MSP: आंदोलन से भी नहीं खिला सूरजमुखी, मक्का-मूंग पर बढ़ रहा है गुस्सा

हरियाणा और पंजाब में गेंहू के अलावा बाकी फसलों पर एमएसपी केवल दावे की बात है वरना हकीकत यह है कि लाभकारी मूल्‍य के लिए किसान दोनों राज्‍यों में तरस रहे हैं। आंदोलन कर के सूरजमुखी के दाम बढ़वाने की अपनी मांग मनवाने के बावजूद दस दिन हो गए और हालत जस की तस बनी हुई है। नए सिरे से आंदोलन परवान चढ़ रहा है

किसानों के आंदोलन के बाद हरियाणा सरकार ने सूरजमुखी के न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य को बढ़ाने का वादा तो कर दिया था, लेकिन हफ्ता भर बीत जाने के बाद अब भी समस्‍या का हल नहीं हो सका है। ‘मेरी फसल मेरा ब्योरा’ पोर्टल पर डेटा के बेमेल होने के कारण कई किसानों को अपनी सूरजमुखी की उपज बेचने में असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) ने दो दिनों के भीतर डेटा में सुधार नहीं होने पर आंदोलन शुरू करने की धमकी दी है।

यूनियन के किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने एक सार्वजनिक बयान में इस बात पर चिंता जताई है कि किसान पोर्टल पर पंजीकरण करवाते हैं और सरकार द्वारा खरीद के लिए उस डेटा का उपयोग किया जाता है। इस डेटा में गड़बड़ी होने के कारण उन्हें सूरजमुखी बेचने में असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

दस दिन पहले सूरजमुखी के दामों पर हुए किसानों के चक्‍का जाम के दौरान गिरफ्तार किए गए किसानों में शाहाबाद के राकेश बैंस भी थे। राकेश कहते हैं, “सूरजमुखी का एमएसपी 6760 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन किसान 4500-4600 रुपये पर बेचने के लिए मजबूर हैं। आंदोलन कर के सरकार को एमएसपी पर फसल खरीदने के लिए मनाया तो गया है, लेकिन सरकार अब दूसरे तरीकों से आनाकानी कर रही है।”

समस्‍या सिर्फ सूरजमुखी के किसानों और हरियाणा तक सीमित नहीं है। अम्बाला जिले के मोहड़ी गांव के किसान अमरजीत सिंह बहुत निराश हैं। उनकी मक्के की फसल तैयार पड़ी है लेकिन खुले बाजार में व्यापारी उन्‍हें ठीक दाम नहीं दे रहे। पूरी फसल बेच दें तो भी एक पैसा लाभ नहीं होने वाला। इस साल उतरते वसंत में उन्‍होंने दस एकड़ जमीन पर मक्के की बिजाई की थी। बेमौसम आए आंधी-तूफान और बारिश के प्रकोप से किसी तरह उनकी फसल बच तो गई पर बाजार में मिल रहे कौड़ी के भावों के हत्थे चढ़ गई।

मद्धम आवाज में वे कहते हैं, “इस बार नुकसान होने वाला है। अधिक नमी वाली मक्के को कोई भी व्यापारी 1100 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा खरीदने में तैयार नहीं है, जबकि सूखे मक्के को बमुश्किल 1600 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। इस बार हमारे बेल्ट के मक्का किसान काफी परेशान हैं, कोई हमारे मक्के को पूछ ही नहीं रहा।”

अम्‍बाला में इस वर्ष लगभग 4000 हेक्टेयर में वसंत मक्के की बुआई हुई थी। अमरजीत ने बताया, “हर साल फसल पर लागत तो लगातार बढ़ ही रही है पर दाम घटते जा रहे हैं। सरकार को हम किसानों को हमारी फसल का सही दाम देना चाहिए, लेकिन मंडियों में न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (एमएसपी) पर खरीद ही नहीं हो रही।”

