जहां निर्भय चित्त हो, मस्तक ऊंचा, ज्ञान हो बाधाहीन… : गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ऐसा एक देश चाहते थे। आज से दो दिन बाद यानी बांग्ला बैशाख के पचीसवें दिन पड़ने वाली उनकी 165वीं जयन्ती पर पश्चिम बंगाल में जो सत्ता संविधान की छांव में बनने रही है वह भय के दम पर आई है- उस भय के जवाब में, जिस पर यहां पंद्रह साल से एक ही दल की सत्ता टिकी हुई थी। डेढ़ दशक का भय अबकी काम नहीं आया। तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी है। टैगोर की भूमि जोड़ासांको पर भाजपा का कब्जा हो चुका है।
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 मई की दोपहर ढलते-ढलते जब सामने आए तो यह लगभग तय हो चुका था कि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी 200 से ज्यादा सीटों के साथ सरकार बना रही है, लेकिन किसी को उम्मीद नहीं थी कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद अपनी भवानीपुर सीट भी हार जाएंगी। दिन ढला, तो बहुत से चमकते सूरज पलट गए। न सिर्फ ममता, बल्कि तमिलनाडु में मुख्यमंत्री स्टालिन अपनी सीट हार गए; भारत की अंतिम वामपंथी सरकार केरल में पांच दशक के राज के बाद डूब गई और असम में विपक्ष के संयुक्त मोर्चे की अगुवाई कर रहे कांग्रेस के गौरव गोगोई भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। वरिष्ठ पत्रकार विद्यार्थी चटर्जी के शब्दों में, ‘बंगाल में हुए नॉनसेंस का तो फिर भी सेंस लगाया जा सकता है, लेकिन तमिलनाडु का नॉनसेंस इससे भी बड़ा है…।‘

फिलहाल, कहानी बंगाल की जहां पहले चरण के मतदान के ठीक बाद यहां प्रकाशित रिपोर्ट में मैंने बतलाया था कि दिल्ली की सत्ता के लिए यह राज्स सबसे ज्यादा अहमियत क्यों रखता है। उस रिपोर्ट के अंत में एक बात स्पष्ट हो रही थी कि बंगाल की राजनैतिक यथास्थिति में दरार पड़ चुकी है। कलकत्ता विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर सौमित्र मुखर्जी ने साफ कहा था कि पश्चिम बंगाल में भाजपा का विरोध करने की कोई वजह नहीं है क्योंकि ममता बनर्जी ही उसे लेकर आई हैं, इसीलिए वे केवल ऑप्टिक्स की लड़ाई लड़ रही हैं। इस बात को और भी कई जानकार मानते हैं, बस अलग-अलग लहजे में बयां करते हैं।
ऑप्टिक्स यानी दिखावे की यह लड़ाई भय के अफसानों पर टिकी थी, जिसके जवाब में भाजपा ने भी लोगों को डराने की राजनीति खेली। मतदाताओं को डराने की इस होड़ में अंतत: भारी वह पड़ा जिसके पास समूचे तंत्र- चुनाव आयोग, न्यायपालिका, सेना और पुलिस-प्रशासन की ताकत थी।
अपने-अपने डर
पश्चिम बंगाल का चुनाव दो प्रतिस्पर्धी किस्म के भय के बीच संपन्न हुआ है और परिणाम के बाद बीते दो-तीन दिनों में डर का विस्तार हुआ है। बंगाल चुनाव के दौरान अपनी दो यात्राओं के दौरान मैंने दर्जनों लोगों से विस्तार में बात की। अलग-अलग जाति, वर्ग, लिंग और आयु के इन तमाम लोगों की बातों में एक नहीं तो दूसरे किस्म का डर साफ दिखता था। डर के दूसरे छोर पर प्राय: कोई स्वाभाविक खलनायक नहीं, बल्कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा निर्मित खलनायक खड़े दिखे।
एक कैब ड्राइवर (26 वर्ष) सुशांत नाथ को देखें, ‘बंगाल में कोई काम ही नहीं है। मैं पोस्ट ग्रेजुएट हूं लेकिन कैब चला रहा हूं। जिसके भी मन में आता है वह कहीं से भी मुंह उठाकर बंगाल चला आता है। आखिर कब तक लोग आते रहेंगे और हम ऐसे ही देखते रहेंगे?’ यह स्थानीय लोगों के मन में बैठा बाहरियों का डर था।
ओडिशा के बालासोर जिले के रहने वाले अख्तर हुसैन पार्क स्ट्रीट इलाके की एक मस्जिद में इमाम हैं। ममता बनर्जी की एक सभा में शामिल होने आए अख्तर का कहना था कि बंगाल को बचाना बहुत जरूरी है और यह काम केवल दीदी ही कर सकती हैं। काऱण पूछने पर उन्होंने कहा, ‘जब यहां के वोटर का नाम काटा गया तो वह कैसे सुप्रीम कोर्ट चली गईं, मामले की पैरवी भी खुद करी, किसी और राज्य में किसी ने भी किया क्या ऐसा? और भी जगहों पर भी तो एसआइआर किया है। दिक्कत केवल नाम कटने की नहीं है, वह तो बाद में भी जुड़ जाएगा, दिक्कत यह है कि अगर भाजपा आ गई तो सबको भगा देगी, और कहां भगाएगी यह किसी को पता नहीं है। हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए उड़ीसा से इधर आया था, यहां से कहां जाएगा?’
