यह ढाई साल पहले की घटना है। जयपुर में एक परिवार के सदस्यों के बीच घरेलू वॉट्सऐप ग्रुप में कुछ बहस हुई थी। ग्रुप में बातचीत के दौरान किसी ने कुछ कमेंट कर दिया। दूसरे को लगा कि उसके मौसेरे भाई ने उसे नीचा दिखाने के लिए जानबूझ कर वह कमेंट किया है। वह उसे समझाने के लिए घर से बाहर निकला। दोनों पक्षों के बीच पहले बहस हुई, फिर तनाव बढ़ा तो चाकू चल गए। इस चक्कर में एक आदमी की मौत हो गई। जो रिश्तेदार बीचबचाव करने आया था वह जख्मी हो गया।
इस घटना के महज चार महीने पहले फरवरी 2024 में महाराष्ट्र के धुले जिले की एक सत्र अदालत ने 2018 के एक मुकदमे में सात व्यक्तियों को आजीवन कैद की सजा सुनाई थी। मामला यह था कि कुछ लोगों ने बंजारा समुदाय नाथपंथी दावरी गोसावी से आने वाले पांच व्यक्तियों की हत्या बच्चाचोरी की अफवाह में आकर कर दी थी। शुरू में तो मुकदमा 35 लोगों पर हुआ था, लेकिन 28 के खिलाफ साक्ष्य नहीं मिले। अंतिम फैसला आने में छह साल लग गए। ऐसी ही एक घटना अभी दो माह पहले श्रीगंगानगर जिले के केसरीसिंहपुर कस्बे के रेलवे स्टेशन पर हुई। एक व्यक्ति ने अपने पांच हजार रुपये चुराने का आरोप लगाकर एक युवक को पकड़ लिया। उसका आरोप सच मानकर भीड़ ने उस लड़के को पीट दिया। बस जान बच गई।
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट का एक अध्ययन नवंबर 2024 में आया जिसमें बताया गया था कि भारत में गौरक्षा से जुड़े 1023 इंस्टाग्राम खातों में से एक तिहाई पर गोवंश के व्यापार से जुड़े लोगों के खिलाफ की जाने वाली हिंसा से संबंधित छवियां न सिर्फ पोस्ट की जाती हैं, बल्कि छवियों के प्रभाव का इस्तेमाल कर के चंदा भी जुटाया जाता है। कुछ महीने बाद फरवरी 2025 में इंडिया हेट लैब की एक रिपोर्ट आई। उसमें मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ विद्वेषपूर्ण भाषणों और बयानों से जुड़ी 1165 घटनाएं दर्ज की गईं जो 2024 में घटी थीं। उन घटनाओं से जुड़े 995 वीडियो या तो सोशल मीडिया पर डाले गए थे या लाइव स्ट्रीम किए गए थे। ऐसी घटनाओं की संख्या 2023 में 668 थी।
कुछ महीने बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद पर तनाव भड़कता है। 2025 के मई में भारत-पाकिस्तान का टकराव अपने चरम पर पहुंच जाता है जब समाचार चैनल दावा करते हैं कि कराची के बंदरगाह पर भारतीय नौसेना ने हमला किया और लाहौर में भारतीय सेना घुस चुकी है। ये तमाम दावे फर्जी थे, लेकिन लोगों पर ऐसी खबरों का जो तात्कालिक असर पड़ चुका था वह नहीं पलटा। सच सामने आने पर भी झूठ और अफवाह से निर्मित धारणाएं कैसे कायम रहती हैं, उसका उदाहरण दिल्ली में रहने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के बुजुर्ग पिता हैं। वे लंबे समय तक समाजवादी विचारों से प्रभावित रहे, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर उनकी राजनीतिक और सामाजिक धारणाएं तेजी से बदल रही हैं। जिन राजनीतिक विचारों से वह सहमत नहीं होते, उन्हें स्वीकार करना उनके लिए अब मुश्किल हो चुका है। असहमति उन्हें महज दूसरी राय नहीं लगती, बल्कि गलत पक्ष में खड़े होने जैसी लगती है। पत्रकार बंधु अपने पिता में आए इस बदलाव को लेकर हैरान परेशान हैं।

निजी दायरे, घर-परिवार, गांव-मोहल्ले से लेकर सार्वजनिक स्थलों और मीडिया संस्थानों तक फैली अलहदा-सी दिखने वाली इन घटनाओं के बीच कुछ साझा सवाल छुपे हुए हैं। जैसे, बच्चाचोरी से लेकर रुपया चोरी की अफवाह पर घटी सामाजिक बुराई क्या निजी हमलावरों में थी या आरोप और साक्ष्य के बीच फर्क के धुंधला पड़ जाने में है? आरोपों की पड़ताल किए बगैर अलग-अलग व्यक्ति कैसे एक गलत लेकिन साझा राय वाली भीड़ बन गए? क्या उस भीड़ में से सात को सजा सुनाने से बुराई की सही शिनाख्त की जा सकी?
ऐसे ही, इंस्टाग्राम पर जब गौरक्षकों की हिंसा के वीडियो फैलाये जाते हैं तब बुराई सिर्फ हमलावर तक सीमित रहने के बजाय क्या दोहराव और पुनरुत्पादन की एक प्रक्रिया नहीं बन जाती? जब किसी को अपने जैसा नागरिक मानने के बजाय ‘गैर’ (मुसलमान/ईसाई) मानकर उसे खतरा बताया जाता है और फिर उसके साथ किए गए अन्याय और अलगाव को उचित ठहराया जाता है, तब बुराई क्या सामूहिक पहचान की आड़ नहीं ले लेती? और क्या होता है जब इस दुहराव, सामूहिक भ्रम, पहचान से उपजी ताकत में हस्तक्षेप करने की जिम्मेदार संस्थाएं- जैसे मीडिया- खुद असामाजिक व अनैतिक कृत्यों को बढ़ाने-चढ़ाने लग जाती हैं?
क्या हर बुराई रावण है?
ये सवाल हमारे समाज में अच्छाई और बुराई के बीच फर्क करने वाले नैतिक आचरण से जाकर जुड़ते हैं। हम लोग हर साल विजयादशमी पर रावण के पुतले को बुराई, असत्य आदि नकारातमक गुणों का प्रतीक मानकर जलाते हैं। पुतला तो जल जाता है, बुराई रह जाती है। ऊपर की घटनाओं को एक बार फिर से देखें। क्या उनमें वर्णित हिंसा, अन्याय, असत्य और बुराई के लिए कोई एक व्यक्ति या समूह आपको अंतिम तौर से जिम्मेदार लगता है? यदि नहीं, तो क्या हम पूरे समाज को ही बुरा मान लें? यह तो ज्यादती होगी।
इसी समाज में कई चमकदार और प्रेरक उदाहरण भी मौजूद हैं। मसलन, जिस सामाजिक स्थिति और डिजिटल वातावरण ने पिछले साल भारत-पाकिस्तान के तनाव से जुड़ी कुसूचनाएं फैलाने में कुछ संस्थानों को मदद की, उसी वातावरण ने गलत दावों को चुनौती देने की सहूलियत भी कुछ लोगों को दी। साल भर पहले की ही बात है जब हमने देखा कि कैसे पंजाब की बाढ़ के दौरान छात्रों, किसानों, संस्थाओं, डॉक्टरों और कार्यकर्ताओं ने राहत का काम किया। केवल एक फैसबुक अपील से शुरू हुई यह पहल चंदा जुटाने और राहत केंद्रों की स्थापना तक जा पहुंची। ऐसा लगा कि समाज अब भी पूरी तरह से पहचानों में बंटा नहीं है। केरल की बाढ़ में भी ऐसा ही कुछ दिखा था।
कुछ ऐसी ही स्थिति हम जुलाई से शुरू हुए सोशल मीडिया केंद्रित युवाओं के विरोध प्रदर्शनों में देख सकते हैं। न्यायपालिका की एक टिप्पणी से आक्रोशित होकर इंस्टाग्राम पर एक आभासी समूह जन्म लेता है और धीरे-धीरे व्यंग्य, मीम, पैरोडी वीडियो और हास्यप्रद कंटेंट के माध्यम से सरकार की सार्वजनिक आलोचना का एक चलन सामने आता है। इससे पता लगता है कि लोग हमेशा निष्क्रिय होकर सोशल मीडिया के कंटेंट का उपभोग नहीं करते। वे इन मंचों के माध्यम से ताकतवर संस्थानों को चुनौती भी देते हैं। यानी लोग इतने भी गूंगे, बहरे और जड़ नहीं हुए हैं। हां, लोगों को भीड़ में तब्दील करने की प्रक्रिया तो यहां भी काम करती ही है।
दो दिन की पत्रकारिता: जब घेराव, हमले और हिरासत का शिकार बने 37 से ज्यादा मीडियाकर्मी
अच्छाइयों को देखते हुए यह समझ में आता है कि बुराई वाली घटनाएं समाज की एक खास संक्रमणकारी स्थिति को दर्शाती हैं, न कि पूरे समाज की प्रतिनिधि तस्वीर हैं- वैसी स्थिति जब समझदारी से विवेक जुदा होता जाता है, जब ताकतवर आदमी में जिम्मेदारी नहीं रहती, जब ज्ञान को करुणा की परवाह नहीं होती और जब सार्वजनिक नैतिकता खुद को सार्वजनिक आचरण में नहीं बदल पाती। ऐसी सामाजिक स्थिति में रावण किसी खलनायक की तरह मरता नहीं, मरकर लौटता भी नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिति बनकर टिक जाता है और खुद को पुनरुत्पादित करता रहता है। लोग अपने-अपने तईं स्वतंत्र, अच्छा और नैतिक व्यवहार ही कर रहे होते हैं, फिर भी समाज में कुल जमा सामूहिक नैतिकता घटती जाती है। यह राम-रावण वाले मुहावरे, अच्छाई-बुराई की दुई से कहीं आगे की स्थिति है।
आखिर ऐसा क्या होता है कि कोई व्यक्ति अपनी स्वतंत्र समझ, विवेक और प्रतिक्रिया को पीछे छोड़कर भीड़ के साथ बहने लगता है? क्या लगातार दोहराई जाने वाली सूचनाएं, सामूहिक भय, बाजार की संस्कृति, आर्थिक असुरक्षा या सामाजिक अकेलापन इंसान के व्यवहार को इस तरह प्रभावित कर सकते हैं कि वह अपने फैसले खुद लेने के बजाय किसी बड़े समूह का हिस्सा बनकर प्रतिक्रिया करने लगे? क्या यह मुमकिन है कि एक समाज सामूहिक रूप से अपनी नैतिक स्वायत्तता का समर्पण कर दे जबकि उसके नागरिक यह मानते रहें कि वे तो स्वतंत्र रूप से ही सोच रहे हैं, चुन रहे हैं और कार्रवाइयां कर रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि आज के दौर में मिथकीय रावण का सबसे खतरनाक रूप वह नहीं जो समाज के खिलाफ खड़ा है, बल्कि वह हो जिसके मूल्यों को यह समाज धीरे-धीरे पैदा कर रहा है?
