Jan Troell : रूपहले परदे पर वंचितों के सपनों को पिरोने वाला एक फिल्मकार

Jan Gustaf Troell
कामगार तबके की कहानियां परदे पर उतारने वाले स्‍वीडिश फिल्‍मकार यान गुस्‍ताफ़ त्रोएल 23 जुलाई, 2026 को 95 साल के पूरे हो गए। आधुनिक यूरोपीय सिनेमा में उनके जोड़ के उम्‍दा फिल्‍मकार बमुश्किल कुछ ही हैं। उस पर भी जीवित फिल्‍मकारों में एकाध ही। तकरीबन एक सदी तक मजदूरों, वंचितों और मेहनतकशों के प्रति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और कलात्‍मक संजीगदी को लेकर जी जाना इतना आसान नहीं होता। भारत में उम्‍दा सिनेमा के प्रेमियों को त्रोएल के काम के बारे में जरूर जानना चाहिए, विद्यार्थी चटर्जी की कलम से

स्‍वीडन के आधुनिक सिनेमा में (Jan Gustaf Troell) यान त्रोएल का नाम बहुत प्रतिष्ठित है। भारत में लोगों को उनके बारे में जरूर जानना चाहिए, चूंकि कलात्‍मक व दार्शनिक दोनों ही पक्षों में इंग्‍मार बर्गमन से ठीक उलट उनका मेयार अपने दिवंगत दोस्‍त और साथी फिल्‍मकार बो विदेरबर्ग जितना ही ऊंचा और शानदार है। कामगार वर्ग के इस उत्‍कृष्‍ट निर्देशक की उपलब्धियों को प्रकाशित करने में फिल्‍म-क्‍लब मूवमेन्‍ट और अन्‍य एजेंसियों ने पर्याप्‍त काम नहीं किया, इतना तो तय है।

त्रोएल आज 95 वर्ष के पूरे हो रहे हैं, लिहाजा देश के कई महत्‍वपूर्ण फिल्‍म महोत्‍सवों में से कोई भी अगर चाहे तो उनके ऊपर केंद्रित एक सत्र रख सकता है। पश्चिम में त्रोएल का सम्‍मान इतना ज्यादा इसलिए है क्‍योंकि अपनी खांटी स्‍वीडिश रचनाओं के सहारे वे सार्वभौमिक अर्थों का सम्‍प्रेषण बड़ी सहजता के साथ करते हैं। इसलिए यह एकदम उपयुक्‍त समय है कि भारत में ‘क्‍लास’ सिनेमा (वर्गीय और उम्‍दा दोनों अर्थों में) के चाहने वाले लोग त्रोएल के बारे में थोड़ा और जानने की ज़हमत उठाएं। 

त्रोएल ने 1960 से 1965 के बीच जो लघु फिल्‍में बनाईं, वे उनके प्रयोगात्‍मक दिमाग का परिचय देती हैं। ये फिल्‍में बेहद आम विषयों और रोजमर्रा के किरदारों पर थीं। एक ऐसी शैली के माध्‍यम से उन्‍हें वे साकार करते थे जिसमें विवरणों को बड़े करीने के साथ बरता जाता था। चीजों को देखने की उनकी नजर उनके छायांकन को गढ़ती और उनकी बहुरंगी कल्‍पना से संपादन निखर कर आता था। त्रोएल की कलात्‍मकता ऐसी है कि लगता ही नहीं वे किसी प्रभाव को जबरन पैदा करने की कोशिश कर रहे हों। सब कुछ उनकी फिल्‍मों में स्‍वाभाविक ढंग से घटता है- जैसे, ऋतुओं का बदलना, एक के बाद दूसरे मौसम का ऐसे आना गोया आने और जाने के बीच की आहट ही मिट जाए। 

स्‍वीडन के भीतरी इलाकों के वंचितों के प्रवक्‍ता के रूप में त्रोएल की ख्‍याति उनकी फिल्‍म स्‍टॉपओवर इन द मार्शलैन्‍ड से बनी। यह कहानी एक ऊबे हुए रेलवे कर्मचारी की है जो एक दिन अचानक काम छोड़कर खुद की तलाश में लग जाता है।

