मतदाता सूची में हेरफेर के आरोपों पर देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को कवर करते समय 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली, अहमदाबाद और पुणे में कम से कम तीन दर्जन पत्रकारों को हिरासत में लिया गया और कुछ मामलों में उनके ऊपर हमले भी किए गए।
कमेटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) द्वारा की गई समाचारों की समीक्षा, प्रत्यक्ष साक्षात्कारों और संपादकों, पत्रकारों और उनके न्यूज़रूम द्वारा जारी प्रामाणिक सोशल मीडिया पोस्टों के अनुसार नई दिल्ली में इन दो दिनों के दौरान कम से कम 35 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया, जहां प्रदर्शन का मुख्य रूप से आह्वान किया गया था। बाकी दोनों शहरों में प्रदर्शन को कवर करते हुए दो और पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। इनमें एक अमदाबाद से आल्ट न्यूज़ की संवाददाता किंजल और दूसरी पुणे से स्क्रोल की दिव्या अश्लेषा हैं।
पुलिस पत्रकारों को लगातार हिरासत में लेती रही, बावजूद इसके कि 11 अक्टूबर को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को आश्वस्त किया था कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को उनके पेशेवर काम से नहीं रोका जाएगा। अदालत ने उसके बाद निर्देश दिए थे कि कानूनी प्रक्रिया के अलावा किसी को भी हिरासत में नहीं लिया जाएगा। इस मामले में न्यायालय 13 अक्टूबर को फिर से सुनवाई करेगा।

सीपीजे के एशिया-प्रशांत कार्यक्रम के समन्वयक कुणाल मजूमदार ने बताया, “सीपीजे के शोध से पता चलता है कि 10 और 11 अक्टूबर को भारतीय पुलिस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के दौरान कम-से-कम 37 पत्रकारों को हिरासत में लिया। इनमें से कई पत्रकारों के साथ मारपीट की गई, उन्हें अपमानित किया गया या उनके काम में बाधा डाली गई। ये घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं और भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं पर एक धब्बा हैं। ये प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों के संवैधानिक अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन करती हैं। साथ ही, ये उच्चतम न्यायालय के समक्ष सरकार द्वारा दिए गए उस आश्वासन के भी विपरीत हैं कि पत्रकारों के काम में बाधा नहीं डाली जाएगी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की विशेष जिम्मेदारी है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखे, पत्रकारों को हस्तक्षेप से बचाए और उन पुलिस अधिकारियों को जवाबदेह ठहराए जो पत्रकारों पर हमला करते हैं या उनके काम में बाधा डालते हैं।”
ये विरोध प्रदर्शन युवा नेतृत्व वाले एक राजनीतिक आंदोलन कॉकरोच जनता पार्टी, कुछ छात्र संगठनों और विपक्षी दलों ने मिलकर आयोजित किए थे। इनका उद्देश्य भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना था। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूचियों के देशव्यापी पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटा दिए गए हैं, हालांकि निर्वाचन आयोग और सरकार इन आरोपों से इनकार करते हैं।
दिल्ली पुलिस ने अपर्याप्त पूर्व सूचना और कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। नई दिल्ली के मध्यवर्ती इलाके में सभाओं पर रोक लगाने का आदेश भी लागू किया गया था। पुलिस ने दर्जनों मेट्रो स्टेशनों तक लोगों की पहुंच सीमित कर दी, कुछ रेल सेवाएं रद्द कर दी गईं और जनपथ–कर्तव्य पथ वाले इलाके के लगभग चार किलोमीटर के दायरे में तथा अस्थायी हिरासत केंद्रों के आसपास इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई थीं। विरोध प्रदर्शन से कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस ने पत्रकारों के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे, जिनमें उनसे अपने प्रेस कार्ड प्रमुखता से प्रदर्शित करने को कहा गया था।
