तेरह साल बाद नियमगिरि: अनिल अग्रवाल का नया ‘भरोसा’ बनाम आदिवासियों की प्राचीन आस्था

Anil Agrawal meeting with Odisha CM Mohan Majhi
Anil Agrawal meeting with Odisha CM Mohan Majhi
वेदांता कंपनी नियमगिरि के डोंगरिया कोंध आदिवासियों से एक बार मुंह की खा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के कारण ही 2013 में ग्राम सभाओं की जीत मुमकिन हुई थी जब लोगों ने अपने पहाड़ में बॉक्‍साइट खनन परियोजना को रोक दिया था। तेरह साल बीत गए, नियमगिरि अब भी सुलग रहा है। पहले आदिवासियों के लोकप्रिय नेता लदा सिकाका की गिरफ्तारी होती है, फिर वेदांता के मालिक ओडिशा के मुख्‍यमंत्री से मिलते हैं और उनमें अपना ‘भरोसा’ जताते हैं कि नवंबर तक सब ठीक हो जाएगा। क्‍या यह मुलाकात सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई ग्राम सभाओं के सामूहिक निर्णय से बड़ी है? आखिर ऐसा क्‍या बदल गया बीते वर्षों में? नियमगिरि पर रंजना पाढ़ी का फॉलो-अप

ओडिशा के मुख्‍यमंत्री मोहन माझी और वेदांता कंपनी के मालिक अनिल अग्रवाल के बीच शनिवार, 27 सितंबर को भुवनेश्‍वर में हुई बैठक की खबर आम है। सूचना के मुताबिक अनिल अग्रवाल ने इस मुलाकात में दक्षिण ओडिशा के बॉक्‍साइट भंडारों के बारे में मुख्‍यमंत्री से चर्चा की है। अचरज की बात नहीं होनी चाहिए कि इस बैठक में चर्चा का मुख्‍य बिंदु नियमगिरि के बॉक्‍साइट भंडार रहे, जिसमें वेदांता की दिलचस्‍पी लंबे समय से है।

बैठक के बाद एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस हुई। उसमें अग्रवाल ने संकेत दिए कि कालाहांडी और रायगड़ा में वेदांता की प्रस्‍तावित खदानों के संबंध में लंबे समय से अटके हुए मसले आगामी नवंबर तक निपटा लिए जाएंगे। उन्‍होंने कहा, ‘इस राज्‍य सरकार में मेरा पूरा भरोसा है। नवंबर तक सब कुछ ठीक हो जाएगा। मुझे कहीं से कोई भी अवरोध दिखाई नहीं दे रहा। अपनी युवावस्‍था में मैं ओडिशा में रहा हूं और यहां के लोगों ने मुझे बहुत प्‍यार दिया है।‘

इस बयान से साफ दिखता है कि हाथी के दांत खाने के और हैं, दिखाने के और! हकीकत यह है कि आज ओडिशा के आदिवासी मुख्‍यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री विशाल खनन कंपनियों को अपना पूरा समर्थन देकर इस क्षेत्र में मौजूद तमाम बॉक्‍साइट भंडारों को लपेटने में लगे हुए हैं। ध्‍यान देने वाली बात है कि मुख्‍यमंत्री और वेदांता के मालिक के बीच हुई इस रणनीतिक बैठक से पहले 10 सितंबर को नियमगिरि सुरक्षा समिति (एनएसएस) से सम्‍बद्ध डोंगरिया कोंध आदिवासियों के सम्‍मानित और लोकप्रिय नेता लदा सिकाका को गिरफ्तार किया जा चुका था। उसके विरोध में कल्‍याणसिंहपुर थाने पर हजारों आदिवासी भारी बारिश के बीच इकट्ठा हुए थे। उन्‍होंने ‘लदा सिकाका को रिहा करो!’, ‘वेदांता गो बैक’ के नारे लगाए थे। अफसोस, कि मुख्‍यधारा की मीडिया ने उनकी आवाजों को दबा दिया।     

इस मौके पर याद दिलाया जाना जरूरी है कि 18 अप्रैल, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मुकदमे में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए नियमगिरि की पहाड़ियों में बॉक्‍साइट खनन परियोजना पर निर्णय लेने का अधिकार जब ग्राम सभाओं के हाथों में सौंपकर उन्‍हें सशक्‍त किया था, उसके बाद जुलाई और अगस्‍त में आयोजित खुले मतसंग्रह में 112 गांवों की 12 ग्राम सभाओं ने वेदांता और ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन के प्रस्‍तावित बॉक्‍साइट खनन के खिलाफ अपना मत दिया था।  