त्रोएल ने यहां आम लोगों के जीवन के बदकिस्‍मत पहलुओं को जिस तरह बरता है उसमें अनावश्‍यक भावुकता गायब है। त्रोएल के समूचे काम में ही चीजों को रेखांकित करने के बजाय समझने की कोशिश ज्‍यादा दिखाई देती है। यहां भी ऐसा ही है। वे संकेत देते हैं, उपदेश नहीं। इस कहानी के नायक का किरदार मैक्‍स वॉन सिदो ने निभाया है। इस किरदार के सहारे और पहाड़ों, ऊंचे-ऊंचे पेड़ों, ग्रामीण जीवन के ठहराव, खिलते हुए फूलों और कई बच्‍चों वाले परिवारों की गरीबी की पृष्‍ठभूमि में इंसानी हालात से जुड़े कुछ भव्‍य सच सामने लाए गए हैं।



त्रोएल ने 1966 में अपनी पहली लंबी फीचर फिल्‍म बनाई। फिल्‍म का नाम है हियर इज़ योर लाइफ (श्‍वेत श्‍याम, 165 मिनट)। यह कहानी एक मेधावी, महत्त्वाकांक्षी और मेहनती मजदूर युवक के राजनीतिक और यौनिक विकास के उहापोह पर है। उसका नाम उलॉफ है। चौदह बरस की नाजुक उम्र में ही उसे लकड़ी काटने और ढोने वालों के साथ काम शुरू करना पड़ता है। ऐसे किरदारों की जिंदगी बहुत धुंधली है। दिन भर की कमरतोड़ मेहनत और रात को भयंकर शराबखोरी से वे सख्‍त हो चुके हैं। इस युवक के पास सपने हैं। वह शिक्षा का भूखा है। उसे आजादी चाहिए। इसलिए वह एक के बाद एक नए काम करता है।

लकड़ी काटने वालों को छोड़ने के बाद वह एक भट्ठे में काम करता है, फिर आरा मिल में, उसके बाद कैंडी बेचता है और फिर एक फिल्‍म प्रदर्शक के लिए प्रोजेक्‍शनिस्‍ट का काम भी करता है। इस सफर में उसकी मुलाकात तमाम किस्‍म के किरदारों से होती है। आदमी, औरत, बूढ़े, जवान, सबसे मिलकर उसके पास तजुर्बों का खजाना इकट्ठा हो जाता है। इस लंबी फिल्‍म का अंत आते-आते पहला विश्‍व युद्ध करीब आ जाता है। उलॉफ अपनी मामूली बचत, बुनियादी समाजवादी सिद्धांतों में कठोर विश्‍वास और एक ऐसी बेहतर दुनिया की उम्‍मीदों के लैस इसका सामना करने को तैयार हो चुका है जहां उसके और उसके जैसों के लिए रोशनी का एक कोना होगा।

हियर इज़ योर लाइफ के तकरीबन चौथाई सदी बाद स्‍वीडन की ही एक और फिल्‍म बिलकुल ऐसी ही भावनाओं को व्‍यक्‍त करते आई थी, बेशक उसकी गति और बुनावट अलग थी। वह डेनमार्क में पैदा हुए फिल्‍मकार बाइल अगस्‍त की पेल्‍ले द कॉन्‍करर थी। अहम बात यह है कि उलॉफ और पेल्‍ले दोनों ही जिंदगी की कठिन पाठशाला से उम्‍मीद और ताकत में प्रशिक्षित किरदार हैं। प्रतिकूलताओं से सामना होने पर- चाहे वे मानव-निर्मित हों या कुदरती- वे अपनी नियति के फैसले खुद करते हैं। 

हियर इज़ योर लाइफ के दो साल बाद त्रोएल ने ओले दोले दॉफ का निर्देशन किया (110 मिनट)। इस फिल्‍म ने उनकी ओर व्‍यापक ध्‍यान खींचा। उन्‍हें इसके लिए कई अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मान मिले। उनमें बर्लिन का गोल्‍डेन बियर और शिकागो का गोल्‍डेन हुगो सम्‍मान था।