नए दौर की बुराइयों का रूपक
कैसा दिखता होगा आज का रावण? आज सामाजिक बुराई की सबसे सटीक उपमा किससे दी जा सकती है? अपने समाज की नई स्थिति को समझने के लिए, उसमें बन रहे नए किस्म के नागरिकों की पहचान को परखने के लिए हमने कुछ अध्ययनों को देखा और कुछ जानकारों से विस्तार से बात की। आइए, पहले कुछ अध्ययनों को देखते हैं।
2023 में प्रकाशित एक अध्ययन ने सोशल मीडिया, पूर्वाग्रहों की पुष्टि और विचारों के ध्रुवीकरण के बीच संबंध का अध्ययन किया था। इसमें पाया गया कि डिजिटल वातावरण में व्यक्ति पहले से मौजूद अपनी धारणाओं के अनुरूप ही सूचनाओं को चुन और समझ सकता है। इससे अलग-अलग विचार समूहों के बीच दूरी और ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।
2024 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन 170 विद्यार्थियों पर किया गया जिसमें पुष्टि पूर्वाग्रह, असहमति को सहन करने की क्षमता और निर्णय लेने की प्रक्रिया के बीच संबंधों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पूर्वाग्रह की पुष्टि का संबंध असहमति के प्रति कम सहनशीलता और निर्णय लेने की क्षमता पर उसके प्रभाव से पाया गया। यह अध्ययन सीमित संख्या में विद्यार्थियों पर आधारित था, इसलिए इसके निष्कर्षों को सीधे पूरे समाज पर लागू नहीं किया जा सकता।
2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में भारत के संदर्भ में गलत सूचना और सामाजिक विभाजन के संबंध को परखा गया। पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद करीब 2900 लोगों पर किए गए प्रयोग में प्रतिभागियों के एक समूह को ऐसी गलत सूचना दिखाई गई जिसमें धार्मिक पहचान से जुड़ा खतरा बताया गया था। अध्ययन में यह पाया गया कि ऐसी गलत सूचना देखने के बाद दूसरे समूह के प्रति अधिक नकारात्मक रवैया पैदा हुआ था। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि गलत सूचना सामाजिक विभाजन को हवा दे सकती है और अपने समूह तथा पराये समूह के बीच की दूरी को और बढ़ा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इस अध्ययन का महत्त्व इसलिए है कि यह केवल यह नहीं पूछता कि लोग गलत सूचना को सच मानते हैं या नहीं, बल्कि यह देखता है कि गलत सूचना किसी व्यक्ति के दूसरे समूह के प्रति भावनात्मक रवैये को कैसे बदल सकती है। यानी संदेश का असर हमेशा इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह तथ्यात्मक रूप से सही है या गलत। कभी-कभी संदेश खुद किसी समूह के बारे में हमारे भावनात्मक रवैये को प्रभावित कर सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सोशल मीडिया ही हिंसा या ध्रुवीकरण का अकेला कारण है। अफवाह, सामुदायिक तनाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण और भीड़ की हिंसा सोशल मीडिया से बहुत पहले मौजूद रही है। सोशल मीडिया ने मुख्य रूप से सूचना के प्रसार की गति, पहुंच और स्वरूप को बदल दिया है। उसके पीछे इस मीडिया का व्यावसायिक उद्देश्य है। जैसा कि एआइ और भाषा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम कर रहे विशेषज्ञ बालेंदु शर्मा दाधीच समझाते हैं- ‘अगर आपको निरंतर एक ही तरह की, एक ही पक्ष की सामग्री विविध रूपों में और अलग-अलग आयामों में दिखाई जाए तो धीरे-धीरे आपके विचार उसी दिशा में झुकाव महसूस कर सकते हैं जिधर वह सामग्री इशारा कर रही है। इसके पीछे अल्गोरिथम की भूमिका व्यावसायिक है, लेकिन अल्गोरिथम का दोहन करने वालों की भूमिका राजनीतिक, व्यावसायिक या कुछ और हो सकती है।‘

समस्या केवल तकनीक नहीं है। यह उस बाजार के डिजाइन की भी समस्या है जिसमें हमें अपने आप झोंक दिया गया है। कॉरपोरेट व्यवस्था चाहती है कि लोग जैसा वे चाहते हैं वैसा सोचें, वैसा करें, वैसा खाएं और वैसा पहनें।
- सूर्यनाथ सिंह, पत्रकार और कथाकार
अलगोरिथम के प्रभाव से बनने वाली भीड़ के व्यवहार को समझाते हुए दैनिक जनसत्ता के पूर्व वरिष्ठ सहायक संपादक और कथाकार सूर्यनाथ सिंह कहते हैं, ‘जैसे एक कुत्ता भौंकता है तो पूरा झुंड उसके साथ खड़ा हो जाता है और काटने दौड़ पड़ता है, बिलकुल वही स्थिति है। लोग बिल्कुल जॉम्बी की तरह चेतनाशून्य होकर एक-दूसरे के पीछे भाग रहे हैं। अगर भीड़ में तर्कशीलता बची होती तो ऐसी हिंसा नहीं होती। इसी तरह तो जॉम्बी तैयार होते हैं।’
दाधीच इस बात की पुष्टि करते हैं, ‘मेरी नजर में सबसे बड़ा असर गहराई से सोचने, तर्क-वितर्क करने, स्मृति के भीतर झांकने और मंथन करने की क्षमता का क्षरण है। हमारे मस्तिष्क को जब परिश्रम के बिना बाहर से परिणाम उपलब्ध होने लगें तो वह धीरे-धीरे उन्हीं के लिहाज से अनुकूलित होने लगता है।’ वह बताते हैं कि अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के शोध में इस बात की पुष्टि हुई है कि लोग मेहनत, शोध, तर्क-वितर्क तथा सभी संबद्ध पक्षों को संज्ञान में लिए बिना जल्दी से अंतिम परिणाम पर आने की जल्दी में रहते हैं। यह प्रवृत्ति स्वयं उनके लिए तथा समाज के लिए भी नुकसानदेह हो सकती है।
सिंह के अनुसार, ‘हमें लगता है कि यह सुविधा है, हम तरक्की कर गए हैं। सूचना तंत्र है, मोबाइल है, फुल स्पीड डेटा मिल रहा है, लेकिन समस्या केवल तकनीक नहीं है। यह उस बाजार के डिजाइन की भी समस्या है जिसमें हमें अपने आप झोंक दिया गया है। कॉरपोरेट व्यवस्था चाहती है कि लोग जैसा वे चाहते हैं वैसा सोचें, वैसा करें, वैसा खाएं और वैसा पहनें।‘
वे शहरों के बदलते स्वरूप को भी इसी बदलाव से जोड़ते हुए कहते हैं, ‘आप जयपुर चले जाइए। क्या जयपुर वही रह गया है जो पहले था? जो जयपुर रह गया है, वही बनारस भी है, वही इलाहाबाद भी है। हमारा छोटा-सा कस्बा भी वैसा ही हो गया है। आप रील देखते हैं, फिर दूसरे लोग उसी की नकल पर रील बनाते हैं। उसी नकल पर फिल्में बनती हैं। पूरी फिल्मों का मिजाज देख लीजिए, पूरे साहित्य का मिजाज देख लीजिए, सब एकरंगी होता जा रहा है। हम जिस सूचना तंत्र को गले लगाए फिर रहे हैं, दरअसल वह हमें जॉम्बी बना रहा है।‘
जॉम्बी: भारतीय समाज में पश्चिमी मुहावरा
‘जॉम्बी’ सुनकर ऐसा लगता है कि फिक्शन की परिकल्पना और हमारी दिनचर्या के सच के बीच मौजूद बारीक लकीर कहीं मिटती तो नहीं जा रही? क्या हमारा समाज वाकई जॉम्बीकरण के अदृश्य संक्रमण की चपेट में आ चुका है? या फिर, अपनी सामाजिक स्थिति के संदर्भ में प्रयोग से पहले हमारे यहां जॉम्बी के स्थानीय अर्थ को खंगालने की जरूरत है?
