीजें कैदियों को जेल की कैंटीन से खरीदनी पड़ रही हैं, जो बहुत महंगी हैं।
उन्होंने बताया कि इसके पहले 7 अप्रैल को भी आकाश को पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया गया था, फिर निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया था। यह सारी गिरफ्तारियां राज्य की सीआइए ने की। जन हस्तक्षेप जांच दल को बताया गया कि सभी गिरफ्तार लोगों के मोबाइल आदि उपकरण अभी तक जब्त हैं।
ठेका मजदूरों का संकट
अजीत सिंह बताते हैं कि कोरोना के पहले तक श्रमिकों की स्थिति इतनी बुरी नहीं थी। 2019 में बेलसोनिका कंपनी ने 450 पुराने श्रमिकों को निकाल दिया। होंडा ने भी आर्थिक मंदी का हवाला देकर 2000 से अधिक ठेका कर्मियों को नौकरी से निकाला था जो लगभग 10 वर्षों से काम कर रहे थे।
उन सभी ने धरना देना शुरू किया, तो बातचीत की मेज़ पर श्रमिकों को मुआवजे के तौर पर कुछ भुगतान देकर मामला सुलझाया गया। उन्होंने बताया कि वह सभी श्रमिक 15 से लेकर 30 हजार रुपये तक का वेतन पाते थे। उस समय उनकी यूनियन भी थी, लेकिन कोरोना खत्म होने के बाद कंपनियों ने नए श्रमिकों को ठेके पर नौकरी दी, तो उन्हें 11 हजार रुपये ही देना शुरू किया। फिर यही ट्रेंड दूसरे अन्य उद्योगों की कंपनियों में भी शुरू हो गया। ठेका श्रमिक यूनियन से नहीं जुड़ सकते क्योंकि वे ठेकेदारों के माध्यम से आते हैं। कंपनी प्रबंधन का यूनियनों पर दबाव है कि वे ठेका श्रमिकों को अपना सदस्य नहीं बना सकते। अधिकांश कंपनियों में यूनियन है, लेकिन उसमें ठेका श्रमिक सदस्य नहीं बन सकते और ठेका श्रमिकों के सवाल पर मान्यता प्राप्त बड़ी ट्रेड यूनियन खामोश रहती हैं।
जिन छोटी ट्रेड यूनियनों ने ठेका श्रमिकों को सदस्य बनाने का साहस किया उनकी मान्यता समाप्त कर दी गई। बेलसोनिका कंपनी की ट्रेड यूनियन इसका बड़ा उदाहरण है, जिसने ठेका कर्मियों को सदस्य बनाया तो कंपनी ने उसकी मान्यता लेबर आफिस (ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार) से शिकायत कर के समाप्त करवा दी और कंपनी ने नई यूनियन बनवा दी। मोहिंदर कपूर बताते हैं कि अपनी ट्रेड यूनियन में ठेकाकर्मियों को उन्होंने जब सदस्य बनाना शुरू किया तो प्रबंधन के नोटिस पर ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार ने उन्हें नोटिस दे दिया कि ठेका श्रमिक को निकालिए नहीं तो मान्यता रद्द हो जाएगी। उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो यूनियन की मान्यता रद्द कर दी गई और कंपनी प्रबंधन ने नई यूनियन बना दी। अब यह मामला हाइकोर्ट में विचाराधीन है।
नोएडा: जहां आतंक फैला

जन हस्तक्षेप की जांच टीम 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में श्रमिकों के आक्रोश और उस पर पुलिस दमन की घटना के 11वें दिन प्रभावित क्षेत्रों में पहुंची। टीम में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडोवकेट एस.एस. नेहरा, विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी अशोक शर्मा, ईश मिश्र, अनिल दुबे, और सीनियर एडवोकेट एम.जेड. अली शामिल थे। टीम ने श्रमिक आंदोलन से संबंधित सभी पक्षकारों से संपर्क की कोशिश की।
