गुमशुदा बच्चों के नाम: माल्विनास की बर्बरताएं, मार्केज़ के विवरण और माँओं की बददुआएं

Fatima Nafees, mother of disappeared JNU student Najeeb Ahmad
Fatima Nafees, mother of disappeared JNU student Najeeb Ahmad
जेएनयू के छात्र नजीब को गायब हुए अगले महीने दस साल पूरे हो जाएंगे। उसकी सरकारी फाइल बंद की जा चुकी है, लेकिन माँ फातिमा ने हार नहीं मानी है। उनकी कानूनी लड़ाई जारी है- बिलकुल अर्जेंटीना की एस्तेला कार्लोतो की तरह, जिन्‍होंने अपनी आधे से ज्‍यादा जिंदगी अपनी बेटी और नाती को खोजने में लगा दी। जिस देश में हर साल चार से पांच लाख लोग ‘गुमशुदा’ दर्ज किए जाते हैं, वहां उनकी कहानियां कहने पर लगी अघोषित पाबंदी मार्केज़ की याद दिलाती है, जिन्‍होंने सबसे पहले माल्विनास में अर्जेंटीना के गुमशुदा बेटों की नियति को उजागर किया था। मार्केज़ अब सौ साल के हो रहे हैं। विद्यार्थी चटर्जी का यह लेख मार्केज़ की जन्‍मशती, नजीब की गुमशुदगी और दुखियारी माँओं के नाम

हाल ही में खत्‍म हुए फुटबॉल के विश्‍व कप में लियोनेल मेसी और उनकी टीम सहित अर्जेंटीना के हजारों समर्थकों ने स्‍टैंड में खड़े होकर 44 साल पहले लास माल्विनास में हुई ‘अपने भाइयों’ की हत्‍याओं की जिस तरह से बार-बार याद दिलाई, वह पूरी दुनिया ने देखा।

यह कृत्‍य ब्रिटिशों द्वारा युद्ध‍बंदियों के सम्‍बंध में जिनेवा कन्‍वेंशन के प्रावधानों के उल्‍लंघन और उनकी बर्बरताओं के बारे में दुनिया की चेतना को जगाने के लिए था। मेसी ने बिलकुल वही किया जिसकी शुरुआत खेल के मैदान में कभी दिएगो मैराडोना ने की थी- इंसाफ के लिए सामूहिक आवाज उठाना- जिसने आगे चलकर परंपरा की शक्‍ल ले ली! मेसी ने उस परंपरा को कायम रखा।

याद हो कि 1982 में दक्षिणी अटलांटिक क्षेत्र में जमीन के कुछ टुकड़ों के ऊपर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच एक युद्ध हुआ था (अगर उसे युद्ध कहा जा सके तो)। इस क्षेत्र को लातिन अमेरिका के लोग लास माल्विनास कहते हैं और ब्रिटेन के लोग इसे फॉकलैंड्स के नाम से जानते हैं। लास माल्विनास की आबादी बहुत कम है। यहां इंसानों से ज्‍यादा भेड़-बकरियां हैं। यहां की जमीन कठोर ठंडी चट्टानों की बनी है और उसमें इतने बड़े-बड़े गड्ढे हैं जिनका आकार चांद की सतह पर मौजूद क्रेटर जितना है। इस क्षेत्र का बाहरी दुनिया के लिए तब तक कोई मायने नहीं था, जब तक कि यहां स्‍थानीय लोगों और ब्रिटेन के बीच टकराव नहीं शुरू हो गए। अर्जेंटीना की इस जंग में शर्मनाक हार हुई थी।


Aregentina soccer team with Malvinas Banner at FIFA 2026
मेसी ने FIFA में अर्जेंटीना की परंपरा को कायम रखा (फोटो: पेदरो रामीरो / X)

अर्जेंटीना के युद्धबंदियों का ब्रिटेन ने किस हद तक उत्‍पीड़न किया था, यह बात धीरे-धीरे तब साफ होती गई जब दोनों तरफ के पूर्व सैन्‍य अधिकारियों की गवाहियां अखबारों में छपना शुरू हुईं।