पश्चिम की फिल्मों की मानें, तो जॉम्बी की कल्पना में एक ऐसा शरीर हमारे सामने आता है जो चलता है, दूसरों के पीछे जाता है, प्रतिक्रिया करता है लेकिन उसके भीतर वह चेतना नहीं होती जिसे हम मनुष्य होने की बुनियादी पहचान मानते हैं। पर क्या जॉम्बी को केवल हॉरर फिल्मों के मरे हुए लोगों के रूप में देखना पर्याप्त है? या फिर, सिंह के अनुसार यह उस सामाजिक स्थिति को समझने का एक रूपक बन सकता है जहां एक जीवित मनुष्य धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र सोच, संवेदना और निर्णय लेने की क्षमता खोने लगता है?
दाधीच कहते हैं कि ‘मैं इस डिजिटल व्यवहार को ऑटो पायलट के रूप में देखने के बजाय कन्फर्मेशन बायस के रूप में देखना अधिक अनुकूल मानता हूं क्योंकि ऑटो पायलट शब्द में विवेक तथा तार्किकता क्षीण दिखाई देते हैं जबकि इन गतिविधियों में उनकी कुछ न कुछ भूमिका अवश्य होती है।’
भारतीय जॉम्बी संस्कृति और उसके बदलते सामाजिक अर्थों पर अध्ययन करने वाले नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर और साइंस फिक्शन लेखक समी अहमद खान का मानना है कि जॉम्बी एक साहित्यिक तकनीक, सामाजिक कटाक्ष और सोचने-देखने का नजरिया बनकर कैरेबियन, अफ्रीका, जापान या ‘ऐंग्लोफोन वेस्ट’ से हमारे पास आता है, लेकिन भारत में आकर उसका चरित्र, परिभाषाएं, प्रसंग और परिप्रेक्ष्य बदल जाते हैं। भारत की कथाएं केवल जॉम्बी को इस्तेमाल नहीं करतीं, बल्कि उसका पूरा ढांचा, अर्थ और परिप्रेक्ष्य बदल देती हैं।
भारत विविधताओं में एकता का देश है। अलग-अलग धर्म और पंथों के रीति-रिवाज भी अलग हैं। शायद इसीलिए यहां जॉम्बी, भूत, प्रेत, जिन्न सब हमारी लोकप्रिय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। लिहाजा, जॉम्बी यहां किसी बिल्कुल नए डर के रूप में नहीं आता।
- समी अहमद खान, सहायक प्रोफेसर, जेएनयू

भारतीय सांस्कृतिक कल्पना में जॉम्बी इन पारंपरिक ‘मृतक’ या ‘अलौकिक’ पात्रों से किस तरह अलग है, इसे स्पष्ट करते हुए खान कहते हैं, ‘जॉम्बी बनने के लिए पार्थिव शरीर की आवश्यकता है। जब शरीर ही विलीन हो गया तो जॉम्बी किसमें आएगा और कैसे बनेगा? इसीलिए शायद भारत में भूत और आत्माएं ज्यादा पाई जाती हैं, यानी ऐसी कल्पना जिसमें हमेशा शरीर की आवश्यकता नहीं होती। भारत विविधताओं में एकता का देश है। अलग-अलग धर्म और पंथों के रीति-रिवाज भी अलग हैं। शायद इसीलिए यहां जॉम्बी, भूत, प्रेत, जिन्न सब हमारी लोकप्रिय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। लिहाजा, जॉम्बी यहां किसी बिल्कुल नए डर के रूप में नहीं आता।’
सोशल मीडिया पर जॉम्बी-केंद्रित चर्चाओं में उस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दिखाई देती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भारत में जॉम्बी प्रलय आया तो अमेरिकी फिल्मों की तरह हर व्यक्ति के पास हथियार नहीं होंगे इसलिए यहां उससे बचना मुश्किल होगा। कुछ लोग इसका उलटा तर्क देते हैं कि भारत में दाह संस्कार की परंपरा होने के कारण कब्रों से मृतकों के उठने वाली हॉलीवुड शैली की जॉम्बी समस्या पैदा ही नहीं होगी। ये टिप्पणियां वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं हैं, लेकिन इनसे यह जरूर पता चलता है कि जॉम्बी की कल्पना अलग-अलग समाजों में अपनी स्थानीय परिस्थितियों से जुड़कर नए अर्थ पैदा करती है।
क्या आज का दौर इस प्रतीक को प्रासंगिक बना रहा है? खान कहते हैं, ‘बिल्कुल। जॉम्बी, डिस्टोपिया और प्रलय जैसी कहानियों की लोकप्रियता आधुनिक समाज की असुरक्षा, भय या बेचैनी को व्यक्त करती हैं। हमारी कथाएं हमेशा हमारे सपनों और भय का मिश्रण रही हैं। आज का दौर वैश्विक तौर पर युद्ध, नफरत, जलवायु में हो रहे बदलाव, किल्लतों और परेशानियों का है। करें हम और भुगते हमारा आने वाला कल? जाहिर सी बात है कि नई पीढ़ी को एक नया कल बनाना है, जिसमें हम अपने रंग, नस्ल, लिंग, धर्म और जाति से ऊपर उठकर एक इंसान बन पाएं। वरना हम रहेंगे जॉम्बी-भेदभाव, नफरत और हिंसा की भेड़चाल चलते हुए।‘
आर्थिक और समाजशास्त्रीय पहलू
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर जॉम्बी को केवल सूचना और राजनीति के प्रतीक तक सीमित कर दिया जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाती है। मनुष्य के सामाजिक व्यवहार को उसकी आर्थिक स्थिति से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
नब्बे के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के साथ काम और श्रम की दुनिया में लगातार बदलाव आया। पिछले एक दशक में डिजिटलीकरण, नई तकनीक और काम के बदलते स्वरूप ने इस प्रक्रिया को और तेज किया है। अर्थशास्त्री, वित्त विशेषज्ञ और आर्थिक विषयों पर कई दशकों से लिखते आ रहे जयंतीलाल भंडारी बताते हैं कि इधर बीच श्रम क्षेत्र में बहुत तेजी से बदलाव आया है। एक तरफ काम का स्वरूप बदल रहा है, दूसरी तरफ रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के बीच दूरी बनी हुई है। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न केवल श्रम नीति का प्रश्न नहीं रहता। यह परिवार, सामाजिक जीवन और भविष्य की सुरक्षा का भी प्रश्न बन जाता है।
अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार पिछले कुछ दशकों में पूंजीवाद और श्रम की दुनिया में आए बदलावों को इसी बड़े संदर्भ में देखते हैं। उनके मुताबिक पूंजीवाद का स्वरूप लगातार बदल रहा है और इसे समझना आसान नहीं है। वे पूछते हैं, ‘आपने कहीं और नहीं देखा कि जब महामारी आई तो लाखों-करोड़ों लोग शहरों से गांवों की ओर पलायन करने लगे। यह दृश्य न चीन में दिखाई दिया, न ब्राजील में और न ही दक्षिण अफ्रीका में। यह केवल हमारे देश में दिखाई दिया। यह इस बात का संकेत है कि हमारा असंगठित क्षेत्र कितनी खराब स्थिति में है।‘
पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया? अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का व्याख्यान
क्या ऐसी आर्थिक असुरक्षा में काम करने वाला श्रमिक भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के भीतर किसी तरह की जॉम्बी स्थिति का अनुभव कर सकता है? सूर्यनाथ सिंह के लिए इस सवाल का संबंध बाजार से भी है। वह कहते हैं कि जब व्यक्ति नागरिक से उपभोक्ता में बदलता है तो उसकी पहचान का एक हिस्सा उसकी खरीदने की क्षमता से तय होने लगता है। वह क्या खाता है, क्या पहनता है, कौन सा फोन रखता है, कौन सी कार चलाता है और कौन सा कंटेंट देखता है, इन सबका संबंध सामाजिक पहचान से जुडऩे लगता है। शिक्षा और स्वास्थ्य भी बाजार का हिस्सा बनते हैं तो परिवारों पर खर्च का दबाव बढ़ता है। ऐसी स्थिति में आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक अलगाव एक-दूसरे से जाकर जुड़ जाते हैं।
आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक अलगाव में पड़ा आदमी जॉम्बी स्थिति का शिकार कैसे बन सकता है, इसे हनुमानगढ़ के एनएम पीजी कॉलेज में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफेसर डॉ. अर्चना गोदारा विस्तार से समझाती हैं। वे बताती हैं कि पहले व्यक्ति की पहचान काफी हद तक परिवार, पड़ोस, गांव, जातीय या सामुदायिक संबंधों, पेशे और स्थानीय संस्थाओं से निर्मित होती थी। अब इन संबंधों में बदलाव आया है। रोजगार की असुरक्षा, प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और सामाजिक अलगाव ने व्यक्ति को अधिक आत्मनिर्भर तो बनाया है, लेकिन कई बार उसे असुरक्षित और अकेला भी किया है। ऐसी स्थिति में डिजिटल माध्यम उसे तुरंत कोई समूह, विचार या पहचान उपलब्ध करा देते हैं।
डॉ. अर्चना के मुताबिक इसीलिए तकनीक को अकेले व्यक्ति को बदलने वाला कारक मानना ठीक नहीं होगा। तकनीक पहले से मौजूद सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के साथ मिलकर व्यवहार को प्रभावित करती है। वह कहती हैं कि जब परिवार, पड़ोस, गांव, श्रमिक संगठन और दूसरे सामुदायिक संबंध कमजोर होते हैं तो व्यक्ति के पास अपने अनुभव साझा करने और अपनी पहचान महसूस करने के पारंपरिक मंच भी कम हो जाते हैं। डिजिटल समूह ऐसी स्थिति में एक नई सामाजिक जगह उपलब्ध कराते हैं। व्यक्ति समान विचार वाले लोगों के समूह में जाकर यह महसूस कर सकता है कि वह अकेला नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब समूह से जुड़ाव धीरे-धीरे स्वतंत्र विचार की जगह समूह की स्वीकृति पर निर्भरता में बदल जाता है।

हर सामूहिक व्यवहार को ‘जॉम्बीकरण’ नहीं कहा जा सकता। समाज में सामूहिकता आवश्यक है। यह रूपक तब अधिक उपयोगी है जब सामूहिकता व्यक्ति के विवेक और असहमति की क्षमता को लगभग निष्क्रिय करने लगे।
- डॉ. अर्चना गोदारा, समाजशास्त्री
दाधीच के मुताबिक मामला केवल समूह की स्वीकृति का नहीं है, ‘अपनी पसंद या मत के कंटेंट को आगे बढ़ाने के कई मकसद हो सकते हैं। इनमें दूसरों के मत को प्रभावित करने का अप्रत्यक्ष प्रयास, अपने दावों तथा विचारों का बिना मांगे प्रमाण पेश करके अपने मत को सुदृढ़ करने की कोशिश, किसी अनूठे कंटेंट की ओर आकर्षित करने की कोशिश, दूसरों को ‘’सही तस्वीर’’ दिखाने का अपने आप ओढ़ा हुआ उत्तरदायित्व और खुद को लोगों से जोड़े रखने का आसान तरीका शामिल हैं।‘
वह कहते हैं, ‘बहुत से लोग झूठी खबरों को इसलिए साझा नहीं करते कि वे उन्हें सच मानते हैं बल्कि अपनी बात और मत की पुष्टि के रूप में करते हैं, भले ही उन्हें पता है कि यह गलत है। इसके पीछे कन्फर्मेशन बायस काम करता है। जो बात हमारी मान्यता से मेल खाती है, उसे जांचने की जरूरत हमें कम महसूस होती है और हम उसके प्रति लचीला तथा उदार रुख अपना लेते हैं।’
डॉ. अर्चना के अनुसार समाजशास्त्र यह देखता है कि लोग एक जैसा सोचने और व्यवहार करने के लिए प्रेरित क्यों होते हैं और इसके पीछे कौन सी सामाजिक संरचनाएं काम कर रही हैं। अनुकरण, सामाजिक दबाव, समूह की स्वीकृति, प्रतिष्ठा, भय, आर्थिक हित और सामाजिक मानदंड व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। डिजिटल माध्यम इस प्रक्रिया को और तेज करते हैं।
इस संदर्भ में गोदारा भी ‘जॉम्बीकरण’ को एक कारगर सामाजिक रूपक के रूप में देखती हैं। उनके अनुसार इसका अर्थ किसी जैविक स्थिति से नहीं बल्कि ऐसी सामाजिक अवस्था से होगा जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्र सोच, आलोचनात्मक विवेक और संवेदनशील प्रतिक्रिया धीरे-धीरे कमजोर होती जाए। बिना विचार किए सूचना स्वीकार करना, असहमति सुनने की क्षमता कम होना, समूह से अलग राय रखने में डर या असहजता महसूस करना, किसी समूह, बाजार या सूचना तंत्र द्वारा बनाए गए व्यवहार को स्वत: दोहराना और दूसरों के दुख के प्रति संवेदनशीलता कम होना इसके संकेत हो सकते हैं।
इसी के साथ वे यह भी मानती हैं कि हर सामूहिक व्यवहार को ‘जॉम्बीकरण’ नहीं कहा जा सकता। समाज में सामूहिकता आवश्यक है। यह रूपक तब अधिक उपयोगी है जब सामूहिकता व्यक्ति के विवेक और असहमति की क्षमता को लगभग निष्क्रिय करने लगे। उनके अनुसार, ‘जॉम्बी’ आज की डिजिटल दुनिया की पूरी तरह नई घटना नहीं है। मनुष्य हमेशा से परिवार, धर्म, जाति, समुदाय, राजनीतिक और दूसरे संगठनों तथा सामाजिक मानदंडों से प्रभावित होता रहा है। नया मुख्यत: माध्यम और उसकी गति है। पहले किसी विचार या व्यवहार के फैलने में समय लगता था और उसका प्रभाव अपेक्षाकृत स्थानीय हो सकता था। अब डिजिटल माध्यम किसी सूचना, प्रवृत्ति या सामूहिक प्रतिक्रिया को बहुत कम समय में विशाल संख्या में लोगों तक पहुंचा सकते हैं।
यानी, आज का ‘जॉम्बी’ पूरी तरह नया सामाजिक प्राणी नहीं है। इसे पुरानी सामूहिक मानसिकता और नई डिजिटल-बाजार व्यवस्था के मेल से पैदा हुए नए रूप के तौर पर समझना अधिक उचित होगा। फर्क इतना है कि पहले व्यक्ति समूह से प्रभावित होता था, जबकि आज समूह हमारे हाथ में मौजूद स्क्रीन के भीतर भी लगातार सक्रिय है।
समाज कैसे जॉम्बी बनता है?
‘जॉम्बी’ यदि पूरी तरह नया सामाजिक प्राणी नहीं है, तो वह पाया कहां जाता है? जिस तरह हमने रावण को अपने बाहर स्थित बुराई के प्रतीक के तौर पर मिथकों में स्थापित किया, क्या जॉम्बी भी हमसे बाहर कहीं मौजूद है? या फिर उसके कुछ रूप हमारे भीतर भी मौजूद हैं? यहीं पर भारतीय सामाजिक परंपरा में बुराई के शाश्वत प्रतीक को बदलने की जरूरत आन पड़ती है।
गांधीजी ने सात सामाजिक पाप गिनाए थे- सिद्धांतों के बिना राजनीति, परिश्रम के बिना संपत्ति, अंतरात्मा के बिना आनंद, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना वाणिज्य, मानवता के बिना विज्ञान और त्याग के बिना पूजा। इन सात सामाजिक पापों की यह सूची गांधीजी ने 22 अक्टूबर 1925 के यंग इंडिया में प्रकाशित की थी। गांधीजी के अनुसार नैतिकता, अर्थशास्त्र, राजनीति और धर्म अलग-अलग इकाइयां हैं, पर सबका उद्देश्य सर्वोदय ही है। आज की दुनिया के हिसाब से अगर गांधीजी के इस सूत्र पर चला जाए, तो तकनीक और प्रौद्योगिकी के प्रभावों के चलते सामाजिक पापों की संख्या और बढ़ सकती है।
इस संदर्भ में पाउला रिचमैन और रुस्तम भरूचा द्वारा रामलीला की परंपराओं पर संपादित एक किताब परफॉर्मिंग द रामायण ट्रैडिशन बहुत बारीकी के साथ रावण के दस सिर के अलग-अलग अर्थ बताते हुए कहती है कि हम समकालीन सामाजिक प्रवृत्तियों को उनके माध्यम से समझ सकते हैं। रावण के दस सिर को समाज के जॉम्बीकरण के दस क्रमिक चरणों के रूप में दर्शाने की एक दिलचस्प पद्धति यहां से निकलती है, जिसमें गांधीजी के गिनाए सामाजिक पाप शामिल हैं।

रावण का पहला सिर विवेक के बिना समझदारी का प्रतीक है। दूसरा सिर जागरूकता के बिना ध्यानाकर्षण का प्रतीक है, जहां हम रोजाना सैकड़ों छवियां, वीडियो और रील तो देखते हैं लेकिन कहीं टिक नहीं पाते, लगातार बदलती दृश्यता के चक्कर में कुछ भी दिमाग में घुस नहीं पाता। तीसरा सिर करुणा के बिना भावना को दर्शाता है, जहां हरेक पीड़ा या सुख पर हम क्लिक कर के इमोजी बना देते हैं लेकिन हमारी भावना कभी भी सामूहिक एकजुटता, किसी के भौतिक सहयोग या जिम्मेदारी में नहीं बदलती। चौथा सिर इंसानियत के बिना पहचान का प्रतीक है जहां नागरिकों के लिए उनका धर्म, राष्ट्रीयता, नस्ल, जाति या राजनैतिक सम्बद्धता की पहचान सबसे ऊपर हो जाती है, लेकिन उसमें इंसानियत का अभाव रहता है। पांचवां सिर गैर-जिम्मेदार अभिव्यक्ति को दर्शाता है, जहां कुछ छापने, प्रसारित करने या फॉरवर्ड करने की आजादी उसे संदर्भित करने, जांचने या उससे हुए नुकसान की जिम्मेदारी लेने की बाध्यता से मुक्त होती है।
