Environmental Violations

Pyre protest against Ken-Betwa project in April 2026

लोकप्रियता के दौर में जल, जंगल और जमीन के संघर्ष : संदर्भ केन-बेतवा आंदोलन

by

देश में आजकल आंदोलन का माहौल है- जमीन पर कम (या कम-चर्चित) और इंटरनेट पर ज्‍यादा। ऐतिहासिक अन्‍यायों और हकमारी के खिलाफ देश भर में दशकों से लगातार चल रहे सत्ता-विरोधी जमीनी जन आंदोलनों की जगह एक बार फिर आभासी तिकड़मों से छेकने की कोशिश की जा रही है, जैसा 2011 में हुआ था। इस बार भी तमाम आंदोलनकारी भ्रमित हो रहे हैं। ‘जेन-ज़ी’ की पीठ पर जारी इस हो-हल्‍ले में लगातार बारह दिन तक सत्‍याग्रह करने वाले केन-बेतवा परियोजना-विरोधी आदिवासी औरतों और बुजुर्गों की आवाज कहीं दब गई है। हालिया केन-बेतवा नदीजोड़ विरोधी आंदोलन को सतीश भारतीय ने विस्‍तार से कवर किया है। उनके मध्‍य प्रदेश से भेजे डिस्‍पैच, बातचीत और अतीत के प्रसंगों के सहारे इस पर्यावरण दिवस पर जल, जंगल, जमीन बचाने वाले जन आंदोलनों की गति और नियति पर यह लंबी कहानी

Aravalli Sanrakshan Yatra

अरावली को बचाना क्यों जरूरी है? अवैध खनन के खिलाफ तीन दशक के संघर्ष से निकले अनुभव

by

अरावली की पर्वत श्रृंखला में विकास पर बीते नवंबर में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने देश भर में पर्यावरण की चिंता करने वालों को सड़कों पर उतार दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर रोक लगा दी, सार्वजनिक चर्चा भी ठंडी पड़ गई, लेकिन अरावली का सवाल लगातार जिंदा है। लोग अरावली संरक्षण पदयात्रा पर निकले हुए हैं। बीते तीन दशक से अरावली में अवैध खनन, वातावरण और पानी पर लगातार संघर्ष चल रहे हैं, विडम्‍बना है कि लोगों का ध्‍यान अभी गया। पिछले वर्षों के संघर्षों, दमन और सबक को याद कर रहे हैं राजस्‍थान के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा

Ken Saro-Viva

तानाशाही सत्ताओं से कैसे न पेश आएं? केन सारो-वीवा की शहादत के तीसवें साल में एक जिंदा सबक

by

एक लेखक अपने लोगों और अपने जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए फांसी पर झूल गया था, यह बात आभासी दुनिया के बाशिंदों को शायद मिथकीय जान पड़े। महज तीन दशक पहले दस नवंबर, 1995 को केन सारो-वीवा एक तानाशाह के हाथों शहीद हुए थे। बिलकुल उसी दिन, जब दशकों बाद जेल से आजाद हुए नेल्‍सन मंडेला बतौर राष्‍ट्रपति अपने पहले अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में भाग ले रहे थे। मुक्तिकामी संघर्षों की धरती अफ्रीका के इतिहास का यह अहम प्रसंग हमारी आज की दुनिया के लिए क्‍यों प्रासंगिक है? केन सारो-वीवा की हत्‍या के एक दशक बाद उनके गांव-शहर होकर आए वरिष्‍ठ पत्रकार आनंद स्‍वरूप वर्मा ने इसे अपनी पुस्‍तक में दर्ज किया है। आज केन सारो-वीवा को याद करते हुए उन्‍हीं की कलम से यह कहानी

वेदांता के खिलाफ अब कालाहांडी में खुल रहा है मोर्चा, लेकिन अबकी सामने अदाणी भी है…

by

नियमगिरि आंदोलन की कामयाबी के बाद माना गया था कि पूर्वी तट के आदिवासियों के पहाड़ खनन से बच जाएंगे। आज दस साल बाद ठीक उलटा हो रहा है। वेदांता को तो बॉक्‍साइट खदान मिली ही है, अदाणी भी दो खदानों के साथ मैदान में है। संघर्ष का नया मोर्चा खुल रहा है कालाहांडी जिले के सिजिमाली और खंडुआलमाली में, जो देश का सबसे गरीब इलाका है। पिछले हफ्ते हुई दो जनसुनवाइयों में आदिवासियों ने कंपनी का जैसा प्रतिरोध किया है वह प्रेरक है, लेकिन यह लड़ाई तिहरी है और चुनाव पास हैं। अभिषेक श्रीवास्‍तव की लंबी रिपोर्ट

कोरोना की आड़ में फिर से जागा रद्द कचरा संयंत्र, इंसानी त्रासदी के मुहाने पर भोजपुर

by

दस साल पहले बिहार में शुरू हुआ एक कचरा संयंत्र जनता के आंदोलन और प्रदूषण बोर्ड की नामंजूरी के कारण बंद हो चुका था। लोगों ने चैन की सांस ली ही थी कि कोविड में चुपके से इस पर दोबारा काम शुरू हो गया। आज जनता फिर से आक्रोशित है। कोईलवर प्रखंड के जमालपुर गांव से होकर आई पीयूसीएल की जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट 23 जुलाई को जारी की है। इस रिपोर्ट के प्रमुख अंश