A file photo from the last Gram Sabha of Jarpa, Niyamgiri, in August 2013
जरपा में आखिरी ग्राम सभा की अध्यक्षता करने आए जिला जज एस.सी. मिश्रा, 19 अगस्त 2013 (फाइल फोटो) 

इस तरह सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने न सिर्फ पहाड़ों पर रहने वाले डोंगरिया कोंध आदिवासियों, बल्कि नियमगिरि की तलहटी वाले गांवों में रहने वाले कुटिया कोंध और देसी कोंध समुदायों के सांस्‍कृतिक और धार्मिक अधिकारों की भी सुरक्षा की थी। फिर सवाल उठता है कि इस बीच ऐसा क्‍या बदल गया कि पांचवीं अनुसूची वाले इस इलाके में आदिवासियों के धार्मिक व सांस्‍कृतिक अधिकारों की बलि अब इतनी आसानी से दी जा सकती है?

इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए हमें नियमगिरि आंदोलन के प्रमुख चेहरे लदा सिकाका की ताजा गिरफ्तारी का पूरा मामला समझना जरूरी है, तभी नियमगिरि का समूचा संदर्भ खुलकर सामने आ सकेगा कि 2013 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद यह क्षेत्र लगातार तनावपूर्ण क्‍यों बना हुआ है और कैसे सुलग रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, खासकर 2014 से लेकर कोरोना महामारी के आने तक इस इलाके में सीआरपीएफ के तलाशी अभियान चले, मनमर्जी गिरफ्तारियां की गईं और यहां के लोगों पर अनगिनत मुकदमे लादे गए। महामारी के दौरान नियमगिरि में सैकड़ों पेड़ काटे गए थे और तल‍हटी से लेकर पहाड़ की चोटी तक चौड़ी सड़कें बनाई गई थीं। वही सिलसिला एक बार फिर शुरू हो चुका है।   

कभी-कभार ऐसे मौके आते हैं जब कानून की मशीनरी खुद कानून से बड़ी हो जाती है- जब गिरफ्तारी, आरोप और लंबी अदालती सुनवाइयां इंसाफ का औजार नहीं रह जातीं क्‍योंकि उनका इस्‍तेमाल केवल असहमतियों को दबाने में किया जाता है। डोंगरिया कोंध आदिवासियों के नेता लदा सिकाका की गिरफ्तारी बिलकुल वही मौका है।

सिकाका नियमगिरि की पहाड़ियों को बचाने के संघर्ष की प्रमुख आवाज हैं। उनकी गिरफ्तारी ने इंसाफ के औजारों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। उनका प्रकरण अकेला नहीं है। उसके पीछे एक ऐसे इलाके में पुलिसिया कार्रवाइयों, आपराधिक मुकदमों, यूएपीए के आरोपों और सुरक्षा तंत्र का लंबा-चौड़ा इतिहास मौजूद है जहां के मूलवासी समुदाय अपनी जमीन, जंगलों और स्‍वशासन के अधिकारों को लगातार मुखर होकर दर्ज करवाते रहे हैं।

यह बीते 10 सितंबर को शाम साढ़े चार बजे के आसपास की बात है जब लदा सिकाका अपने वकील और छह साथियों के साथ अपने गांव लौट रहे थे। वे लांजीगढ़ कोर्ट से एक मामले में जमानत पर छूटकर आ रहे थे। रास्‍ते में कल्‍याणसिंहपुर के पास उनकी गाड़ी को हथियारबंद पुलिस टीम ने रोक लिया।


Lada Sikaka, the popular leader of Niyamgiri struggle
नियमगिरि आंदोलन के लोकप्रिय नेता लदा सिकाका

