कोरोना की आड़ में फिर से जागा रद्द कचरा संयंत्र, इंसानी त्रासदी के मुहाने पर भोजपुर

दस साल पहले बिहार में शुरू हुआ एक कचरा संयंत्र जनता के आंदोलन और प्रदूषण बोर्ड की नामंजूरी के कारण बंद हो चुका था। लोगों ने चैन की सांस ली ही थी कि कोविड में चुपके से इस पर दोबारा काम शुरू हो गया। आज जनता फिर से आक्रोशित है। कोईलवर प्रखंड के जमालपुर गांव से होकर आई पीयूसीएल की जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट 23 जुलाई को जारी की है। इस रिपोर्ट के प्रमुख अंश

हमारे संगठन ने बताया कि फैक्ट्री के विरुद्ध जनता को संगठित होना पड़ेगा। 2014 में सभी लोग संगठित हुए और फैक्ट्री को काम रोकने पर मजबूर होना पड़ा। इसकी सूचना अखबार में भी आ गई। सभी चीजें शांत हो गईं। 2019-20 में अचानक चुपके से फिर कंपनी ने काम शुरू कर दिया।

अजय राय, गांव-कोलरामपुर, पंचायत-पूर्वीबबूरा, थाना-कोईलवर

बिहार के भोजपुर जिला के कोईलवर प्रखंड के अन्तर्गत जमालपुर गांव में कचरा आधारित कारखाना से जुड़े साक्ष्यों और आंकड़ों से प्रतीत होता है कि इस फैक्ट्री के बनने और कार्य करने के बाद ऐसी मानवीय त्रासदी पैदा होगी जिसको संभालना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

नागरिक अधिकारों पर काम करने वाली संस्‍था पीपुल्‍स यूनियन फॉर सिविल राइट्स (पीयूसीएल) की राज्य इकाई ने इस कारखाने की पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय जांच दल का गठन किया था। इस दल ने सोन महानद के तट पर बन रही कचरा फैक्ट्री का मुआयना किया, ग्रामीणों से बात की, साक्ष्य इकट्ठे किए, संबंधित दस्तावेजों का अध्ययन किया और पिछले साल संबंधित अधिकारियों से मुलाकात की, उनसे कम्पनी के खिलाफ जनता की षिकायतों के बारे में बात की। इसके अलावा कई वैज्ञानिकों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों से भी मुलाकात करके तथ्य इकठ्ठे किए गए। जांच के उपरांत रिपोर्ट तैयार की गई।

पृष्ठभूमि


2014 में अखबार में प्रकाशित जन सुनवाई की सूचना

पूरे भारत की तरह बिहार में भी औद्योगिक, बायोमेडिकल व इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रबंधन एक बड़ी समस्या बन कर समाज के सामने उभरा है। कई बार विकसित देश अपने कचरे या बेकार साबित हो चुके कचरा प्रबंधन के तरीकों को विकासशील देशों की तरफ भेज देते हैं जिससे विकासशील राष्ट्र मानवीय त्रासदियों का शिकार होते रहते हैं। देश के अंदर अमीर इलाकों का कचरा गरीब इलाकों में भेजा जा रहा है। यह नीति अनैतिक, अवैज्ञानिक व पर्यावरण विरोधी है। इसी तरह औद्योगिक, बायोमेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रबंधन के नाम पर सरकारी अनुदान के चक्कर में कचरा प्रबंधन के लिए कंपनी का गठन होता है। इन कंपनियों के सामने मानवीय त्रासदी और दीर्घकालीन पर्यावरणीय क्षति का मोल बहुत कम होता है।

