बीती 4 मई को आए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे में भारतीय जनता पार्टी ने लंबे संघर्ष और दशकों की मेहनत के बाद भारी बहुमत से राज्य की सत्ता हासिल की। धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता, साम्प्रदायिकता और घुसपैठ जैसे मुद्दों को अपने चुनावी प्रचार का हिस्सा बनाकर भाजपा के सत्ता तक पहुंचने के बाद यह सवाल अहम हो गया था कि बंगाल की राजनीति और समाज में अब किस तरह के बदलाव होंगे।
पिछली दो चुनावी यात्राओं के दौरान एक आशंका मन में घर कर गई थी, कि शायद अगली बार जब कलकत्ता आना हो तो यह शहर पहले जैसा नहीं रहेगा। उसी दौरान यह तय किया था कि चुनाव के बाद एक बार और कलकत्ता वापस आएंगे, शायद आखिरी बार! इसके अलावा, 17 अगस्त को नई सरकार को बने सौ दिन पूरे हो रहे थे। चूंकि कलकत्ते में होना प्रेम में होने जैसा है, तो नई सत्ता अपनी सहूलियत के हिसाब से नया कलकत्ता बनाए उससे पहले शहर को एक बार और देख लिया जाय, यही आस थी।
संबंधित कहानी
पश्चिम बंगाल : जीत-हार से परे, राजनीति की ऑप्टिक्स को कैसे बदल रहा है प्रवासी ‘हिन्दुस्तानी’ वोटर
इन्हीं सब आशंकाओं को मन में लिए शुरुआती तीन महीने के कामकाज को देखने और बदले हुए बंगाल का अनुभव करने के लिए हम तीन दोस्तों ने यात्रा का निश्चय किया। दो अगस्त की शाम नई दिल्ली से सियालदह जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस में सवार होकर हमने इस सफ़र की शुरुआत की।
रेल में बंगाल
दिल्ली की चिलचिलाती धूप और उमस भरी गर्मी से जूझते हुए जब हम ट्रेन में पहुंचे, तो सीट पर बैठते ही सुखद अनुभूति हुई। कंपार्टमेंट धीरे-धीरे भर चुका था। ट्रेन चलने से पहले ही सभी सहयात्री अपनी-अपनी सीट पर जगह बना चुके थे। अब समय था परिचय का- यात्रा को सुगम बनाने वाला पुराना कायदा, जो आज भी उतना ही कारगर है।
सबसे पहले परिचय हुआ संगीता जी से, जो मूल रूप से मुर्शिदाबाद की रहने वाली हैं, लेकिन नौकरी तथा कामकाज के सिलसिले में राजस्थान के भिवाड़ी में रहती हैं। वह अपने घर जा रही थीं, कारण कि उनके स्कूल के पूर्व छात्रों का मिलन समारोह आयोजित हो रहा था। घर जाने की खुशी और पुराने दोस्तों से मिलने का उत्साह उनकी आंखों में साफ देखा जा सकता था।
बातचीत की शुरुआत हुई ही थी कि बात चल निकली दो हफ्ते पहले दिल्ली में हुए जेन-ज़ी आंदोलन की, जिसे उन्होंने बच्चों की बेहूदा हरकत बताया और कहा कि कोई अपने प्रधानमंत्री को गाली कैसे दे सकता है! आजकल के बच्चों में संस्कार नहीं है! संगीता जी का साथ दिया घोष बाबू ने, जो अब तक अंग्रेजी अखबार में अपनी नज़रें गड़ाए बातचीत में शामिल होने का सिरा ढूंढ रहे थे। यह मौका दिया उन्हें जेन-ज़ी आंदोलन से शुरू हुई बातचीत ने।