पार्क स्ट्रीट के ही एक होटल में हाउसकीपिंग का काम करने वाले रफीक (बदला हुआ नाम) भी डरे हुए दिखे, ‘काम करने के लिए दिल्ली हमारे लिए बहुत दूर है। ओडिशा का बहुत आदमी इधर आता है। हां, पैसा कम मिलता है, लेकिन यहां सब कुछ बहुत सस्ता है। हम चाहे तो दस रुपये में पेट भर के खाना खा लेगा। बीजेपी अगर सरकार में आएगी तो सबसे पहले हमको ही भगाएगी। ओडिशा से तो हमको भगा ही रहा है, यहां से भगाएगा तो कहां जाएगा? ये सब बिहारी है जो चाहता है कि यहां बीजेपी का सरकार बने।‘
बंगाल में चुनाव के सिलसिले में गए और ठहरे बहुत से पर्यवेक्षकों, पत्रकारों और सर्वेक्षकों की रफीक जैसे मतदाताओं से बात कर के एक मोटी धारणा बनी थी कि बंगाल में इस बार भाजपा की सरकार बने, यह आकांक्षा केवल ‘बिहारी’ यानी उत्तर भारतीय मतदाताओं की है (जिन्हें यहां आम तौर से ‘हिंदुस्तानी’ कहते हैं)। इस सपाट समझदारी में थोड़ी दिक्कत थी, यह बंगाल के मूल लोगों से बात कर के समझ में आया, जिनके कहे भाजपा मजबूरी का नाम थी।

नदिया जिले की रहने वाली शुभब्रता विश्वास ने हमसे बातचीत में चुनाव के पहले बताया था, ‘बंगाल का हालात खराब है, यहां करने के लिए कोई काम नहीं है। टीएमसी का गुंडई, घोटाला भी कम नहीं है। भाजपा हमको भी नहीं पसंद है, लेकिन हमारे पास और दूसरा विकल्प क्या है? जो भी लोग बीजेपी को वोट कर रहे हैं, उनके पास विकल्प क्या है? हमको बस ममता से पीछा छुड़ाना है। उसके पास न तो बंगाल को लेकर कोई विज़न है और न ही नीयत।‘
वह पूछती हैं, ’दीदी केंद्र सरकार की हर योजना का विरोध अलग करती है, क्या यहां के लोगों को रोजगार नहीं चाहिए, या फिर यहां के लोग बीमार नहीं होते? आखिर कब तक बंगाली मानुष काम की तलाश में बाहर जाता रहेगा?’
