वर्तमान केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MNREGA) का नाम बदलकर ‘विकसित भारत– रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन’, ग्रामीण (VB-GRAMG) कर दिया है। यह बदलाव केवल नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई मूलभूत परिवर्तन भी किए गए हैं। ये परिवर्तन मनरेगा के मूल प्रावधानों को कमजोर करते हुए मज़दूरों के काम पाने के अधिकार को ही समाप्त कर देंगे।
‘वी.बी.–जी.राम.जी.’ विधेयक 18 दिसंबर 2025 को संसद में त्वरित प्रक्रिया के माध्यम से पारित किया गया तथा 21 दिसंबर 2025 को इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इस विधेयक के लागू होने से ग्रामीण रोजगार नीति की संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन होने की संभावना है। आलोचकों के अनुसार, इस विधेयक के प्रभाव-स्वरूप देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 13 करोड़ मज़दूरों को अब 100 दिनों के रोज़गार की अधिकार-आधारित गारंटी प्राप्त नहीं रहेगी, जो पहले मनरेगा के अंतर्गत उपलब्ध थी। इससे ग्रामीण आजीविका सुरक्षा, रोजगार की उपलब्धता और सामाजिक संरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।
इसी चिंता के कारण देश भर में अलग-अलग राजनैतिक दल, जनसंगठन और ग्रामीण समुदाय आधारित संगठन नए बदलावों का विरोध कर रहे हैं। सोमवार 22 दिसंबर को कई जिला मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं और उत्तर प्रदेश के सीतापुर में संगतिन किसान मजदूर संगठन की रैली में एक अहम नारा लगा है, ‘’मनरेगा में बदलाव बहाना है, मकसद गुलाम बनाना है’।
MNREGA बनाम VB-GRAMG
संविधान में देश के नागरिकों को दिए गए नीति-निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 39(क) और अनुच्छेद 41 के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को आजीविका के साधन और रोज़गार सुनिश्चित करने का निर्देश राज्य को दिया गया है। आज़ादी के लगभग 60 वर्ष बाद यूपीए सरकार ने वर्ष 2005 में संसद में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) पारित किया था। यह कानून पूर्ण रूप से रोज़गार की गारंटी तो नहीं था, लेकिन ग्रामीण मज़दूरों की आजीविका के लिए एक महत्वपूर्ण पहल अवश्य था, जिसने उनके जीवन में कुछ राहत प्रदान की।
भ्रष्टाचार, तकनीकी जटिलताओं, बजट कटौती, कम मज़दूरी, काम न मिलना और मज़दूरी भुगतान में देरी जैसी समस्याओं के बावजूद, यह कानून ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार देता था कि वह पूरे वित्तीय वर्ष में 100 दिन के रोज़गार की मांग कर सके। काम का आवेदन करने के 15 दिनों के भीतर रोज़गार न मिलने पर बेरोज़गारी भत्ता पाने का अधिकार मज़दूर को प्राप्त था। यही इस कानून की सबसे बड़ी ताकत थी।
मज़दूर द्वारा किए गए कार्य की मज़दूरी का 100 प्रतिशत भुगतान तथा काम की मांग के अनुसार बजट आवंटन की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की थी। मज़दूरी का पूरा भुगतान और सामग्री लागत का 75 प्रतिशत केंद्र सरकार तथा 25 प्रतिशत राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता था (व्यवहार में 90:10 का अनुपात)। अब केंद्र सरकार केवल 60 प्रतिशत बजट देगी और शेष 40 प्रतिशत भार राज्य सरकारों पर डाला जाएगा।
मनरेगा के तहत मज़दूर पूरे वित्तीय वर्ष में किसी भी समय रोज़गार की मांग कर सकता था। मनरेगा के कार्यों की योजना ग्राम सभा द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार बनाई जाती थी। इसके अंतर्गत छोटे और सीमांत किसानों को निजी भूमि पर भी कार्य कराने का प्रावधान था। अब मनरेगा कार्यों की योजना “पीएम गति शक्ति योजना” से जुड़ी “विकसित ग्राम पंचायत योजना” के माध्यम से तय की जाएगी। इसका अर्थ है कि ग्राम सभा से कार्य योजना बनाने का अधिकार छीन लिया गया है।