रावण का छठवां सिर जवाबदेहीमुक्त ताकत का प्रतीक है। सातवां सिर आत्मचिंतनहीन दुहराव का प्रतीक है। आठवां सिर असीम कामनाओं और चाहों को दर्शाता है। नौवां सिर कागजी नैतिकता को दर्शाता है, जहां नैतिक आचरण गायब होता है और केवल नैतिकता के बखान के आधार पर दूसरे के ऊपर अपनी श्रेष्ठता दर्शायी जाती है। यहां नैतिक साहस का अभाव होता है। आखिरी और दसवां सिर संपर्क या जुड़ाव का प्रतीक है- ऐसा जुड़ाव जो कोई समुदाय नहीं बनाता। यहां हम हर पल दूसरों के लिए डिटिल पहुंच के भीतर तो होते हैं, लेकिन संबंध बनाने, असहमतियों को सुलझाने तथा सामूहिक जीवन कायम करने के टिकाऊ और कठिन चक्करों में नहीं पड़ते।
जाहिर है, रावण के ये दस प्रतीकात्मक सिर उसके मिथकीय अर्थों से पुष्ट नहीं हैं। यह तो महज एक क्रमिक विकास है जिसमें एक समाज बाहर से तो भला-चंगा और सक्रिय दिखता है लेकिन नैतिक स्तर पर खुद को दुरुस्त करने की उसकी क्षमता दिन-ब-दिन घटते चली जाती है। यही पाप और बुराइयां मिलकर समाज का ‘जॉम्बीकरण’ करती हैं। यानी जॉम्बी का प्रतीक अब फिल्म और सोशल मीडिया से बाहर निकालकर हमारे समाज में साकार हो चुका है।
इसका असली प्रकोप तब पैदा होता है जब किसी सूचना का असर मोबाइल की स्क्रीन से निकलकर किसी दूसरे इंसान के शरीर पर पड़ता है। बीबीसी ने 2018 में भारत में वॉट्सऐप और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों तथा उनसे जुड़ी भीड़ की हिंसा का विश्लेषण किया था। उसने फरवरी 2014 से जुलाई 2018 के बीच प्रकाशित तीन करोड़ से अधिक अंग्रेजी भाषा की खबरों का विश्लेषण किया और करीब 6,000 घटनाओं को अलग कर दूसरी विश्वसनीय रिपोर्टों से क्रॉसचेक किया। उसके अनुसार दो वर्षों में 23 घटनाओं में कम से कम 31 लोग मारे गए थे। ये घटनाएं 12 राज्यों में हुई थीं। इन घटनाओं में बच्चों के अपहरण की अफवाहें विशेष रूप से तेजी से फैलीं। कई बार कोई वीडियो वास्तविक होता था लेकिन उसके साथ लगाया गया दावा झूठा होता था। लोग संदेश किसी अजनबी से नहीं, अपने दोस्त, रिश्तेदार या परिचित के वॉट्सऐप समूह से प्राप्त करते थे। भरोसे के इस नेटवर्क के कारण संदेश को सच मान लेने की संभावना बढ़ जाती थी।
ऐसी ही अफवाहों के बीच 2018 में कर्नाटक के बीदर की एक घटना में सॉफ्टवेयर इंजीनियर मोहम्मद आजम की हत्या हुई। बच्चों के अपहरण से संबंधित संदेश और वीडियो प्रसारित हो रहे थे। एक वीडियो को इस दावे के साथ फैलाया गया कि उसमें बच्चा उठाने वाले लोग दिखाई दे रहे हैं। आजम और उनके साथियों को भीड़ ने घेर लिया और हमला किया। आजम की मौत हो गई। बाद की पड़ताल में जिस वीडियो को स्थानीय घटना बताया जा रहा था, वह दरअसल पाकिस्तान के एक बाल सुरक्षा अभियान का हिस्सा निकला था।
ऐसी घटनाओं से जॉम्बी का प्रतीक एक अलग अर्थ लेने लगता है। जॉम्बी फिल्मों में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक संक्रमण फैलता है और कुछ ही समय में पूरा झुंड बदल जाता है। वास्तविक दुनिया में कोई काल्पनिक वायरस नहीं फैल रहा होता है, लेकिन एक संदेश, एक अफवाह और एक डर जरूर फैल जाता है। एक व्यक्ति ने दूसरे पर विश्वास करता है, दूसरा तीसरे को बताता है और देखते-देखते भीड़ एक अनजान व्यक्ति को खतरा मान लेती है।
जिन लोगों को सच पहले से पता होता है वे भी सूचनाओं के निरंतर दोहराव से प्रभावित हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर रीपोस्ट, मीम, हैशटैग और अलगोरिथम के कारण ऐसा दोहराव कई गुना बढ़ जाता है। जब वही बात अलग-अलग लोगों से आती दिखती है, तो उसे ’सामान्य’ या ’सर्वमान्य’ मान लेने की भावना और मजबूत होती है।
- बालेन्दु शर्मा दाधीच, भाषा प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ

इस प्रक्रिया के मोटे तौर से पांच चरण होते हैं। पहला चरण ध्यानाकर्षण का है, जब एक व्यक्ति लगातार नोटिफिकेशन, सूचना, मनोरंजन, छवियों और भावनात्मक संदेशों की बाढ़ में घिर जाता है। इस बमबारी की रफ्तार इतनी तेज होती है और दुहराव ऐसा, कि व्यक्ति को सोचने-समझने और संदेह करने का समय नहीं मिलता। उसकी आत्मचिंतन की क्षमता चली जाती है। यह दूसरा चरण है। जैसे ही ठहर कर सोचने की क्षमता जाती है, वह अपने न्याय निर्णय को दूसरे के हवाले कर देता है। यह दूसरा कोई भी हो सकता है- उसका अपना समूह, कोई नेता, इनफ्लुएंसर, या अलगोरिथम। यह तीसरा चरण है जब उसे कोई दूसरा बताता है कि क्या सोचना है और कैसे प्रतिक्रिया देनी है। अब वह गिरफ्त में आ चुका है। चौथा चरण क्रूरता और हिंसा को उसके मन में सामान्य बनाने का होता है। लगातार अपमान, गाली-गलौज, उदासीनता किसी ऐसे कृत्य को व्यक्ति के लिए सामान्य बना देती है जो शायद पहली बार उसके लिए असहज रहा हो।
अंतिम चरण इस व्यक्ति के नैतिक स्तर पर यांत्रिक हो जाने का है। वह सोचेगा भी, प्रतिक्रिया भी करेगा, लेकिन सब कुछ उसकी पहले की गई कार्रवाई का दुहराव होगा, बाहर से निर्देशित होगा और बाहरी से वफादारी निभाने के लिहाज से होगा। उसका स्वतंत्र नैतिक निर्णय अब जा चुका है। यानी, रावण से जॉम्बी का संक्रमण पूरा हो चुका है। अब इस बात की पहचान ही मुश्किल है कि क्या बुरा है- व्यक्ति, समाज या उसे चलाने वाली प्रक्रियाएं।
दाधीच यहां जोसेफ गोयबल्स के इस कथन को उद्धृत करते हैं कि सौ बार दोहराये जाने पर झूठ भी सच दिखने लगता है। वे बताते हैं कि कुछ शोधों में यह पता चला है कि जिन लोगों को सच पहले से पता होता है वे भी सूचनाओं के निरंतर दोहराव से प्रभावित हो जाते हैं, ‘सोशल मीडिया पर रीपोस्ट, मीम, हैशटैग और अलगोरिथम के कारण ऐसा दोहराव कई गुना बढ़ जाता है। जब वही बात अलग-अलग लोगों से आती दिखती है, तो उसे ‘’सामान्य’’ या ‘’सर्वमान्य’’ मान लेने की भावना और मजबूत होती है।’
जॉम्बी-संक्रमण की रफ्तार और अनुभव
सामाजिक ‘जॉम्बीकरण’ की रफ्तार को समझने के लिए कुछ आंकड़ों को देखना जरूरी है। लोगों के निजी और पारिवारिक अनुभवों से भी कुछ बातें निकल कर आई हैं जो जॉम्बी के रूपक को पुष्ट करती हैं।
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आइएएमएआइ) और कांतार की ‘इंटरनेट इन इंडिया 2025’ रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भारत में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 95.8 करोड़ पहुंच गई। एक साल में इसमें करीब 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या शहरी भारत की तुलना में कहीं तेज गति से बढ़ रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के 2025 के ‘कॉम्प्रिहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे: टेलीकॉम’ के अनुसार देश के 85.5 प्रतिशत घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन है और 86.3 प्रतिशत घरों में घर के भीतर इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। 15 से 29 वर्ष की उम्र के 97.1 प्रतिशत लोगों के लिए डिजिटल दुनिया अब घर के बाहर की कोई अलग दुनिया नहीं रही, वह परिवार के भीतर, रोजमर्रा के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है।