सिकाका को लांजीगढ़ के प्रथम श्रेणी न्‍यायिक मजिस्‍ट्रेट ने नौ साल पुराने एक मुकदमे (मुकदमा संख्‍या 349/2017) के सिलसिले में इसी साल के 9 मार्च को भगोड़ा घोषित किया था और रायगड़ा जिले के कल्‍याणसिंहपुर थाना प्रभारी को उनकी संपत्ति जब्‍त करने की कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया था। सिकाका इस मामले में ओडिशा उच्‍च न्‍यायालय गए, जहां अदालत ने वारंट और संपत्ति जब्‍ती के आदेश को रद्द कर दिया था और उन्‍हें जमानत दे दी थी। जमानत देने की शर्त उच्‍च न्‍यायालय ने यह रखी थी कि सिकाका को न्‍यायिक मजिस्‍ट्रेट की अदालत में पेश होकर ‘आत्‍मसमर्पण’ करना होगा। न्‍यायिक मजिस्‍ट्रेट की अदालत ने इसका पालन किया।

अचरज की बात लगती है कि डोंगरिया कोंध समुदाय का जो नेता समूची नियमगिरि पहाड़ियों की सुरक्षा के लिए लड़ रहा है उसे संपत्ति जब्‍त करने का नोटिस थमा दिया गया। अब पीछे मुड़कर देखने पर समझ आता है कि यह सारा मसला उसे अदालत में पेश करवाने के लिए था। बहरहाल, रायगड़ा पुलिस पहले से ही सिकाका के गांव लौटने का इंतजार करते हुए घात में बैठी थी। इस पुलिस टीम की अगुवाई केसिंगा के एसडीपीओ सहित कल्‍याणसिंहपुर थाने और विश्‍वनाथपुर थाने के प्रभारी कर रहे थे। पुलिस टीम सिकाका को जबरन उठा ले गई।

मौके पर अधिवक्‍ता नरेंद्र मोहन्‍ती मौजूद थे। उन्‍होंने वारंट दिखाने की मांग की थी। फिर उन्‍होंने और कई अन्‍य लोगों ने थानों में दरयाफ्त की और सिकाका के ठिकाने के बारे में रायगड़ा जाकर पता लगाने की कोशिश की। मोहन्‍ती के अनुसार, ‘उन्‍हें कहां रखा गया था इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। हमने रायगड़ा के पुलिस अधीक्षक को लिखित में शिकायत दी लेकिन हमें बैठाए रखा गया। अगला पूरा दिन हम लोग रायगड़ा की कोर्ट में इंतजार करते रहे। फिर खबर आई कि लदा सिकाका को अलग-अलग ठिकानों से घुमाते हुए 10 सितंबर की रात साढ़े दस बजे अदालत के समक्ष पेश किया गया था, जिसके बाद उन्‍हें रायगड़ा जेल में भेज दिया गया है।‘

अदालती दस्‍तावेजों की पड़ताल से अब यह साफ हो चुका है कि सिकाका को कोर्ट से जारी वारंट और अरेस्‍ट मेमो के आधार पर हिरासत में लिया गया था। इसके बाद पुलिस ने सारी कानूनी औपचारिकताएं निभाई थीं। जेल भेजे जाने वाली रात पुलिस ने सिकाका के लिए सरकारी वकील का इंतजाम किया था। वह केवल कागजी खानापूर्ति थी। उस वकील ने ‘आरोपित’ के बचाव में एक शब्‍द नहीं कहा था। ये सारी औपचारिकताएं अंधेरे में पूरी की गईं। अधिवक्‍ता मोहन्‍ती, सिकाका के परिवार और समूचे समुदाय को उनके ठिकाने की सूचना करीब चौबीस घंटे बाद ही मिल सकी, जबकि वे लोग पूरे दिन अदालत में इंतजार करते रहे थे और एसपी व थाना प्रभारियों को कई दफा फोन लगा चुके थे।

लदा सिकाका के ऊपर बीते वर्षों के दौरान लगातार बढ़ते गए मुकदमों और नियमगिरि से जुड़े कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियों व गुमशुदगी के पूरे सिलसिले में रखकर देखा जाए, तो यह ताजा प्रकरण ज्‍यादा निर्णायक शक्‍ल ले लेता है। लंबे समय से चलाए जा रहे सुरक्षा अभियानों के साये में पहले से ही जी रहे समुदायों के खिलाफ आतंकवाद और राजद्रोह जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े कानूनों का इस्‍तेमाल ऐसे परिणाम लेकर आता है जिसके प्रभाव केवल अदालत तक सीमित नहीं रहते। इससे लोगों की दैनंदिन जिंदगी बदल जाती है। साथ ही, यह राजनीतिक असहमति और सामुदायिक एकजुटता को आपराधिकता और राष्‍ट्रीय सुरक्षा के सवालों में तब्‍दील कर देता है।    