सुशांत, रफीक, अख्तर और शुभब्रता का डर बंगाल की चुनावी फिजा में मतदान से पहले तैर रहे कई किस्म के राजनीतिक आख्यानों की झलक देता है। एक तो बंगाल के लोगों के लिए बाहरियों का डर, जिसमें भाजपा को भी बाहरी माना जा रहा था और एक बंगाली मतदाता दूसरे को भी बाहरी मान रहा था। यानी, बंगाल में रहने वाले मतदाताओं के बीच लोकल और बाहरी होने को लेकर एक महीन संघर्ष काम कर रहा था। दूसरे, मौजूदा सत्ता को लेकर मोहभंग और यथास्थिति कायम रहने का डर था, जिसके चलते आम बंगाली मतदाता मजबूरी में ही सही, विकल्प के तौर पर भाजपा को देख पा रहा था। डर की एक तीसरी किस्म थी जो बंगाल से बाहर दूसरे राज्यों में रहने वाले बंगालियों में काम कर रही थी, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान।
करीब साल पर पहले जब दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, सहित उत्तर भारत की कई जगहों पर बंगाली मुसलमानों को शक की निगाहों से देखने और उनके साथ मारपीट की घटनाएं सामने आईं, उसके बाद इन घटनाओं को लेकर खूब राजनीति हुई, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। यह बंगाली मुसलमानों के खिलाफ बाकी लोगों में फैलाया गया डर था कि वे अवैध घुसपैठिया हैं। उसके बाद चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण एसआइआर की प्रक्रिया चलाई। यह दुहरा डर बंगाल के बाहर बसे कामगार बंगाली मुसलमानों (और हिंदुओं को भी) को चुनाव में वोट डालने के लिए बंगाल तक खींच लाया- सिर्फ इसलिए कि कहीं उनकी नागरिकता न छीन ली जाए!
लिपी हलदार दिल्ली में रहती हैं और घरेलू नौकरानी का काम करती हैं। उनके पति एक दुकान पर सेल्समैन हैं और ड्राइवर का काम भी करते हैं। वोट डालने के लिए वे 15 दिन की छुट्टी लेकर बंगाल गई थीं। उनका कहना था कि ‘हम अभी दिल्ली के वोटर हुए नहीं हैं, और वहां वोट डालने नहीं जाएंगे तो फिर हम कहीं के नहीं रहेंगे।‘
बीते साल जुलाई में हुई घटनाओं का असर उन पर हुआ, जब कई जगहों से उनका काम छूट गया। याद करते हुए वह बताती हैं, ‘वह समय बहुत खराब था। मेरे ससुर को कैंसर है, दिल्ली में ही उनका इलाज चल रहा है, उस समय करीब पांच घरों से मेरा काम छूट गया था। बहुत खराब लगा था हमको, लेकिन क्या कर सकते हैं? इसमें हमारी गलती नहीं है।‘ जिन लोगों के यहां वह काम करती हैं उन्हीं लोगों ने उन्हें दूसरी जगह काम दिलाया, पैसे भी दिए।

ऐसी ही घटनाओं को लेकर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी वोटरों के बीच गई। प्रचारित किया गया कि देखो, भाजपा बंगालियों को किस तरह से देखती है। उसका नतीजा यह हुआ कि बंगाल के बाहर रहने वाले मतदाता बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए किसी भी कीमत पर घर वापस लौटे। यह बात हालांकि अब तक स्थापित नहीं है कि एसआइआर में जिनके नाम कटे या ट्रिब्यूनल में फंसे, वे किस दल के मतदाता थे।
कलकत्ता के एक पुराने संगठन नागरिक मंच के नबो दत्ता ने चुनाव से महीना भर पहले हमसे हुई बातचीत में इस बात की आशंका जताईं थी कि 2011 में जो हुआ, वह इस बार भी हो सकता है क्योंकि ममता बनर्जी ने राज्य में असहमति और विरोध की लोकतांत्रिक स्पेस को खत्म कर डाला है। उन्होंने कहा था, ‘बुद्धो बाबू को लोग जब हटाया तो ये सोच के ममता को थोड़ी वोट दिया था कि वो विकल्प है। बस इतना था कि इसको हटाओ, फिर देखा जाएगा। उसी तरह होता है। बंगाल में इसीलिए टीएमसी को इतना कुछ करना पड़ रहा है, ये मंदिर जो बना रहा है, वो सब बीजेपी से लड़ाई लड़ने के लिए जो कुछ कर रहा है वो लड़ाई वास्तव में बीजेपी से नहीं अपने प्रति विरोध से है। उनके संगठन के भीतर जो नेगेटिव चीज चल रहा है उसके खिलाफ ये लड़ाई है। उसको कैसे मैनेज करना है ये उसको अभी सोचना है। ‘