सरकार द्वारा 2023 के लिए मक्के की कीमतों में 6.5 फीसदी की वृद्धि की गई है। कृषि विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि सरकार ने खरीफ-2023 सीजन में अम्बाला जिले में ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ योजना के तहत मक्का के लिए 2490 एकड़ का लक्ष्य रखा था। योजना के तहत किसानों को 7000 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन मिलेगा और मक्के के लिए एमएसपी 2090 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है जो पिछली बार से ज्‍यादा है।

कृषि विशेषज्ञ रमनदीप मान कहते हैं, “एक तरफ सरकार चाहती है कि किसान फसल विविधीकरण अपनाएं, लेकिन दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रयास नहीं करती है कि किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले। हर फसल की खरीद एमएसपी पर होनी चाहिए, तब जाकर किसान फसल विविधीकरण की नीति को अपनाएंगे।”

नाम न छापने की शर्त पर अम्‍बाला के एक व्यापारी ने बताया, “मक्का ज्यादातर मुर्गीपालन और पशु चारे में इस्तेमाल होता है। इस साल मक्का तो एक हिसाब से पिटा हुआ है। व्यापारी भी मक्के की खरीद-फरोख्‍त में बड़ा संभलकर हाथ डाल रहे हैं।”

अम्बाला और इसके आसपास के जिलों में मक्के की फसल के अलावा सूरजमुखी की फसल की बिजाई भी होती है। सूरजमुखी के किसान भी अपनी फसल के लाभकारी मूल्यों के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनकी फसल भी सरकार एमएसपी पर नहीं खरीद रही है।

सूरजमुखी के किसानों के आंदोलन की ताप राष्ट्रीय फलक पर पहली बार बीते 6 जून को महसूस की गई जब कुरुक्षेत्र के शहर शाहाबाद में किसानों ने जीटी रोड (दिल्ली-अमृतसर हाइवे) को बंद कर दिया। उस दिन लगभग पांच हजार किसान सड़क पर थे। सरकार ने बातचीत करने के बजाय प्रदर्शनकारी किसानों पर लाठीचार्ज कर दिया और किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी समेत दस किसानों को गिरफ्तार कर लिया। सरकार के इस कदम से सूबे के किसानों में और गुस्सा भर गया।

किसानों ने 12 जून को कुरुक्षेत्र के पीपली शहर में दोबारा जीटी रोड को जाम कर दिया। इस बार किसानों की संख्या 50 हजार थी। सरकार को दो दिन के अंदर ही सूरजमुखी की खरीद और किसानों की रिहाई की मांग माननी पड़ी, जिसके बाद किसानों ने अपना धरना उठा लिया।

पंजाब में मूंग की फसल की भी यही कहानी है। सरकार द्वारा बहुत कम दाम में मूंग खरीदने के कारण खुले बाजार के व्यापारी मूंग को 5800 रुपये प्रति क्विंटल में खरीद रहे हैं। यह मूंग की MSP से लगभग 2000 रुपये कम है। पंजाब की लगभग 70 प्रतिशत मूंग की खरीद एमएसपी से कम पर हुई है। खुले बाजार में लगभग 75000 क्विंटल की खरीददारी हुई है। इसके उलट सरकार ने अभी तक सिर्फ 116 क्विंटल मूंग की ही सरकारी खरीद की है।

पिछले साल 85 फीसदी से ज्यादा फसल एमएसपी 7275 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे बिकी और राज्य सरकार को किसानों को इस कमी के लिए 42 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुआवजा देना पड़ा। भावांतर के तहत किसानों को 1000 रुपये प्रति क्विंटल की तय राशि दी गई थी, जिसके बाद भी किसानों के घाटे की भरपाई नहीं हो सकी।

मान बताते हैं, “पिछले साल पंजाब में 85 प्रतिशत मूंग एमएसपी से नीचे बिकी, किसानों को 1000 रुपये क्विंटल का मुआवजा देने के बाद भी अधिकांश किसानों को 7275 रुपये क्विंटल का एमएसपी नहीं मिल सका। इस साल मूंग का रकबा आधा हो गया था, उसमें से भी 70 प्रतिशत मूंग की खरीद एमएसपी से नीचे हुई है।‘’


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