मौका मिलते ही उन्होंने जेन-ज़ी सहित पूरे आंदोलन को खूब भला-बुरा कहा। इसमें उन्होंने विदेशी समर्थन से लेकर दूसरे धर्म के लोगों द्वारा प्रधानमंत्री और भाजपा को बदनाम करने की साजिश ढूंढने की खूब कोशिश की। इस सब के बीच एक और परिवार था जो लगातार हमारी बातें सुन रहा था लेकिन अभी तक बातचीत में शामिल नहीं हुआ था। ट्रेन के साथ बातचीत ने रफ्तार पकड़ी ही थी कि शांत बैठे परिवार के मुखिया- जो पेशे से एक बैंकर हैं- ने आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि कोई कितना भी ताकतवर हो सकता है, समझदार हो सकता है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि सामने वाला आपसे भी ज्यादा समझदार हो सकता है। और आजकल के बच्चे तो हर तरह से सुविधा-संपन्न हैं, उनके हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट है, आप किसी को कम नहीं आंक सकते। मोदी जी यही समझने में भूल कर गए और जेन-ज़ी को हल्के में ले लिया, जो काम आपने इतने बवाल के बाद किया पहले ही कर लेते! क्या उनको नहीं पता था कि पेपर लीक हुआ है, कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली है? अगर धर्मेंद्र प्रधान को पहले ही हटा दिया होता तो इतने बड़े आंदोलन की नौबत ही नहीं आती।
“बंगाल से बाहर दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे दो बंगाली उस जगह को दूसरा बंगाल बना देते हैं”- इस पुरानी कहावत के अनुसार पहले संगीता जी, फिर घोष बाबू और थोड़ी देर बाद यह बैंकर बाबू का बंगाली परिवार बातचीत भी में ऐसे शामिल हुआ कि हम तीन दोस्त अब केवल श्रोता बन चुके थे।
पिछले पचास साल से दिल्ली के द्वारका में रह रहे घोष बाबू बताते हैं कि रिटायरमेंट से पहले वह एक निजी कंपनी में दक्षिण एशिया टेक्निकल हेड के पद पर कार्यरत थे। इसके चलते उन्होंने पूरी दुनिया घूमी हुई है और उनकी देखी दुनिया के हिसाब से बंगाल बहुत पिछड़ा राज्य है, जिसका विकास होना बहुत जरूरी है। इसीलिए बंगाल को नई और डबल इंजन की सरकार चाहिए थी। उनके अनुसार महज ढाई महीने पहले आई सरकार ने राज्य का विकास करना शुरू कर दिया है।
भाजपा के जीतने के कारण पूछने पर वह तृणमूल के खिलाफ नाराजगी बताते हैं। उनके मुताबिक तृणमूल के कार्यकर्ताओं की गुंडई, भ्रष्टाचार और राज्य के पिछड़ेपन से उपजी नाराजगी भाजपा की जीत का सबसे बड़ा कारण बनी। इसके बाद वह ममता बनर्जी के एक बयान का जिक्र करते हैं जिसमें उन्होंने मुस्लिम समुदाय को सुरक्षा का अहसास दिलाने के लिए कह दिया कि जब तक वह सत्ता में हैं, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। उनके अनुसार यही बात हिंदुओं को खल गई।
बैंकर बाबू घोष बाबू के बताए कारण से मौन सहमति जताते हैं। वह खुद किसको वोट करते हैं, यह पूछने पर हंसते हुए कहते हैं, “हम जिसको वोट देते हैं वह चुनाव ही नहीं जीतता।” उनकी राजनीतिक सम्बद्धता का अंदाजा लगाने के बाद हुई बातचीत में वे खुलकर बताते हैं कि छात्र जीवन में वे वाम संगठन की राजनीति किया करते थे।
संगीता जी अपनी बातों से लगातार ध्यान आकर्षित करती हैं। सबसे पहले तो वह भिवाड़ी पहुंचने की अपनी कहानी बताती हैं, फिर भाषा की दिक्कतों का सामना कैसे किया, कैसे एक हरियाणवी महिला ने उन्हें राजस्थानी और हिंदी सिखाई, जिससे उनका वहां रहना आसान हो सका। शुरुआती बातचीत के आखिर में उन्होंने बताया कि वह भिवाड़ी में भाजपा से सम्बद्ध किसी संगठन, शायद विश्व हिंदू परिषद, की अध्यक्ष हैं।