डर की पिच पर प्रतिस्पर्धी बैटिंग
हो सकता है ममता बनर्जी ने लड़ाई को मैनेज करने का सोचा हो, हो सकता है नहीं भी, पर मुख्यमंत्री के खिलाफ भवानीपुर से जीते भाजपा के नेता सुवेंदु अधिकारी ने मतगणना वाली सुबह ही कह दिया था कि ममता इसलिए आगे चल रही हैं क्योंकि उन बूथों की गिनती हो रही है जहां मुसलमान ज्यादा हैं, जैसे ही हिंदू-बहुल इलाकों की गिनती शुरू होगी ममता चुनाव हार जाएंगी। उनकी बात अंतिम राउंड की गिनती में सही साबित हुई, और नबो दत्ता की आशंका भी।
तृणमूल से राजनीति शुरू करने वाले अधिकारी ने नंदीग्राम की सीट पर भी जीत हासिल की, जिसके बाद उनका बयान आया, ‘इस बार भी नंदीग्राम के हिंदुओं ने मुझे जितवा दिया। मैं नंदीग्राम के हिंदुओं के लिए काम करता रहूंगा।‘ दोनों ही सीटों पर अपनी जीत के पीछे हिंदुओं को श्रेय देने वाले मुख्यमंत्री पद के सबसे तगड़े भाजपा उम्मीदवार 9 मई को मुख्यमंत्री की शपथ लेते हैं या नहीं, इससे इतर उनके ये बयान इस बात का पता देते हैं कि बंगाल के चुनाव में भाजपा का प्रमुख चुनावी आख्यान हिंदू मतों की गोलबंदी पर ही टिका हुआ था जिसका जवाब टीएमसी उसी के तरीकों से देने में लगी थी।
भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में जिन प्रमुख मुद्दों को उठाया उसमें बांग्लादेशी घुसपैठिया, रोहिंग्या, राज्य की सिंडिकेट पॉलिटिक्स में धार्मिक आधार पर एक समुदाय को प्राथमिकता दिया जाना, प्रमुख थे जिसके चलते उसके अनुसार राज्य की 70 प्रतिशत आबादी (स्वाभाविक तौर पर हिंदू) की उपेक्षा हो रही थी। इनके साथ जोड़ते हुए पार्टी के नेताओं ने अपनी रैलियों में कानून-व्यवस्था और हिंदू समुदाय की सुरक्षा का सवाल उठाया। यह हिंदू मतदाताओं के बीच डर फैलाने की खुली राजनीति थी, जो उत्तर भारत के राज्यों में भाजपा ‘हिंदू खतरे में है’ कह के लंबे समय से करती आई है।
इसके अलावा, भाजपा बीते कई साल से बंगाल में धार्मिक राष्ट्रवादी प्रतीकों का इस्तेमाल खुलेआम कर ही रही थी। उसने अपने मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मदद से राम, हनुमान, गणेश जैसे देवताओं पर केंद्रित धार्मिक आयोजनों को बंगाल की धार्मिक संस्कृति में शामिल कराने पर पूरा जोर लगाया जबकि बंगाल मूलत: देवीपूजक समाज रहा है, जहां देवी को ठाकुर कहकर पूजा जाता है। दत्ता के मुताबिक, ‘साठ हजार बूथों पर आधे में भी भाजपा का संगठन नहीं था, लेकिन उसके पास आरएसएस नाम का अदृश्य संगठन था जिसकी पचास हजार इकाइयां हैं और बारह हजार स्कूल चलते हैं। बस वह दिखाई नहीं पड़ता।‘
इस तंत्र के माध्यम से भाजपा के फैलाए डर का नतीजा यह हुआ कि ममता बनर्जी ने उसकी काट में एक तो भाजपा के ही तरीके अपनाए; दूसरे, बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठाकर मतदाताओं में बाहरी का डर पैदा कर दिया। उन्होंने सबसे पहले भाजपा को बंगाली समाज, कला, संस्कृति से अनजान एक बाहरी पार्टी के तौर पर प्रचारित किया। बीते कई महीनों से वह और उनकी पार्टी भाजपा को ‘बांग्ला विरोधी जमींदार’ कहकर संबोधित कर रही थी, जिसका उद्देश्य केवल बंगाल की सत्ता पर कब्जा करना है। तृणमूल की डर की राजनीति में केवल वे मतदाता नहीं फंसे जो नई पीढ़ी के हैं और ज्यादातर बंगाल से बाहर रह रहे हैं। ये मतदाता परिवर्तन की बात कर रहे थे। उनका मानना था कि बंगाल पिछले 70 साल से एक ही पैटर्न पर चला आ रहा है, जिसको बदलने की आवश्यकता है।

