पूरब में लोहा लगा है। अश्वमेघ का अश्व पश्चिम बंगाल में पकड़ा गया है। उसे छुड़ाने के लिए सारा तंत्र और कई अक्षौहिणी सेनाएं जिरह-बख्तर के साथ उतार दी गई हैं।
यह पहला अवसर नहीं है जब लोकतांत्रिक देश में चक्रवर्ती सम्राट घोषित करने के लिए बंगाल में बवाल चल रहा है। पांच साल पहले की जोर आजमाइश के बाद ‘धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्’ का भाव लिए लौट जाना पड़ा था। स्मरण हो कि राजा विश्वामित्र ने पूरे सामर्थ्य से महर्षि वशिष्ठ पर हमला किया था, लेकिन उनकी नंदिनी गाय को नहीं ले पाए थे, परास्त हो गए थे। उनकी समझ में आ गया था कि शारीरिक बल नहीं बल्कि आत्मिक बल, तप और त्याग ही असल शक्ति है। उन्होंने वहीं से राजपाट त्यागकर आत्मिक उन्नति की राह थाम ली और कठोर तप करके ब्रह्मर्षि बने।
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गायों की रक्षा का मुद्दा उठा रखा है। पश्चिम बंगाल के चुनावी महासमर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोहत्या के खिलाफ वक्तव्य दिया तो अनायास नहीं था। तंत्र-साधना की भूमि बंगाल के चुनाव में राजनीतिक वादों और दावों की अपेक्षा अबकी पंचमकार की साधना जोरों पर है। मांस, मत्स्य, मदिरा जैसी मुद्राएं दर्शायी जा रही हैं। मैथुन पर चर्चा पिछले चुनाव में खूब हुई थी। इस बार भी एप्सटीन का जिन्न तो है ही, मगर इन सबको उस आस्था और परम्परा के साथ बरता ही नहीं जा रहा है।
पश्चिम बंगाल : जीत-हार से परे, राजनीति की ऑप्टिक्स को कैसे बदल रहा है प्रवासी ‘हिन्दुस्तानी’ वोटर
वामाचार में पंचमकार को वास्तविक और अनुष्ठानिक रूप से बरतने का विधान है और दक्षिणपंथ में सांकेतिक रूप से, पर यहां तो दक्षिणपंथी मकार के विकार को स्थूल भौतिक रूप में ग्रहण करके उसमें डूबने का दावा ठोक रहे हैं। ‘मैं दीदी से एक किलो ज्यादा मांस खाऊंगा’- हेमंता विश्वशर्मा का यह वक्तव्य वामाचार पद्धति के मुताबिक है और मनोज तिवारी, अनुराग ठाकुर आदि का मछली दि’खाना’ दक्षिण मार्ग है। और चुनाव में शाब्दिक तीर-तरकश तो वामाचार के अनुरूप ही चल रहे है। कुल मिलाकर वाम-दक्षिण का मार्ग में घालमेल हो गया है।
दरअसल, बिना मर्म जाने किसी संस्कृति में नश्तर लगाने पर रोग गम्भीर ही हो जाता है। ऐसी ही गलती अंग्रेजों ने की थी। जिस बंगाल के रास्ते वे हिंदुस्तान में दाखिल हुए उसी को 1905 में विभाजित करने का फैसला लेकर अपने पांव में कुल्हाड़ी मार ली थी। तब वे मुस्लिम-बहुल पूर्व और हिन्दू-बहुल पश्चिम को अलग करके फूट डालना चाहते थे। असम को मुस्लिम-बहुल पूर्वी बंगाल में शामिल किया गया था। उनकी इस दवा का विपरीत असर पड़ा और 1911 में विभाजन वापस ले लेना पड़ा। बंगभंग ने जनता को एकजुट कर दिया और बंगभंग के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया।
बिना मर्म जाने तंत्र के तत्वों को साधना के बजाय साधन के रूप में उपभोग में लाने का विपरीत असर भी हो सकता है। तंत्र में मद्य आनंद है; मांस वाणी पर नियंत्रण; मत्स्य नाड़ी पर नियंत्रण; मुद्रा का अर्थ सत्संग या नकारात्मक विचारों को जलाना है; और मैथुन का अर्थ शिव से मिलान है। पर पश्चिम बंगाल के लोकतंत्र में तंत्र अतिलौकिक रूप से आजमाया जा रहा है। पंचमकार के उपयोग से पहले छह रिपुओं पर विजय पाना भी तो जरूरी है! इन रिपुओं में मद, मोह, मत्सर (ईर्ष्या) तो मकार ही हैं। काम, क्रोध लोभ भी उनके साथ ही हैं।