उन्‍होंने बताया कि या तो हत्‍याएं उनकी आंखों के सामने हुई थीं या फिर इसके बारे में उन्‍होंने सुन रखा था। युद्ध की दसवीं बरसी पर 1992 में एक किताब प्रकाशित हुई जिसे एक अंग्रेज सैनिक ने लिखा था। उसमें बताया गया था कि अर्जेंटीना के युद्धबंदियों को तीखी ढलान वाली पहाड़ियों से धकेला गया था। झंझट से बचने और समय बचाने के लिए उनके माथे में सीधे गोली भी मारी गई थी।

बीते साढ़े चार दशक के दौरान अर्जेंटीना और ब्रिटेन ने रह-रह कर ऐसी रिपोर्टों की जांच के आदेश दिए हैं जिनमें बताया गया है कि अर्जेंटीना के सैनिकों को ब्रिटेन के अफसरों और लोगों ने मौत के घाट उतारा था, लेकिन उन जांचों से कुछ भी निकल कर नहीं आ सका। ऐसे कई आरोपों के बारे में भूतपूर्व लांस कारपोरल विन्‍सेंट ब्रैमली की लिखी किताब एक्‍सकर्शन टु हेल- माउंट लॉंगडन में पढ़ा जा सकता है, जिसमें 11 और 12 जून 1982 को माल्विनास की राजधानी से पांच मील दूर स्थित 700 फुट की एक चट्टानी पहाड़ी पर हुई निर्णायक जंग का संदर्भ है।            

माल्विनास की जंग ने कई ऐसे ज्‍वलन्‍त सवालों को पैदा किया था जिन पर आज भी तमाम लोग बेचैन हो उठते हैं। मसलन, उस वक्‍त तो अर्जेंटीना सैन्‍य शासन के अंतर्गत था, फिर अचानक लास माल्विनास पर अपना दावा ठोंकने की दिलचस्‍पी उसमें क्‍योंकर पैदा हुई? अर्जेंटीना से उपजी चुनौती की प्रतिक्रिया मार्गरेट थैचर ने इतनी तेज क्‍यों दी कि ब्रिटेन की कार्रवाई पाशविक बर्बरता की हद तक जा पहुंची? इन सवालों के जवाब इतिहास मांगता है। इनके जवाब इतिहास के लिए ही सही, दिए जाने चाहिए।    


Excursion to Hell: Mount Longdon by Vincent Bramley
विन्‍सेंट ब्रैमली की लिखी किताब एक्‍सकर्शन टु हेल- माउंट लॉंगडन

अर्जेंटीना में 1980 के दशक के आरंभ से, बल्कि उससे कहीं पहले से चल रहे सैन्‍य जनरलों के आततायी राज ने देश का कबाड़ा कर रखा था। वहां के लोकतंत्र और कानून के राज का सैन्‍य जोर-जबर से गला घोंटा जा चुका था। राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों, विश्‍वविद्यालयों और बौद्धिक तबकों तथा चर्च के एक हिस्‍से से आने वाले हजारों असहमत लोग अचानक ‘गुमशुदा’ हो गए थे (देसपरासिदोस, ‘डिसअपीयर्ड’ के लिए)। जहां सेना नहीं चाहती थी कि उसका चेहरा सामने आवे, वहां हथियारबंद दक्षिणपंथी गुडों से वह अपना काम करवाती थी।

बेरोजगारी जबरदस्‍त स्‍तर पर थी। अर्थव्‍यवस्‍था बिखर चुकी थी। अपने देश को नर्क बनता देख अर्जेंटीना के लोग भयंकर असंतुष्‍ट और बेचैन थे। यह सच है कि अर्जेंटीना के लोगों ने लास माल्विनास को हमेशा से अपना माना था और कई लातिन अमेरिकी देश भी इस दावे के समर्थन में थे, लेकिन उसे कब्‍जाने की टाइमिंग का लेना-देना सीधे तौर पर अर्जेंटीना की जनता का उसकी समस्‍याओं से ध्‍यान भटकाने के साथ जुड़ा था। चूंकि लास माल्विनास ब्रिटेन का उपनिवेश था, तो ऐसे वक्‍त में उस पर हमला करने की सैन्‍य योजना दरअसल एक खुराफाती साजिश थी ताकि सैन्‍य सरकार अर्जेंटीना में अपनी गद्दी कायम रख सके। वह जनता के आक्राश से खुद को बचाने के लिए यह जुआ खेलने को तैयार थी।

