हम दिल्ली में उनकी बाट जोहते रहे, वे कोलकाता से ही कॉमरेड सुमित के पास चली गईं…

Gargi Chakraborty
Gargi Chakraborty
प्रतिष्ठित इतिहासकार, महिला और कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन की महत्‍वपूर्ण आवाज डॉ. गार्गी चटर्जी बीते 2 मार्च को नहीं रहीं। उनका 78 वर्ष की उम्र में कोलकाता में निधन हो गया। अभी साल भर भी नहीं हुआ उनके जीवनसाथी सुमित चक्रवर्ती को गुजरे हुए जो साप्‍ताहिक पत्रिका मेनस्‍ट्रीम के संपादक हुआ करते थे और देश के बौद्धिक समाज के भीतर बचे-खुचे चुनिंदा नैतिक स्‍वरों में एक थे। सुमित चक्रवर्ती और गार्गी चक्रवर्ती के साथ अपनी मुलाकातों, संस्‍मरणों और प्रसंगों पर श्रद्धांजलि-स्‍वरूप विनीत तिवारी की टिप्‍पणी

जब मणिपुर प्रगतिशील लेखक संघ के पचासवें स्थापना दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए इम्फाल जाने का आमंत्रण मिला तो मैंने बिना देर किये यह तय किया कि एक दिन कोलकाता रुकते हुए जाऊंगा और कॉमरेड गार्गी चक्रवर्ती से जरूर मिलूंगा।

कॉमरेड सुमित चक्रवर्ती को गुजरे बहुत दिन नहीं हुए थे। दिल्ली के आइआइसी में आयोजित उनकी शोकसभा में कितने सारे लोगों ने कॉमरेड सुमित को कितनी शिद्दत से याद किया था। जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट के काम करते हुए हम लोगों ने एजाज़ अहमद के व्याख्यान किए, वेनेजुएला और लैटिन अमेरिका पर कार्यक्रम भी किए। प्रो. इरफ़ान हबीब, सईद नक़वी, सीमा मुस्तफ़ा, अरुणा रॉय, प्रफुल्ल बिदवई, अनेक लोगों को संगोष्ठियों और चर्चाओं के लिए आमंत्रित किया। लगभग हमेशा ही कॉमरेड सुमित आते थे और वे इसे प्रोत्साहित भी करते थे। अनेक दफ़ा उन्होंने मेनस्ट्रीम में भी हमें प्रकाशित किया।

मेरे साथ तो लॉकडाउन में उनका एक विशिष्ट संबंध बन गया था। जब लॉकडाउन हुआ तो एक दिन उनका फोन आया। तब हम लोगों ने इंदौर में मजदूरों और ज़रूरतमंदों की मदद के लिए कुछ उपक्रम शुरू किया था जिसकी ख्याति काफी लोगों तक पहुंच गई थी। दान-पुण्य वाले काम तो बहुत हो रहे थे लेकिन हम राजनीतिक स्तर पर भी प्रशासन और शासन के खिलाफ लिख-बोल रहे थे और यह काम भी कर रहे थे। इसके लिए अनेक वरिष्ठ कॉमरेड फोन करके हमारी तारीफ करते थे और हौसला बढ़ाते थे। मुझे लगा कि कॉमरेड सुमित ने उसी सिलसिले में फोन किया होगा।

फोन पर कॉमरेड सुमित ने जो पुतिन के खिलाफ बोलना शुरू किया तो पहले तो मुझे समझ नहीं आया, फिर बाद में थोड़ा सन्दर्भ समझ में आया। तब तक रूस और युक्रेन का युद्ध शुरू नहीं हुआ था लेकिन हालात बिगड़ रहे थे।

