लाखों लोगों को काशी की ओर खींच लाने वाली गंगा आरती और सनातनी कर्मकांडों के पवित्र मंत्रोच्चार के पीछे एक और शहर बसता है, जो शांत है- उन औरतों का शहर, जिनकी जिंदगियां प्राय: अदृश्य रहती हैं। उस शहर में जाति और वर्ग का दोहरा बोझ स्त्री होने मात्र से तिहरा हो जाता है। आश्रमों में रहने वाली परित्यक्त औरतें, स्वास्थ्य-सेवा तंत्र से बहरिया दी गईं दलित औरतें, मजदूरी करवाने के लिए जबरन बंधुआ बनाई गईं मुसहर माँएं, और उत्पीड़क धंधों में धकेल दी गईं बेटियां, इस तथाकथित सनातनी शहर के भीतर अस्तित्व की छुपी हुई कहानी की किरदार हैं।
यह अदृश्यता कोई इत्तेफ़ाक नहीं है, उस संरचना की पैदाइश है जिसे पितृसत्ता, जाति-क्रम, और आर्थिक वंचना मिलकर बनाते हैं। मानवाधिकार जन निगरानी समिति (पीवीसीएचआर) ने औरतों के खिलाफ हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत को भेजे अपने प्रतिवेदन में बताया था कि उत्तर प्रदेश में सरकारी सेवा प्रदाता तक छुआछूत बरतते हैं। वे अपने स्वास्थ्य दौरों पर दलित औरतों को नहीं छूते हैं जिसके चलते ये औरतें मातृत्व स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं से महरूम रह जाती हैं। बहरियाए जाने के चलते औरतों और उनके बच्चों के कुपोषण, बीमारी और असमय मौत का पुराना चक्का हर बार फिर से घूम जाता है।
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बावजूद इसके, उनकी चुप्पी का अर्थ उदासीनता से नहीं लगाया जाना चाहिए। उसमें प्राय: ताकत छुपी होती है। काशी की औरतें सबसे कठिन परिस्थितियों में जीवन को बचाती हैं, उसे पोसती हैं और प्रतिरोध करती हैं। ललिता घाट पर महज कुछ रुपये के लिए कपास की बत्ती बनाने वाली विधवाएं; अपने नवजात को दूध पिलाने के लिए भट्ठा मालिकों की नाफरमानी करने वाली मुसहर माँएं; और अपने लिए कभी वर्जित रही जगहों पर आत्मप्रतिष्ठा के अधिकार को मुखर करने वाली दलित औरतें- इन सब के लिए जीना और बचे रह पाना ही इनका प्रतिरोध है। यह अध्याय इन्हीं परतदार वास्तविकताओं की पड़ताल करता है: वैधव्य का लैंगिक बहिष्करण, जाति का कलंक, हिंसा, और इनके समानांतर एकजुटता, प्रतिरोध व बदलाव की जगहों का औरतों द्वारा गढ़ा जाना।
बनारस की विधवाएं: कर्मकांड और परित्याग के बीच
लंबे समय से बनारस को विधवाओं के अंतिम आसरे की तरह देखा गया है, जहां परिवारों से परित्यक्त औरतें आकर गंगा किनारे पूजा-अर्चना कर के बाकी का जीवन काट सकती हैं। बीसवीं सदी में विधवाओं को एक हद तक समुदाय का सहारा मिल जाता था। मंदिरों के लिए दीया बाती बनाने से लेकर भजन-कीर्तन से जो थोड़ा-बहुत मिलता उससे वे अपना जीवन गुजार लेती थीं। सेवा की यह संस्कृति आज पतन की ओर है।