इस बीच घोष बाबू लगातार यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि बंगाल में भाजपा की सरकार क्यों जरूरी है। इसके लिए उन्होंने वही सब कारण बताए जिनका प्रचार भाजपा चुनाव के दौरान कर रही थी- मसलन, केंद्र सरकार की योजनाओं का लागू न होना, घुसपैठिये, राष्ट्रवाद और बंगाल की बदहाली के लिए ममता बनर्जी का जिम्मेदार होना। यह सब बताते हुए किसी रहस्य का उद्घाटन करने के अंदाज में उन्होंने यह भी जानकारी दी कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनवाने में उनका क्या योगदान रहा। पूछने पर वह बताते हैं कि उन्होंने भी बंगाली लोगों को वोट करने के लिए अपने पैसे से बंगाल भेजा था।
बंगाल का हाल क्या है और नई सरकार कैसा काम कर रही है? घोष बाबू ने बताया कि नई सरकार आने के बाद अमूल अपना एक प्लांट लगाने बंगाल जा रही है; मेट्रो विस्तार के लिए केंद्र सरकार द्वारा पैसा जारी किया जा चुका है; बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग के लिए राज्य सरकार ने जमीन दे दी है, केंद्र सरकार की तरफ से पैसा दिया जा चुका है और जल्द ही इन सब पर काम शुरू हो जाएगा। इसके उलट, काफी देर से शांत बैठे बैंकर बाबू ने कहा कि कोलकाता में सब कुछ ठप पड़ा हुआ है। यहां तक कि नियमित साफ-सफाई जैसे जरूरी काम भी शहर में नहीं हो पा रहे है। वजह पूछने पर वह कहते हैं, “काम करने वाला सब लोग छोड़कर भाग गया है, टीएमसी का था न।”
सोने जाने से ठीक पहले उनकी पत्नी ने सवाल पूछा कि आप लोग करते क्या हैं- ‘आप लोग तो ऐसे सवाल कर रहे हैं जैसे पत्रकार हों’! दरअसल, अपने परिचय में हमने उन्हें बस इतना ही बतलाया था कि हम नए बंगाल को देखने जा रहे हैं। अगली सुबह जब चाय और ऑमलेट बेचने वालों की आवाज से नींद खुली और रात की बातचीत आगे बढ़ी ही थी, कि घोष बाबू ने हमारे अंदाज से हमारी पहचान बताने की कोशिश की। उन्होंने मुझे बिहारी कहा और आगे संदेह के साथ जोड़ा- ‘भगवान जाने आप लोग कलकत्ता क्या करने जा रहे हैं, ऐसा लग रहा है जैसे किसी गुप्त मिशन पर जा रहे हों!’ मेरे दोस्त ने पलटवार किया और जवाब में सिर्फ इतना कहा कि शक्ल से तो आप भी मद्रासी लग रहे हैं।
तब तक सियालदह आ चुका था। बातचीत और गाड़ी दोनों के आगे बढ़ने की गुंजाइश खत्म हो चुकी थी। घोष बाबू भीड़ में कहीं गायब हो गए। संगीता जी से हमने औपचारिक विदा प्लेटफॉर्म पर ली। संयोग से बैंकर बाबू का परिवारा टैक्सी करते हुए पार्किंग में फिर से मिल गया, तो उनसे आखिरी नमस्कार वहीं हुआ।
दीवार पर लिखी इबारत
सियालदह रेलवे स्टेशन से पार्क स्ट्रीट तक अपने होटल तक के रास्ते में करीब आधा दर्जन जगहों पर नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की बड़ी-सी तस्वीर के साथ अमित मेटलिक्स का प्रचार करती बड़ी-बड़ी होर्डिंगें दिखीं। यह एक स्टील कंपनी है जिसने भाजपा सरकार के सौवें दिन 17 अगस्त, 2026 को पुरुलिया में 4000 करोड़ रुपये के स्टील प्लांट की नींव रखी है। खुद मुख्यमंत्री ने इस परियोजना का उद्घाटन किया है।