कॉमरेड सुमित ने मुझसे कहा कि एप्सो के जरिये आप लोग कुछ कीजिए। मैंने अपनी सीमित समझ के हिसाब से कहा कि कॉमरेड, हम लोग शांति की अपील के लिए प्रदर्शन आदि कर नहीं सकते क्योंकि पुलिस करने नहीं देगी और लोग भी बाहर निकलने में बहुत डर रहे हैं। वे बोले, ‘नहीं, आप लोग रूस पर बात कीजिए, इसे रोकिए।’ मैं थोड़ा पसोपेश में था। उनकी आवाज में बहुत बेचैनी और हड़बड़ी थी।

मैंने जया को बताया कि कॉमरेड का ऐसा फोन आया था। हम लोग रूस-युक्रेन पर पढ़ने और करीब से नजर रखने लगे। दो-चार दिन ही गुजरे होंगे कि उनका फिर फोन आया। वही बेचैनी और वही हड़बड़ी। उसमें कुछ बातें उनकी थोड़ी कम स्पष्ट थीं। फिर एक बार कॉमरेड गार्गी से भी बात हुई। वे बोलीं कि सुमित हालात से परेशान हैं लेकिन थोड़ा उनके दिमाग में तनाव भी ज्‍यादा है इसलिए आप लोग थोड़ा समझना। उन्होंने इशारा किया तो मुझे लगा कि मामला केवल हालात की परेशानियों तक सीमित नहीं है और खुद कॉमरेड सुमित की भी कुछ परेशानी है क्‍योंकि जो बातें हो चुकी थीं वे उन्हें फिर से दोहरा रहे थे। कुछ भूल भी रहे थे।


Drawing room of Gargi and Sumit Chakravarty in Kolkata
कोलकाता में दिवंगत सुमित और गार्गी चक्रवर्ती का खाली कमरा

वह वेबिनारों का दौर था। सो हमने वहां के हालात पर और नाटो की भूमिका पर वेबिनार आयोजित किए। धीरे-धीरे यह स्पष्ट भी होने लगा था कि युद्ध के लिए रूस और युक्रेन नहीं बल्कि नाटो जिम्मेदार है। कुछ महीनों बाद युद्ध शुरू भी हो गया और कॉमरेड सुमित, पुतिन पर और भी गुस्सा हुए। हम पर भी गुस्सा हुए कि एप्सो में होते हुए हम युद्ध रोक क्यों नहीं पाए। फिर सुना कि कॉमरेड को ब्रेन में स्ट्रोक हुआ था और मेनस्ट्रीम को निकालने की जिम्मेदारी हर्ष ने उठा ली है। हम लोग दिल्ली में उनके घर उनसे मिलने गए। कॉमरेड कृष्णा लाहिड़ी मजूमदार हमारे साथ थीं। 

वे आए, बैठे, अधिकांश समय चुप ही रहे लेकिन फिर उन्होंने किसी बात के लिए राहुल गांधी की तारीफ की। क्यूबा की वैक्सीन और उनके डॉक्टरों के किस्से उन्होंने रुचि लेकर मुस्कराते हुए सुने। उसके बाद हमने सुना कि उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया था। वे लोग कोलकाता चले गए थे। बस वही उनसे आखिरी मुलाकात रही।     

वे बहुत मृदुभाषी थे। बहुत बड़े, अंतरराष्ट्रीय ख्याति के पत्रकार थे। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों से लेकर दुनिया के किसी भी कोने में हो रहे अत्याचार को लेकर उनका दिल दुखी होता था। और सिर्फ दुखी नहीं होते थे, वे उस अत्याचार की समाप्ति के लिए आवाज उठाते थे, असरदार लोगों को एकजुट करते थे, और हालात बदलने की कोशिश करते थे।

उनका प्रभाव था भी इतना कि उनके स्पर्श से मुश्किलें कम भी होती थीं। मुझे उनके साथ काम करने का अवसर तो नहीं मिला था लेकिन जया की वजह से कॉमरेड गार्गी और कॉमरेड सुमित का स्नेह मुझे भी हासिल होता था। देश के इतने बड़े पत्रकार निखिल चक्रवर्ती और बंगाल की क्रांतिकारी सांसद और अंतरराष्ट्रीय महिला आंदोलन की नेत्री रेणु चक्रवर्ती के बेटे सुमित चक्रवर्ती से मिलकर एक चिड़िया के पंख के स्पर्श जैसा हल्का और सुखद अहसास होता था। उनकी मुस्कान में एक कॉमरेड की आत्मीयता और बंगाली भद्रता मौजूद रहती थी।

