Imperialism

Salute to America event in Washington, D.C., 5 July, 2026

ढाई सदी की अमेरिकी आजादी हम सबके लिए एक अफसोस और खतरा क्यों है

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आज से पचास साल पहले अमेरिकी आजादी की दो सदी पूरी होने का वक्‍त ऐसा था जब अमेरिकी समाज में आलोचना के आंतरिक स्‍वर विरोधाभासों को संतुलित करते दिखते थे। उस वक्‍त किताबों, फिल्‍मों और लोकप्रिय संस्‍कृति के उत्‍पादों में लोगों की आत्‍मा का शुद्धिकरण करने की फिर भी एक ताकत शेष थी। आज उसकी कल्‍पना ही संभव नहीं है। आखिर अमेरिकी समाज अपने ढाई सौवें साल में यहां तक कैसे पहुंचा? इसके हमारे लिए क्‍या निहितार्थ हैं? प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से यानिस वारूफाकिस की टिप्‍पणी

Emperor's mask has fallen, representative image made by AI

मुखौटा गिर चुका है: शासक की निजी डिजिटल जागीर बनते जा रहे देश और नागरिक के सवाल पर

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दुनिया की राजनीति और आर्थिकी आपस में मिलकर कैसे आधुनिक राज्‍य के चरित्र को बदल रही है; सम्‍प्रभु लोकतांत्रिक राष्‍ट्रों के भीतर चुनी हुई सरकार और नागरिक के बीच का रिश्‍ता कैसे विकृत हो रहा है; और अपनी अंतर्वस्‍तु व स्‍वरूप में हर लोकशाही कैसे राजशाही की ओर बढ़ रही है; इन विषयों पर दुनिया भर में कोरोना के बाद से बहुत चर्चा हुई है। भारत अपवाद है। यहां राज्‍य-सम्‍बंधी विमर्श नदारद दिखता है जबकि पांचसाला चुनाव ही विमर्शों के केंद्र में रहता है। फॉलो-अप स्‍टोरीज़ के संरक्षक रहे दिवंगत शिक्षाविद् अनिल चौधरी राज्‍य, सरकार, कानून और समाज की जटिल गुत्‍थी पर लगातार बोलते थे। उनके 76वें जन्‍मदिवस पर दिल्‍ली में आयोजित सम्मिलन इसी विषय पर परिचर्चा का बायस बना। सम्मिलन में प्रस्‍तुत अरुण सिंह का लिखा यह आधारपत्र बदलती हुई दुनिया पर कुछ रोशनी डालता है

फलस्तीन-इजरायल विवाद : एक अंतहीन त्रासदी

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हमास के ताजा हमले और उसके बदले में की जा रही कार्रवाई बताती है कि आतंकवाद को समाप्त करने का इजरायली तरीका अगर इतना ही कारगर होता, तो आज अपने जन्म के 74 साल बाद भी वह इस समस्या से जूझ नहीं रहा होता। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य में इजरायल-फलस्‍तीन संघर्ष पर रोशनी डाल रहे हैं मुशर्रफ़ अली