बीत चुकी दुनिया और उसके लोगों की एक फिल्म, जो उम्मीद की स्मृतियां बहाल करती है!

The Battle of Chile
The Battle of Chile
डॉक्‍युमेंटरी निर्माताओं में बहुत कम लोग ऐसे हैं जिनका समूचा काम एक ही विषय के इर्द-गिर्द अलग-अलग पहलुओं को समेटता हुआ अपने समय के कालानुक्रमिक दस्‍तावेज जैसा हो। चिली की तानाशाही और लोकजीवन के प्रसंग में पात्रीसियो गुज्‍़मान ने आजीवन जो काम किया, वही काम बीते पचास साल से आनंद पटवर्धन भारत में साम्‍प्रदायिकता की विभिन्‍न छायाओं के साथ कर रहे हैं। स्‍वाभाविक है कि गुज्‍़मान के काम का पटवर्धन पर गहरा असर रहा होगा। खुद आनंद पटवर्धन के शब्‍दों में, गुज्‍़मान की ऐतिहासिक फिल्‍म 'द बैटल आफ चिली' पर कुछ शब्‍द

उन्‍नीस सौ सत्तर के उग्र परिवर्तन वाले दशक में मैं अमेरिका में पढ़ रहा था। वहां मैंने कई ऐसी डॉक्‍युमेंटरी फिल्‍में देखी थीं जो मुझे फिल्‍मकारी की ओर प्रेरित कर रही थीं। उन्‍हें देखकर मुझे समझ आने लगा था कि फिल्‍म बनाना भी सामाजिक कार्रवाई का एक कारगर तरीका हो सकता है। ऐसी फिल्‍मों में एक जो मेरे मन में अब तक बसी हुई है, वह पात्रीसियो गुज्‍़मान की द बैटल ऑफ चिली है।

चिली के राष्‍ट्रपति साल्‍वाडोर आयेंदे उस समय तक एक मशहूर शख्सियत बन चुके थे। मैं मन से चाहता था कि अपने मार्क्‍सवादी दोस्‍तों को अहिंसा की नीति स्‍वीकार करने के लिए तैयार कर सकूं। साथ ही मेरी कोशिश यह भी थी कि अपने गांधीवादी दोस्‍तों को मैं इस बात पर राजी कर सकूं कि वर्ग-संघर्ष के बगैर अहिंसा न्‍याय नहीं दिला सकती। मेरे लिए आयेंदे इसका उदाहरण थे। वे एक ऐसे मार्क्‍सवादी थे जो रक्‍तरंजित क्रांति नहीं, बल्कि चुनाव के रास्ते सत्ता में आए थे। सीआइए-प्रायोजित सैन्‍य तख्‍तापलट में 11 सितंबर, 1973 को आयेंदे की हत्‍या कर दी गई और हजारों नागरिकों व कामगारों का कत्‍लेआम कर डाला गया। यह लोकतंत्र और समाजवाद पर विनाशक हमला था। आयेंदे के उन्‍हीं वर्षों के गौरव और त्रासदी को गुज्‍़मान की महान डॉक्‍युमेंटरी कैद करती है।


Victory Train, a picture from Allende's 1958 Presidential Campaign
विक्ट्री ट्रेन: आयेंदे के 1958 के चुनाव प्रचार की तस्वीर (विकिपिडिया)

याद पड़ता है कि मेरे ऊपर सबसे ज्‍यादा असर उस डॉक्‍युमेंटरी की किस चीज ने डाला- वह फिल्‍म का सबसे नाटकीय फुटेज नहीं था जिसमें अर्जेंटीना का एक कैमरामैन लियोनार्दो हेनरिक्‍सन अपने ऊपर सेना की सीधी गोली चलने तक लगातार शूट करता रहा और उसने अपनी मौत को ही फिल्‍मा दिया; न ही वह मोनेडा की इमारत पर हुई अंतिम बमबारी वाला फुटेज था जिसमें आयेंदे मारे गए। मेरे लिए सबसे असरकारी चीज थी पेंटागन और चिली के निरंकुश शासकों द्वारा पैदा किए संकट के सघन होते जाने के बीच आम लोगों की दैनंदिन जिंदगी में घट रही घटनाओं का श्रमसाध्‍य रिकॉर्ड।

करीब चौथाई सदी बाद फिर से उस फिल्‍म को देखने पर मैं उसमें दर्ज विवरणों पर हैरत में रह गया। गुज्‍़मान के कैमरे एक ही वक्‍त में हर जगह पर मौजूद हैं- वे दक्षिणपंथी शहरी कुलीन से बात कर रहे हैं तो मजदूरों को उनके घरों और कारखानों में फिल्‍मा भी रहे हैं; संसद में पाखंडी नेताओं पर नजर रखे हुए हैं तो छज्‍जों से गोली दागते विपक्ष के बीच नीचे सड़क पर मजदूरों के साथ मार्च कर रहे हैं; और गोलीबारी में मारे गए एक मजदूर के भारी-भरकम जनाजे में साथ-साथ चल रहे हैं। इन विवरणों के माध्‍यम से उन्‍होंने चिली की सियासत के हर पहलू की चीरफाड़ विशुद्ध समाजशास्‍त्रीय सटीकता के साथ की।