इसका एक चौंकाने वाला उदाहरण है बिड़ला आश्रम, जहां कभी बीस विधवाएं रहती थीं पर आज केवल दो बची हैं। सुविधाओं का टोटा, ढहती हुई छत, और नई भर्तियां न होना दिखाता है कि आश्रम के न्यासियों और प्रबंधकों ने जान-बूझ कर उसकी उपेक्षा की है ताकि ऐसे भवनों को पर्यटक अतिथिगृह और होटलों में बदला जा सके। इसी तरह, नेपाली मंदिर वाला आश्रम भी उपेक्षित और जर्जर पड़ा है। अस्सी साल पार कर चुकी विधवाएं बिना किसी देखभाल के बीमार होकर बिस्तरों पर पड़ी हैं। एक स्थानीय व्यक्ति बताते हैं कि विधवाओं की बनारस में ‘उपेक्षा’ हो रही है, जिसके चलते कई अब वृंदावन और हरिद्वार में आश्रय ले रही हैं।
जो बच गई हैं, उनकी हालत नाजुक है। एनडीटीवी ने 2015 में एक कहानी की थी जिसमें बताया था कि समूचे बनारस में 38000 से ज्यादा विधवाएं रहती हैं। ज्यादातर आश्रमों और मंदिरों के सहारे हैं और उनके ऊपर नीति-निर्माताओं की कोई नजर ही नहीं है। बिड़ला आश्रम की सत्तर वर्षीया निवासी कृष्णा देवी याद करती हैं कि वे अठारह बरस की उम्र में विधवा हो गई थीं। उसके बाद से ही आाश्रम में रह रही हैं। उन्हें किसी की मदद नहीं मिलती। कभी-कभार धर्मार्थ कुछ मिल जाता है तो खाना पका लेती हैं। अन्नपूर्णा शर्मा एक और विधवा हैं जिन्होंने घुटन भरी इस जिंदगी को गवारा नहीं किया। उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और बंदिशों से भरी जिंदगी में भी जिजीविषा की ताकत को सबके सामने रखा।
ऐसी कहानियां न केवल निजी पीड़ा को उभारती हैं, बल्कि व्यवस्थागत उपेक्षा को भी सामने लाती हैं। कभी इस शहर की पावन अर्थव्यवस्था का अंग रहीं ये विधवाएं अब मुनाफा-केंद्रित पर्यटन और शहरी पुनर्विकास के कारण हाशिये पर जा चुकी हैं। इनका बहिष्करण दिखाता है कि बिना परिवार या किसी आय के औरतों को समाज के हाशिये पर धकेल दिया जाता है, जहां उनका बचे रहना अदृश्य मजदूरी और धर्मार्थ सहयोग के भरोसे रह जाता है।
दलित और मुसहर औरतें
काशी में वैधव्य जहां एक किस्म के बहिष्करण का प्रतिनिधि है, वहीं दलित और मुसहर औरतें कहीं ज्यादा कड़वे सच की नुमाइंदगी करती हैं: जाति का कलंक, स्त्री होने के चलते अधीनता और वर्ग-आधारित गरीबी का तिहरा बोझ वे उठाती हैं। भूमिहीन मजदूर होने के चलते वे बंधुआगिरी और भुखमरी के दुष्चक्र में फंसी रहती हैं। औरत होने के चलते एक तो वे घरेलू काम करती ही हैं जिसका उन्हें कोई मोल नहीं मिलता, दूसरे दिहाड़ी भी करती हैं। फिर ‘अस्पृश्य’ जाति का होने के कारण स्वास्थ्य सेवा, पोषण योजनाओं और शिक्षा से उन्हें यह व्यवस्था बाहर कर देती है। यही ढांचागत हाशियाकरण उन्हें इस पावन शहर का सबसे जयादा अदृश्य नागरिक बनाता है।
बनारस के ईंट भट्ठों में काम करने वाली मुसहर औरतों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी का संघर्ष बुनियादी मातृत्व सेवाएं न मिलने से और गहरा जाता है। एक मुसहर माँ काजल (बदला हुआ नाम) उस दिन को याद करती है जब उसने अपने भट्ठे के सुपरवाइजर की नाफरमानी यह कहकर की थी कि ‘’ईंट पकने का इंतजार कर सकती है, मेरी बच्ची नहीं।‘’ काम के दौरान अपनी बच्ची को दूध पिलाने की उसकी जिद के चलते उसे काम से निकाले जाने की धमकी भी मिली थी।