यह फिल्‍म एक उपन्‍यास पर आधारित है। इसमें एक स्‍कूली शिक्षक की दु:स्‍वप्‍नों से निर्मित जिंदगी का वर्णन है, जहां दिन में उसका टकराव बेहूदा बच्चों से होता है तो उसकी रातें पेशेवर नाकामी के भयावह सपनों से भरी हुई हैं। यह शिक्षक मार्टिन्‍सन अपने विद्यार्थियों को दोस्‍त बनाने की भरसक कोशिश करता है लेकिन वह जितनी ईमानदार कोशिश करता है उतना ही बुरी तरह नाकाम रहता है। फिल्‍म का अंत छात्रों की ऐसी क्रूरता के साथ होता है जिससे सब कुछ खत्म होने के कगार पर आ जाता है। क्‍या मार्टिन्‍सन अपने विद्यार्थियों के हाथ मारा जाएगा या बाल-बाल बच जाएगा? यदि बच भी गया, तो क्‍या दोबारा अपने किशोर उत्‍पीड़कों की चुनौती का सामना करने का साहस जुटा पाएगा?


A shot from Troell's film Ole Dole Doff
ओले दोले दॉफ का शिक्षक मार्टिन्‍सन: फिल्म के अंत से एक दृश्य

जाहिर है, ओले दोले दॉफ और हियर इज़ योर लाइफ अपनी लय और विचार दोनों में एक-दूसरे से भिन्‍न फिल्‍में हैं। पहली फिल्‍म में झटकों के साथ प्रयुक्‍त बिखराव वाली एक ऐसी शैली है जो दर्शाये गए रिश्‍ते की तूफानी प्रकृति को उभारती है, जबकि दूसरी में सहज बहता हुआ आख्‍यान है जो नरम स्‍पर्श के साथ एक किशोर नायक के भावनात्‍मक विकास और उसके साकार होने की संभावना की उम्‍मीद बंधाता है।

दोनों फिल्‍मों में जहां तक जिंदगी के प्रति नजरिये का प्रश्‍न है, वह पहली में ठंडा और क्रूर है। यहां न सिर्फ स्‍कूली तंत्र से, बल्कि उस समूचे उपभोक्‍तावादी समाज से निराशावादी मोहभंग दिखाया गया है जो यांत्रिक ढंग से जी रहे लोगों की जिंदगी के हर कदम पर बाप बनने की कोशिश करता है। यह फिल्‍म सबसे मजबूती के साथ नाउम्‍मीदी का भाव जगाती है, जो आत्‍मा पर गहरा घाव दे जाता है। इसके ठीक उलट, दूसरी फिल्‍म कठिनाइयों की पृष्‍ठभूमि में रची उलॉफ और उसके साथियों की दास्‍तान से आशावाद और मौन एकजुटता को उभारती है।

यान त्रोएल के शुरुआती काम खासकर इसलिए इतने प्रभावशाली हैं क्‍योंकि वे बड़ी आसानी से जमीनी हकीकत को एक ऐसी दुनिया की कल्‍पना के साथ गूंथ देते हैं जो दो जून की रोटी और आजादी के संघर्ष के पार बसती है।

त्रोएल की महारत इसी में है कि वे दर्शक को ऐसी कल्‍पना करने में समर्थ बनाने की ऊर्जा दे पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि त्रोएल खुद कामगार वर्ग से आने वाले माता-पिता की पैदाइश थे जिन्‍होंने वंचना और गलाज़त के माहौल में भी अपने बच्‍चों को सलीके से पालने का संघर्ष किया। शायद इसीलिए त्रोएल निर्बाध पूंजीवाद से नफरत करते हैं और उनके देश के कलाकारों के बीच उन्‍हें बाजार की सत्ता का प्रबल आलोचक माना जाता है। बावजूद इसके, उनके भीतर का कलाकार और दृष्‍टा ही है जो उन्‍हें जीवन को पुष्‍ट करने वाली सोच की तकरीबन मौन गूंज के पार जाने की छूट नहीं देता।


पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया?