बिहार में औद्योगिक बायोमेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रबंधन के सिलसिले में हैदराबाद की रामकी एनवायरो इंजीनियर्स लिमिटेड ने भोजपुर जिला के कोईलवर प्रखंड स्थित जमालपुर गांव के समीप सोन महानद के तट पर कचरा जलाने के लिए फैक्ट्री लगाना प्रारंभ किया। इस कंपनी की वेबसाइट पर यह दावा किया गया है कि वह कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य कर चुकी है। इस कंपनी के चेयरमैन श्री अल्ला अयोध्या रामी रेड्डी हैं। इस कंपनी ने 2011-12 में कोईलवर प्रखंड के कई गांव में जमीन खरीदी। जमीन निजी थी, लिहाजा सरकार से जमीन लेने का प्रश्न नहीं उठता। जमीनें रैयती थी। उनका इतिहास में जो वर्णन है पुराने सर्वे के अनुसार ही है। कंपनी ने सरकार से हर प्रकार की अनुमति हासिल कर ली या कर लेने की प्रक्रिया में अग्रसर हो गई। फिर सोन के विल्कुल पेट में ही काम शुरू कर दिया।

ग्रामीणों ने शुरू-शुरू में कोई विरोध नहीं किया, मगर बाद में उन्हें इस बात का आभास हुआ कि संयंत्र की वजह से आने वाले समय में स्वास्थ्य को बहुत अधिक नुकसान पहुंचने वाला है। अतः कई गांव के लोगों ने 2014 की सरकारी जन-सुनवाई में इस फैक्ट्री के निर्माण पर रोक की मांग की। इस जन-दबाव के कारण तात्कालिक रूप से काम रुक गया, मगर अचानक लॉकडाउन आपातकाल के दौरान कंपनी ने पुनः काम शुरू कर दिया।

जब कोरोना चरम पर था (अप्रैल-मई 2020 में) ट्रक का आना-जाना शुरू हुआ। ग्रामवासियों के लिए यह एक नई तरह की बात थी। नदी तक जाने वाला रास्ता आम रास्ता नहीं है। यह रास्ता ग्रामीणों ने केवल उनको दिया है, जो नदी से बालू उत्खनन का काम करते हैं। ग्रामीणों ने जब पड़ताल की, तो मालूम हुआ कि कंपनी का सामान नदी के तट पर गिराया जा रहा है। सभी ग्रामीण इस बात से दोबारा नाराज हो गए।

हेमंत कुमार, पिता-भुवनेश्वर सिंह, गांव-महादेव चक, पंचायत- दौलतपुर (सरपंच पति)

फैक्ट्री स्थल का मुआयना

(क) सोन महानद फैक्ट्री से 100 मीटर से भी कम दूरी पर है, जो साफ-साफ फैक्ट्री के एक गड्ढे के पीछे दिखाई दे रही थी। यह गड्ढा और इसी तरह के कई गड्ढे फैक्ट्री परिसर में बनाए गए हैं ताकि फैक्ट्री से निकलने वाले अपशिष्ट जल को वहां जमा किया जा सके। उन गड्ढों में काफी मोटी प्लास्टिक की चादर बिछाई गई थी। संभवतः उसका उद्देश्य अपशिष्ट जल को भूमिगत होने से रोकना है।

(ख) पूरी अधिग्रहित जमीन महानद के बहाव क्षेत्र में है। जब महानद का जलस्तर बढ़ेगा तो स्वतः यह फैक्ट्री जलमग्न हो जाएगी। इसके दो परिणाम हो सकते हैं: पहला, फैक्ट्री बंद हो जाए और दूसरा, फैक्ट्री के सारे रासायनिक अपशिष्ट सोन की धारा में मिल जाएं। तब यह प्रश्न उठता है कि फैक्ट्री वहां क्यों बनाई जा रही है। जानकारों का मानना है कि फैक्ट्री अगर नदी के बहाव में बह जाए, तो बीमा कंपनियों से लगभग सारा पैसा कंपनी मालिकों को मिल जाएगा यानी कंपनी कभी घाटे में नहीं रहेगी।

(ग) फैक्ट्री अभी निर्माणाधीन है।

(घ) फैक्ट्री के आसपास घनी आबादी वाले गांव हैं, अतः फैक्ट्री से निकलने वाला धुआं आसपास के सभी गांवों को प्रभावित करेगा, जो कई तरह की बीमारियां पैदा करेगा।