इसके बावजूद, नाफरमानी के इस कृत्य से उसने एक ऐसी जगह पर अपनी आत्मप्रतिष्ठा को बहाल किया जहां औरतों की आवाजें हर पल दबाई जाती हैं। भट्ठे में काम करने की कठिन परिस्थितियों- धूप में देर तक बिना हवा-पानी और स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में- के कारण प्राय: माँएं अपने बच्चों को मजबूरन चाय पिलाती हैं या पानी मिला हुआ दूध। भट्ठे में काम करने के लिए 2022 में आए परिवारों के 124 बच्चों में से केवल आठ को पूरी तरह टीका लग पाया था और केवल 15 माँ के दूध पर पल रहे थे। नवजातों में मौत और माँओं में कुपोषण बहुत आम बात थी। जनमित्र न्यास और क्राइ के प्रयासों से स्थिति थोड़ा बदलना शुरू हुई। फिर 2024 में पहला स्तनपान करने वाले बच्चों की संख्या नौ से बढ़कर 38 हुई, केवल स्तनपान पर पलने वाले बच्चों की संख्या 15 से बढ़कर 56 हुई और नवजात की मौत गिरकर दो पर आ गई। उसके अगले साल एक भी बच्चे की मौत नहीं हुई।
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काजल की कहानी दिखाती है कि स्तनपान कराने के अधिकार पर आवाज उठाना कैसे आर्थिक शोषण और पितृसत्तात्मक नियंत्रण, दोनों के खिलाफ एक साथ प्रतिरोध का कृत्य रचता है। यानी, मुसहर औरतों के लिए मातृत्व स्वास्थ्य का मामला केवल निजी सरोकर नहीं है, बल्कि मान्यता, प्रतिष्ठा और वजूद तीनों के लिए एक सार्वजनिक संघर्ष का मसला है।
डॉ. स्वाति : नारीवाद और सामाजिक संघर्ष
काशी में हाशिये पर जीने वाली औरतों के संघर्षों को कुछ ऐसी दूरदर्शी महिलाओं ने आवाज दी है जो बौद्धिक, राजनैतिक और जमीनी दायरों के बीच पुल का काम करती थीं। उनमें एक थीं वैज्ञानिक और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता डॉ. स्वाति, जिनकी जिंदगी नारीवादी प्रतिबद्धता और समाजवादी संघर्ष का संगम रही।
ग्वालियर में 1948 में जन्मी डॉ. स्वाति ने 1975 में युनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग से भौतिकी में अपनी पीएचडी पूरी की। अमेरिका में आकर्षक अकादमिक प्रस्तावों को ठुकराकर उन्होंने भारत वापस आना चुना और अपने वैज्ञानिक प्रशिक्षण को जमीनी एक्टिविज्म के साथ मिलाकर काम करने का फैसला किया। तीन दशक से ज्यादा समय तक उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय में अध्यापन किया, बाद में बायोइनफॉर्मेटिक्स में उन्होंने अग्रणी शोध किया और युवा शोधकर्ताओं का मार्गदर्शन किया1 इसके बावजूद, उनकी प्रयोगशाला उनकी कक्षा तक सीमित नहीं रही, उसका विस्तार उत्तर प्रदेश के गांवों और बस्तियों तक हुआ। वहां उन्होंने दलितों, आदिवासियों, किसानों और औरतों के साथ काम करते हुए दमनकारी संरचनाओं को चुनौती दी।