उनकी शोकसभा में कुछ सेवानिवृत्त नौकरशाह, जो राष्ट्रपति केआर नारायणन के विशेष अधिकारी थे, ने सुनाया कि कैसे राष्ट्रपति ने उन्हें बुलाकर अपने भाषण की प्रति सबसे पहले सुमित को पहुंचाने को कहा था। शायद सागरी छाबड़ा ने या रीटा मनचंदा ने। किसी मौके पर पुलिस द्वारा सुमित को और अन्य लोगों को किसी आंदोलन का (शायद नर्मदा बचाओ आंदोलन का) समर्थन करने के कारण थाने ले जाया गया जहां सुमित ने पुलिसवालों को अपनी सौम्य शैली में समझा-बुझा दिया था कि उन्हें घटना की रिपोर्टिंग देने के लिए बाहर जाना पड़ेगा और वे पुलिसवालों को आंदोलन के महत्त्व के बारे में सहमत करते हुए निकल भी लिए थे। थोड़े भावुक भी थे, लेकिन उन्हें विनम्रता छोड़ते कभी नहीं देखा, यहां तक कि गुस्से में भी नहीं।


A portrait of Sumit Chakravarty in his Kolkata house
सुमित चक्रवर्ती (1944-26/07/2025)

जया उनके बारे में बताती थी कि जब ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका की नीतियां गोर्बाच्योव ने सोवियत संघ में लागू कीं, तब जया ने उन नीतियों की आलोचना करते हुए एक लेख 1990 के आसपास मेनस्ट्रीम में लिखा था। सोवियत संघ तब कायम था। जया के विश्लेषण से सुमित सहमत होने को तैयार नहीं थे लेकिन उन्हें जया के विश्लेषण में कोई कमी भी नजर नहीं आ रही थी। तब भी उन्होंने जया का लेख प्रकाशित किया और बाद में जब सोवियत संघ का विघटन हो गया तब उन्होंने जया को फोन करके कहा कि तुम्हारा विश्लेषण सही था। जया हमेशा उनका इस बात के लिए बहुत सम्मान करती रही कि उन्हें अपने ग़लत होने को स्वीकारने में कोई संकोच नहीं था।     

कॉमरेड सुमित के जाने के बाद कॉमरेड गार्गी चक्रवर्ती जी से मुलाकात नहीं हुई थी। वे कोलकाता में ही रह रही थीं। इसलिए जब इम्फाल जाने के रस्ते को देखा तो कोलकाता को यात्रा का अनिवार्य पड़ाव बनाना तय कर लिया था।

मध्य प्रदेश के चित्रा और अमित के साथ भी मिलने का मन था ही क्योंकि उनसे मिले भी वर्षों हो गए थे। चित्रा से मिलकर मंदसौर के अपने पुराने वरिष्ठ साथी बाबूलाल माली विषपायी जी की यादें भी ताजा हो जातीं। कोलकाता में प्रलेस और इप्टा के वरिष्ठ साथी कॉमरेड अमिताभ चक्रवर्ती को बताया कि मैं एक दिन कोलकाता रहूंगा और हम कहीं मिल सकते हैं तो खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ, कोलकाता की एक संक्षिप्त बैठक आयोजित कर ली। कोई 20-25 लेखकों की बैठक हुई और मैं वहीं से गार्गी जी के घर निकल गया। उन्हें आने की पहले से जानकारी थी तो वे इंतजार ही कर रही थीं।