कारखाने का मुआयना करने गई जांच टीम

कंपनी की ईआइए रिपोर्ट का अध्ययन

भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय के 2006 की अधिसूचना के अंतर्गत किसी भी नई परियोजना के निर्माण अथवा वर्तमान परियोजना के विस्तार से पूर्व पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट (ईआइए) सरकार की एक्सपर्ट समिति के सामने रखना आवश्यक है। इसी रिपोर्ट पर सरकार की एक्सपर्ट समिति अपनी राय देती है कि परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है या नहीं।

रामकी एनवायरो इंजीनियर्स लिमिटेड, हैदराबाद की अनुभागी कंपनी बिहार वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड के लिए रामकी द्वारा ही तैयार की गई ईआइए रिपोर्ट को जांच दल ने हासिल किया।

इस रिपोर्ट का अध्ययन करने पर यह बात सामने आई कि यह रिपोर्ट सत्यातीत है। इस रिपोर्ट में कोईलवर रेलवे स्टेशन के बदले आरा रेलवे स्टेशन को महुई मौजा के करीब बताया गया है। इसमें कई गलत जानकारियां दी गईं हैं, जैसे किः

  • कारखाने की प्रस्तावित जमीन सोन महानद के पेट में नहीं है
  • कारखाना क्षेत्र में कोई विद्यालय नहीं है
  • कारखाना क्षेत्र में कोई अस्पताल नहीं है
  • इस क्षेत्र में सीआरपीएफ कैंप नहीं है

इसके उलटे जांच दल ने पाया कि सभी सामाजिक सुविधाएं वहीं आसपास मौजूद हैं। इससे पता चलता है कि रिपोर्ट में जान-बूझ कर ऐसी बातें छुपाई गईं जिससे कि कंपनी को स्वीकृति मिलने की संभावना घट जाएगी।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि फैक्ट्री की साइट नदी की धारा के लगभग 100 मीटर की दूरी पर है। यह दूरी इतनी कम है कि अगर नदी का पानी चढ़ा तो वो फैक्ट्री की साइट में घुस जाएगा। इस स्थिति में नदी के पानी के जरिये खतरनाक रसायन कहां से कहां पहुंच जाएंगे ये बताना नामुमकिन है।

ट्रक की आवाजही का देखकर हम सभी सजग हुए। ये ट्रक बालू के नहीं थे। ये बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि बालू निकलवाने वाले ठेकेदार ग्रामीणों के साथ अनुबंध करते हैं और नदी तक जाने वाले रास्ते का किराया जमीन मालिक को देते हैं। इसलिए ग्रामीणों ने एक बार फिर विरोध शुरू किया। तब तक काम आगे बढ़ चुका था। 2020 में प्रशासन की मदद से फैक्ट्री का काम आगे बढ़ाया गया। सर्किल अफसर ने खुद कंपनी के लोगों को जमीन अपने कब्जे में लेने में मदद की। जमीन के अधिग्रहण में विवाद भी हुआ था, पर सर्किल अफसर और पुलिसवालों ने कंपनी की हर तरह से इस मामले में मदंद की। फिर धीरे-धीरे बिजली का कनेक्शन भी कंपनी वालों को मिल गया। कंपनी ने मजदूर भी रख लिए।

कन्हैया कुमार, पिता- दुखित राम, गांव-हरिपुर, कोईलवर

जमीन का विवरण

यह सारी जमीन जो कंपनी ने खरीदी है, वह खाता संख्या-69 की है। उस खाता में दो प्लॉट हैं-401 और 240। 1970 के सर्वे से पता चलता है कि प्लॉट संख्या-401 और 240 की जमीनें पांच लोगों के पास थी। उन्हीं पांच लोगों के खानदन के लोगों ने अपनी जमीनें कंपनी को बेची हैं। उन लोगों के पास जमीन का वैध कागज है या नहीं इसकी पुष्टि नहीं हुई।

जन सुनवाई की कार्रवाई के कागजात से पता चलता है कि जमीन के मालिकाने पर भी विवाद चल रहा है। लिहाजा विवादित जमीन पर बनी फैक्ट्री की आयु लम्बी नहीं होने की भी पूरी आशंका है।