लोकप्रियता के दौर में जल, जंगल और जमीन के संघर्ष


जाहिर है, फिर अनिल अग्रवाल को हमारे आदिवासी मुख्‍यमंत्री के ऊपर यह भरोसा क्‍यों न होगा कि उनके रहते वेदांता का रास्‍ता बिलकुल साफ है। आखिरकार, 2013 में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से पहले और बाद में उन्‍होंने हमारी न्‍याय प्रणाली का भरपूर इस्‍तेमाल किया है। दर्जनों एफआइआर ऐसी हुई पड़ी हैं जिनमें भविष्‍य में गिरफ्तारियां होनी हैं। अपनी जमीन, जंगल, पहाड़ और देवी-देवताओं को बचाने के लिए चलाए गए जनता के आंदोलन को आपराधिक ठहराने का यही तो तरीका है।

लदा सिकाका को 14 साल पुराने एक मुकदमे के आधार पर कोर्ट में पेश किया गया, जिसमें यूएपीए और राज्‍य के खिलाफ युद्ध, इत्‍यादि की धाराएं लगी थीं (कल्‍याणसिंहपुर थाने के केस संख्‍या 75/12 से सम्‍बद्ध जीआर केस संख्‍या 565/2012)। उन्‍हें कथित रूप से एक माओवादी संगठन का सदस्‍य होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

मामला 2012 का है जब वेदांता के खिलाफ आदिवासियों का प्रतिरोध और तनाव अपने चरम पर था, जिसके बाद 2013 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। उसके बाद से ही नियमगिरि में तैनात सीआरपीएफ कभी नहीं हटाई गई। लगातार जारी निगरानी ने इस इलाके को धीरे-धीरे ‘संघर्ष का क्षेत्र’ (कान्फ्लिक्‍ट ज़ोन) बना दिया। उसी के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपनी सालाना रिपोर्ट में नियमगिरि सुरक्षा समिति का सम्‍बंध ‘माओवादी’ संगठनों से बता दिया और लिखा कि एनएसएस की गतिविधियों को माओवादी ‘निर्देशित’ करते हैं। बेशक, इस मुनादी की किाी रूप में कोई कानूनी बुनियाद नहीं थी। यह केवल जन आंदोलनों को बदनाम करने के लिए मीडिया को फेंका गया चारा था ताकि इन जन आंदोलनों से जुड़े लोगों के खिलाफ अतिसख्त कानूनों के इस्‍तेमाल को जायज ठहराया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद गुजरे वर्षों में यहां लगातार यूएपीए की धाराएं इस्‍तेमाल की गई हैं। मसलन, एक केस जिसमें लदा सिकाका और अन्‍य नेता नामजद हैं (एफआइआर संख्‍या 26/17), उसमें आरोप है कि कुछ अज्ञात लोगों ने देसी शराब के ठेके पर हमला कर के वहां माओवादी पोस्‍टर चिपकाये। एफआइआर में आइपीसी की धारा 121 लगाई गई है जो भारत की सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने, उसका प्रयास करने और उसे उकसाने से जुड़ी है और जिसकी सजा मृत्‍युदंड या आजीवन कारावास है। इसमें हिंसा के रास्‍ते कोई सार्वजनिक लक्ष्‍य हासिल करने के लिए भारत सरकार के खिलाफ लोगों को संगठित करने, उससे जुड़ने और विद्रोह का प्रयास करने के आरोप भी शामिल हैं।


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इसी तरह 5 अगस्‍त 2023 को नियमगिरि क्षेत्र के पतंगपदर गांव निवासी कृष्‍णा सिकाका और लाखपदर गांव निवासी बारी सिकाका को लांजीगढ़ के साप्‍ताहिक हाट से सादे कपड़ों में आए पुलिसवालों ने उठा लिया था। वे दोनों विश्‍व आदिवासी दिवस के उत्‍सव का प्रचार कर रहे थे। फिर नियमगिरि सुरक्षा समिति के लोग कालाहांडी और रायगड़ा जिलों के चार थानों में उनका पता करने के लिए गए, लेकिन सभी ने उनकी गिरफ्तारी से इनकार कर दिया। इसके बाद लांजीगढ़ थाने में गुमशुदगी की एक शिकायत उनके भाई और एनएसएस व नियमगिरि क्षेत्र के चार लोगों द्वारा दर्ज करवाई गई।