जहां तक ब्रिटेन की प्रतिक्रिया का सवाल था, उस साल वहां चुनाव होने थे। इसलिए लास माल्विनास में श्रीमती थैचर को एक दैवीय अवसर दिखाई दिया जिसके सहारे वे अपनी कमजोर होती छवि को संभाल सकती थीं। इसीलिए युद्ध का कुल परिणाम थैचर के लिए इतना ही हुआ कि वे ब्रिटेन की सत्ता में वापस आ गईं, वो भी दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद मिले सबसे बड़े बहुमत के साथ। उन्‍होंने युद्ध में हुई जीत के नाम पर औसत ब्रिटिश नागरिक की भावनाओं के साथ एक कामयाब खेल रचा।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि ब्रिटेन तब तक दुनिया के पैमाने पर दूसरे दर्जे की सैन्‍य ताकत बन चुका था, लेकिन एक औसत अंग्रेज की औपनिवेशिक मानसिकता अब तक कायम थी। इसी मानसिकता का थैचर ने लाभ उठाया और वहां के लोगों ने पलट कर चुनाव में अपनी प्रधानमंत्री और उनकी कंजर्वटिव पार्टी को भारी बहुमत से जिताया। एक मामूली मारवाड़ी की बेटी से कथित लौह महिला के दरजे तक पहुंचीं श्रीमती थैचर के बारे में यह कहना बेशक अतिरंजना हो सकता है कि वे युद्धप्रेमी महिला थीं, लेकिन इतना तो तय है कि अपने चुनावी भाषणों में उन्‍होंने माल्विनास की जंग में जीत का हवाला खूब दिया था। उन्‍होंने वास्‍तव में इस जंग से पैदा हुई बेचारगी और दुख-दर्द का सियासी लाभ उठाया था।

माल्विनास की जंग से जुड़ी त्रासदियों को दुनिया के सामने जितना गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ ने प्रकाशित किया, उतना काम शायद किसी ने नहीं किया है। मार्केज की यह जन्‍मशती चल रही है और अगले साल मार्च में वे सौ साल के हो जाएंगे।

जिस साल माल्विनास की जंग भड़की, उसी साल के अंत में मार्केज़ को नोबेल से सम्‍मानित किया गया। वे लातिन अमेरिका की सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक आवाज बन चुके थे। इसीलिए माल्विनास युद्ध की पहली बरसी पर वहां अर्जेंटीना के कब्‍जे और अंग्रेजों के बर्बर पलटवार पर 1983 के अप्रैल में मार्केज़ ने जब स्‍पैनिश अखबार एल पाएस में एक लंबा लेख लिखा, तो उसने लाखों पाठकों को सदमे में डाल दिया।


Gabriel José García Márquez exposed the brutalities of Malvinas war
गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ (6 March 1927 – 17 April 2014)