भारत सरकार ने विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर लगभग 23,000 अर्धसैनिक बलों को तैनात किया था। इनमें जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से वापस बुलाए गए बल भी शामिल थे। इसके अतिरिक्त, दिल्ली पुलिस के कम से कम 15,000 जवान भी तैनात किए गए थे।
पत्रकारों को हिरासत में लेने के अलावा पुलिस ने कुछ पत्रकारों को उनके कपड़ों से पकड़कर घसीटा और अन्य को प्रेस कार्ड दिखाने के बावजूद बसों में धकेल दिया। अधिकारियों ने कम से कम पांच पत्रकारों के फोन जब्त किए, कम से कम एक पत्रकार पर वीडियो फुटेज मिटाने का दबाव बनाया और कुछ पत्रकारों को हिरासत में रखने के लिए 65 किलोमीटर तक दूर स्थित केंद्रों पर ले गए।
पत्रकारों के अपने बयानों या उनके मीडिया संस्थानों की रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने कम से कम पांच पत्रकारों पर हमला किया। 10 अक्टूबर को प्रमुख भारतीय पत्रकार राणा अय्यूब ने एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि जब उन्होंने पुलिस से पूछा कि क्या वह प्रदर्शनकारियों को गालियां दे रहे एक व्यक्ति को अपनी नाक के नीचे संरक्षण दे रही है, तब पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेने की धमकी दी। ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ की स्तंभकार अय्यूब ने सीपीजे को बताया कि उनके पत्रकार होने की जानकारी होने के बावजूद पुलिस ने उन्हें लाठी से मारा जिससे उन्हें चोटें आईं, जिसका दर्द अब तक गया नहीं है।


नीचे प्रदर्शन के दो दिनों के दौरान हिरासत में लिए गए पत्रकारों की सूची दी जा रही है। इनमें से अधिकतर पत्रकारों को उस समय हिरासत में लिया गया जब वे बाकायदा अपने प्रेस कार्ड पहने हुए थे और दिखा भी रहे थे।
10 अक्टूबर
दिल्ली पुलिस ने अस्थायी रूप से निम्नलिखित पत्रकारों को हिरासत में लिया:
- स्क्रॉल: आयुष तिवारी और शोएब दानियाल
- बिजनेस स्टैंडर्ड: अनुष्का भारद्वाज
- न्यूज़लॉन्ड्री: अश्विन कुमार सिंह, आस्था सव्यसाची और अनमोल प्रीतम तथा प्रशिक्षु अंशु
- रॉयटर्स: सौरभ शर्मा
- नवभारत टाइम्स: ऋतिक जोशी और राहुल चरास
- बूम: जागृति त्रिशा
- इंडिया टुडे का डिजिटल वीडियो मंच मो: शिवांग शुक्ला।
- मॉलिटिक्स: नीरज झा
- द क्विंट: सार्थक जायसवाल
- रिपोर्टर टीवी: रोशनी राजन और फ़र्ज़ा टी.एम.
- स्वतंत्र पत्रकार सृष्टि खन्ना और प्रशांत पुंडीर
- नो नॉइज़ स्टोरीज़: विवेक गुप्ता
- ऑल्ट न्यूज़: प्रशिक्षु अग्निवा रे
11 अक्टूबर
पुलिस ने निम्नलिखित पत्रकारों को हिरासत में लिया:
- इंडियन एक्सप्रेस हिंदी: शाश्वत, सिया और विजय
- हिंदुस्तान: आशीष सिंह
- नायाब वर्ल्ड: नितिन कटियार
- उल्टा चश्मा: प्रज्ञा मिश्रा
- स्वतंत्र पत्रकार निधि सुरेश और एम. राजशेखर
उसी दिन कनॉट प्लेस में विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे कई अन्य पत्रकारों को भी हिरासत में लिया गया। प्रेस कार्ड पहने हुए पीक टीवी के पत्रकार वेदांत अग्रवाल और सारा खान प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। इस दौरान पुलिसकर्मियों ने उन्हें घसीटकर हिरासत में ले लिया। खान ने बताया कि एक पुरुष पुलिस अधिकारी ने उनकी गर्दन पकड़कर उन्हें एक महिला पुलिस अधिकारी की ओर धकेल दिया।