इस डर को फैलाने में उनकी परोक्ष सहायता की चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए एसआइआर ने, जिसमें बंगाल के लाखों वोटर के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए थे। इसको ममता बनर्जी ने इस तरह से प्रचारित किया कि लोगों ने इसे अपनी ‘नागरिकता’ की समाप्ति के तौर पर देखा। मतदाता और नागरिक होने में बुनियादी फर्क है, लेकिन बंगाल के मतदाताओं के पास दोनों में फर्क बरतने का कोई विकल्प नहीं था क्योंकि बगल के राज्य असम में जहां भाजपा की सरकार है वहां हजारों लोगों को अवैध नागरिक बताकर डिटेंशन सेंटर में भेजा जा चुका है। जाहिर है कि जिन लोगों को डिटेंशन सेंटर भेजा गया, उनमें से ज्यादातर मुसलमान थे।
इसके अलावा, बंगाली मुसलमानों को घुसपैठिया बताकर देश भर में भाजपा प्रचारित कर ही रही थी। बंगाल में तीनों राउंड के एसआइआर को मिलाकर कुल 91 लाख मतदाताओं के जो नाम कटे, उनमें साठ फीसदी से ज्यादा हिंदू हैं लेकिन यह तथ्य चुनावी प्रचार में सार्वजनिक नजरों से छुपा लिया गया। यह सच है कि तीसरे राउंड के एसआइआर में ‘लॉजिकल डिस्क्रीपेन्सी’ के नाम पर फंसे 27 लाख मतदाताओं में सबसे ज्यादा मुसलमान हैं, केवल इसी तथ्य को प्रकाशित कर समूचे एसआइआर पर थोपने की प्रचार रणनीति ने एक ओर तो तृणमूल को अपने मुस्लिम मतदाताओं में डर कायम करने की सहूलियत दी। दूसरी ओर, तृणमूल के इस प्रचार ने भाजपा को बिना मेहनत के हिंदू मतदाताओं के बीच भरोसा कायम करने का एक सहारा दे दिया, कि वह सत्ता में आए बगैर जब ऐसा कर सकती है तो आने के बाद क्या कुछ कर पाने में सक्षम होगी।
भाजपा के प्रचार का सबसे प्रमुख अंग यह था कि ‘आमार शोनार बांग्ला’ बनाने के लिए बंगाल में भाजपा की सरकार लाना जरूरी है। इसीलिए भाजपा लगातार कोशिश कर रही थी कि ममता बनर्जी उसके मैदान में आकर चुनाव लड़ें। इसके लिए वह लगातार बंगाली अस्मिता के बरअक्स धार्मिक राष्ट्रवाद के अपने आजमाये हुए तरीकों का प्रयोग कर रही थी। शुरू में कुछेक नेताओं के बयानों से यह माहौल बना कि भाजपा सरकार में आने पर मछली-मांस बंद कर देगी। यह मसला जब विवाद का विषय बना, उसके बाद भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर, मनोज तिवारी, द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान मछली खाते हुए फोटो खिंचवाना और बताना कि उन्हें कौन से पानी की मछली ज्यादा पसंद है, यह सब अनायास नहीं था। यह ममता बनर्जी के फैलाए डर का जवाब था। यानी, तृणमूल कांग्रेस को पहले मांस-मछली में फंसाया गया, फिर मतदाताओं को भाजपा का भरोसा दिलाया गया।