यहां यह ध्‍यान देने लायक बात है कि सामान्‍यत: स्‍कैन्डिनेविया और खासकर स्‍वीडन की रचनात्‍मक कलाओं और बौद्धिक विचार जगत में बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक समाजवादी विचार की एक मजबूत धारा मौजूद थी। वो तो नब्‍बे के दशक की शुरुआत में जब समाजवादी धड़े का नाटकीय ढंग से सामूहिक पतन हुआ और नतीजतन संरक्षणवादी ताकत स्‍वीडन की सत्ता में आई, तब उसने उन तमाम अच्‍छे कामों को ध्‍वस्‍त करना शुरू कर दिया जो उसके पूर्ववर्तियों ने सामाजिक सुरक्षा और कल्‍याणकारी उपायों के सहारे किए थे। इसलिए असमानताओं को कम करने की पुकार त्रोएल के समग्र काम में दिखाई देती है- यह पुकार कर्कश नहीं बल्कि ठोस है, समर्पित नहीं, बल्कि आह्वानकारी है, जो गैर-बराबरी की छाया का सामना करने के लिए मनुष्‍य को भीतर से जगाती है। शायद इसीलिए उत्तरी ध्रुव के इलाकों का समाजवादी विचार वास्‍तव में इंकलाबी बना और ज्‍यादा लंबे समय तक टिक भी सका, चूंकि उसने ठस होने से इनकार किया और सपाट नारों में उसे कोई खास गुण नजर नहीं आया।

त्रोएल खुलकर इस बात को कहते भी हैं, कि उनकी दिलचस्‍पी सक्रिय राजनीति से ज्‍यादा लोगों में है। इसके बावजूद वे इतने नादान नहीं हैं कि लोगों की निजी जिंदगी या सामूहिक व्‍यवहार को नियंत्रित करने वाले सामाजिक आयामों से गाफिल रहें। वास्‍तव में, वैश्विक व्‍यवस्‍था को बहुत तेजी से दिए जा रहे नए आकार को लेकर उनकी जागरूकता इतनी गहरी है कि वह उन्‍हें चौकस और बेचैन करती है। मुट्ठी भर दबंग देशों की रहनुमाई में चल रही आज की दुनिया में ‘बाजार-मंत्र’ का लगातार किया जा रहा तेज उच्‍चार उन्‍हें एक हद तक अंतर्मुखी बनाता है। फिर भी, उन्‍होंने अपने सामाजिक फलसफे के साथ एक पल भी समझौता नहीं किया है।

जैसा कि कई प्रतिष्ठित फिल्‍मकारों के यहां देखा जाता है, त्रोएल की रचनाएं भी प्राय: एक-दूसरे का विस्‍तार ही हैं, चाहे ड्रामा हो या डॉक्‍युमेंट्री। उदाहरण के लिए, दो असामाजिक तत्त्वों की वास्‍तविक जिंदगी पर निर्मित उनकी डॉक्‍युमेंट्री इल कापितानो उनकी फिल्‍म ओले दोले दॉफ से इतना मिलती-जुलती है। कापितानो के अंत में दोनों असामाजिक युवा तीन निर्दोष व्‍यक्तियों की हत्‍या के लिए गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। इस लिहाज से दोनों फिल्‍में असंतुलित सामाजिक विकास की पृष्‍ठभूमि में युवाओं के असामान्‍य व्‍यवहार पर उदास और वीभत्‍स टिप्‍पणी की तरह हैं।


A shot from Troell's film Il Capitano
कापितानो का पहला शॉट

इसी तरह बैंग अधेड़ उम्र के एक ऐसे शिक्षक की जिंदगी को चित्रित करती है, जो वाल्‍टर मिटी की तरह दैनंदिन नीरसताओं के बजाय सपनों और फंतासी की दुनिया में ज्‍यादा जीता है। यह फिल्‍म एक असामान्‍य व्‍यक्ति की जिंदगी को समझने का एक सरस प्रयास है। शायद इसका उद्देश्‍य सदिच्‍छाओं पर रोशनी डालना है, उन आदर्शवादी विचारों पर, जिनके साथ हर युवा मन अपना पेशेवर सफर शुरू करता है जब तक कि उसके सामने बाधाएं नहीं आ जाएं।

त्रोएल का मानस कितना व्‍यापक है, यह इस तथ्‍य से साबित होता है कि उन्‍होंने एक ही विषय पर दो फिल्‍में बना डालीं- एक नाटकीय अभिनय वाली फिल्‍म और दूसरी खोजी डॉक्‍युमेंट्री।