कृष्‍णा और बारी सिकाका की गुमशुदगी और पुलिस द्वारा उनके ठिकाने के बारे में सूचना न दिए जाने के खिलाफ एनएसएस के सदस्‍यों ने अपने पारंपरिक अस्‍त्रों के साथ कल्‍याणसिंहपुर थाने के बाहर प्रदर्शन किया। ‘कानून व्‍यवस्‍था’ कायम करने के नाम पर थाने ने दो प्‍लाटून सशस्‍त्र पुलिसबल बुलवा लिया, जिसमें एक कार्यकारी मजिस्‍ट्रेट भी था। प्रदर्शन से वापस जाते वक्‍त द्रेंजू सिकाका को पुलिस ने उठाने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारियों के हस्‍तक्षेप से वे कामयाब नहीं हो पाए। फिर कल्‍याणसिंहपुर थाने ने एक एफआइआर दर्ज कर ली (87/2023) जिसमें इस प्रदर्शन को गैर-कानूनी करार दिया। एफआइआर में नामजद लदा सिकाका, लिंगराज आजाद और सात अन्‍य एनएसएस कार्यकर्ताओं के ऊपर आइपीसी की धाराएं 147, 148, 109, 294, 188, 353, 332, 307 और 149, यूएपीए की धारा 16, 17, 18 और आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम की धारा 7 लगाई गई।

ये धाराएं गैराकानूनी सभा, लोकसेवकों की नाफरमानी और उन्‍हें चोट पहुंचाने, हत्‍या के प्रयास आदि, आतंकी गतिविधियों, उनके लिए फंड जुटाने तथा यूएपीए के तहत षडयंत्र से जुड़ी हैं। यानी, दो गायब ग्रामीणों का केवल पता-ठिकाना पूछने को यूएपीए के तहत आतंकी गतिविधि बना दिया गया। ये अलग बात है कि जब प्रदर्शन पूरे इलाके में फैल गया और खासकर सिजिमाली में आंदोलन शुरू हुआ, तो अदालत में चार्जशीट पेश करने से पहले रायगड़ा पुलिस ने उसमें से यूएपीए की धारा हटा दी।       

इस तरह हम देख सकते हैं कि नियमगिरि में कानून को वहां रहने वाले समुदाय के खिलाफ सबसे मजबूत हथियार की तरह बरता गया है जबकि वे लोग केवल अपने पवित्र पर्वत को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। इन वर्षों में किसी को भी आतंकवादी या माओवादी ठहरा देने का आरोप राज्‍य का चलन सा बन चुका है। इस इलाके में हो रहे मानवाधिकार उल्‍लंघन की पड़ताल करने गई जनवादी अधिकार संगठनों के अखिल भारतीय संघ (सीडीआरओ) तथा ओडिशा के गणतांत्रिक अधिकार सुरक्षा संगठन (जीएएसएस) की 16 सदस्‍यीय टीम ने पाया कि मानवाधिकार उल्‍लंघन के मामले 2013 में ग्राम सभाओं के लिए फैसले के बाद बढ़े हैं। इस टीम ने इलाके में तीन दिन बिताए और गांव-गांव घूमकर घटनाओं पर लोगों के वृत्तान्‍त दर्ज किए। यह पड़ताल लांजीगढ़ अल्‍युमिना रिफाइनरी के गेट पर एकत्रित ग्रामीणों के ऊपर हुए लाठीचार्ज के बाद की गई थी, जिसमें एक मजदूर और एक सुरक्षाकर्मी की मौत हो गई थी।    

जुलाई 2019 में प्रस्‍तुत अपनी रिपोर्ट में इस टीम ने निष्‍कर्ष दिया कि नियमगिरि के लोग दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं: एक लड़ाई माओवादी कार्यकर्ता, शुभचिंतक या सहयोगी ठहराये जाने के आरोपों के खिलाफ है; दूसरी लड़ाई वेदांता के खिलाफ है, जिसे वे नियमगिरि के परिवेश के लिए बड़ा खतरा मानते हैं।