इन आंकड़ों का असर लोगों से बातचीत में दिखता है। हनुमानगढ़ के किसान भगवान सिंह खुड़ी कहते हैं कि पहले गांव में कोई बात होती थी तो लोग एक-दूसरे से पूछते थे कि असल बात क्या है। अब मोबाइल पर कोई मैसेज आ जाता है और लोग उसे सच मान लेते हैं। कई बार पता चलता है कि बात गलत थी, लेकिन तब तक वह दस गांवों में पहुंच चुकी होती है। आदमी अब सोचने से पहले प्रतिक्रिया देने लगा है। यहीं के नौकरीपेशा युवा पदमेश सिहाग कहते हैं, ‘हमारे पास पहले से ज्यादा सुविधाएं हैं लेकिन समय जैसे कम हो गया है। घर में चार लोग बैठे हैं तो चारों के हाथ में मोबाइल है। बातचीत कम हो गई है। आदमी काम करता है, पैसा कमाता है और फिर वही पैसा चीजें खरीदने में चला जाता है। कभी-कभी लगता है कि हम अपनी जरूरत के लिए काम कर रहे हैं या बाजार की जरूरत के लिए।‘
सूर्यनाथ के अनुसार यह बदलाव केवल सूचना तक सीमित नहीं है। वे कहते हैं, ‘हमारी सत्ता व्यक्ति के रूप में रह नहीं गई है। हम कंज्यूमर हो गए हैं। सौ रुपया लगाकर चार सौ रुपये कमाने की प्रवृत्ति बढ़ी है।’ वे भारतीय ज्ञान परंपरा में मौजूद तर्क की संस्कृति की ओर भी ध्यान दिलाते हैं। उनके अनुसार सवाल पूछना और किसी बात को तर्क के आधार पर नकारना हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है, जो अब खत्म हो गया है। शिक्षा व्यवस्था में रटने की प्रवृत्ति को भी वे इसी संकट से जोड़ते हैं। उनके अनुसार जब सोचने और तर्क करने की क्षमता कम होती जाती है तो ‘आप गोभी खाएं या चिकन, बराबर ही है। उनमें कोई भेद नहीं कर पाएंगे।’

सिंह इसे अलगाव की अवधारणा से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि जब लगाव कम होगा तो आप दूसरे को एक वस्तु के रूप में देखने लगेंगे। उसके प्रति संवेदना नहीं रहेगी। सोशल मीडिया इस स्थिति को और जटिल बना सकता है। ऐसा माहौल बन रहा है जहां व्यक्ति चलता-फिरता है, परिवार में मौजूद है, काम करता है, बातचीत भी करता है लेकिन भावनात्मक रूप से दूसरे लोगों से उसका संबंध कमजोर होता जाता है। हनुमानगढ़ जिले के संगरिया के भूरा सिंह कहते हैं, ‘पहले कस्बे में किसी के घर परेशानी होती थी तो लोग अपने आप पहुंच जाते थे। अब पड़ोसी का हाल भी मोबाइल से पता चलता है। परिवार में भी लोग अपनी-अपनी दुनिया में हैं। आज आदमी के पास लोगों की संख्या बहुत है, लेकिन अपनेपन वाले लोग कम होते जा रहे हैं।’
एक मीडिया रिपोर्ट में मनोचिकित्सकों और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के हवाले से सोशल मीडिया से जुड़े दंपत्ति विवादों में वृद्धि की बात सामने आई है। रिपोर्ट में भोपाल के सरकारी अस्पतालों में दर्ज दंपत्ति विवादों और सोशल मीडिया के इस्तेमाल के बीच देखे गए संबंधों का उल्लेख किया गया है। विशेषज्ञों ने तुलना, लाइक, कमेंट की चिंता और साथी की ऑनलाइन गतिविधियों को लेकर असुरक्षा जैसे कारणों की ओर ध्यान दिलाया है। विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह की रिपोर्ट को पूरे समाज पर लागू होने वाला वैज्ञानिक निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा, लेकिन यह उस बदलाव की ओर संकेत करती है जिसमें डिजिटल स्क्रीन निजी संबंधों के बीच प्रवेश कर चुकी है।
इसी तरह, वॉट्सऐप समूहों ने परिवारों को एक साथ जोड़ना बेशक आसान किया है, लेकिन उसी समूह में राजनीति, जाति, धर्म और राष्ट्रवाद पर लगातार संदेश आने लगें तो वही मंच मतभेदों का मैदान भी बन सकता है। एक सदस्य किसी संदेश को आगे बढ़ाता है। दूसरा पूछता है कि इसका स्रोत क्या है। तीसरा उसे अपने विश्वास या पहचान पर हमला समझ लेता है। चौथा उसी संदेश को आगे किसी और समूह में भेज देता है। धीरे-धीरे विवाद संदेश से निकलकर व्यक्ति तक पहुंच जाता है। अब समस्या यह नहीं रह जाती कि यह बात सही है या गलत। सवाल बन जाता है- आप किस तरफ हैं? सिंह के शब्दों में, ‘जो दलगत कट्टरता लोगों में बैठ गई है वह बहुत खतरनाक है। इसकी वजह से परिवार एकरंगी हो गए हैं।’
आपदा में संक्रमण के दो चेहरे
बॉलीवुड में पटकथा, कहानी और संवाद लेखक रामकुमार सिंह भी जॉम्बी को आधुनिक समाज की नई बीमारी नहीं मानते। वह मानते हैं कि डर तो एक सार्वभौमिक भाव है।
रामकुमार कहते हैं, ‘रियल लाइफ में डर आपके सामने आता है तो हार्मोन्स उससे लडऩे की आपको ताकत देते हैं। हमें पता नहीं चलता, लेकिन वह हमारे लिए जरूरी होता है। वह आपको एक इमोशनल यात्रा पूरी करने देता है। इसीलिए जॉम्बी या जो भी डरावने किरदार हैं, वे लोगों को आकर्षित करते हैं। जो हमारे भीतर की जरूरत है उसे ये किरदार पूरा करते हैं, लेकिन भारत की परंपरागत कहानियों में चूंकि पिशाच, चुड़ैल, आधे इंसान-आधे दानव और आधे जीवित-आधे मृत जैसे कई रूप पहले से मौजूद रहे हैं इसलिए मेरे लिए ‘जॉम्बी’ डर की अगली सीढ़ी भर नहीं है।‘
तो क्या आधुनिक समाज को ‘जॉम्बी’ के रूपक से हम समझ सकते हैं? इस पर रामकुमार कहते हैं, ‘बिल्कुल समझ सकते हैं। जॉम्बी बिहेव इस तरह करता है कि आसपास के लोगों को देखकर रिएक्ट करता है। आप उसी की तरह हो जाओ तो सर्वाइव कर जाओगे। वह रूपक की तरह बिल्कुल इस्तेमाल होगा, लेकिन यह बहुत क्षणिक चीजें हैं। मुझे लगता है कि मानव समाज बहुत लंबे समय तक नफरत के मूल्य में जी नहीं सकता। नफरत व्यक्तिगत रूप से धीरे-धीरे आपको परेशान करना शुरू करती है और आप लडऩा शुरू कर देते हैं। एक समय के बाद आपको मनुष्य होने के नाते अहसास होने लगता है। आप मनुष्य होने के नाते अपने आपको करेक्ट करते हो। इसीलिए हमारे पास हिस्ट्री होती है।’
वे मानते हैं कि बहुत बार लोग अहसास नहीं भी कर पाते। जैसे, इजराइल और फिलिस्तीन की लड़ाई देखकर लगता है कब से ये लड़ रहे हैं और यह सब खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। उनके अनुसार अहसास होने में लगने वाला वक्त ‘पीढ़ियों में भी हो सकता है। ये नहीं कि पंद्रह दिन होगा, दो महीना होगा, पांच साल होगा। ऐसी सोशल स्टडीज हैं कि कई बार पीढ़ियां नफरत में ही अपने को बर्बाद कर देती हैं। प्रेम और इंसानियत मुझे लगता है बहुत कीमती है। उसे हासिल करने के लिए बहुत सारी पीढ़ियां लग जाती हैं, जैसे हमें डेमोक्रेसी तक आते-आते हजार साल लगे। जानवर से मनुष्य बनने की यात्रा लाखों साल की है। ऐसे ही हमारी जितनी भी नकारात्मकता की यात्रा है, अगर वो समाज में दिख रही है तो वह एक संक्रमण काल है, लेकिन हम हमेशा बेहतर होने की तरफ बढ़ते हैं। एक हीरो आता है। कभी गांधी आते हैं, कभी मोहम्मद साहब आते हैं, कभी कृष्ण तो कभी राम आते हैं। सोसायटी अपना हीरो चुनती है और वह हीरो आपको बताता है कि नहीं, ऐसे नहीं, ऐसे जीना है।’

आपदाओं की सूरत में किसी नायक के आने तथा लोगों में विवेक पैदा होने की ठोस संभावना पर हमने डॉ. राजीव एम. एम. नांबियार से बात की, जिन्होंने सुनामी के बाद केरल, तमिलनाडु और अंडमान-निकोबार में राहत एवं पुनर्वास के अलावा केरल की बाढ़ और भूस्खलनों के दौरान भी काम किया है। वे आपदा प्रबंधन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और जोखिम प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं। वे नायक की धारणा के बजाय समाज की सामूहिकता के अपने अनुभवों पर जोर देते हैं।