यह विषय 1897 में तीन साहसी स्‍वीडिश नागरिकों द्वारा गरम हवा के गुब्‍बारे के सहारे की गई उत्तरी ध्रुव की यात्रा का है। उनमें दो इंजीनियर और एक चिकित्‍सक था। वे कभी मंजिल पर नहीं पहुंच सके। वास्‍तव में, वे कभी लौट ही नहीं सके। 1930 में नॉर्वे के वैज्ञानिकों को ध्रुवीय बर्फ में एक कैमरा, कुछ खुली रीलें, नोट और डायरियां बरामद हुईं जिसके बाद तीनों लापता अन्‍वेषियों का रहस्‍य खुल सका। इंजीनियर एस. ए. आंद्री, नील्‍स स्त्रिंदबर्ग और चिकित्‍सक छायाकार नट फ्रेंकेल की इस कहानी ने स्‍कैन्डिनेविया में पीढ़ियों को प्रेरित और विस्मित किया है। त्रोएल ने 1982 में उनके बदकिस्‍मत सफर पर एक नाटकीय कहानी बुनी और अपने पसंदीदा अभिनेता मैक्‍स वॉन सिदो को टीम लीडर आंद्री के किरदार में ढाल के द फ्लाइट ऑफ द ईगल नाम की फिल्‍म बनाई।

इसके पंद्रह साल बाद 1997 में त्रोएल अपनी विशिष्‍ट शैली में फिर नमूदार हुए उसी विषय के साथ, लेकिन एक डॉक्‍युमेंट्री की शक्‍ल में, जो नॉर्वे द्वारा बाद में भेजे गए खोजी अभियानों में बरामद पत्रों, डायरियों और तस्‍वीरों पर आधारित थी। नाम था देयर फ्रोज़ेन ड्रीम, जो उस बदकिस्‍मत यात्रा के अवशेषों की छवियों का सम्मिश्रण है, बाकी इसी विषय पर त्रोएल की पिछली फिल्‍म से कुछ टुकड़े भी इसमें शामिल हैं। इनसे मिलकर जो बनता है, वह तीनों ऐतिहासिक अन्‍वेषकों की गुमशुदगी के इर्द-गिर्द नाटकीय घटनाओं की एक निजी व्‍याख्‍या है। अबकी अभिनेता मैक्‍स वॉन सिदो नदारद हैं, पर उनकी आवाज डॉक्‍युमेंट्री में बराबर सुनाई देती है। 

यान त्रोएल की बनाई तीन घंटे की महान डॉक्‍युमेंट्री लैंड ऑफ ड्रीम्‍स (1988) का जिक्र किए बगैर उनके शानदार काम पर कोई भी चर्चा शायद पूरी नहीं हो सकती। यह फिल्‍म जैसी तरंगें और जैसी अनुगूंजें उत्‍पन्न करती है, वे इसे एक साथ वैयक्तिक और सार्वभौमिक बनाते हैं। यह फिल्‍म त्रोएल ने अपनी बेटी जोहाना के जन्‍म से प्रेरित होकर और उसी को आधार मानकर बनाई थी, जो एक नागरिक और एक कलाकार के बतौर त्रोएल के लिए नए सपनों की शुरुआत का प्रतीक है। उन्‍होंने बहुत प्‍यार से, इत्‍मीनान से और पूरे संकल्‍प के साथ इस फिल्‍म को एक लंबे निबंध की तरह गढ़ा, जिसमें राजनीति, कला, समाज और उनके अस्तित्‍व व चेतना के करीब अन्‍य तमाम क्षेत्रों का समावेश है।