कहीं भी और हर कहीं मौजूद रहने के इस साहस और सामर्थ्‍य की कीमत उनके सिनेमटोग्राफर होरहे मूलर को अपनी जिंदगी से चुकानी पड़ी थी, जब तख्‍तापलट के बाद जनरल ऑगस्‍टो पीनोशे के बर्बर शासन ने बाकायदा उन पर दबिश देकर उन्‍हें प्रताड़ित किया और उनकी हत्या कर दी।

आज इतिहास में पीछे मुड़कर देखने पर हम बेशक जानते हैं कि तख्‍तापलट का अंतिम नतीजा क्‍या रहा, लेकिन गुज्‍़मान की यह फिल्‍म आ रहे इंकलाब की आहटों से भरी पड़ी है। उसकी रूमानियत को फिल्‍मकार की टीम की नसों में दौड़ता हुआ महसूस किया जा सकता है, जब वे कारखानों और सभागारों में चल रही महीन बहसों को रिकॉर्ड कर रहे थे। जब टकराव बिलकुल सिर पर मंडरा रहा था, वे मजदूर वर्ग की हर छाया को दर्ज कर रहे थे। कई इस बात को मानते थे कि कानूनन चुनी गई सरकार को अब मजदूरों को आत्‍मरक्षा के लिए हथियार बांटना शुरू कर देना चाहिए। आयेंदे हालांकि अंत तक आदर्शवादी बने रहे। उन्‍हें या तो यह भरोसा था कि राज्‍य के अहम अंग संविधान के प्रति वफादार बने रहेंगे, या फिर वे इस बात पर दृढ़ थे कि चाहे जो भी हो खुद को और अपनी सरकार को बचाने के लिए गैरकानूनी तरीकों का इस्‍तेमाल नहीं करना है।



इस विभाजन के दूसरे छोर पर हम उन कुलीनों को पाते हैं जिनकी पहले तो चुनाव में अक्षुण्‍ण आस्‍था थी (जब तक उससे जीत मिल रही थी), फिर वे हड़ताली मजदूरों और ट्रांसपोर्टरों के साथ असामान्‍य गठजोड़ बनाने लगे और अंतत: उतनी ही सुगमता के साथ उन्‍होंने फासीवाद को गले लगा लिया। हम सेना के उन अधिकारियों के मुस्‍कराते हुए ठंडे चेहरे देखते हैं जो अपने ही एक साथी की हत्‍या का षडयंत्र इस पूर्वाभास में रच रहे हैं कि विश्‍वासघात के निर्णायक दिन कहीं वह सरकार के प्रति वफादारी न दिखा बैठे।    

सत्तर के दशक में हूलियो गारसीया एस्‍पीनोज़ा ने ‘इम्‍परफेक्‍ट सिनेमा’ (अनगढ़ सिनेमा) के आगमन का स्‍वागत किया था- वह सिनेमा जिसमें हाथ के कैमरे के इस्‍तेमाल से तेज गति वाली श्‍वेत-श्‍याम दानेदार फुटेज निकाली जाती है, जिस पर दर्शाये गए संघर्षों की छाप होती है। गुज्‍़मान का सौंदर्यशास्‍त्र ‘अनगढ़ता’ और आत्‍मसजग क्रांतिकारिता से बहुत ऊपर उठा हुआ है। उसमें एक कविताई है। यह कविता साधारण की महत्ता में अमोघ आस्‍था के असाधारण के साथ गुम्‍फन से उपजती है।

द बैटल ऑफ चिली का नामकरण संभवत: पॉन्‍टेकॉर्वो की द बैटल ऑफ अल्जियर्स की तर्ज पर किया गया है, जो एक मास्‍टरपीस पुनर्रचना है। उसी की तरह द बैटल ऑफ चिली भी हमें अध्‍याय दर अध्‍याय बहुत निष्‍ठुर ढंग से अपने त्रासद उपसंहार तक लेकर जाती है। बस अंतर ये है कि अल्जियर्स की तरह यह पुनर्रचना नहीं, बल्कि एक जिंदा रिकॉर्ड है। यह फिल्‍म हमें आमंत्रित करती है कि लोगों को हम उस तरह से देखें जैसे वे वास्‍तव में थे, और उस दुनिया में जिसे अब हम कभी नहीं देख पाएंगे। ऐसा कर के यह फिल्‍म उम्‍मीदों की स्‍मृति को बहाल करती है। 


(यह लेख जमशेदपुर से 1973-2007 तक प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी के साप्ताहिक अखबार MOTIF के 19 जुलाई, 2004 के अंक से साभार है)


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