वैज्ञानिकों की राय

रामकी कंपनी के कागजात से यह जानकारी मिलती है कि सोन के किनारे निर्माणरत कारखाने में बिहार के 18 जिलों के 99 कारखानों के 50 हजार मैट्रिक टन जहरीले कचरे को जलाने की योजना है। इस कारखाने में खेती योग्य 57.24 एकड़ जमीन, रोजाना 423 किलो लीटर पानी की जरूरत, तथा रोजाना 80 किलो लीटर जहरीला प्रदूषित पानी बाहर निकलेगा, जिसे सोन नदी में बहा दिया जाएगा। तीसरे चरण के दौरान इस कारखाने में 2 मेगावाट ऊर्जा का उत्पादन होगा।

जाने-माने पर्यावरणविद डॉ. गोपाल कृष्ण, जो इसी क्षेत्र के रहने वाले हैं, उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक एवं चिकित्सा शोध से ये साबित होता है कि इस तरह के कारखाने जहां भी बने हैं उसके 10 किलोमीटर के दायरे में कैंसर का खतरा बढ़ा है। उन्होंने ये भी कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय के 15 जनवरी 2013 के एक आदेश में कहा गया है कि “कचरा भस्मीकरण संयंत्र के 40 किलोमीटर क्षेत्र में रहने वाले लोगों में गले का कैंसर, फेफड़े का कैंसर, पैर का कैंसर, लिवर का कैंसर, मलद्वार का कैंसर आदि के खतरे बढ़ जाते हैं। इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।


कचरा जलाने के संयंत्र के ठीक पीछे बह रहे सोन महानद का दृश्य

बिहार की नदियों के जानकार डॉ. दिनेश मिश्र ने बताया कि जिस जगह पर ये फैक्ट्री बन रही है वो बाढ़ग्रस्‍त इलाका है और वहां कई बार बाढ़ आ चुकी है। ऐसी जगह पर किसी कचरा प्रबंधन करने वाली फैक्ट्री का बनना घातक साबित होगा। एक बार सोन के पानी में फैक्ट्री से निकला पानी अगर मिल गया तो बताया नहीं जा सकता कि वो कहां-कहां चला जाएगा।

राजीव सहाय भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं और इस फैक्ट्री की जानकारी रखते हैं। उन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 के अंतर्गत कोई भी फैक्ट्री नदी के पेट में नहीं लगाई जा सकती है। यह सर्वथा गैरकानूनी है और यह दावा करना कि अवशिष्ट पदार्थ लीक होकर नदी के जल में नहीं मिलेगा ये गलत है। दूसरी तरफ उन्होंने ये भी कहा कि जब एक बार पर्यावरण मंत्रालय की आकलन समिति ने परियोजना को नामंजूर कर दिया तो फिर कोई खास वजह नहीं दिखाई दे रही है कि उसको स्वीकृति मिल जाए, जिसका दावा कंपनी ने किया है। समिति के अनुसार रिहायशी इलाके से 200 मीटर के भीतर इस प्रकार के खतरनाक परिसंकटमय कचरे के निबटान और भस्मीकरण की गतिविधि उचित नहीं है। कारखाने के लिए जो जगह चुनी गई है उसे कम्पनी के तर्कसंगत और न्यायसंगत साबित नहीं कर पाई है, लेकिन कम्पनी ने समिति को बरगलाते हुए 200 मीटर के बजाय 600 मीटर दूर रिहायशी इलाका होने की बात कहकर केंद्रीय पर्यावरणीय अनुमति हासिल कर ली है।

एके जैन, पूर्व मुख्य अभियन्ता, डीबीसी एवं आल इंडिया पावर फेडरेशन के कानून विभाग के संयोजक का अन्वेषण अनुशंसा करता है कि फैक्ट्री के लिए यह स्थान उपयुक्त नहीं है। कम्पनी के दावे परस्पर विरोधी और अविश्वसनीय हैं। तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि कम्पनी सरकार और स्थानीय लोगों को गुमराह कर रही है। यह स्थान दो तटबंधों के बीच स्थित है। यह स्थान सदैव बाढ़ग्रस्त रहा है।