इसीलिए असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को सफाई देनी पड़ी कि असम में खानपान पर किसी भी प्रकार की कोई रोकटोक नहीं है, सब कुछ पहले जैसा ही है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि एक कंपिटीशन रखा जाए कि कौन कितना माछ खा पाता है, ‘मैं शर्त लगाता हूं कि दीदी से एक किलो माछ ज्यादा खाऊंगा।‘ हिमंता द्वारा दी गई सफाई इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि असम, बंगाल से बिल्कुल सटा हुआ राज्य है जहां दस साल से भाजपा सत्ता में है। असम और बंगाल सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। भाजपा नेताओं के बाद के ये बयान और अब हुई जीत दिखाती है कि मांस-मछली की राजनीति में फंस कर तृणमूल दरअसल अनजाने ही भाजपा की पिच पर खेल रही थी। यह दोहरे ‘डर’ की मिट्टी से बनी पिच थी।
संघ की ममता
इस पिच के बनने की शुरुआत 2021 में भाजपा की बंगाल चुनाव में हार के बाद से ही हो चुकी थी। एक ओर नागरिक समाज में तृणमूल सरकार का डर था। दूसरी ओर तृणमूल में भाजपा का डर।
चुनाव परिणाम के बाद अपना नाम न छापने की शर्त पर एक प्रोफेसर ने मुझे बताया, ‘टीएमसी सरकार की आक्रामक निगरानी व्यवस्था से लोग डरे हुए थे। सरकार के विरोध में उठने वाली आवाज को दबा दिया जाता था। कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया जाता। उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखी जाती थी। सरकार को चुनौती देने के बाद उसके परिणामों से सरकारी कर्मचारी खास तौर पर डरे हुए थे।‘
वे जादवपुर यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री के प्रोफेसर अंबिकेश मुखर्जी का उदाहरण देते हैं जिन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, लॉकअप में रखा गया और एक कड़े कानून के तहत उनके ऊपर केस किया गया, जो बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ख़ारिज कर दिया गया। उसके बाद भी उन्हें रिटायरमेंट तक परेशान किया गया। उनके मुताबिक ‘यह राज्य सरकार के “बदले की भावना” का एक शुरुआती नमूना था। अगर एक सामाजिक रूप से मजबूत व्यक्ति के साथ ऐसा हो सकता है, तो आम लोगों का हाल समझा जा सकता है और यह केवल इसलिए हुआ कि उन्होंने एक मीम शेयर किया था।‘
दूसरा पक्ष भाजपा की केंद्र सरकार का है। केंद्र में भाजपा के आने के बाद वंदे मातरम नहीं गाने पर पिटाई किए जाने के कई मामले देश भर में सामने आ चुके थे, जिनमें एक व्यक्ति की 2020 में हुई मौत का मामला बहुत चर्चित था। यानी वंदे मातरम को न गाने का एक डर तो मौजूद था ही। इसके अलावा, बंगाल चुनाव से पहले संसद के शीत सत्र में भाजपा ने वंदे मातरम पर अलग से बहस करवाई। वंदे मातरम का ड़ेढ़ सौवां साल मनाने के लिए देश भर में कार्यक्रम आयोजित किए गए। याद करें, तो इससे पहले बीती जनवरी में हुए दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले को आनंद मठ की थीम पर आयोजित किया गया। भाजपा वैसे तो शुरुआत से ही वंदे मातरम को अपने एजेंडे में लेकर चलती आ रही है, लेकिन बंगाल के विशेष संदर्भ में उसकी राजनीतिक मंशा इसके रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के समक्ष टैगोर के वैश्विक मानवतावाद को नीचा दिखाने की रही है।
दिलचस्प है कि भाजपा ने अपने पूरे चुनाव प्रचार में वंदे मातरम का जिक्र तक नहीं किया, सिवाय इसके कि बंकिमचंद्र की पांचवीं पीढ़ी से आने वाले सुमित्रो चटर्जी को उसने नैहाटी सीट से उम्मीदवार बना दिया (और वे जीत गए)। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यही काम सुभाषचंद्र बोस के परिवार के साथ किया था और चंद्र कुमार बोस को पार्टी में शामिल करा लिया था।