लदा सिकाका की 10 सितंबर को हुई गिरफ्तारी के बाद भुवनेश्‍वर में और दूसरे इलाकों में विरोध प्रदर्शन आयोजित हुए। कनसर्न्‍ड सिटिजंस फोरम ने गंभीर आशंका जताई कि बॉक्‍साइट-संपन्‍न इलाकों में आदिवासी और दलित नेताओं को निशाना बनाकर उन पर हमले किए जा रहे हैं।

अपने प्रेस वक्‍तव्‍य में फोरम कहता है कि ‘लदा सिकाका, लिंगराज आजाद और हीरामल नाइक की गिरफ्तारी, या कंटामाल व तलाआमपदर के ग्रामीणों की जबरन घेराबंदी कोई अलग-अलग और असम्‍बद्ध घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ओडिशा में खनन और औद्योगीकरण के लिए न्‍यायिक प्रणाली को साम दाम दंड भेद के रास्‍ते इस्‍तेमाल में लाया जा रहा है।‘



हाल के महीनों में केंद्र और राज्‍य सरकारों ने पूर्वी घाटों की पर्वत श्रृंखलाओं में मौजूद बॉक्‍साइट खदानें एक-एक कर के अलग-अलग कंपनियों को पट्टे पर देने का काम किया है। नंदापुर ब्‍लॉक की बालदा खदान अदाणी को दी गई है, नारायणपटना की कर्णपोडिकोंडा खदान और थुआमुल रामपुर की करलापट खदान वेदांता को दी गई है, तथा पट्टांगी सेरुबंधा की खदान नाल्‍को को दी गई है। रायगड़ा जिले के काशीपुर-टिकरी क्षेत्र में चार और खदानें नीलामी की प्रक्रिया में हैं। ओडिशा के अल्‍युमिनियम क्षेत्र में अदाणी की 1.10 लाख करोड़ रुपये के निवेश योजना को बहुत तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

इसके साथ-साथ स्‍थानीय समुदाय, खासकर दलित और आदिवासी समूह, अपनी आजीविका, घर और सांस्‍कृतिक विरासत को बचाने के लिए इन खनन कंपनियों का विरोध कर रहे हैं। कई जगहों पर वे खनन को रोकने में कामयाब भी हुए हैं। पर्यावरणवादी, विभिन्‍न राजनीतिक समूह, ट्रेड यूनियनें, जनवादी संगठन और यहां तक कि अवकाश प्राप्‍त नौकरशाह भी ओडिशा सरकार से खनन रोकने का आग्रह कर चुके हैं। इसीलिए राज्‍य प्रशासन अब खनन कंपनियों की मदद के लिए सीधे उतर आया है और उसने स्‍थानीय नेताओं की गिरफ्तारी के साथ उन इलाकों के गांवों की घेराबंदी कर डाली है जहां संघर्ष तेज है, जैसे कंटामाल और तलाआमपदर गांव। इसका सीधा उद्देश्‍य खनन विरोधी आंदोलन को खत्‍म करना है और साथ ही सड़क, रेलवे, आदि बुनियादी ढांचे के निर्माण में तेजी लाना है ताकि खनन में आई तेजी के हित सुविधाएं बनाई जा सकें।

अधिवक्‍ता और मनवाधिकार कार्यकर्ता बिस्‍वप्रिया कानूनगो के अनुसार, ‘इसलिए हमारे सामने सवाल बस इतना नहीं है कि लदा सिकाका के ऊपर क्‍या आरोप लगाए गए हैं, बल्कि यह है कि असामान्‍य अपराधिक कानूनों का किया जा रहा बार-बार इस्‍तेमाल नियमगिरि में लोकतांत्रिक असहमति के लिए क्‍या मायने रखता है। नियमगिरि की कहानी इसीलिए महज एक गिरफ्तारी या एक एफआइआर जितनी सरल नहीं है। यह कहानी बताती है कि जब एक समुदाय अपनी जमीनें छीने जाने और जीवनशैली बरबाद किए जाने का प्रतिरोध करता है और इस क्रम में उसका सामना एक दमनकारी राज्‍य से होता है, तब उसके साथ क्‍या होता है। यह कहानी एक आरोप और एक अभियोग के बीच दूरी की है, एक आपराधिक केस लगाए जाने और उसमें दोषसिद्धि होने के बीच की दूरी की है, और इस बारे में है कि जहां सामान्‍य नागरिक पहले से ही राज्‍य की असामान्‍य उपस्थिति के बीच किसी तरह से जी पा रहे थे वहां कैसे असामान्‍य कानूनों को लागू किया जाता है। मेरा खयाल है कि भगत सिंह के ये शब्‍द यहां खास तौर से प्रतिध्‍वनित होते हैं कि ‘’आदमी को मारना आसान है, लेकिन विचार को आप नहीं मार सकते’’। व्‍यक्तियों को बेशक गिरफ्तार और कैद किया जा सकता है, दंड दिया जा सकता है, लेकिन वे जिन विचारों को लेकर चलते हैं- अपने भविष्‍य के बारे में बोलने का एक समुदाय का अधिकार, उसकी गरिमा, और आत्‍मनिर्णय- उन्‍हें सींखचों में कैद कर पाना मुश्किल है।‘