मार्केज़ के अनुसार, माल्विनास की ठंड में तैनात अर्जेंटीना के सैनिकों के पास इतने कम कपड़े थे और इतनी खराब रिहाइश, कि 92 सैनिकों के अंडकोश निकालने पड़ गए क्‍योंकि वे ठंड से बुरी तरह जम चुके थे। शल्‍यक्रिया के बाद इन सैनिकों को वापस अपने मोर्चों पर लौटना पड़ा। कुछ सैनिक केवल टेनिस वाले जूतों में वहां तैनात थे, तो हफ्तों बाद जब उनके जूते निकाले गए तो साथ में पैर का मांस भी उखड़ आया। लगातार ठंड और नमी के चलते उनके पैर में जहर फैल चुका था। बर्फ की चमक ने पांच सौ सैनिकों को अंधा कर दिया था क्‍योंकि उनके पास उससे बचाने वाले चश्‍मे नहीं थे। सैनिकों की भूख को मारने के लिए और उन्‍हें लगातार जगाए रखने के लिए अफसरों ने युद्ध के मोर्च पर भेजने से पहले सेना में भर्ती हुए युवकों को पहले चॉकलेट और फिर इंजेक्‍शन के माध्‍यम से नशा दिया था। कई सैनिक तो नींद मे ही ठंड से मर गए, लेकिन वे अपने उन साथि‍यों के मुकाबले खुशकिस्‍मत थे जो जम चुके भोजन के डिब्‍बों को खुरचते हुए भूख से मरे।    

मार्केज़ ने ये सारे विवरण ऐसे अप्रकाशित पत्रों से निकालकर छापे थे जो अर्जेंटीना के लोगों ने देश के भीतर और बाहर रहने वाले प्रवासी समुदायों से एक-दूसरे को लिखे थे। उन्‍होंने अपनी कहानी की शुरुआत एक ऐसे रंगरूट से की थी जो युद्ध के बाद ब्‍यूनोस एयरीज़ लौट रहा था और उसने अपनी मां को फोन कर के पूछा था कि क्‍या वह अपने संग एक साथी को घर ला सकता है जिसके दोनों पैर और आंखें जंग में जा चुकी हैं। उसकी मां ने घबरा कर जवाब दिया था- नहीं! वह अपने घर में ऐसे किसी अपंग प्राणी को नहीं रख सकती। मां की यह बात सुनकर बेटे ने तुरंत फोन काटा और खुद को गोली मार ली क्‍योंकि वह खुद युद्ध से अंधा और जख्‍मी था।

यह अनुमान ही लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश मीडिया ने मार्केज़ के एल पाएस में छपे लेख को देखकर भी अनदेखा किया होगा, चूंकि उन्‍होंने उसमें यह भी जिक्र किया था कि युद्ध के बाद रिहा किए गए अर्जेंटीना के सैन्‍यबंदियों में से पचास ऐसे थे जिनके गुदाद्वार का इलाज करना पड़ा था क्‍योंकि ब्रिटिशों के किए बलात्‍कार से वे जख्‍मी हो चुके थे। इन सैनिकों को ब्रिटिशों ने माल्विनास के डार्विन इलाके में पकड़कर कैद रखा था। मार्केज़ के इस दिल दहला देने वाले लेख से भारत के पाठक अनजान रह जाते अगर उसे 1983 की गर्मियों में बंबई से निकलने वाली मासिक पत्रिका इम्प्रिन्‍ट ने नहीं छापा होता (यह पत्रिका अब बंद हो चुकी है)।


Cover, printline and article about Marquez in 1983 issue of Imprint magazine published from Bombay
बंबई की मासिक पत्रिका इम्प्रिन्‍ट का 1983 का अंक और मार्केज़ के बारे में लेख (इंटरनेट आर्काइव से)
Argentinian POW in Port Stanley
पोर्ट स्‍टैनली में कतारबद्ध अर्जेंटीना के युद्धबंदी (विकिपीडिया)

दुनिया के इस हिस्‍से में और खासकर भारत में लोगों के लिए ज्‍यादा चिंताजनक मार्केज़ के लेख का वह हिस्‍सा होना चाहिए जिसमें उन्‍होंने गुरखा सैनिकों के बारे में लिखा था। ये गुरखा सैनिक ब्रिटेन की ओर से लड़ रहे थे और पोर्ट स्‍टैनली में उसकी टास्‍क फोर्स की पहली पंक्ति में तैनात थे, जो ‘चिल्‍लाते हुए सिर काटते जाते थे… हर सात सेकेंड में एक सिर। वे बाल से पकड़कर कटे हुए सिर को हाथ में लेते और उसके कान काट देते थे।‘ मार्केज़ का विवरण बताता है कि इन गुरखा सैनिकों के सिर पर ऐसी सनक सवार थी कि जंग खत्‍म होने के बाद वे ब्रिटिश सैनिकों के बीच ही कत्‍लेआम मचाने लगे। उन्‍हें बांधकर रोकना पड़ा था।