मनरेगा कानून और वी.बी.–जी.राम.जी. मिशन का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि अब यह कानून नहीं, बल्कि एक मिशन बन गया है। कानून अधिकार देता है, जबकि मिशन सरकार की मर्जी पर निर्भर होता है। इस बदलाव के साथ ग्रामीण मज़दूरों को काम पाने का अधिकार और ग्राम सभा की योजना निर्माण में स्वायत्त भूमिका समाप्त हो रही है। अब यह पूरी तरह सरकार के विवेक पर निर्भर होगा कि किसे, कहां, कब और किस प्रकार का काम दिया जाएगा।
ग्रामीण रोजगार : पहले और अब
| महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA) | विकसित भारत– रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन, ग्रामीण (VB-GRAMG) |
| 1. यह ग्रामीण मज़दूरों को दिया गया एक अधिकार आधारित कानून था, जिसके अंतर्गत रोज़गार उपलब्ध कराया जाना सुनिश्चित किया गया था। | 1. यह कोई अधिकार-आधारित कानून नहीं, बल्कि एक मिशन है जो पूरी तरह सरकार की मर्जी पर निर्भर करता है कि काम मिलेगा या नहीं। |
| 2. इसके तहत पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों के मज़दूर रोज़गार की मांग कर सकते थे- यह उनका अधिकार था और उन्हें काम उपलब्ध कराना सरकार की कानूनी जिम्मेदारी थी। | 2. इसके अंतर्गत केंद्र सरकार यह तय करेगी कि किस राज्य में और उस राज्य के किस क्षेत्र में रोज़गार उपलब्ध कराया जाएगा। |
| 3. इस कानून के अंतर्गत काम की मांग के आधार पर बजट का निर्धारण किया जाता था। | 3. इसमें सरकार पहले बजट तय करेगी और उसी के अनुसार काम मिलेगा। इसका स्पष्ट अर्थ है कि सभी जरूरतमंदों को काम मिलना सुनिश्चित नहीं होगा। |
| 4. पूरे वित्तीय वर्ष में किसी भी समय रोज़गार की मांग की जा सकती थी। | 4. इस व्यवस्था में पूरे वित्तीय वर्ष के दौरान कृषि के व्यस्त दिनों में 60 दिनों तक काम स्थगित रहेगा, चाहे मज़दूरों को काम की आवश्यकता कितनी भी क्यों न हो। |
| 5. गांव में कौन-से कार्य किए जाएंगे, इसकी योजना ग्राम सभा द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार तैयार की जाती थी। इसमें छोटे और सीमांत किसानों की निजी भूमि पर कार्य कराने का भी प्रावधान था। | 5. कार्यों की योजना “पीएम गति शक्ति योजना” से जुड़ी “विकसित ग्राम पंचायत योजना” के माध्यम से तय की जाएगी, जिससे ग्राम सभा की स्वायत्तता समाप्त हो जाएगी। |
| 6. मज़दूरों की मज़दूरी का 100 प्रतिशत तथा सामग्री लागत का 75 प्रतिशत व्यय केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता था, जबकि सामग्री लागत का 25 प्रतिशत व्यय राज्य सरकार करती थी। इस प्रकार यह अनुपात 90:10 का था। | 6. इसमें कुल व्यय का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार तथा 40 प्रतिशत राज्य सरकार को वहन करना होगा। बजट की कमी की स्थिति में राज्य सरकारें पीछे हट सकती हैं, जिससे मज़दूरों को काम मिलना और अधिक कठिन हो जाएगा। |
| 7. प्रत्येक ग्रामीण परिवार को पूरे वित्तीय वर्ष में 100 दिनों के रोज़गार की गारंटी प्रदान की गई थी।। | 7. इसमें पूरे वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के काम की बात कही जा रही है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह काम किस प्रकार और किन शर्तों पर मिलेगा। जबकि वास्तविकता यह है कि 100 दिनों की गारंटी के बावजूद मज़दूरों को वर्ष भर में औसतन लगभग 50 दिन का ही काम मिल पाया है- तो फिर 125 दिनों का काम कैसे सुनिश्चित होगा? |
उपरोक्त तुलनात्मक विश्लेक्षण के आधार पर हम कह सकते है कि नया ‘वीबी– जी राम जी’ रोजगार के हक़ का हनन है और मांग आधारित प्रणाली से आपूर्ति आधारित प्रणाली की ओर प्रस्थान है।