मद तो सत्ता का सह-उत्पाद है। पश्चिम बंगाल का चुनाव मोह और ममता में तो फंसा ही है, पर खेल खराब कर दिया है मत्सर और उससे उत्पन्न काम, क्रोध और लोभ ने। सत्ता के लोभ में देश भर में बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी घोषित करके हमला करने, मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरती रवैये ने भय पैदा किया है। रही सही कसर सेवकों ने जनतंत्र से जान-बूझ कर जन को मताधिकार से वंचित कर के पूरा कर दिया है।
कुल 27 लाख मतदाताओं को अनायास हाशिये पर फेंकने वाले मुख्य निर्वाचन आयुक्त को इतना तो सोचना था कि परीक्षा में सभी कठिन सवालों का दर्प परीक्षार्थी अक्सर हाशिये पर ही तोड़ते हैं और वहां गणनाएं रफ होती हैं। उनके फेयर नम्बर बना देते हैं। पश्चिम बंगाल का चुनाव भी गणित के कठिन प्रश्नपत्र जैसा है। लगता है लोक ने इसे चुनौती मान लिया है। लोग देश भर से कामधाम छोड़कर अपना हक जिंदा रखने के लिए अपने घर लौट आए हैं। उनको लग रहा है कि वोट ही वह ताला है जो घर और बाहर की दुनिया को चोर-लुटेरों से बचाएगा।

चुनाव आयोग और धर्म, भाषा, जाति के नाम पर नफरत फैलाने वालों ने पश्चिम बंगाल को ‘देश’ (यही कहते है बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों के लोग उत्तर भारत को) से लड़ने पर विवश कर दिया है। पश्चिम बंगाल में मतदान प्रतिशत 80 होता रहा है। इस बार आंकड़ा 93 प्रतिशत तक पहुंच रहा है।
कोलकाता महानगर की सीटों पर पिछली बार 63 से 71 प्रतिशत तक मतदान हुआ था। इस बार आंकड़ा 90 प्रतिशत से ऊपर चला जाय तो आश्चर्य की बात न होगी! उदाहरण के लिए, चौरंगी विधानसभा में 209713 वोटर थे जो अब घटकर 126349 रह गए हैं। यहां 40 प्रतिशत वोटर हटा दिए गए हैं। यहां लोकसभा चुनाव में 55.4 प्रतिशत वोट पड़े थे। जाहिर है कि अबकी यहां 90 प्रतिशत से ज्यादा वोट पड़ेंगे। यहां पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल की नयना बंदोपाध्याय को 62.87 और भाजपा को 22.2 प्रतिशत वोट मिले थे। अंतर 40 प्रतिशत वोटों का है जिसे चुनाव आयोग ने गायब कर दिया। तो क्या यहां सुविचारित तरीके से काटे गए वोट नतीजे बदल देंगे?
पश्चिम बंगाल के मतदाताओं की स्थिति अन्य राज्यों से अलग है क्योंकि हर बांग्ला बोलने वाला संदिग्ध बंगलादेशी हो गया है। यह काम निर्वाचन आयोग ने बेजा तरीके से नागरिकता की जांच करके और भाजपा के नेताओं ने देश भर में घुसपैठिये का नैरेटिव गढ़कर किया है। इस स्थिति को तृणमूल कांग्रेस ने लोगों के अस्तित्व की लड़ाई और बांग्ला पहचान से जोड़ दिया है। जाहिर है कि यह मछली खाने और दिखाने से तो हल होने वाला नहीं है।
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आज शाम चुनाव प्रचार बंद होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 अप्रैल को काशी आ जाएंगे और यहां नारी वंदन करेंगे। जब मतदान हो रहा होगा तब मोक्षनगरी में वे बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद लेने जाएंगे जुलूस लेकर। याद है, हर बार आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के बाद कैमरे वालों के साथ वे तपस्या पर निकल जाते हैं।
अबकी वे मोक्षभूमि महाश्मशान काशी में भी लाइव तपस्या करने आ रहे हैं। याद रखना चाहिए कि काशी में जिसकी साधना सफल हो जाती है वह एकाकार हो जाता है। उसके पास कुछ नहीं बचता- न मत्स्य और न मत्सर।