चिली में पानी बहुत बरसता है और अकसर बहुत ठंड हो जाती है। मैं चार साल का था जब मेरे पिता हमें छोड़कर चले गए, फिर मैं अपनी मां के साथ बीनिया देल मार में ही रहा। यह एक छोटा सा शानदार तटवर्ती कस्बा है। मैं कोई बहुत अच्छा विद्यार्थी नहीं था। जब स्कूल से पास होकर निकला तब मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि बड़ा होकर मैं क्या करूंगा।
युनिवर्सिटी में भी मुझे बहुत सहज महसूस नहीं हुआ। मैंने थिएटर स्टडीज को आजमाया, फिर इतिहास में हाथ डाला और अंत में दर्शनशास्त्र पढ़ने लगा, पर इनमें से किसी भी पाठ्यक्रम को मैंने पूरा नहीं किया। वहीं मेरा एक दोस्त दर्शन पढ़ रहा था और दूसरा थिएटर। उन दोनों के साथ मिलकर मैंने आठ शॉर्ट फिल्में निर्देशित कीं जो 8 एमएम के कैमरे पर बनाई गई थीं। उनमें कुछ फिक्शन थीं, कुछ ऐनिमेशन। इन फिल्मों पर स्कॉटिश मूल के फिल्मकार नोर्मन मक्लारेन का संभवत: प्रभाव था। वे तो खैर परदे पर जैसे सीधे चित्रकारी ही करते थे। कुछ समय तक उन्होंने जॉन ग्रियरसन के साथ भी काम किया था।
फिर मैंने विश्वविद्यालय छोड़ दिया। इसके पीछे मुख्यत: आर्थिक कारण रहे। इसके बाद मुझे एक विज्ञापन एजेंसी में कॉपीराइटर का काम मिल गया। तब मैं हफ्ते में दो बार सिनेमा देखने जाता था। चालीस और पचास के दशक की तकरीबन हर उत्तर अमेरिकी पिक्चर मैंने देख रखी थी। उस वक्त तक चिली में फिल्मकार कम ही थे। पचास के दशक के अंत तक डॉक्युमेंटरी को एक वधा के तौर पर संजीदगी से लिया जाने लगा था। मैंने याक्स-येस कूस्तो, लुईस माले और वाल्ट डिज़्नी की फिल्में देखीं, पर मुझे फिक्शन पसंद नहीं आया। मेरी दिलचस्पी कहीं ज्यादा गतिमान रेखाचित्र बनाने और स्टॉप-फ्रेम ऐनिमेशन को शूट करने में थी। मेरे लिए यह अपने इतिहास पर बात करने के एक तरीके जैसा था। मेरे ऊपर दो आंदोलनों का जबरदस्त असर रहा- फ्री सिनेमा और न्यू वेव। दोनों ही आंदोलन डॉक्युमेंटरी के करीब ठहरते हैं। चिली में इस तरह की डॉक्युमेंटरी फिल्में 1961-62 के आसपास आई थीं।
मैं चाहता था कि अपनी बनाई 8 एमएम वाली फिल्मों की प्रतियां बनवाकर रख लूं। इसके लिए मैंने सिनेमटोग्राफिक इंस्टिट्यूट से मदद मांगी। वहां विभाग के अध्यक्ष को मेरी फिल्में पसंद आईं, तो उन्होंने मुझे स्कूल में पढ़ने का न्योता दे डाला। फिर तो मैं हर सुबह वहां जाने लगा। दोपहर और शाम को विज्ञापन एजेंसी में काम करना मैंने जारी रखा। उसके तीन साल बाद मैंने स्पेन में मैड्रिड सिनेमा स्कूल जाने का फैसला किया।
उसी दौरान चिली में एक सिनेमा आंदोलन उभर रहा था जो बहुत राजनीतिक, बहुत रचनात्मक और विशुद्ध देसी था। उस सिलसिले में बीनिया देल मार में लैटिन अमेरिका के फिल्मकारों की एक बैठक हुई थी। इसी बैठक से लैटिन अमेरिका का नया सिनेमा निकला। मेरे सोचने के तरीके का राजनीतिकरण हालांकि मैड्रिड में हुआ, जहां मैंने लैटिन अमेरिका के बारे में जाना, यूरोपीय साम्राज्यवाद द्वारा उसके उपनिवेशीकरण तथा आर्थिक निर्भरता के अभिशाप को समझना शुरू किया। वहां मैंने जे. एडगर हूवर को जाना, चे गुआरा को जाना।