मनरेगा को खत्म करने से रोजगार एक मूलभूत हक़ के बजाय एक महज़ सरकारी सेवा योजना के रूप में बनकर रह जाएगा। मनरेगा की मूल भावना है मजदूरों को उनकी मांग के हिसाब से काम मुहैया कराना क्योंकि इस कानून की आत्मा में “काम का अधिकार” है। इस भावना को कुचलते हुए नए कानून की धारा 4(5) के तहत केंद्र सरकार हर राज्य के लिए एक वित्तीय आवंटन का मानक तय करेगी और अगर कोई राज्य उससे अधिक व्यय करता है तो धारा 4(6) के तहत यह राशि राज्य सरकार द्वारा, केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित तरीके और प्रक्रिया के अनुसार वहन की जाएगी। इससे केंद्र सरकार को राज्यों को दिए जाने वाले बजट की मात्रा मनमाने ढंग से तय करने का अधिकार मिल जाता है। इसी के आधार पर यह तय होगा कि किसी राज्य में कितने दिनों का रोज़गार दिया जा सकता है। यह मनरेगा की मूल सोच को पूरी तरह तरह पलट देता है, जहां बजट आवंटन मांग के अनुसार होता था और उसकी जगह एक ऐसी आपूर्ति-आधारित व्यवस्था ले आता है जिसमें रोज़गार की मांग को पहले से तय बजट के अनुसार ढलना पड़ेगा।
राज्यों पर 40 प्रतिशत वित्तीय बोझ डालना
मनरेगा के तहत मज़दूरी का 100% और सामग्री लागत का 75% वहन करने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की होती थी। व्यवहार में इसका अर्थ है कि केंद्र और राज्यों के बीच खर्च का अनुपात लगभग 90:10 रहता है, लेकिन G-RAM-G विधेयक की धारा 22(2) में कहा गया है कि “केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच निधि साझा करने का अनुपात उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालयी राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर) और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 90:10 होगा, जबकि विधानमंडल वाले सभी अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए यह 60:40 होगा।”
यह प्रावधान न केवल राज्यों पर भारी वित्तीय बोझ डालता है, बल्कि गरीब राज्यों और उन राज्यों पर भी असमान रूप से असर डालता है जहां से बड़ी संख्या में लोग रोज़गार के लिए पलायन करते हैं और जिन्हें ग्रामीण रोजगार की सबसे अधिक ज़रूरत है। बढ़े हुए वित्तीय बोझ के कारण राज्य सरकारें खर्च कम करने की नीति अपनाने पर मजबूर होंगी और मज़दूरों की काम की मांग को दर्ज ही नहीं करेंगी।
60 दिनों तक योजना बंद रखने का प्रावधान जीवन के अधिकार का उल्लंघन
मनरेगा जैसी रोजगार गारंटी योजना को वर्ष में 60 दिनों तक बंद/स्थगित रखने का प्रावधान् अत्यंत जन विरोधी है। यह गरीबों के जीवन एवं आजीविका के अधिकार (अनुच्छेद 21) का स्पष्ट उल्लंघन है। बेरोजगारी, महंगाई और ग्रामीण संकट के समय में इस प्रकार का प्रावधान योजना के मूल उद्देश्य को निष्प्रभावी कर देगा तथा लाखों परिवारों को भुखमरी की ओर धकेलने वाला सिद्ध होगा।
किसे रोजगार दिया जाएगा यह तय करना – मनरेगा की आत्मा के विरुद्ध
मनरेगा काम का एक वैधानिक अधिकार स्थापित करता है जो मांग आधारित और सार्वभौमिक है- “जिस भी व्यक्ति को काम की आवश्यकता है, उसे मांग के आधार पर रोजगार उपलब्ध कराना।” प्रस्तावित बिल में केंद्र सरकार उन क्षेत्रों का चयन करेगी जहां नए कानून के तहत काम दिया जाएगा। यह भेदभावपूर्ण तथा संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 के विरुद्ध है। यह केंद्र को अत्यधिक शक्ति प्रदान भी करता है। रोजगार का अधिकार आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए, न कि प्रशासनिक या राजनीतिक चयन के आधार पर।
ग्राम सभाओं की ताकत खत्म
मनरेगा के तहत जो काम ग्राम सभा द्वारा तय किए जाते थे वो इस नए बिल के अनुसार पीएम गति शक्ति योजना’ से जुडे विकसित ग्राम पंचायत प्लान’ के जरिये तय होंगे। इससे ग्राम के विकास की दिशा निर्धारित करने के ग्रामवासियों के हक़ को छीना जाएगा। यह 73वें संवैधानिक संशोधन से मिले हक़ों का हनन है।
संगतिन किसान मजदूर संगठन की नेता ऋचा सिंह से बातचीत, साभार निशान पब्लिकेशन्स