माल्विनास में तैनात किए गए सात सौ गुरखा सैनिकों में से केवल सत्तर ही जिंदा बच सके- यह ब्रिटेन की महारानी की सेवा में चारे की तरह इस्‍तेमाल किए जाने वाले दक्षिण एशियाई लोगों की नियति बताता है जिसने अपना काम निकलवाने के बाद कभी किसी की चिंता नहीं की। अगर अंग्रेजों ने गुरखों को माल्विनास की जंग में चारे की तरह इस्‍तेमाल किया, तो ब्‍यूनोस एयरीज़ के जनरलों ने भी अर्जेंटीना के मूलवासियों के साथ यही बरताव किया, हताहतों में जिनकी संख्‍या सबसे ज्‍यादा थी।

माल्विनास में हुई अर्जेंटीना की हार का एक परिणाम यह निकला कि वर्षों के अत्‍याचारी राज के बाद आखिरकार सैन्‍य शासन को जाना पड़ा और लड़खड़ाते कदमों से धीरे-धीरे ही सही, लोकतंत्र इस देश में लौट आया।

उस समय अर्जेंटीना का समाज बुरी तरह बंटा हुआ था। लोग अपने जख्‍मों को गुस्‍से, शर्म और जबरदस्‍त द्वंद्व के साथ भरने में जुटे हुए थे। उन्‍हें देश के बुजुर्ग नेता राउल अल्‍फॉन्सिन के नेतृत्‍व में बहुत दिलचस्‍पी नहीं थी क्‍योंकि अर्जेंटीना को जिन बुराइयों से गुजरना पड़ा था उन्‍हें दुरुस्‍त करने का कोई रामबाण इलाज उनके पास नहीं था। इसीलिए लोगों ने उनके बजाय साउल कार्लोस मेनेम को वोट दे दिया, जो सीरियाई प्रवासियों के वंशज थे और यहां आकर कैथोलिक बन गए थे, हालांकि बाद के घटनाक्रम स्‍पष्‍ट करते हैं कि इस परिवर्तन का उनकी आस्‍था के बजाय सुविधा से कहीं ज्‍यादा लेना-देना था।

अर्जेंटीना का संविधान यह प्रावधान करता है कि कोई भी गैर-कैथोलिक देश का राष्‍ट्रपति नहीं बन सकता। मेनेम का दावा था कि तानाशाही के वर्षों में मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के चलते उन्‍हें जेल में बहुत यातनाएं सहनी पड़ी थीं। जेल से छूटने के बाद उन्‍होंने चुनाव लड़ा और जीतकर राष्‍ट्रपति बन गए। उन्‍होंने बहुत चतुराई के साथ खुद को पूर्व राष्‍ट्रपति पेरॉन की भूमिका में गढ़ा, जो कामगार वर्ग के शुभचिंतक और आदर्श पारिवारिक शख्सियत थे, हालांकि अर्जेंटीना के लोग और बाकी दुनिया भी इस बात को बहुत कम ही जानती थी कि यह चित्ताकर्षक और वाक्पटु व्‍यक्ति तानाशाह जनरलों के साथ साठगांठ किए बैठा था। जनरलों के साथ मेनेम का एक गोपनीय समझौता था कि उनके ऊपर मुकदमा नहीं चलाना है। माल्विनास की जंग में ठंड और भूख से मारे गए लोगों या तानाशाही राज में गायब हुए लोगों के मां-बाप, दादा-दादी, दोस्‍त और परिजनों को यह अंदाजा ही नहीं था कि देश और उसकी जनता के साथ किए अपने वादों से मेनेम पलट जाएगा।