लदा सिकाका की गिरफ्तारी के ठीक बाद बहुत सुनियोजित ढंग से दो घंटे के भीतर ही वेदांता की सिजिमाली बॉक्‍साइट खनन परियाजना का विरोध कर रहे दो मुख्‍य गांवों में हथियारबंद पुलिसबल तैनात कर दिया गया- काशीपुर ब्‍लॉक का कंटामाल और थुआमुल रामपुर ब्‍लॉक का तलाआमपदर। कंटामाल में पुलिस को डेरा डाले अब तीन हफ्ते होने जा रहे हैं। राष्‍ट्रीय मीडिया में मुख्‍यमंत्री मोहन माझी और अनिल अग्रवाल की 27 सितंबर को हुई मुलाकात की छपी तस्‍वीरें अपने आप में इस बात का सबूत हैं कि एक आदिवासी मुख्‍यमंत्री ने दक्षिण ओडिशा के बॉक्‍साइट भंडारों को खोलकर कैसे कुलीन धनपशुओं का भरोसा जीत लिया है।


Notice inviting tender for bauxite mining lease in Niyamgiri region
खनन के पट्टे देने के लिए निविदा का नोटिस

ऐसा लगता है कि दक्षिण ओडिशा में पांचवीं अनुसूची वाले इलाकों के माली पर्वतवासी लोग अपनी आखिरी सांस तक लड़ेंगे। छिटपुट रिश्‍वतों, अफवाहों और नेताओं के खिलाफ कुप्रचार के रास्‍ते उन्‍हें डिगाने में राज्‍य पूरी तरह जुटा हुआ है। जाहिर है, सामुदायिक रिश्‍ते ऐसे दबाव में घिसते भी हैं, लेकिन अपने साझा संसाधनों के ऊपर मजबूती से पैर टिकाकर खड़े रहने का संकल्‍प कठिन काम है जिसे पूंजीवादी राज्‍य की तमाम तिकड़में नहीं हिला सकती हैं।

एक घटना याद आती है 20 अक्‍टूबर 2018 की, जब लदा सिकाका को साप्‍ताहिक हाट से जबरन घसीटकर मुनीगुड़ा थाने ले जाया गया था। तहसीलदार ने उनसे कहा कि इलाके से सीआरपीएफ को हटाने के खिलाफ बुलाए गए अपने प्रदर्शन को वे तत्‍काल वापस लें। जब तहसीलदार ने उन्‍हें प्रलोभन दिया कि पट्टों को देने का अधिकार चूंकि उसी के पास है इसलिए सिकाका कभी भी किसी चीज के लिए उसके पास आ सकते हैं, तब लदा सिकाका का जवाब था, ‘अगर आप पट्टा देने का अधिकार रखते हैं तो हमें बस एक पट्टा दे दीजिए, पूरी नियमगिरि का पट्टा।‘   

अनिल अग्रवाल को राज्‍य सरकार में जो ‘भरोसा’ पैदा हुआ है, उसका सामना अभी इस हकीकत से होना बाकी है कि आदिवासियों, वनवासियों और हाशिये के अन्‍य समुदायों को चुने हुए नेताओं और संस्थाओं पर कभी भी भरोसा नहीं रहा। वे तो मानते हैं कि लोगों की रक्षा उनके नियम राजा, खंडुआल राजा और तीज राजा ही करते हैं। वे उन पहाड़ों की रक्षा करते हैं। पहाड़ उनकी रक्षा करते हैं।



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