डॉ. स्वाति का यह सफर इमरजेंसी के बाद शुरू हुआ। अस्सी के दशक में बने समता संगठन की सह-संस्थापक होने के नाते वे किशन पटनायक और भाई वैद्य के साथ किसानों, मजदूरों और हाशिये के समुदायों को एकजुट करने में लगी रहीं। बाद में वे समाजवादी जन परिषद की उपाध्यक्ष बनीं। उन्होंने विेकेंद्रीकरण, महिला अधिकार और नवउदारवाद के खिलाफ समाजवादी विकल्पों पर प्रमुख बहसों को आकार देने का काम किया। उनके लिए लैंगिक न्याय का सवाल जाति और सांप्रदायिकता से जुदा नहीं था। बनारस में उन्होंने नारी एकता मंच बनाने में सहयोग किया। यह एक ऐसा मंच था जो दहेज हत्याओं, घरेलू हिंसा ओर महिला बंदियों के सवाल को उठाता था।
डॉ. स्वाति लगातार कहती थीं कि नारीवादी राजनीति को औरतों के ऊपर जाति-बहिष्करण, वर्गीय गरीबी और लैंगिक उत्पीड़न के तिहरे बोझ को संबोधित करना चाहिए। उन्होंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खतरों को, खासकर बाबरी विध्वंस के बाद, यह कहते हुए रेखांकित किया कि लोकतंत्र के लिए सभी धर्मों की औरतों की एकता क्यों अनिवार्य है। इसी भावना से उन्होंने समन्वय नाम के एक समूह का गठन किया, जो न्याय और समता के साझा एजेंडे के इर्द-गिर्द महिला समूहों, शैक्षणिक कार्यकर्ताओं और समाजवादियों को जोड़ने वाला एक नेटवर्क था।
उनका बौद्धिक अवदान भी बराबर महत्त्वपूर्ण था। उनका जोर था कि विज्ञान का काम समाज में वैज्ञानिक मिजाज को रोपना है, न कि पूंजीवादी मुनाफाखोरी का औजार बनकर उसके काम आना है। उन्होंने शिक्षा की इस दृष्टि को ऑल इंडिया फोरम फॉर राइट टु एजुकेशन में रखते हुए ‘केजी से पीजी’ तक मुफ्त और समान स्कूली शिक्षा की पैरवी की। उन्होंने शिक्षकों, विद्यार्थियों, और अभिभावकों को समता व न्याय पर आधारित कॉमन स्कूल सिस्टम के लिए संगठित किया।
काशी में डॉ. स्वाति की छोड़ी विरासत न सिर्फ संस्थाओं के माध्यम से बल्कि उन आंदोलनों की मार्फत भी जिंदा है जिन्हें उन्होंने पोषित किया। उनकी नारीवादी प्रैक्सिस- विज्ञान, समाजवाद और जमीनी संघर्षों का एकीकरण- ने काशी की औरतों के क्षितिज को विस्तार देने का काम किया है। उन्होंने दिखाया है कि प्रतिरोध केवल दमनकारी ढांचों के भीतर जीने तक सीमित नहीं है, बल्कि समता, पंथनिरपेक्षता और एकजुटता के विकल्प खड़ा करने में भी होता है।
वैश्विक प्रतिध्वनियां: गरीबी का स्त्रीकरण और प्रतिरोध
काशी की औरतों की जिंदगी को अलगाव में नहीं समझा जा सकता। उनके संघर्ष महाद्वीपों के पार गुंजित हैं, जहां औरतें जाति या नस्ल, लिंग और गरीबी का मिलाजुला भार झेल रही हैं। इस वैश्विक परिघटना को ‘फेमिनाइजेशन ऑफ पावर्टी’ का नाम दिया गया है, यानी दुनिया के गरीबों के बीच औरतों की उपस्थिति आनुपातिक रूप से ज्यादा होते जाना। इसके पीछे के कारणों में काम, देखभाल तथा संसाधनों तक पहुंच के मामले में मौजूद संरचनागत असमानताएं हैं।
मसलन, सब-सहारन अफ्रीका की विधवाएं एकदम बनारस की औरतों जैसी स्थितियों का सामना करती हैं1 वहां ऐसे कई समुदाय हैं जहां विधवा होने के बाद औरतों को जमीन जायदाद से महरूम कर दिया जाता है और गांवों या शहरों की चौहद्दी पर धकेल दिया जाता है। लैटिन अमेरिका की शहरी बस्तियों में रहने वाली औरतें कम मजदूरी और घरेलू श्रम का दोहरा बोझ झेलती हैं। वे सामुदायिक जीवन की रीढ़ हैं, फिर भी उन्हें सवार्चजनिक सेवाओं की जद से बाहर रखा जाता है। मध्य-पूर्व और अफ्रीका के शरणार्थी शिविरों में माँओं को काम और बच्चों की देखभाल में से केवल एक को चुनने का असंभव विकल्प दिया जाता है, जो भट्ठों में काम करने वाली मुसहर औरतों के द्वंद्व की प्रतिध्वनि है।