मेनेम के किए तमाम विश्‍वासघातों में से कम से कम एक ऐसा था जिसने भारत में बहुत से लोगों को गहरे निराश किया। मेनेम ने वादा किया था कि लैटिन अमेरिका के भीतर अर्जेंटीना गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्‍व करता रहेगा, जिसके प्रति भारत कृतसंकल्‍प था। जैसे ही सियासी फायदे की बात आई, मेनेम अमेरिकी दबाव में टूट गया। अमेरिका ने यहां पहले ही सैन्‍य जनरलों के अत्‍याचारी राज का सक्रिय सहयोग किया था जबकि बाकी दुनिया में वह लोकतंत्र और मानवाधिकार के मूल्‍य बघार रहा था। मेनेम को उसी ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन से बाहर निकलने को बाध्‍य किया। इसमें अमेरिका की दलील थी कि अब यह आंदोलन प्रासंगिक नहीं रह गया है। बुश और मेनेम का समीकरण यह था कि अर्जेंटीना के ऐसा करते ही लैटिन अमेरिका के बाकी देश भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन से बाहर आ जाएंगे और इस तरह से क्‍यूबा को अलगाव में डाला जा सकेगा, हालांकि इसका उन्‍हें कोई फायदा नहीं हुआ।



अर्जेंटीना में जैसे ही सैन्‍य तानाशाही का अंत हुआ था, तमाम कलाकार, फिल्‍मकार, आदि दुनिया को बताने में लग गए थे कि माल्विनास की जंग में क्‍या हुआ था। वे उन अंधेरे दिनों के अनगिनत भयावह आतंकों की सूचनाएं अब दुनिया को दे रहे थे कि कैसे ‘ईश्‍वर, परिवार और देश’ के नाम पर फौज ने लोगों के साथ जो मन में आया सो किया। लुइस पुएंज़ो की फिल्‍म ला ऑफिशियल हिस्‍टोरिया (द ऑफिशियल वर्ज़न) ने सैन्‍य शासन के हजारों विरोधियों की गुमशुदगी के प्रसंग को सामने लाने का काम किया था और बताया था कि कैसे इन गायब किए गए लोगों के बच्‍चों को कई बार सत्ता-समर्थक निसंतान लोगों में बांट दिया जाता था। इस फिल्‍म को 1984 के कॉन्‍स में सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म का गोल्‍डेन पाम पुरस्‍कार मिला था।

यह गायब किए गए लोगों का मुद्दा उठाने वाली पहली उल्‍लेखनीय कोशिश थी जिसने तानाशाही सत्ता की भयावहताओं को प्रकाशित करने वाली कृतियों के लिए दरवाजे खोल दिए और ऐसी फिल्‍मों की बाढ़ आ गई। इस सिलसिले में बने कुछ वृत्तचित्र तो बहुत प्रामाणिक निकले जिनके पीछे गहन शोध किया गया था। माल्विनास की लड़ाई पर मार्केज़ का लिखा तो अब भी ऐसे स्रोत की तरह काम कर रहा है जो इस मुद्दे को लगातार जिंदा रखे हुए है।

अर्जेंटीना में लोकतंत्र की वापसी के कई दशक बाद वहां के लोग आज भी ऐसी गोपनीय फाइलों और कागजात को तलाश रहे हैं जिनसे पता चल सके कि उनके प्रियजन कैसे मरे या उन्‍हें जल्‍दबाजी में कहां दफनाया गया था। जैसे ब्‍यूनोस एयरीज़ की एक मां एस्तेला कार्लोतो, जिसने अपनी आधे से ज्‍यादा जिंदगी अपनी बेटी और उसके बच्‍चे को खोजने में लगा दी जिसे उसने सेना की कैद में जना था।   

इस संदर्भ में भारत को भी देखा जाना चाहिए जहां भारी संख्‍या में राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों को गायब किया गया है और यह संख्‍या लगातार बढ़ती ही जा रही है। जैसे फातिमा नफ़ीस, जिसने जेएनयू से गायब हुए नजीब अहमद को जना था, जो वहां बायोटेक्‍नोलॉजी का छात्र था।