बातचीत श्रमिकों से ही हो सकी क्योंकि कंपनी प्रबंधन और प्रशासन से कोशिश के बाद भी मुलाकात नहीं हो सकी। टीम ने श्रमिकों के कार्यस्थलों और आवासीय इलाकों का भी दौरा किया और बहुत सारे नए पहलू उजागर हुए, मसलन श्रमिकों को नौकरी के दौरान मिलने वाले कम वेतन, कार्य स्थलों पर असम्मान (महिला श्रमिकों के संदर्भ में), सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य सुरक्षा, विश्राम के घंटे, आदि। श्रमिकों की आवासीय स्थिति को स्लम कहना ज्यादा उपयुक्त है। उनके आवास आसपास के गांवों और हिंडन नदी के डूब क्षेत्रों में बनी कॉलोनियों में है, जहां आम तौर से एक कमरे में ही पूरा परिवार रहता है अथवा 8 बटा 10 के कमरे में पांच से सात श्रमिक रहते हैं।
नोएडा में 15 से 20 वर्षों से श्रमिक 10-11 हजार रुपये की नौकरी कर रहे हैं। मजदूरों के अंदर बीते दशकों से असंतोष पनप रहा था और उनके विरोध प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से न्यूनतम वेतन में 21 फीसद वृद्धि की घोषणा की, जो प्रतिशत में बहुत, लेकिन रुपये में बहुत मामूली है। वृद्धि के अनुसार नोएडा में अकुशल मजदूरों का वेतन 13690 रूपये, अर्धकुशल का 15059 रुपये और कुशल श्रमिकों का 16864 रुपये प्रतिमाह किया गया है। जांच दल को बताया गया कि अधिकांश कंपनियों में वृद्धि लागू हो गई है, लेकिन कुछ कंपनियां कभी भी न्यूनतम वेज देने का नियम नहीं मानती हैं। श्रमिकों की मांग न्यूनतम वेतन प्रतिमाह 20000 रुपया करने की है।
टीम ने पाया कि पुलिस द्वारा बड़े पैमाने पर की गई कार्रवाई और लगभग 1000 महिला-पुरुषों की गिरफ्तारी के बाद कुछ दिनों तक उन्हें और उनके परिजनों को प्रताड़ित और अपमानित किया गया। इसके बाद उनमें से लगभग 100 लोगों के अलावा बाकी को रिहा कर दिया गया। घटना के 11 दिन बाद भी बड़े पैमाने पर पुलिसबल की पूरे क्षेत्र में, बाजारों, श्रमिकों के आवासीय इलाकों और कंपनियों के आसपास तैनाती थी। इससे श्रमिक डरे हुए थे और जांच दल से बातचीत करने से कतरा रहे थे। यही नहीं, जिन प्रशासनिक अधिकारियों से टीम ने बातचीत करनी चाही, उन्होंने मिलने और बातचीत से न सिर्फ इंकार कर दिया, बल्कि जांच रिपोर्ट में मुलाकात करने की कोशिश का उल्लेख करने से भी मना किया। उनका कहना था कि “ऊपर” से आदेश है कि श्रमिक आंदोलन के संदर्भ में किसी से कोई बात न की जाए।
श्रमिकों, उनके परिजनों एवं प्रशासनिक अधिकारियों में व्याप्त भय और सत्ता के कथित “ऊपरी” आतंक की इस स्थिति को देखते हुए जन हस्तक्षेप की टीम ने सर्वसम्मति से तय किया कि वह अपनी नोएडा संबंधी रिपोर्ट में किसी भी श्रमिक, उनके परिजन, प्रशासनिक अधिकारी और घटनास्थल के गवाहों के असली नाम व काम का उल्लेख नहीं करेगी। इसलिए आगे रिपोर्ट में सभी नामों को संबंधित व्यक्तियों की इच्छा के अनुरूप परिवर्तित कर दिया गया है।
बेनामी गवाहियां
जन हस्तक्षेप की टीम को एक कंपनी में काम कर रहे बलिया से आए कामगार रतनलाल ने बताया की यहां बहुत सारी ऐसी कंपनियां हैं जिनमें सिर्फ मालिक ही हैं। कंपनियां ठेकेदारों को चेक से पैसा देती हैं और फिर ठेकेदारों के खाते से श्रमिकों को भुगतान होता है। इस तरह कंपनी कोई सैलरी स्लिप या नियुक्ति का कागज नहीं देती। यहां तक कि हाजिरी रजिस्टर भी कच्चा होता है।