नांबियार कहते हैं, ‘जॉम्बी फिल्मों में दिखाई जाने वाली कई स्थितियों की वास्तविक आपदाओं से भी कुछ समानताएं दिखाई देती हैं। बाढ़, सूखा या पर्यावरणीय संकट के समय लोगों की आजीविका प्रभावित होती है, जरूरी सेवाएं बाधित होती हैं, संसाधनों की कमी होने लगती है और समुदायों पर दबाव बढ़ता जाता है। ऐसी स्थिति में समाज को फिर से संभालने के लिए सामूहिक प्रयास और एक-दूसरे का साथ जरूरी हो जाता है।’
डॉ. नांबियार जॉम्बी फिल्मों और वास्तविक आपदाओं के बीच सीधी समानता बरतने से सावधान करते हैं, ‘जॉम्बी की दुनिया को वास्तविकता मानने के बजाय उसे इस बात को समझने के एक तरीके के रूप में देखा जा सकता है कि किसी आपदा के दौरान भय, अफवाह, संसाधनों की कमी और जरूरी सेवाओं में व्यवधान किस तरह एक-दूसरे से जुड़कर संकट को बढ़ा सकते हैं।‘ वे संकट के बीच दूसरी तस्वीर भी दिखाते हैं जब स्थानीय एनजीओ ने प्रभावित लोगों को राहत के काम में शामिल किया- सामुदायिक रसोइयां चलीं, जहां बचे हुए लोगों ने खुद खाना बनाया और बांटा। उनके अनुसार लोगों को राहत प्रक्रिया में शामिल करना केवल उनसे काम करवाना नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य यह भी था कि इससे उनका सम्मान और अपने जीवन पर नियंत्रण की भावना बनी रहे। स्थानीय ज्ञान भी ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
वे केरल की 2018 की बाढ़ का उदाहरण देते हैं। बाढ़ से सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, सड़क बंद हुई तो राहत प्रभावित हुई, राहत प्रभावित हुई तो भोजन, पानी, दवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ा। लंबे समय तक ऐसी स्थिति रहने पर रोजगार और सामाजिक जीवन तक प्रभावित होने लगता है। नांबियार इसे ‘कैस्केडिंग रिस्क’ कहते हैं यानी ऐसा एक जोखिम जो दूसरे जोखिम को जन्म देता है और उसका असर उस जगह से बहुत दूर तक पहुंच सकता है जहां संकट शुरू हुआ था। जॉम्बी की कहानी में भी एक व्यक्ति से शुरू हुई चीज धीरे-धीरे दूसरों तक पहुंचती जाती है। वास्तविक आपदा में यह फैलाव किसी काल्पनिक संक्रमण से नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर आपस में जुड़ी श्रृंखलाओं की कमजोरियों के कारण होता है।
नांबियार के मुताबिक जिस सामाजिक नेटवर्क के रास्ते जोखिम फैल सकता है, उसी नेटवर्क के जरिये संकट को रोकने की कोशिश भी की जा सकती है। केरल की बाढ़ में स्थानीय लोग, मछुआरे, स्वयंसेवक, संगठन और स्थानीय स्वशासन संस्थाएं उन जगहों तक पहुंचीं जहां औपचारिक राहत व्यवस्था को पहुंचने में कठिनाई थी। इसलिए संकट केवल संक्रमण की तरह नहीं फैलता। भरोसा भी फैल सकता है। सहयोग भी फैल सकता है। सामुदायिक लचीलापन भी फैल सकता है।
नांबियार के अनुभव में ‘जॉम्बी’ का सबसे दिलचस्प पहलू संकट के फैलने की प्रक्रिया में निहित है। डर फैल सकता है, अफवाह फैल सकती है, एक जगह का व्यवधान दूसरी जगह पहुंच सकता है और संसाधनों की कमी पूरे सामाजिक तंत्र पर दबाव डाल सकती है। इसके उलट भरोसा भी फैल सकता है, सहयोग भी और सामुदायिक लचीलापन भी। स्थानीय संगठन, स्वयंसेवक, सामाजिक कार्यकर्ता और समुदाय उस श्रृंखला को वहीं रोक सकते हैं जहां वह शुरू हुई है।
नांबियार की बताई इस दुतरफा प्रक्रिया का आनुभविक आधार कुदरती आपदाएं हैं, मानव-निर्मित और अन्य नहीं। क्या हो यदि कोई आपदा सचेत तौर से, कहीं केंद्रीकृत ढंग से, किसी शक्तिशाली इकाई द्वारा फैलायी जा रही हो? वे कहते हैं कि यदि हर चेतावनी केवल डर पैदा करे और लोगों को यह न बताए कि उन्हें करना क्या है, तो लगातार चेतावनियों का असर कम हो सकता है। दूसरी तरफ जरूरत से ज्यादा डर पैदा करने वाली भाषा लोगों को तैयार करने के बजाय और भयभीत कर सकती है।
और अंत में राजनीतिक सत्ता…
यही वह बिंदु है जहां आकर डर का पूरा व्याकरण शीर्षस्थ सत्ता के अधीन हो जाता है और हमें सता की भूमिका को भी संज्ञान में लेना पड़ता है।
ताजा उदाहरण बीते 15 अगस्त को लाल किले से दिए गए स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल है। उन्होंने कहा था कि ऐसे लोगों को पहचान कर ‘आइसोलेट’ करना होगा। जब किसी समाज में सत्ता-शीर्ष की राजनीतिक भाषा किसी व्यक्ति की पहचान को परिभाषित करने लगे तब असहमति और लोकतंत्र का क्या होता है? इस संदर्भ में बीते वर्षों में ‘राष्ट्रविरोधी’, ‘सूडो-सेकुलर’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘प्रेस्टिट्यूट’, ‘अवॉर्ड वापसी गैंग’, ‘आंदोलनजीवी’, जैसे शब्द भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं। क्या इन शब्दों के सहारे यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि सत्ता की भाषा कैसे तय करती है कि किसे ‘अपना’ और किसे ‘पराया’ माना जाए?
हमने देखा है कि 2014 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार भारत में आने के बाद ये तमाम भाषिक प्रयोग सत्तापक्ष की ओर से ‘गैर’ की पहचान के संदर्भ में किए गए हैं। अबकी प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ ईजाद कर डाला, पर उससे पहले भी वे ऐसे काम कर चुके हैं। 2019 में प्रधानमंत्री ने एक इंटरव्यू में ‘ख़ान मार्केट गैंग’ का जिक्र किया था। उसी साल दिसंबर में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ प्रदर्शन शुरू हुए, तब झारखंड के दुमका में प्रधानमंत्री ने कहा कि आग लगाने वाले ‘अपने कपड़ों से पहचाने जा सकते हैं।’ बिना कोई शब्द गढ़े महज कपड़ों की तरफ़ इशारा करके बता दिया गया कि किस कौम को ‘आग लगाने वाला’ कहा जा रहा है। फिर जनवरी 2020 में दिल्ली चुनाव के दौरान सत्ताधारी दल के एक मंत्री ने मंच से ‘देश के गद्दारों को…’ वाला नारा उछाला। भीड़ ने बाकी हिस्सा न सिर्फ खुद पूरा कर दिया, बल्कि कुछ ही दिनों बाद नारा जमीन पर उतर आया और जामिया व शाहीन बाग में गोलियां चल गईं।
यदि हर चेतावनी केवल डर पैदा करे और लोगों को यह न बताए कि उन्हें करना क्या है, तो लगातार चेतावनियों का असर कम हो सकता है। दूसरी तरफ जरूरत से ज्यादा डर पैदा करने वाली भाषा लोगों को तैयार करने के बजाय और भयभीत कर सकती है।
– डॉ. राजीव एम. एम. नांबियार, आपदा और जोखिम प्रबंधन विशेषज्ञ

इन उदाहरणों के सहारे अपने एक ताजा शोधपत्र में पत्रकार और संचार के शोधार्थी दिलीप खान लिखते हैं, ‘अगर सारी असहमति को एक नाम दे दिया जाता तब तो उस नाम के नीचे पत्रकार, छात्र, किसान, और मुसलमान एक साथ खड़े हो जाते और उन्हें अपनी साझा लड़ाई दिख जाती। अलग-अलग ठप्पों ने हर समूह को अपने कठघरे में अकेला कर दिया। ‘’टुकड़े-टुकड़े गैंग’’ पर बहस में किसान नहीं थे और ‘’खालिस्तानी’’ वाली बहस में मुस्लिम। हर समूह को अपनी बेगुनाही अलग से साबित करने का टास्क थमा दिया गया। जो समूह उस वक्त निशाने पर नहीं था वह कई बार यह सोचकर चुप रहा कि बात उसकी नहीं हो रही। असहमति को टुकड़ों में पहचानने का मतलब था उसे टुकड़ों में ही रखना।‘