फातिमा जानती हैं कि अपने भीतर के गुस्‍से को सरकार के खिलाफ कैसे मोड़ा जाए क्‍योंकि सरकार ने उसके गुमशुदा बेटे को तलाशने की पर्याप्‍त कोशिश नहीं की। (नजीब का केस सीबीआइ द्वारा बंद किए जाने के बाद) उसने जिन शब्‍दों में अपने दर्द को बयां किया था उसे भुला पाना मुश्किल है: ‘जिन मांओं के बच्‍चे गायब हैं, जिनके बच्‍चों को मुठभेड़ में मारा जा रहा है, मैं उन सब से कहना चाहूंगी कि आगे आएं और मेरे साथ खड़े हों। मैं उनकी ताकत बनूंगी, वे मेरी ताकत बनें। हमारी दुआओं और बददुआओं का असर होगा और यह भाजपा सरकार जल्‍द ही खत्‍म हो जाएगी। रोहित वेमुला और जुनैद खान जैसे बच्‍चों की मांएं, जिन्‍होंने अपने बच्‍चे गंवा दिए, मेरे साथ आएं। इस बांझ सरकार को हम मिलकर जगाएंगे।‘     


"Where is Najeeb" graffiti in front of the Central Bureau of Investigation headquarters, New Delhi. (The CBI headquarters is on the opposite side of the road, not pictured.)
दस साल, एक सवाल: दिल्ली में सीबीआई मुख्यालय के सामने वाली दीवार पर लिखी एक इबारत (विकिपीडिया)

प्रसंगवश, भारत के पास भी अपना ‘गुमशुदा लोगों का सिनेमा’ होना चाहिए था। वास्‍तव में ऐसा सिनेमा यहां है भी, लेकिन इस मुद्दे को संबोधित करने वाले खास वृत्तचित्रों को फिल्‍म महोत्‍सवों और सार्वजनिक स्‍थलों पर दिखाए जाने से हमेशा रोका गया है। खासकर, सबसे ज्‍यादा गुमशुदगी का दर्द कश्‍मीरियों को झेलना पड़ा है, जिनके बेटे-बेटियों को सेना और अर्धसैन्‍य बलों ने रात के अंधेरे में उठा लिया और उन्‍हें फिर कभी नहीं देखा गया। इस विषय पर बनी फिल्‍मों या फिर गुजरात के नरसंहार की हकीकत बताने वाली फिल्‍मों को फिल्‍म महोत्‍सवों की चयन समितियों ने एकतरफा ढंग से खारिज किया है, जिनमें अधिकतर ऐसे तत्त्व भरे पड़े हैं जो आरएसएस और उसकी विचारधारा का प्रचार करते हैं।

मुंबई इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल तो अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्‍व काल से ही राजनीतिक दखलंदाजी का शिकार रहा है। नब्‍बे के दशक तक मुंबई फिल्‍म महोत्‍सव आला दरजे का कला आयोजन हुआ करता था। उसके बाद इसका पतन इतनी तेजी से हुआ कि आज की तारीख में कोई भी उम्‍दा और विचारवान कलाकार उसको गंभीरता से नहीं लेता। इसकी वजह ऐसे आयोजनों का विवेकहीनता के साथ किया गया भगवाकरण है। अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि भारत में ‘गुमशुदा लोगों का सिनेमा’ सचेत रूप से किए गए भेदभाव के कारण आज धूल चाट रहा है और उसमें मकड़ी के जाले लग चुके हैं।

ऐसे में मांओं की बददुआओं को हलके में नहीं लेना चाहिए, चाहे वह एस्तेला हो या फातिमा। एक जख्‍मी मां द्वारा ‘बांझ’ शब्‍द का प्रयोग यहां बहुत सांकेतिक मायने रखता है- यह उस चौड़ी खाई को दिखाता है जो प्‍यार से पालने-पोसने वाली एक मां और उन युद्धोन्‍मादी ठगों के बीच फैली है जिन्‍हें सिर्फ मारना-काटना आता है।



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