अमित मेटलिक्स जिस स्तर पर इस प्रोजेक्ट का प्रचार-प्रसार बंगाल में कर रही थी, उसे देखकर बार बार यही सवाल मन में आ रहा था कि क्या कंपनी को पहले से पता था कि राज्य में सरकार बदलने वाली है और नई सरकार आने के बाद उसे क्या करना है। इसके अलावा, सड़क सुरक्षा सप्ताह के होर्डिंग पूरे शहर में लगे हुए थे। हर चौक-चौराहे पर भगवा रंग के सड़क सुरक्षा वाले पुलिस बूथ बने हुए थे। पूरे कलकत्ते में अकेले सड़क सुरक्षा के इकलौते होर्डिंग इतने ज्यादा थे जेसे लगता था कि वे सरकार बदल जाने की मुनादी करने के लिए लगाए गए हों।
चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने धर्म, घुसपैठिया, खान-पान और बंगाली अस्मिता को जितनी आक्रामकता के साथ मुद्दा बनाया था उससे अंदाजा लगाया जा रहा था कि सत्ता में आने के बाद पार्टी उतनी ही तेजी से उन पर काम भी करेगी। इसका असर सरकार बनने के शुरुआती दिनों में दिखा भी, जब खासकर कलकत्ता के न्यू मार्केट इलाके में और हावड़ा रेलवे स्टेशन के बाहर सैकड़ों रेहड़ी-पटरी वालों को हटा दिया गया। इसका कारण सिर्फ इतना बताया गया कि शहर को सुंदर बनाना है। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार केवल उन जगहां का निशाना बना रही है जहां दूसरे धर्म के लोग ज्यादा संख्या में इकट्ठे हो रहे हैं।
चुनाव से पहले एक आशंका थी कि अगर भाजपा सरकार आती है तो कलकत्ता को किस तरह बरतेगी। कारण कि भाजपा सरकारों के काम करने के तरीके को देखते हुए कलकत्ता बिल्कुल वैसी ही जगह है जहां बदलाव की सबसे ज्यादा आवश्यकता उसे लग सकती है। यह आशंका हकीकत में बदलती हुई नजर आई 20 जून को, जब पार्क सर्कस इलाके में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड कर दिया गया। इतिहास के जानकारों ने इस पर आपत्ति जताई और भाजपा की कमअक्ली की निंदा की।
दरअसल, जिन सुहरावर्दी के नाम पर यह सड़क थी वे इतिहासकार और शिक्षाविद तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम वाइस चांसलर कर्नल सर हसन सुहरावर्दी थे, न कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे हुसैन सुहरावर्दी। यह बात अलग है कि हुसेन सुहरावर्दी, हसन के भतीजे थे। जिस गोपाल (मुखर्जी) पाठा के नाम पर इस सड़क का नामकरण अब किया गया है, उसके बारे में ज्ञात तथ्य यह है कि उसने बंगाल के प्रसिद्ध “डायरेक्ट एक्शन-डे” के मौके पर हिंदुओं की रक्षा के लिए हथियार उठाए और एक संगठन बनाया।
बहरहाल, 20 जून को जब इस नामबदली की घोषणा की गई, उसी दिन बंगाल में पश्चिम बंग दिवस भी मनाया गया। लगभग दो महीने पहले हुए इस आयोजन के बैनर-होर्डिंग अब भी जहां-तहां दिख जाते हैं। इस दिन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि यह है कि 20 जून 1947 को बंगाल विभाजन पर तत्कालीन विधानसभा में मतदान हुआ था कि बंगाल का विभाजन होना चाहिए या नहीं।