घटना की शुरुआत किस तरह से हुई, इस पर उन्होंने बताया कि ऋचा ग्लोबल गारमेंट्स कंपनी की एक शाखा नोएडा सेक्टर 83 में भी है। यह वही कंपनी है जिसके ऊपर 2020 में आरोप लगा था कि उसने मुस्लिम कामगारों को काम देने से मना कर दिया था। उस समय यह खबर कुछ अखबारों ने प्रकाशित की थी। यह कंपनी हरियाणा में जो मजदूरी देती है, नोएडा में नहीं देती। इसको लेकर कर्मचारियों में असंतोष पहले से था कि एक ही कंपनी कुछ किलोमीटर की दूरी पर अलग-अलग मजदूरी क्यों दे रही है। उधर गुड़गांव-मानेसर में आंदोलन और मजदूरी बढ़ने की खबरें नोएडा पहुंच ही रही थीं तो 9 अप्रैल 2026 को वेतन मिलने के बाद कर्मचारियों ने कंपनी के गेट पर धरना शुरू कर दिया। पुलिस ने कंपनी के गेट पर और सड़कों पर बैरिकेड लगाकर ट्रैफिक जाम कर दिया। इससे आम लोगों को काफी परेशानी हुई।
रतनलाल ने बताया कि 13 अप्रैल को सड़क पर सुबह से ही जाम में फंसे आम लोगों ने पुलिस द्वारा रास्ता रोके जाने का विरोध करना शुरू किया। इससे हंगामे की स्थिति पैदा हो गई, तो पुलिस ने बलप्रयोग किया। जाम में फंसे लोग कंपनी के गेट की तरफ भी भागे। इससे धरने पर बैठे श्रमिकों में भगदड़ मच गई। इसके बाद हालात बेकाबू हो गए। उन्होंने बताया कि कंपनी ने धरने पर बैठे कुछ श्रमिकों को 10 तारीख को ही गिरफ्तार करवा दिया था। इससे भी मजदूरों में आक्रोश था।
गारमेंट और एक्सपोर्ट यूनिट में कार्यरत एक महिला कामगार अनीता मौर्या ने बताया कि 9 अ्रपैल को जब यह खबर पहुंची कि मानेसर में गारमेंट कंपनी ने बढ़ी तनख्वाह लोगों को दी है, तो यहां के श्रमिकों, खास तौर पर गारमेंट व एक्सपोर्ट से जुड़ी कंपनियों के श्रमिकों में असंतोष फैल गया। उन्होंने प्रबंधन से बढ़ी दर पर वेतन देने की मांग की। उन्होंने बताया कि नोएडा में ऐसी भी फैक्ट्रियां हैं जो पहले दिल्ली में थीं और 2010 में जब शीला दीक्षित की सरकार के समय 35 फीसद की वेतन वृद्धि हुई तो बहुत सारी कंपनियां नोएडा शिफ्ट हो गईं। जब तक ये कंपनियां दिल्ली में थीं, बढ़ा वेतन दे रही थीं, लेकिन नोएडा आने के बाद उन्होंने वेतन में कटौती कर दी। वैसे भी कंपनी बहुत सारे लोगों को नौ महीने काम कराने के बाद कुछ दिनों के लिए निकाल देती है और वापस फिर काम पर रख लेती है। दूसरी बार नौकरी देते समय वेतन और भी कम कर दिया जाता है और श्रमिक मजबूरी में काम करते हैं।
अनीता मौर्या से चाय की दुकान पर हमारी मुलाकात हुई थी। उनके पति भी फैक्ट्री में नौकरी करते हैं। उनकी मां फुटपाथ पर ही रोटी-सब्जी का ढाबा चलाती हैं। अकेले रहने वाले श्रमिक उनसे ही रोज खाना पैक करा कर ले जाते हैं। अनीता की मां राजलक्ष्मी मौर्या ने कहा कि इस छोटे से होटल से ही उनका घर चलता है। एक दूसरी बेटी इंटर पास करके अब होटल में ही उनका हाथ बंटाती है क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण वह अब उसे आगे और नहीं पढ़ा सकतीं। उन्होंने बताया कि श्रमिकों की हालत दयनीय है और उनकी बर्दाश्त करने की ताकत घटी गई है। इसीलिए लोग सड़कों पर उतरे। पुलिस ने भी बहुत प्रताड़ना की है, फिर भी लोग डर नहीं रहे हैं।
अनीता पूछती हैं- 10-15 वर्ष से आपकी तनख्वाह में बढ़ोतरी न हो या 100-200 रुपये की ही बढ़ोतरी हो, तो आप क्या करेंगे? जबकि मकान का किराया और गैस के दाम कई गुना ज्यादा बढ गये हैं?

एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले ट्रेड यूनियन नेता राजवीर ने बताया कि 20 वर्ष पहले नोएडा और ग्रेटर नोएडा में दूसरे राज्यों की तुलना में श्रमिकों को ज्यादा वेतन मिलता था। ठेकेदारी प्रथा नहीं थी। उन्होंने डेंसो कंपनी का उल्लेख करते हुए बताया कि वहां टेक्नीशियन की भी सैलरी एक लाख रुपये के आसपास होती थी। इसी तरह एशियन पेंट और बहुत सारी कंपनियां हैं जो वेज से ज्यादा वेतन देती थीं। 1995 और फिर 2000 के बाद बहुत तेजी से बदलाव आया। वेज कम होने लगा और फिर नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना के दौरान इंडस्ट्री ठप पड़ने लगी, श्रमिकों का वेतन घटने लगा। उन्होंने बताया कि अब यहां पूरी तरह ठेकेदारी व्यवस्था हो गई है। बहुत सारी कंपनियां दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान से आई हैं, जो रेगुलर कर्मचारी नहीं रखती हैं और ठेकेदारों के माध्यम से लाए गए ठेका श्रमिकों से काम कराती हैं। 2004-05 से हाउसकीपिंग, कैंटीन, ड्राइवर, स्टोरकीपर जैसे काम ठेकेदारों को दिए जाने लगे और वह कामगारों को दस से पंद्रह हजार का वेतन देता है। बीते 20 वर्षों से यही वेतन चल रहा है। इसी तरह प्रोडक्शन इकाइयों में भी ठेका श्रमिकों से ही काम कराया जाने लगा है।
चाय की दुकान पर बैठे श्रमिकों ने बताया कि मामला गारमेंट और एक्सपोर्ट फैक्ट्री से शुरू हुआ था, जो इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, पैकिंग और सप्लाई चैन यूनिट तथा फैल गया। नोएडा में सबसे पहली हड़ताल ऋचा कंपनी से शुरू हुई जहां से 9 अप्रैल को विनय नामक श्रमिक को गिरफ्तार किया गया था। फिर उसे छोड़ दिया गया और बाद में 13 तारीख को बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शन के बाद दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। श्रमिकों ने बताया कि नोएडा के सेक्टर 2, 59, 60, 62, 83, 84 के फैक्ट्री श्रमिकों में विरोध की लहर सी दौड़ गई। बलिया से काम करने आए नागेंद्र ने बताया कि बहुत जगह तो हंगामा कंपनी के मालिकों, प्रबंधकों और पुलिस की मिलीभगत से हुआ। जिन कारखानों या कंपनियों में कोई मामला नहीं था वहां के श्रमिकों को भी पुलिस बुलाकर बलप्रयोग करना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था मानो सभी कंपनियां श्रमिकों को सबक सिखाना चाहती हों। इससे हालात और ज्यादा बिगड़ गए।
चाय-नाश्ते की दुकान चलाने वाले जौनपुर के महावीर सिंह बताते हैं कि ऋचा कंपनी से शुरू हुआ मामला जब ऑटो पार्ट बनाने वाली कंपनी माथर्सन ग्रुप तक पहुंचा, तो आग भड़क गई क्योंकि वहां सबसे ज्यादा ठेका मजदूर काम करते हैं। जिन कंपनियों में कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हो रहा था वहां के मालिकों ने भी अपने कुछ श्रमिकों को पुलिस बुलाकर गिरफ्तार कराया। इससे श्रमिक भड़क गए और बहुत जल्द 30 से 40 हजार मजदूर नोएडा की सड़कों पर दिखाई देने लगे। महावीर कहते हैं “भैया उनकी हालत बहुत खराब है। इनको मैं दिन-रात देखता हूं। एक-एक पैसे को मोहताज रहते हैं। उधारी पर जिंदगी चलती है।“
वहीं बैठे एक और मजदूर सीताराम ने बताया कि सरकार ने वेतन बढ़ोतरी तो की है, पर वह मिलेगा कि नहीं इस पर कंपनी से कोई नोटिस या जानकारी नहीं मिली है। कुछ कंपनियों ने बढ़ा वेतन देने का नोटिस लगा दिया है, पर ज्यादातर कंपनियों में ऐसा नहीं हुआ है। इसलिए सभी कर्मचारियों को अगला वेतन मिलने का इंतजार है। उनका कहना था कि जीने लायक वेतन तो 30000 रुपया होना चाहिए। अब दो-तीन हजार बढ़ भी जाएगा तो ओवरटाइम बंद होने की बात है। यदि ऐसा हुआ तो श्रमिकों की हालत और खराब हो जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि 30000 वेतन हो तो ओवरटाइम की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