जब साल्वाडोर आयेंदे चिली के राष्ट्रपति बने, तो मैं सीधे चिली लौट गया। आयेंदे बीते 18 साल से चुनाव लड़ रहे थे और प्रचार में जुटे थे। अपने राजनीतिक अभियान की शुरुआत उन्होंने 1952 में थी। मैं जब किशोर था उसी वक्त आयेंदे सोशलिस्ट पार्टी के नेता बन चुके थे, लेकिन तब मेरे मन में उनके लिए कोई खास सहानुभूति नहीं थी। उस उम्र में मैं यह नहीं समझता था कि वे आखिर करना क्या चाहते हैं। तब मेरा रुझान ज्यादातर राजनीतिक मध्यमार्ग की तरफ था, यानी ईसाई समाजवाद। फ्रांको के राज वाले स्पेन में रहते हुए मेरे सोचने का ढंग राजनीतिक हुआ। यूनिवर्सिटी ऑफ मैड्रिड में तो विद्यार्थियों की राजनीतिक चेतना बहुत ही मजबूत थी। इसीलिए जब आयेंदे राष्ट्रपति बने तब मुझे महसूस हुआ कि मुझे तो चिली में ही होना चाहिए।
मैं मैड्रिड में पांच साल से था, लेकिन एक झटके में वहां से निकल गया, यह सोचे बगैर कि चिली जाकर क्या करूंगा। हवाई जहाज से उतरते हुए मेरे मन में तुरंत खयाल आया कि चिली में जो कुछ भी चल रहा है उस पर क्यों न एक डॉक्युमेंटरी बनाई जाए। यहां की सड़कें विरोध प्रदर्शनों से लबालब थीं। दीवारें पेंटिंगों से रंगी हुई थीं। हर जगह आयेंदे के भाषण चल रहे थे जिनमें वे स्टील, कोयला, बिजली और बैंकों के राष्ट्रीयकरण पर बात करते थे। आयेंदे जिस दिन सत्ता में आए, उसी दिन से उन्होंने पॉपुलर यूनिटी का अपना पोग्राम लागू करना शुरू कर दिया। हम में से जो लोग भी आयेंदे का समर्थन करते थे सबको यही लगता था कि बिना गृहयुद्ध के क्रांति मुमकिन है, और वास्तव में, शुरुआत में तो सेना की तरफ से कोई खतरा भी नहीं था।
मैंने एक कैमरामैन और एक साउंड रिकॉर्डिस्ट को साथ में लिया। फिर अरीफ्लेक्स के एक कैमरे और परफेक्ट टोन के साउंड रिकॉर्डर से- जिनके बीच सिंक्रोनाइजेशन नदारद था और यह बड़ी भयावह बात थी- हमने हाथों से ही सड़क पर पूरी फिल्म शूट कर डाली। यह फिल्म हमारे विशुद्ध उत्साह का नतीजा थी। जबरदस्त थी। उसका जश्न बनता था। आज उस दौर को पीछे मुड़ के देखने में ऐसा लगता है कि बुर्जुआ वर्ग ने कैसा जबरदस्त अन्याय ढाया था। उसकी तुलना संभव नहीं। चिली की आधी जनता तबाह कर दी गई थी। फिर भी चिली के दक्षिणपंथी उन हत्याओं और कत्लेआम के लिए कभी माफी नहीं मांगेंगे। मेरे लिए तो यह ऐसे है गोया तख्तापलट कल ही की बात हो।
निरंकुशता के विरुद्ध : तख्तापलट के पचास बरस और चिली का प्रतिरोधी सिनेमा
हकीकत का एक काव्यात्मक पहलू होता है जो मुझे बहुत भाता है, लेकिन मैं उसे कभी पकड़ नहीं पाता हूं। मैं जब भी एक ज्यादा काव्यात्मक फिल्म बनाने की कोशिश करता हूं, तो एक ऐतिहासिक फिल्म निकल आती है। हाल ही में मैंने मैड्रिड जैसे शहरों पर छोटी-छोटी फिल्में बनाना शुरू की हैं। इससे मुझे बहुत संतोष मिलता है। बीते तीन साल में द पिनोशे केस का निर्माण मुझसे बहुत कुछ ले चुका है। अब मैं आयेंदे के बारे में एक फिल्म बनाने की शुरुआत कर रहा हूं। उसमें अगले तीन साल शायद लग जाएं।