उससे पहले हुसैन सुहरावर्दी और शरतचंद्र बोस संयुक्त और स्वतंत्र बंगाल को लेकर एक समझौता कर चुके थे। उनका मानना था कि बंगाल भारत और पाकिस्तान में से किसी के साथ भी नहीं जाएगा, लेकिन श्यामाप्रसाद मुखर्जी लगातार इसका विरोध कर रहे थे और हिंदू बहुल बंगाल को भारत तथा मुस्लिम बहुल बंगाल को पाकिस्तान में शामिल किए जाने की बात लगातार कह रहे थे।
इन सब प्रयासों के बाद आखिरकार बंगाल का विभाजन हो गया, जिसके लिए 20 जून 1947 को मतदान किया गया। इसी सिलसिले में भापा की सरकार ने इस दिन को आधिकारिक तौर पर मनाने की शुरुआत की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए। पहली बार इसको मनाने के लिए सरकार के स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए गए जबकि हिंदी कैलेंडर के हिसाब से आम बंगाली बैसाख के पहले दिन को बंगाल दिवस के रूप में मनाता है, जो खुशियों का दिन है और जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं।

कोलकाता की सड़कों पर आगे बढ़ते हुए कुछ जगहों पर एक और पोस्टर “हिंदू इकनॉमिक फोरम कलकत्ता चैप्टर” का लगा हुआ दिखता है। इस पोस्टर की टैगलाइन है “धर्मस्य मूलम् अर्थ:” और मंच की बैठक का मूल विषय लिखा है “राइज ऑफ सोनार बांग्ला”, जो बीते 8 अगस्त को संपन्न हुई जब हम दक्षिण 24 परगना होते हुए शहर से सौ किलोमीटर दूर बकखाली घूमने गए थे। यह पोस्टर सरकारी तो नहीं है, लेकिन बंगाल सरकार के मंत्रियों की फोटो इस पर प्रमुखता से छपी हुई है। सुवेंदु अधिकारी की तस्वीर इसमें नहीं है।
इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के तहत देश में काम कर रहा एक संगठन है। द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार इसकी स्थापना किन्हीं स्वामी विज्ञानानंद ने थी, जो विश्व हिंदू परिषद में संयुक्त महासचिव रह चुके हैं।
दावे और सवाल
कोलकाता की सड़कों पर घूमते-फिरते दर्जनों लोगों से हमने बात की। एक ड्राइवर से नई सरकार के काम के बारे में हमने पूछा तो तंज कसते हुए वह कहता है- फाइन दीजिए, फिर बताएंगे!
वह कहता है कि जब से नई सरकार आई है, हर बात में फाइन मार रही है। सीट बेल्ट और हेलमेट के लिए तो पहले दंड होता ही था, लेकिन अब तो बाहर निकलने तक पर फाइन लग रहा है। पहले पुलिस वाला सौ-दो सौ रुपये लेकर मान भी जाता था, अब तो कोई सुनने वाला ही नहीं है। एक कैब वाले ने सड़क पर थूकने तक पर जुर्माना लगाए जाने की बात कही। आम तौर से यहां गाड़ी चलाने वालों की राय यह है कि बंगाल में सरकार किसी भी पार्टी की रहे, सिस्टम वैसा का वैसा ही रहेगा।
कैब ड्राइवर की कही बात की गवाही समिक भट्टाचार्य का वह बयान है जिसमें वह कहते हैं कि बंगाल से भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म करने में कुछ समय लगेगा। उनके इस बयान के कुछ दिन बाद ही भाजपा ने उगाही के आरोप में 25 लोगों को पार्टी से निलंबित कर दिया तथा 300 लोगों को कारण बताओ नोटिस जारी किया।