Poster of Troell's Land of Dreams
लैंड ऑफ ड्रीम्‍स (1988) का पोस्टर

यह फिल्‍म कई सवाल उठाती है। उनमें एक सवाल यह है कि आधुनिक दौर का स्‍वीडिश नागरिक जिस काबिलियत और कुशलता के पीछे भाग रहा है, वह यदि उसके सुख के लिए ही खतरा बन जाए तो उसकी क्‍या अहमियत है। इस फिल्‍म का आकर्षक छायांकन, सवाल पूछने का उसका जज्‍बा, स्‍वीडन के सार्वजनिक और बौद्धिक जीवन से चुने हुए व्‍यक्तित्‍वों के रह-रह कर आने वाले लंबे साक्षात्‍कार और फिल्‍म का मूड- जो पुराने सपनों के गायब होने और नए सपनों के पैदा होने के बीच झूलता रहता है- सब कुछ आपस में मिलकर अंधाधुंध वृद्धि और निर्वैयक्तिक विकास के इस युग में उसे इंसानी जज्‍बे का एक जिंदा दस्‍तावेज बना देता है।

अपने कभी न भुलाये जा सकने वाले किशोर नायक उलॉफ की ही तरह त्रोएल ने भी अपनी जिंदगी में अलग-अलग वक्‍त के दौरान अलग-अलग काम किए। फिल्‍म बनाने तो वे तब आए जब तीस पार कर चुके थे। फोटोग्राफी में उनकी रुचि थी, जो आगे चलकर आजीवन फिल्‍मकारी में बदल गई।

लंबे समय तक इंतजार करने के बाद उन्‍हें पहला मौका बो विदरबर्ग की पहली फीचर फिल्‍म में मिला। विदरबर्ग स्‍वीडन के मजदूर वर्ग की संस्‍कृति की एक और प्रतिष्ठित पैदाइश हैं। बर्गमान-विरोधी विवादों के लिए तो वे मशहूर/कुख्‍यात रहे ही हैं (निर्भर करता है कि आप किस पाले में खड़े हैं)। उन्‍होंने ईश्‍वर और अधिभौतिक विषयों के चुनाव पर अपने से वरिष्‍ठ निर्देशक रहे बर्गमान को कठघरे में खड़ा कर दिया था और उनकी आलोचना की थी कि वे इस हद तक इन विषयों से आसक्‍त हैं कि आसपास के सार्थक विषयों से लेकर स्‍वीडन की धरती के अभिशप्‍त लोगों तक को भुला चुके हैं।


आवारा सर्वहारा


विदरबर्ग की उस फिल्‍म पर काम करने के बाद से लेकर अब तक त्रोएल लंबा सफर कर चुके हैं। इस सफर में उनकी शैली और मूड में बदलाव आता रहा, पर स्‍वतंत्र और न्‍यायपूर्ण समाज बनाने के मूल्‍यों से वे नहीं डिगे। विषय चाहे कोई भी हो, उसे बरतने का उनका ढंग खास अपने किस्‍म का ही रहा। उनके प्रयोग की छाप उनके काम पर साफ दिखती है। यात्रा के अंत में उनका विश्‍लेषण करने पर हम पाते हैं कि अपने कुछ साथी फिल्मकारों से वे एक मामले में एकदम अलग खड़े दिखते हैं- उस स्‍याह दार्शनिकता में उनकी रुचि बेहद मामूली रही है जहां मनुष्‍य की नियति को नैतिक चिंताओं और रुझानों के आलोक में बरता जाता है। इसके बजाय, एक उत्‍साही किस्‍सागो के रूप में उनकी भूमिका ज्‍यादा समझ आती है जो यह जानता है कि आम जिंदगियों के खास गुणों को कैसे उभारा जाए।

जाहिर है, यह खासियत उन्‍हें कोई कम दार्शनिक, नैतिकतावादी या व्‍यक्तिवादी नहीं बनाती। निश्चित ही इसका लेना-देना उनकी अपनी धुंधली पृष्‍ठभूमि से है, उनके विविध अनुभवों से है। इसीलिए उन्‍होंने जो कुछ रचा, उसमें वे एक साथ काव्‍यात्‍मक, भव्‍य और इसके बावजूद बेहद जमीनी जान पड़ते हैं। इसकी वजह ही यह है कि परदे पर उतारी अपनी हर रचना में वे या तो प्रत्‍यक्ष या फिर परोक्ष रूप से उम्‍मीद और निराशा, कुंठा और सुख, के अपने निजी अनुभवों को पिरो रहे थे।          

उनके सारे काम एक तरफ, अकेले अपने किरदार उलॉफ के लिए ही यान त्रोएल हमारे युग के सिनेमा के शीर्ष पायदान के हकदार हैं।



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