शायद वह 13 सितम्बर, 2025 की शाम थी। दरवाजे पर बहुत ख़ूबसूरत अंग्रेज़ी के घुमावदार अक्षरों में पुराने जमाने की नेमप्लेट लगी थी जिस पर एस. चक्रवर्ती लिखा था। अंदर दाखिल होने पर सामने ही रबीन्द्रनाथ ठाकुर की तस्वीर और दो पेंटिंग्स थीं। पास में बहुत सारी किताबों के साथ कॉमरेड सुमित की चिरपरिचित मुस्कराहट वाली तस्वीर रखी थी। मुझे अच्छा लगा कि उस पर कोई हार-फूल नहीं था जिससे वह दिवंगत का संकेत देती। उनकी तस्वीर के नीचे चित्तोप्रसाद, ए. रामचंद्रन, और इंडियन माइथोलॉजी शीर्षक की किताबें रखी थीं। मैंने कमरे की इन उपस्थितियों को कैमरे में कैद किया। फिर कॉमरेड गार्गी से बातें होती रहीं।


Door of Gargi and Sumit Chakravarty residence in Kolkata

वे थकी हुई थीं, लेकिन उद्विग्न नहीं। दस दिन बाद ही सीपीआइ का राष्ट्रीय महाधिवेशन चंडीगढ़ में होने वाला था जिसमें वे ज़िंदगी भर सक्रिय रहीं। उसके बारे में बातें कीं, आमतौर पर वामपंथ में आ रही गिरावट की बात हुई और भी बहुत सारी बातें हुईं। उन्होंने बताया कि वे दिवाली के बाद या शायद पहले जब दिल्ली में प्रदूषण कम रहेगा, दिल्ली आएंगी। वे आएंगी तो उनसे हम सब मिलेंगे। सईदा जी भी राह देख रही हैं। निशा, जया और बाकी सब भी। सुनकर उन्हें अच्छा लगा।

उनकी अपनी ही एक खास तरह की मुस्कराहट थी, सादगी भरी और बनावट से दूर। मैंने उन्हें झूठ ही कहा कि आपकी पी.सी. जोशी वाली एनबीटी की किताब हमारे मध्य प्रदेश के साथी ख़ूब याद करते रहते हैं। सुनकर उन्होंने फिर वैसी ही मुस्कराहट से जवाब दिया। दरअसल, जब मध्य प्रदेश के सतना जिले में प्रगतिशील लेखक संघ के 2017 में हुए राज्य सम्मेलन में विश्वनाथ त्रिपाठी जी हमारे उद्घाटनकर्ता थे और गार्गी जी को हमने विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था तब उन्होंने वामपंथी संस्कृति की राजनीति और वामपंथी राजनीति की सांस्कृतिक समझ पर एक व्याख्यान दिया था। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की शिक्षिका रही थीं और उन्होंने इतिहास की सही समझ के बारे में भी सभी उपस्थित लेखकों को कुछ सूत्र दिए थे। 


Writer Vineet Tiwari with Gargi Chakravarty in his last meeting, Saptember 2025 in Kolkata
गार्गी चक्रवर्ती के साथ लेखक विनीत तिवारी

उन्होंने कहा कि वे जल्द दिल्ली आएंगी तब और कुछ योजना बनाएंगे। उन्होंने खाने का पूछा। कहा कि तुम यहीं रुक भी सकते हो। घर में काम के लिए एक युवक मौजूद था जो खाना भी बना सकता था, लेकिन रात के खाने का कार्यक्रम चित्रा, अमित और उनकी बेटी के साथ बन चुका था। मैं उनसे दिल्ली मिलने की उम्मीद में चला आया। उन्होंने कहा कि उन्हें कॉमरेड सुमित का काफी सारा काम दिल्ली में हैं इसलिए उन्हें आना ही है।  

फिर खबर मिली कि उनकी तबियत ठीक नहीं होने से वे नहीं आईं। हम उनके आने की बाट जोहते रहे। वे कोलकाता से ही कॉमरेड सुमित के पास चली गईं।



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