वे पूछते हैं कि सत्ता को आखिर यह सब करने की जरूरत ही क्यों पड़ी? जिस सरकार के पास संसद में भारी बहुमत था, अदालतें जिसके खिलाफ कम ही जाती थीं, और मीडिया का बड़ा हिस्सा जिसके साथ खड़ा था, उसे हर असहमत आवाज के लिए एक नया नाम गढ़ने की जरूरत क्यों थी? जवाब भी वे खुद देते हैं:
‘शायद इसलिए क्योंकि कोई भी सत्ता अपनी वैधता सिर्फ चुनाव जीतकर हासिल नहीं करती, उसे हर दिन यह साबित करना पड़ता है कि वह लोगों के सवालों का जवाब दे सकती है। इसलिए सवाल पूछने वाले की नीयत पर सवाल उठा देना कहीं आसान है। दूसरा मकसद अपने समर्थकों को लगातार जंग के माहौल में रखना है। जिस आबादी को हर रोज बताया जाए कि देश के भीतर दुश्मन घूम रहे हैं वह अपने नेता से सवाल पूछने के बजाय उसके पीछे और कसकर खड़ी हो जाती है। तीसरा मकसद दिखाई सबसे कम देता है, पर शायद सबसे अहम है। ठप्पे उस बड़ी आबादी को चुप कराते हैं जो खुलकर न तो सत्ता के साथ है, न ही उसके खिलाफ। ठप्पे का असली निशाना अक्सर वह आदमी नहीं होता जिस पर ठप्पा लगता है, बल्कि वे हजारों लोग होते हैं जो यह देखकर डर जाते हैं कि अगला नंबर उनका भी हो सकता है।‘
पिछले बारह साल से लगातार ऐसी ही भाषा, नारों और चेतावनियों ने हमारे समाज में एक किस्म की मानसिक थकान, उदासीनता और अवमानना एक साथ पैदा कर दी है। खान मानते हैं कि ‘दिमागी नक्सल’ इस पूरे सिलसिले का सबसे दिलचस्प मोड़ है क्योंकि यह टुकड़ों में पहचानने की सत्ता की पुरानी रणनीति के मुताबिक नहीं है। पहली बार सत्ता ने एक ऐसा ठप्पा गढ़ा है जिसका निशाना सीधे सोचने का तरीका है। यानी ‘दिमागी नक्सल’ में सोच को ही सुरक्षा का मसला बना दिया गया है। यह एक तरह से इस बात की स्वीकारोक्ति है कि असहमति अब इतनी फैल चुकी है कि उसे टुकड़ों में बांटकर संभालना मुमकिन नहीं रहा।
अमेरिका से लेकर भारत तक अपने नेता के साये में जॉम्बी बनते राजनीतिक दल
शायद इसीलिए दिल्ली की सड़कें आज 25,000 से ज्यादा पुलिसबलों और अर्धसैन्य बलों तथा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की 273 कंपनियों की किलेबंदी में तकरीबन इमरजेंसी जैसे हालात देख रही हैं। अगले एक महीने तक फिलहाल कैद की यह स्थिति रहने वाली है, जो इस असामान्य कदम को धीरे-धीरे सामान्य बना देगी और लोगों में इसको लेकर एक सहमति-सी बन जाएगी। यह आपातकालीन राज्य वाली स्थिति है, जिसके बारे में दार्शनिक जॉर्जियो आगम्बेन हमें यह समझाने में मदद कर सकते हैं कि सत्ता किस तरह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को नियंत्रित करने की अपनी क्षमता को बढ़ाती है। समाज है कि ऐसी व्यवस्था में रहने वाले लोगों की नैतिक और राजनीतिक स्वायत्तता का क्या होता है?
आगम्बेन के मुताबिक अपवाद की अवस्था (स्टेट ऑफ एक्सेप्शन) ही समाज का जॉम्बीकरण करती है। यह तकनीक और सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रत्यक्ष और ठोस है, जिसका अनुभव कोरोना के बाद से पूरी दुनिया में अलग-अलग नियंत्रणकारी सत्ताओं के राज में किया गया है। जब सार्वजनिक जीवन सुरक्षा केंद्रित हो जाता है तब राजनीतिक विवेक बाहरी स्रोतों के अधीन हो जाता है और नागरिकों की निष्क्रियता सामान्य होने लगती है। ऐसे में मानसिक स्तर पर नागरिक सार्वजनिक सभाओं और आंदोलनों को लोकतांत्रिक सहभागिता के बजाय खतरे की दृष्टि से देखने के अभ्यस्त हो सकते हैं।
इसमें पहली प्रक्रिया संस्थागत शक्ति का विस्तार है। दूसरी राजनीतिक चेतना में संभावित परिवर्तन। इन दोनों को एक ही चीज मानना उचित नहीं होगा। पहली प्रक्रिया का होना दूसरी को स्वतः प्रमाणित नहीं करता, लेकिन जब दोनों एक-दूसरे को मजबूत करने लगें तब समस्या अधिक गंभीर हो जाती है। यदि नागरिक अपने साथियों की अभिव्यक्ति पर निगरानी रखने लगें, विरोधियों के विरुद्ध कार्रवाई का समर्थन करने लगें या सत्ता के दावों की जांच किए बिना उन्हें स्वीकार करने लगें, तब नियंत्रण केवल राज्य का काम नहीं रह जाता।
यानी, समाज में अकेले पड़ चुके मनुष्य के डर और भीड़तंत्र में बदलने के बाद की जाने वाली सामूहिक प्रतिक्रिया की जो कथा छिटपुट खबरों, अफवाहों, आदि से शुरू होती दिख रही थी, अब साफ हो रहा है कि उसकी बुनियाद में तो दरअसल सत्ता की राजनीतिक कार्रवाइयां हैं; सत्ता की भाषा है, उसके नारे हैं, उसके उकसावे हैं और उनके बहाने उसकी ऐसी आपातकालीन किलेबंदियां हैं जिनका अंतिम परिणाम यह है कि समाज स्वयं अपने नियंत्रण की प्रक्रिया में भागीदार बन जाता है।
जॉम्बीतंत्र की ओर…
आज की दिल्ली इस स्थिति की सबसे ज्वलन्त और प्रासंगिक झांकी है। प्रधानमंत्री, न्यायाधीश से लेकर सत्ताधीशों की भाषा उस स्थिति के बनने का सबसे ठोस और प्रत्यक्ष कारण है। बाकी सब कुछ आधुनिक डिजिटल माध्यमों का फैलाया संक्रमण है।

इसे ऐसे समझें कि रावण के दस सिर सत्ता की अनेक क्षमताओं के प्रतीक बन चुके हैं- जैसे निगरानी, सूचना पर नियंत्रण, दमन, प्रचार, जनमत निर्माण और वैचारिक औचित्य। इन सब के बीच एक समन्वय है। उसके ऊपर पर्याप्त नैतिक नियंत्रण नहीं है। जॉम्बी इन्हीं दस सिरों का कुल जमा सामाजिक परिणाम है- जॉम्बी वह नागरिक है जो जीवित है, संवाद कर रहा है, डिजिटल दुनिया से जुड़ा है और अपनी नैतिक श्रेष्ठता को लेकर आश्वस्त भी है, लेकिन सत्ता पर प्रश्न उठाने, राजनीतिक विरोधियों की मानवीय गरिमा को स्वीकार करने और असुविधाजनक परिस्थितियों में भी अधिकारों की रक्षा करने की क्षमता को खोता जा रहा है। तकनीक और सूचना के माध्यम जॉम्बी बनते नागरिकों के व्यवहार को देखने, मापने और नियंत्रित करने के योग्य बना रहे हैं। वे यह भी तय कर रही हैं कि नागरिक क्या देखते हैं, किससे डरते हैं, क्या चाहते हैं और किस पर विश्वास करते हैं।
इस तकनीक का प्रभाव हालांकि एकतरफा नहीं है। वही नेटवर्क असहमति को संगठित कर सकते हैं, सत्ता के दुरुपयोग को उजागर कर सकते हैं और नागरिक एकजुटता का आधार भी बन सकते हैं। ऐसा हमने जुलाई से लेकर अब तक नीट पेपर लीक आंदोलन और एसआइआर-विरोधी आंदोलन में बखूबी देखा है। फ्रांस और अल्बानिया सहित दुनिया के और इलाकों में भी इस तरह के सत्ता-विरोधी आंदोलन चल रहे हैं। दुनिया भर के देशों में जनता जिनके खिलाफ ये प्रदर्शन कर रही है वह उन्हीं की चुनी हुई नैतिक संयम से मुक्त हो चुकी सत्ता है, जिनके शासकों ने अपने-अपने देशों को अपनी डिजिटल जागीर में तब्दील कर डाला है। यही सत्ताएं आज के रावण का चेहरा हो सकती हैं। इन सत्ताओं के समक्ष जिनकी नैतिक स्वायत्तता कमजोर पड़ती जा रही है, वैसे नागरिकों के लिए जॉम्बी एक रूपक हो सकता है; और डिजिटल प्रौद्योगिकी उस ‘दिव्य दृष्टि’ के गोले जैसी है जिससे सत्तारूपी रावण नागरिक समाज को देखता है, प्रभावित करता है और लगातार प्रबंधित-नियंत्रित करता है।
यानी, इतने बरस बाद भी रावण कहीं गया नहीं है- वह राज्यसत्ताओं में सबसे ऊपर बैठा हुआ निगरानी-नियंत्रण की तकनीकों के सहारे नागरिकों को जॉम्बी बनाने में लगा हुआ है ताकि लोग खुद ही आपस में मर-खप जाएं।
(सम्पादन: अभिषेक श्रीवास्तव)