फ्रेंच फिल्मकार और पूर्व पत्रकार क्रिस मार्कर (जिनका मूल नाम क्रिश्चियन फ्रांसुआ बूशे-विलेनेव था) मई 1972 में कोस्ता गावरुज़ के साथ चिली आए थे यह देखने कि यहां क्या चल रहा है। इत्तेफाक से उन्होंने मेरी फिल्म द फर्स्ट ईयर देख ली। वह मेरी पहली पेशेवर फिल्म थी। फिर मार्कर ने मुझसे संपर्क किया और बोले कि वे भी ऐसी ही एक फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन मैंने चूंकि पहले ही इसे बना दिया है तो क्या वे मेरी फिल्म को दूसरे देशों में वितरित कर सकते हैं। मार्कर बहुत उदार आदमी निकले।
उसी साल अक्टूबर में चिली के दक्षिणपंथी राजनीतिक धड़े ने एक बड़ी हड़ताल की थी। सब कुछ ठप हो गया था। तभी मुझे अहसास हुआ कि मुझे अपना काम जारी रखना चाहिए और अगली फिल्म चिली की क्रांति पर बनानी चाहिए। द बैटल ऑफ चिली यहीं से निकली। अब दिक्कत यह थी कि इसके लिए मेरे पास रील का स्टॉक होना जरूरी था ताकि मैं लगातार शूट करता रह सकूं। चिली पर लगे प्रतिबंधों की वजह से नया स्टॉक मिलना मुश्किल था। तब मैंने मार्कर को मदद के लिए लिख कर भेजा। उन्होंने किसी तरह से सारा सामान भिजवाया और उनकी मदद से हम लोग तख्तापलट के दिन तक लगातार शूट कर सके।
तख्तापलट के बाद मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। हमें सांटियागो के नेशनल स्टेडियम में ले जाया गया। स्वाभाविक रूप से मैं बहुत डरा हुआ था। उन्होंने मुझसे कहा था कि अगली सुबह मेरी हत्या कर दी जाएगी, लेकिन सुबह होते ही हमें एक बस में चढ़ने का आदेश दिया गया। उस बीच सेना मेरे घर की तलाशी ले चुकी थी और उसने फिल्मों से भरी बालटियां उठाकर फिंकवा दी थीं। संजोग से उन बालटियों में एक भी नेगेटिव नहीं था। हमें चिली के स्टेडियम में ले जाया गया। वह भयावह जगह थी। हमने सुन रखा था कि वे वहां लोगों को मार रहे थे। फिर अचानक ही उनकी योजना बदल गई। हमें वापस नेशनल स्टेडियम लाया गया और मुझे एकांतवास में डाल दिया गया। इसका साफ मतलब था कि मुझे मरने के लिए छोड़ दिया गया है।
अगले दिन उन्होंने बाकी लोगों के साथ मुझे वहां से निकाल दिया। हम सबके अनुभव एक जैसे ही थे। सेना ने दो हफ्ते तक मुझसे पूछताछ की, लेकिन उन्हें समझ में ही नहीं आया कि मैं क्या कर रहा था। इसलिए उन्होंने मुझे कोई तवज्जो नहीं दी। उनके लिए मेरा कोई महत्त्व नहीं था। मैंने उन्हें बताया था कि मैं फ्रेंच टेलीविज़न के लिए शूट कर रहा हूं। वास्तव में मैंने सब कुछ छुपा दिया था।
रिहा किए जाने के बाद स्पैनिश फिल्म स्कूल के मेरे साथियों ने इतना चंदा जुटाया जो चिली छोड़कर मेरे मैड्रिड जाने के लिए काफी था। हमने जो कुछ भी शूट किया था वह सब सामान स्वीडिश दूतावास के राजनयिक झोले में तस्करी से बाहर निकाला गया। मेरे कैमरामैन होरहे मूलर सांटियागो में ही रुक गए थे। उन्हें लग रहा था कि वहां उन्हें अब कोई खतरा नहीं है। कोई साल भर बाद उनकी महिला मित्र, अभिनेत्री कार्मेन बुएनो के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उनका क्या हुआ, अब तक कुछ भी पता नहीं चल सका है- तमाम और लोगों की तरह वे भी बस गायब हो गए।

(पात्रीसियो गुज़्मान का यह संस्मरण जमशेदपुर से 1973-2007 तक प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी के साप्ताहिक अखबार MOTIF के 19 जुलाई, 2004 के अंक से साभार है)

