Authoritarianism

AI Illustration showing society in transition

बुराई का व्याकरण : रावण को जलाने वाला समाज आज जॉम्‍बी कैसे पैदा कर रहा है!

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दशहरे पर हमारा समाज सदियों से रावण को मारता आ रहा है। वह जानता है कि यह प्रतीकात्‍मक कर्मकांड है, इससे बुराई खत्‍म नहीं होती। इसमें कभी किसी को बहुत दिक्‍कत नहीं थी, बशर्ते बुराइयों ने अपना चोला और रंगढंग नहीं बदला होता। बीते दो दशक के दौरान हुए सूचना प्रौद्योगिकी और उपाभोक्‍तावाद के विस्‍फोट ने सामाजिक बुराइयों का चलन और चरित्र बुनियादी रूप से बदल डाला है। स्‍वतंत्र ढंग से सोचने, तर्क करने, और नैतिक जीवन जीने की गुंजाइशों को ही अब मारा जा रहा है। हर जगह, हर शक्‍ल, हर कहानी अब एक जैसी दिखने लगी है, गोया सामने जॉम्‍बी फिल्‍म चल रही हो। रावण भी हर बार खुद को जलता देख कर हंसता ही होगा! बुराइयां आखिर किसी संक्रामक महामारी की तरह क्‍यों और कैसे फैल रही हैं, इस पर अमरपाल सिंह वर्मा ने विस्‍तार से विचार किया है। विजयादशमी पर विशेष प्रस्‍तुति

Patricio Guzmán

मैं, पात्रीसियो गुज्‍़मान… संघर्षरत जनता के महान फिल्मकार की कहानी उन्हीं की जुबानी

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दुनिया भर में आम लोगों की जिंदगी को दर्ज करने वालों का अगर कोई पितामह कहा जा सकता है, तो वे फिल्‍मकार पात्रीसियो गुज्‍़मान हैं। नवउदारवाद की पहली प्रायोगिक धरती चिली में पैदा हुए गुज्‍़मान ने तानाशाह फ्रांको के स्‍पेन में सिनेमा सीखा और आयेंदे की क्रांति के वक्‍त लौटकर अपने देश आए। इसके बाद का उनका पूरा जीवन सैन्‍य तख्‍तापलट, जनरल पीनोशे के अत्‍याचारों और आम लोगों के संघर्षों को रिकॉर्ड करते हुए बीता। इसकी उन्‍हें कीमत भी चुकानी पड़ी। गुज्‍़मान बीते 15 सितंबर को गुजर गए। वे क्‍या थे, कौन थे, उनकी प्रेरणाएं क्‍या थीं, सब कुछ खुद उन्‍हीं की जुबानी

Fatima Nafees, mother of disappeared JNU student Najeeb Ahmad

गुमशुदा बच्चों के नाम: माल्विनास की बर्बरताएं, मार्केज़ के विवरण और माँओं की बददुआएं

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जेएनयू के छात्र नजीब को गायब हुए अगले महीने दस साल पूरे हो जाएंगे। उसकी सरकारी फाइल बंद की जा चुकी है, लेकिन माँ फातिमा ने हार नहीं मानी है। उनकी कानूनी लड़ाई जारी है- बिलकुल अर्जेंटीना की एस्तेला कार्लोतो की तरह, जिन्‍होंने अपनी आधे से ज्‍यादा जिंदगी अपनी बेटी और नाती को खोजने में लगा दी। जिस देश में हर साल चार से पांच लाख लोग ‘गुमशुदा’ दर्ज किए जाते हैं, वहां उनकी कहानियां कहने पर लगी अघोषित पाबंदी मार्केज़ की याद दिलाती है, जिन्‍होंने सबसे पहले माल्विनास में अर्जेंटीना के गुमशुदा बेटों की नियति को उजागर किया था। मार्केज़ अब सौ साल के हो रहे हैं। विद्यार्थी चटर्जी का यह लेख मार्केज़ की जन्‍मशती, नजीब की गुमशुदगी और दुखियारी माँओं के नाम

Indira Gandhi

‘इमरजेंसी’ आधी सदी बाद भी दबंग शासकों के लिए आईना क्‍यों है? एक निस्‍संग किताब से कुछ सबक

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इस साल प्रकाशित श्रीनाथ राघवन की इंदिरा गांधी पर लिखी किताब एक ओर सत्ता के काम करने के तरीके उजागर करती है, तो दूसरी तरफ आज के शासकों को चेतावनी भी देती है। पचास साल पहले इस देश में इमरजेंसी लगाने वाली युद्धोत्‍तर काल की पहली दबंग शासक इंदिरा गांधी पर आज की तारीख में कहानी कहना लोकतंत्र की उस नजाकत को उभारने जैसा काम है, जिसका मूल सबक यह है कि लोकतांत्रिक परिवर्तन और पतन दोनों एक ही राह के हमजोली होते हैं। ‘’इंदिरा गांधी ऐंड द ईयर्स दैट ट्रांसफॉर्म्‍ड इंडिया’’ पर अंतरा हालदर की समीक्षा

भारत में धनकुबेरों का फैलता राज और बढ़ती गैर-बराबरी: पिछले दस साल का हिसाब

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प्रतिष्ठित अर्थशास्‍त्री थॉमस पिकेटी ने भारत में गैर-बराबरी और अरबपतियों के फैलते राज पर एक रिपोर्ट जारी की है। वर्ल्‍ड इनीक्वालिटी लैब से जारी इस रिपोर्ट को पिकेटी के साथ नितिन कुमार भारती, लुकास चैन्सल और अनमोल सोमंची ने मिलकर लिखा है। पिछले दस वर्षों के दौरान किस तरह भारत धनकुबेरों के तंत्र में तब्‍दील होता गया है और यहां का मध्‍यवर्ग लगभग लापता होने के कगार पर आ चुका है, उसकी एक संक्षिप्‍त तथ्‍यात्‍मक तस्‍वीर फॉलो-अप स्‍टोरीज अपने पाठकों के लिए चुन कर प्रस्‍तुत कर रहा है