2020 में जब ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ा, तो ग्रामीणों ने फैक्ट्री का घेराव कर दिया। दोनों पक्षों का झगड़ा हुआ और ग्रामीणों ने फैक्ट्री पर हमला कर दिया। कंपनी ने एफआइआर भी कर दिया। इस तरह से मामला फिर से बढ़ गया। अभी की स्थिति यह है कि कंपनी नदी के किनारे 50 फुट का रास्ता बना रही है, इस रास्ते से सीधे कोईलवर पहुंचा जा सकता है। इस तरह से सारा काम पक्का हो जाएगा।

नंदजी, पिता- विष्णु ठाकुर

केंद्रीय विशेषज्ञ आकलन समिति की समीक्षा

भारत सरकार की पर्यावरण विशेषज्ञ आकलन समिति ने 118वीं बैठक (तिथि 8-9 नवम्बर 2012 पैरा संख्या 4.5, पृष्ठ संख्या 10) में रामकी एनवायरो इंजीनियर्स लिमिटेड, हैदराबाद के अनुभागी कंपनी बिहार वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड के लिए रामकी द्वारा ही तैयार की गई पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट पर विचार करने के उपरान्त इस कारखाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

इसके उपरांत ईएसी की 149वीं बैठक (24 से 26 जून 2015) हुई जिसमें इसी कारखाने का निर्माण करने की स्वीकृति पर चर्चा हुई। इस बैठक में कमेटी ने कंपनी को सुधार लाने के लिए 38 बिंदुओं पर आधारित आदेश दिया। (पृष्ठ संख्या 6 से 41)

समिति ने 16 अक्टूबर 2014 को बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अम्बिका शरण उच्च विद्यालय, जमालपुर में रामकी कंपनी द्वारा प्रस्तावित खतरनाक कचरा जलाने वाले कारखाने के पर्यावरणीय प्रभाव पर जन सुनवाई से निकले तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया है। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने लिखित तौर पर सूचित किया था कि इस कारखाने का भारी जनविरोध है।

कंपनी के अधिकारियों से बातचीत

पीयूसीएल की जांच टीम के दो सदस्यों प्रो. रमा शंकर आर्य और श्री नंद किशोर सिंह ने भोजपुर जिले के कोईलवर के हरिपुर गांव के समीप बने रामकी एनवायरो इंजीनियर्स लिमिटेड के स्थानीय मैनेजर श्री चन्द्रमणि कुमार से उनके कार्यालय में जाकर मुलाकात की और उनसे उनकी कम्पनी और उसकी योजना के बारे में जानकारी प्राप्त की। उन्होंने बतलाया कि उनकी कम्पनी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है, जिसका मुख्यालय हैदराबाद में है। उनकी कम्पनी का मुख्य काम या व्यवसाय कचरा प्रबंधन है। इसी उद्देश्य से उनकी कम्पनी ने बिहार के भोजपुर जिले के कोईलवर प्रखंड के हरिपुर गांव के समीप कम्पनी की एक इकाई लगाने की योजना वर्ष 2011 में बनाई। इसके लिए करीब 22 एकड़ 89 डिसमिल जमीन भी 2012 में खरीदी गई।


रामकी कंपनी का दफ्तर

यह जमीन मुख्य रूप से अर्जुन राय एवं उनके परिवार और मुन्द्रिका राय एवं उनके परिवार से खरीदी गई है। जमीन का खाता नम्बर-69 तथा खसरा नम्बर-401 है।

उन्‍होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट के लिए उन्‍होंने भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से 2015 में ही स्वीकृति ली थी। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्थापना की स्वीकृति 23 दिसम्बर 2019 में मिली थी। प्रशासनिक भवन 2021 में बनकर तैयार हुआ था। अभी तक बिहार राज्‍य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इसे चालू करने की इजाजत (कन्‍सेन्‍ट टु ऑपरेट) नहीं दी है। इस प्रोजेक्ट में करीब 254 करोड़ रुपये का निवेश होगा। इसमें कचरा जलाने (इनसिनेरेशन), जमीन में भरने (लैंडफिल) तथा रासइक्लिंग, तीनों विधियों का इस्तेमाल किया जाएगा।