फिलहाल विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार मौजूदा स्थिति यह है कि लगभग 1000 लोगों को पुलिस ने धारा 107, 151, शांति भंग के आरोप में लोगों को जेल भेजा था, उन्हें काफी प्रताड़ना के बाद छोड़ दिया गया। लगभग 100 से कुछ कम लोग अब भी गौतमबुद्ध नगर की कासना जेल में बंद है। इनमें से अधिकांश संख्या उनकी है जो ट्रेड यूनियन ऐक्टिविस्ट, समर्थक छात्र, पत्रकार हैं या तोड़फोड़ में सीसीटीवी फुटेज में देखे गए अथवा कंपनी प्रबंधकों द्वारा पुलिस को श्रमिकों की दी गयी सूची में शामिल थे।
उन सबको विभिन्न धाराओं में गिरफ्तार किया गया है जिनके ऊपर पुलिस पर हमला, संपत्ति का नुकसान, आगजनी, हत्या का प्रयास, विस्फोटक रखने जैसी धाराएं लगी हैं। सबसे खास बात यह है कि जिन पुलिसकर्मियों को घायल बताया गया है, उससे संबंधित कोई मीडिया रिपोर्ट दिखाई नहीं देती, जबकि श्रमिकों पर हत्या का प्रयास करने वाली 307 जैसी धाराएं लगाई गई हैं। जेल से छूटने के बाद एक श्रमिक ने बताया कि उन्हें सामान्य कैदियों के साथ रखा गया था और प्रशासन के इशारे पर दूसरे कैदी उनके साथ मार-पिटाई और दुर्व्यवहार करते थे।
‘पुलिस स्टेट’ के उदाहरण

नोएडा-गुड़गांव-मानेसर के अलावा अन्य राज्यों में बीते महीनों में शुरू हुए श्रमिक आंदोलनों ने वर्षों से मजदूर आंदोलन में आए ठहराव को तोड़ दिया है। न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी, काम के घंटे आठ करने, ओवरटाइम दोगुना करने, बोनस देने, कार्यस्थलों पर सम्मानजनक व्यवहार की मांग अखिल भारतीय स्वरूप ले चुकी है। श्रमिक असंतोष यूपी, हरियाणा ही नहीं अन्य राज्यों में जहां भी भड़का, वहां यही चार प्रमुख मांगें दिखाई देती हैं।
नोएडा, गुड़गांव व मानेसर में श्रमिक असंतोष को पुलिस ने जिस बर्बर तरीके से कुचला है, वह राज्यों के “पुलिस स्टेट” बन जाने का बड़ा उदाहरण है। अधिकारियों को तथाकथित “ऊपर” से मिले आदेश के बाद सड़क पर गुजरने वाले स्त्री, पुरुष और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 14 साल के एक बच्चे को जेल भेजा गया। पुलिस ने यह भी नहीं देखा कि कोई बीमार अस्पताल जा रहा है या कोई घर का सामान लेकर लौट रहा है, उसे भी गिरफ्तार किया।
एनसीआर के श्रमिक आंदोलन से निपटने का जो तरीका सरकारों खास तौर पर उत्तर प्रदेश प्रशासन ने अपनाया और सत्ता का इस्तेमाल जिस कठोरता से किया वह किसी भी नागरिक समाज के लिए घोर चिंता का विषय है। सरकार ने समस्या की गंभीरता को न समझते हुए उसे देश-विरोधी और अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र बताया। जिला, पुलिस और जेल प्रशासन ने स्वतंत्र मीडिया, वकीलों, नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं से भी मिलने से मना कर दिया। पुलिस और जिला प्रशासन ने बार-बार कहा कि श्रमिकों के असंतोष में बाहरी ताकतें शामिल हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक रूप से कहा कि प्रदेश शांति और विकास के रास्ते पर चल रहा था, लेकिन बाहरी षड्यंत्रकारी गड़बड़ी फैला कर औद्योगिक क्षेत्रों में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहे थे।
13 अप्रैल के लगभग दो माह बाद जब जांच दल ने नोएडा में कुछ श्रमिकों से संपर्क किया तो पता चला कि पुलिस दमन अथवा कंपनी प्रबंधन के भय से वे नोएडा छोड़कर वापस गांव लौट चुके श्रमिक अभी तक वापस काम पर नहीं लौटे हैं। उनमें से जो कुछ लौटे भी हैं, उन्हें उसी कंपनी में काम नहीं मिला जहां वह पहले काम कर रहे थे।
(जन हस्तक्षेप द्वारा दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में 19 जून 2026 को जारी जांच रिपोर्ट का संक्षिप्त और संपादित रूप)