इससे इतर, भाजपा सरकार ने यहां किसी भी नई योजना की शुरुआत नहीं की है, सिवाय इसके कि जो योजनाएं राज्य सरकार अपने पैसे से चला रही थी, उनकी दोबारा ब्रांडिंग करके नई योजनाओं के तौर पर शुरू कर रही है। इसमें अन्नपूर्णा योजना के तहत महिलाओं को तीन हजार रुपये देना हो या फिर राज्य में आयुष्मान भारत योजना को लागू करना, जिसे ममता बनर्जी ने लागू करने से इंकार कर दिया था। इस संबंध में सरकार द्वारा अखबारों में विज्ञापन दिया गया है, जिसमें उसके द्वारा किए गए कामों की जानकारी दी गई है।

सुवेंदु अधिकारी लगातार कोशिश कर रहे हैं कि वह राज्य में ज्यादा से ज्यादा उद्योग लेकर आ पाएं। उनके प्रयासों को कुछ औद्योगिक घरानों ने समर्थन भी दिखाया है। इसमें अमित मेटलिक्स के अलावा, श्याम स्टील ग्रुप है जो 15 हजार करोड़ रुपये की लागत से राज्य के बांकुड़ा के मेजिया में एक प्लांट लगाने जा रहा है। हुगली जिले के डांकुनी में लक्स कोजी ग्रुप के नए प्लांट की नींव खुद मुख्यमंत्री ने ही रखी।
बीते तीन माह के घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी कहती हैं कि सरकार को समझ ही नहीं आ रहा है कि करना क्या है। इसके चलते राज्य के सामान्य प्रशासनिक कार्य ठप पड़े हुए हैं। वह पूछती हैं, ‘सुवेंदु अधिकारी ने शपथ लेने के दो दिन के भीतर बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग करने के लिए 45 दिन में जमीन उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। उसके बाद क्या हुआ? क्या घुसपैठिये आने रुक गए? अगर नहीं, तो कितने पकड़े गए, कितनों को वापस भेजा गया, उसकी जानकारी कहां है? बांग्लादेश के साथ संबंधों में तनातनी का माहौल है, उस पर सरकार का क्या रुख है?’
शिक्षा के सवाल पर वह कहती हैं, ‘सरकार बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन शिक्षकों को तो जनगणना में लगाया हुआ है। उससे पहले राज्य में चुनाव थे और उससे भी पहले एसआइआर का काम चल रहा था। फिर स्कूलों में पढ़ा कौन रहा है? हां, सरकार अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने का हरसंभव प्रयास कर रही है।‘
दिसंबर का इंतजार
चुनावी नतीजे के बाद लगभग सदमे में जा चुका भाजपा-विरोधी बंगाली भद्रलोक अब जेन ज़ी आंदोलन से थोड़ी सांस पाकर वापस से खुद को समेटने लगा है। अब वह खुलकर भाजपा और उसके कामों का विरोध कर पा रहा है। उसका विरोध कितना सफल होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा।
जेन ज़ी आंदोलन के हल्ले में हालांकि बंगाल के भीतर हुई बड़ी राजनीतिक उलटफेर दब कर रह गई- सत्ता गंवाने के महज एक महीने में तृणमूल कांग्रेस का टूटना! भारतीय राजनीति के इतिहास में यह शायद पहली बार है कि कोई पार्टी सत्ता गंवाने के महीने भर बाद ही टूट जाए और बचे हुए लोगों पर जनता अंडे और टमाटर फेंकने लगे।
बंगाल का इतिहास हमेशा से ऐसा ही रहा है कि वहां चुनाव हारने वाली पार्टियां कुछ साल के भीतर अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष करने लगती हैं- पहले कांग्रेस, फिर वाम दल और अब तृणमूल कांग्रेस। तृणमूल से अलग हुए सांसद और विधायक नेशनलिस्ट सिटिज़ंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआइ) में शामिल हो गए हैं लेकिन अभी तक उन्हें संसद, विधानसभा और चुनाव आयोग से मंजूरी नहीं मिली है। इसके लिए तीन महीने की समय सीमा होती है। वह समय भी नजदीक आता जा रहा है, इसलिए देखने वाली बात होगी कि इनका क्या होता है।