ये प्रतिध्वनियां बताती हैं कि काशी की औरतें अपवाद नहीं, बल्कि दुनिया भर में गरीब औरतों के खिलाफ संरचनागत हिंसा के व्यापक चलन का हिस्सा हैं। तो भी, यह वैश्विक कहानी केवल बहरियाए जाने की नहीं, प्रतिरोध की भी है। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया में औरतों के ऐसे समूह उभर कर आए हैं जो जमीन, भोजन और स्वास्थ्य के अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं। बीज बैंक बनाने वाली केनिया की किसान औरतों से लेकर सुरक्षित बाल देखभाल के लिए नेबरहुड काउंसिल बनाने वाली रियो डे जेनेरो की माँओं तक, हम पाते हैं कि औरतों का बुनियादी कर्तापन अपने वजूद को एक सामूहिक राजनीतिक कृत्य में रूपांतरित कर रहा है।

पुस्तक: काशी
लेखक: लेनिन रघुवंशी, चंद्र मिश्रा, श्रुति नागवंशी
प्रकाशक: फ्रन्टपेज पब्लिकेशन
प्रकाशन वर्ष: 2026
पृष्ठ: 156
मूल्य: 395 रुपये
इसी तर्ज पर काशी की विधवाएं, दलित माँएं, और मुसहर औरतें दिखाती हैं कि प्रतिकूल माहौल में उनका प्रतिरोध कैसे उभरता है। वजूद कायम रखने की उनकी रणनीतियां- कपास की बत्ती बनाने से लेकर स्तनपान के अधिकार की मांग, किचेन गार्डेन की खेती और नवदलित अभियानों में शिरकत तक- उन्हें स्त्री-प्रतिरोध के अंतरराष्ट्रीय ताने-बाने के साथ जोड़ती हैं। ये समानताएं एक भव्य हकीकत को रेखांकित करती हैं: अदृश्यता की राजनीति वैश्विक है, तो औरतों के प्रतिरोध की राजनीति भी।
यानी, काशी को पूरी तरह से समझने का मतलब इन औरतों को सुनना है। इनकी जिंदगी न्यायरहित कर्मकांडों की सीमाओं को उद्घाटित करती है। वे हमें चुनौती देती हैं कि हम एक ऐसे शहर- और एक ऐसी दुनिया- का तसव्वुर करें जहां विरासत अदृश्य लोगों के शोषण पर टिकी न हो, बल्कि प्रतिरोध की प्रतिष्ठा से रूपांतरित होती हो।
आखिरकार, खुद महादेव भी माँ अन्नपूर्णा के आगे खाली कटोरा लेकर खड़े हुए ही थे। अहंकार का नाश करने वाली और जाति या शुद्धता के बंधनों से परे सबको शरण देने वाली माँ काली की उग्र करुणा में भी तो इसी सच का साक्षात्कार होता है, कि सारा पोषण और धन-धान्य दरअसल माँ से उपजता है। यानी, वह औरतों की शक्ति है जो काशी को पावन बनाती है। इसलिए काशी की औरतों की अदृश्यता जब तक खत्म नहीं होगी, तब तक यह शहर सही मायनों में पवित्र नहीं हो सकेगा।
ऊपर प्रकाशित अंश पुस्तक ‘काशी’ के सातवें अध्याय Women in Kashi: Silence, Strength, and Survival से लिया गया है। पुस्तक संबंधी संपर्क हेतु पत्रव्यवहारीय लेखक (Corresponding Author) लेनिन रघुवंशी हैं जिनका ईमेल है: pvchr.india@gmail.com