स्वतंत्र पत्रकार श्याम मीरा सिंह को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। इससे पहले दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेरा, उनके साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें अपशब्द कहे थे। इसके कुछ ही समय बाद सिंह का एक्स अकाउंट भारत में रोक दिया गया। उस अकाउंट से वे विरोध प्रदर्शनों के छोटे वीडियो पोस्ट कर रहे थे। एक्स की ओर से जारी सूचना में कहा गया कि यह कार्रवाई “कानूनी मांग के जवाब में” की गई है। भारत के बाहर उनका अकाउंट अब भी दिखाई दे रहा है।
पुलिस ने 11 अक्टूबर को मलयालम के समाचार चैनलों के कम से कम तीन पत्रकारों को हिरासत में लिया और कुछ घंटों बाद रिहा कर दिया। एशियानेट न्यूज़ के पत्रकार साजिन ए. को हिरासत में लिया गया और लगभग आधे घंटे बाद रिहा कर दिया गया। चैनल के दिल्ली प्रमुख प्रशांत रघुवंशम ने सीपीजे को इसकी पुष्टि की। 24 न्यूज़ के पत्रकार सुहैल मोहम्मद जब वीडियो रिकॉर्ड कर रहे थे, तब पुलिस ने उनकी गर्दन पकड़ी और उन्हें जबरन पुलिस वाहन में बैठा दिया। चैनल ने बताया कि उसके वीडियो पत्रकार वी.एस. राहुल को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। पुलिस ने उनका कैमरा छीन लिया और माइक्रोफोन फेंक दिया।
उसी शाम पुलिस ने द कारवां के सहायक मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर रयान थॉमस को जनपथ पर पकड़ कर घसीटते हुए हिरासतियों वाली बस में बैठा दिया। वे हिरासत की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग कर रहे थे और उनका प्रेस कार्ड स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था, फिर भी ऐसा किया गया। जब उन्होंने अपनी रिकॉर्डिंग मिटाने से इनकार किया, तो पुलिस ने उनके सिर पर बार-बार प्रहार किया, उन्हें थप्पड़ मारे और पुलिस कार के भीतर बंदूक के कुंदे से उनके पेट में वार किया गया। बाद में उन्हें कनॉट प्लेस में ले जाकर छोड़ दिया गया।

सीपीजे 11 अक्टूबर को हिरासत में लिए गए कई अन्य पत्रकारों के नामों की अभी पुष्टि नहीं कर पाया है। इनमें द हिंदू की एक पत्रकार भी शामिल हैं जिन्हें पुलिस ने बस में धकेल दिया था। उनके यह बताने पर कि वे पत्रकार हैं, उन्हें रिहा कर दिया गया। समाचार एजेंसी पीटीआइ के एक पत्रकार को भी हिरासत में लिए जाने की सूचना है। एक समाचार एजेंसी के फोटो पत्रकार ने मीडिया को बताया कि पुलिसकर्मियों ने उनकी गर्दन पकड़कर उन्हें घसीटा और एक वैन में डाल दिया।
उसी दिन प्रेस कार्ड पहने पुरुषों के एक समूह ने कनॉट प्लेस में मकतूब मीडिया की पत्रकार फ़िदा फ़ातिमा, संपादकीय प्रशिक्षु नदा सईदा और कंट्रिब्यूटर अक्तरिस्ता अंसारी को घेर लिया। यह सब वर्दीधारी पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हुआ। मकतूब मीडिया के संपादक असलाह कय्यालक्कथ ने सीपीजे को बताया कि उन लोगों ने पत्रकारों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपमान करने का आरोप लगाया और उनके खिलाफ इस्लामोफोबिक, यानी इस्लाम और मुसलमानों के प्रति घृणा से प्रेरित गालियों का इस्तेमाल किया। जब फ़ातिमा ने उन लोगों से उनके अपने प्रेस पहचान-पत्र दिखाने को कहा तो उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने द हिंदू को बताया कि कुछ पत्रकारों को इसलिए हिरासत में लिया गया हो सकता है क्योंकि वे प्रदर्शनकारियों के निकट काम कर रहे थे और हिरासत की कार्रवाई के दौरान वहां से हटे नहीं। सीपीजे ने दिल्ली पुलिस को ईमेल भेजकर इस मामले पर उसकी प्रतिक्रिया मांगी है, लेकिन तत्काल कोई जवाब नहीं मिल सका है।