सरकार बने अभी 100 दिन ही हुए हैं और बलात्कार, लिंचिंग व एनकाउंटर जैसी घटनाओं की खबरें आनी लगी हैं, जिसने आम आदमी को थोड़ा सा डरा दिया है। बारुईपुर में हुई एक घटना में अपराध के सभी पहलू रेप, मर्डर, लिंचिंग, और एनकाउंटर शामिल हैं। बारुईपुर में ही मंगलवार की सुबह एक दुकान के किनारे एक बम बरामद हुआ जिसे स्थानीय लोगों ने समय रहते पुलिस को रिपोर्ट कर दिया। रेप और मर्डर कांड के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 18 अगस्त को बारुईपरु पुलिस द्वारा दायर किए गए एनकाउंटर सम्बंधी हलफनामे का संज्ञान लिया है। इस मामले में दायर स्वतंत्र जनहित याचिकाओं पर भी अदालत विचार कर रही है।
इस बीच, सरकार के 100 दिन मनाने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह 20 अगस्त से बंगाल के तीन दिवसीय दोरे पर निकल रहे हैं। माना जा रहा है कि बूथ, मंडल और जिला स्तर पर पार्टी संगठन के पुनर्गठन की कवायद को इस दौरान अंजाम दिया जाएगा ताकि दुर्गापूजा से पहले भाजपा अपने संगठन का विस्तार कर सके। दिसंबर में प्रस्तावित कोलकाता नगर निगम के चुनावों के संदर्भ में यह कदम उठाया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि दिसंबर में होन वाले नगर निकाय के चुनाव ही तय करेंगे कि भाजपा की सरकार राज्य में कितने दिन और कितनी मजबूती से टिक पाएगी।
सड़क आबाद है…
इस बीच दिलचस्प बात देखने में यह आई है कि चुनाव के दौरान कांग्रेस के जितने पोस्टर शहर में दिखते थे, उससे कहीं ज्यादा होर्डिंग, बैनर आदि आज दिख रहे हैं। यही हाल सीपीएम का भी है। शहर के जानकार लोगों का मानना है कि आगामी स्थानीय चुनावों में भाजपा को इन दोनों दलों से दिक्कत होने वाली है।
जहां तक टीएमसी का सवाल है, शहर के चाइना बाजार में घूमते हुए सड़क किनारे सजी खिलौनों की दुकान में एक खिलौना और उसकी दुकानदार द्वारा की गई व्याख्या ही सियासी स्थिति को समझाने के लिए पर्याप्त है। ‘डक चेजिंग रेस’ नाम के इस खिलौने को देख कर हम लोग रुक जाते हैं और दुकान वाले से पूछते हैं कि यह क्या है। वह एक बतख को उंगली दिखाकर समझाता है- ‘ये “हमारा दादा” है अभिषेक बनर्जी। सबसे आगे। बाकी सब खत्म हो गया, यही खाली रह गया है।‘
इसी बाजार से थोड़ा आगे लू शुन स्ट्रीट पर चाइनीज़ खाद्य पदार्थों के एक पुराने और मशहूर स्थानीय ब्रांड पाऊ चोंग किम की दुकान है। दशकों पहले चीन से आकर यहां बसी इसकी मालकिन अनौपचारिक बातचीत में कहती हैं, ‘थोड़ा सा तो डर लग ही रहा है कि आगे क्या होगा, लेकिन क्या ही कर सकते हैं। जो होगा, देखा जाएगा। हमको तो बिजनेस चलाना है।‘
बिलकुल यही बात यहां के दूसरे लोग भी कहते हैं, चाहे हिंदू हों, मुसलमान या चीनी। बंगाल में सरकार भले बदल चुकी है, लेकिन सड़क का कारोबार जस का तस आबाद है।