गौरतलब है कि विश्व बैंक ने इस कम्पनी को ब्लैकलिस्ट किया था। अमेरिकी कम्पनी केकेआर की इस कम्पनी में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है। केकेआर समर्थित इस कम्पनी की बिक्री प्रक्रिया शुरू हो गई है।

मेरा लड़का राजेश पांडे फैक्ट्री में काम करने गया। 2021 में सावन के महीने में फैक्ट्री में काम के दौरान ऊंचाई से गिर गया। जख्मी हालत में उसको फेंक दिया गया। कुछ घंटे बाद जब वह मिला, तो कोईलवर अस्पताल ले जाया गया। वहीं वह इलाज के दौरान मर गया। कंपनी के अधिकारी चंद्रमणि‍ ने मुआवजे के रूप में 80,000 रुपये देने की बात कही, मगर केवल 15,000 रुपये ही मिले। इस मामले में कंपनी पर कोई केस भी नहीं किया गया।

राजनारायण पांडेय, गांव- पुराना हरिपुर, पंचायत- चंदा

बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से मुलाकात

जांच टीम के उक्त दोनों सदस्यों ने पाटलिपुत्र अवस्थित बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के. कार्यालय जाकर उसके तत्कालीन अध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार घोष से मुलाकात की और कोईलवर के समीप बन रहे उस प्रोजेक्ट के बाबत जानकारी हासिल करने की कोशिश की थी। प्रो. घोष ने बताया कि उन्हें ग्रामीणों से शिकायत मिली है और उन्होंने तीन सदस्यीय एक विशेषज्ञ समिति से जांच भी करवाई है। उम्मीद है कि जल्द ही पूरी रिपोर्ट आ जाएगी तब वह सबके लिए उपलब्ध हो जाएगी। उन्होंने यह जोर देकर कहा कि वे लोग न्यायसंगत फैसला करेंगे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रोजेक्ट को चालू करने की इजाजत नहीं दी गई है।

जन सुनवाई दो-तीन घंटे तक चलती रही थी। 500 लोगों की भीड़ थी। जनता ने कंपनी को स्पष्ट कह दिया था कि यहां फैक्ट्री लगाना सर्वथा अनुचित है।

श्याम प्रकाश सिंह, गांव-महुईबल्हा, पंचायत-चंदा, थाना-कोईलवर

निष्कर्ष

जांच दल सभी साक्ष्यों और दस्तावेजों के अध्ययन के बाद निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचाः

  1. पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील इलाके में सोन महानद के किनारे निर्माणरत कारखाने में बिहार के 18 जिलों के 99 कारखानों के 50 हजार मैट्रिक टन जहरीले कचरे को डालने, दफनाने और जलाने की योजना है। पूरे बिहार के इलेक्ट्रॉनिक कचरे के अलावा कारखाने में लगभग सवा सौ अस्पतालों का कचरा भी आएगा। इस कारखाने में खेती योग्य 57.24 एकड़ जमीन, रोजाना 423 किलोलीटर पानी की जरूरत, तथा रोजाना 80 किलोलीटर जहरीला प्रदूषित पानी बाहर निकलेगा जिसे सोन महानद में बहा दिया जाएगा। तीसरे चरण के दौरान इस कारखाने के भस्मीकरण संयंत्र से 2 मेगावाट ऊर्जा का उत्पादन होगा। अदालत के अनुसार कचरा भरमीकरण संयंत्र के 10 किलोमीटर क्षेत्र में रहने वाले लोगों में गले का कैंसर, फेफड़े का कैंसर, पैर का कैंसर, लीवर का कैंसर मलद्वार का कैंसर आदि के खतरे बढ़ जाते हैं। इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।
  2. भारत सरकार की पर्यावरण विशेषज्ञ आकलन समिति ने रामकी द्वारा तैयार की गई पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट के बाद इस कारखाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। समिति के अनुसार रिहायशी इलाके से 200 मीटर के भीतर इस प्रकार के खतरनाक परिसंकटमय कचरे के निबटान और भस्मीकरण की गतिविधि उचित नहीं है। कारखाने के लिए जो जगह चुनी गई है उसे कंपनी तर्कसंगत और न्‍यायसंगत नहीं साबित कर पाई है। समिति का निर्णय सही था।
  3. कंपनी ने पर्यावरण विशेषज्ञ आकलन समिति को बरगलाते हुए 200 मीटर के बजाय 600 मीटर दूर रिहायशी इलाका होने की बात कहकर केंद्रीय पर्यावरणीय अनुमति हासिल कर ली और पर्यावरणीय प्रभाव जन सुनवाई से निकले तथ्यों को नजअंदाज कर दिया। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने लिखित तौर पर सूचित किया था कि इस कारखाने का भारी जनविरोध है।
  4. यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि ऐसी कचरा जलाने वाली परियोजना से लाइलाज रोगों का शिकार होना पड़ता है। सोन के पेट में कोईलवर-बिहटा क्षेत्र में इस प्रकार की परियोजना से वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को गंभीर जनस्वास्थ्य की समस्याएं पैदा होंगी।
  5. रामकी की अनुभागी कंपनी बिहार वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड के लिए रामकी द्वारा ही तैयार की गई पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट का अध्ययन करने पर यह बात सामने आई कि कंपनी की रिपोर्ट में कोईलवर रेलवे स्टेशन के बदले आरा रेलवे स्टेशन को महुई मौजा के करीब बताया गया है। कंपनी ने इस तथ्य को छुपाया है कि कारखाने का प्रस्तावित जमीन नदी के पेट में ही है, कारखाना क्षेत्र में कोई विद्यालय नहीं है, कारखाना क्षेत्र में कोई अस्पताल नहीं है और इस क्षेत्र में सीआरपीएफ कैंप नहीं है।
  6. कारखाने से होने वाले जहरीले डायोक्सिन और पारा के उत्पादन को छुपाया है। ऐसे कारखाने से जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और भोजन श्रृंखला प्रदूषण होता है।
  7. दूसरे जिलों के कारखानों व अस्पतालों का कचरा सोन व रिहायशी इलाके में लाने का कोई तर्कसंगत, न्यायसंगत औचित्य नहीं है।
  8. कारखाना भोजपुर के कोईलवर क्षेत्र व पटना के बिहटा क्षेत्र को प्रभावित करेगा। ऐसे कारखाने से दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक आपदा भोपाल गैस कांड से भी बड़ा हादसा होने की संभावना है।
  9. बिहार के मौजूदा कारखाने नियमानुसार औद्योगिक कचरा का निपटारे का प्रबंधन किए बिना ही चलाई जा रही है।
  10. कृषि योग्य जमीन को रामकी कम्पनी को देना नाजायज था।

सिफारिशें

इन तथ्यों के आलोक में जनहित में और पर्यावरण स्वास्थ्य की दृष्टि से भोपाल गैस काण्ड की पुनरावृत्ति से बचने के लिए औद्योगिक कचरा, अस्पताल का कचरा एवं इलेक्ट्रॉनिक कचरा आधारित इस कारखाने के निर्माण को तत्काल रोक देना चाहिए।   सोन महानद के पेट में हुए निर्माण कार्य को रोककर स्थानीय पर्यावरण को हुए नुकसान का अकालन कर कम्पनी से जुर्माना लेना चाहिए। भूमि की खरीद में हुई संभावित धांधली की जांच होनी चाहिए। राज्य सरकार को इस कम्पनी की संभावित जालसाजी की गहन पड़ताल करनी चाहिए।

जांच टीम के सदस्‍य

सरफराज, महासचिव, पीयूसीएल (बिहार)
नंद किशोर सिंह, सदस्य, राज्य कार्यकारिणी, पीयूसीएल (बिहार)
नागेश्वर प्रसाद, सदस्य, राज्य कार्यकारिणी, पीयूसीएल (बिहार)
डॉ. रमाशंकर आर्य, उपाध्यक्ष, पीयूसीएल (बिहार)
कृमारेश, सदस्य, राज्य कार्यकारिणी, पीयूसीएल (बिहार)


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