संघ और भाजपा बंगाल में बंकिम और टैगोर को एक दूसरे के विरोधी के तौर पर खड़ा करने की कोशिश में रहे हैं, लेकिन बंगाल के भद्रजन में खुले तौर पर इसे लेकर स्वीकार्यता नहीं दिखी। मतदान से ठीक पहले हुई बातचीत में विद्यार्थी चटर्जी, जो जाधवपुर सीट से मतदाता हैं, ने बताया था, ‘राष्ट्रवाद बंगाल की देन है, वह चाहे बंकिम चंद्र का हो टेगौर का हो, यह बंगाल का है, और कोई भी बाहरी आकर बंगालियों को नहीं बता सकता है कि हम वंदे मातरम कैसे गाएंगे या फिर टैगोर और बंकिम चंद्र में कौन बड़ा है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसका इस्तेमाल कैसे करें।‘ यानी, बंकिम और टैगोर में से किसी एक के चुनाव से इतर, भद्रलोक के भीतर भी ‘बाहरी’ का डर तो था ही।
भाजपा द्वारा किए गए ऐसे धार्मिक राष्ट्रवादी प्रचार के दबाव में तृणमूल कांग्रेस ने कोलकाता के न्यूटाउन में दुर्गा आंगन बनाया, दीघा में जगन्नाथ मंदिर बनाया, और अन्य धार्मिक प्रयोग किए। गली-मोहल्लों में छोटे-छोटे राम और हनुमान के मंदिर बनाए गए, जिसे भाजपा ने यह कहकर प्रचारित किया कि हिंदू-विरोधी ममता हिंदू वोटर को खुश करने के लिए यह सब कर रही है। भाजपा का प्रचार-तंत्र हमेशा से ममता बनर्जी को मुस्लिमपरस्त साबित करने की कोशिश करता रहा है, अपने संबोधनों में उन्हें मोमिता और ममता बेगम कहकर बुलाता रहा है। ममता का कार्यकाल इस मामले में विस्तार के लिहाज से संघ और भाजपा के लिए बहुत अनुकूल साबित हुआ।
ममता बनर्जी की इन धार्मिक पहलों के संदर्भ में चुनाव से पहले हुई लंबी बातचीत में ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट सुशोवन धर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी, ‘आरएसएस की कोशिश रहती है कि ऐसा प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिक माहौल बना दो कि टीएमसी भी उसके गीत गाए। और फिर चुप बैठ के इंतजार करो। आरएसएस वाले कहते हैं, कितना दिन रहेगी ममता? पांच साल, दस साल… धीरज रखो न भाई इतना, आखिर सौ साल से बैठे ही हुए हैं। भाजपा का थोड़ा अलग है, जैसा होता है- मनी, मसल पावर, आदि। गुंडा पॉलिटिक्स खेलता रहता है। इंदौर वाला माल (कैलाश विजयवर्गीय) यहां पर आ कर वही काम किया। तो मुझे लग रहा है कि भाजपा यहां अपनी स्वायत्तता को छोड़ती नहीं है, भले आरएसएस के काम को बाधित भी नहीं करती है। इसलिए अभी का माहौल थोड़ा प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता वाला हो गया है।‘
उन्होंने दीघा में ममता बनर्जी के बनवाए जगन्नाथ मंदिर के संदर्भ में एक किस्सा सुनाया था, ‘वहां दिलीप घोष गया था। उससे प्रेस ने पूछा कि आप टीएमसी में जा रहे हैं क्या। उसने सीधा बात किया। बोला, हमारा काम है मंदिर बनाना। वो काम कर के टीएमसी ने अच्छा किया। वो हमारी लाइन पर आ गई है। इससे क्या मतलब कि मैं टीएमसी में जा रहा हूं या नहीं।‘
इसी तरह की बात दत्ता भी बताते हैं जब संघ प्रमुख मोहन भागवत आरजी कार हत्याकांड के बाद कोलकाता आए थे और उन्होंने राज्य सरकार में अपना पूरा भरोसा जताया था। वे कहते हैं, ‘ममता भाजपा के खिलाफ लड़ रही थी लेकिन संघ को हमेशा वे अच्छा मानती रहीं।‘ सुशोवन का कहना था कि आरएसएस का कुल एजेंडा है कि उसका काम निकलना चाहिए, चाहे कोई भी निकाले, कोई भी।
पहली बार 2011 में राज्य में टीएमसी की सरकार बनने के बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में लेफ्ट और कांग्रेस ने गठबंधन किया जिसके चलते टीएमसी की स्थिति काफी खराब थी। उस चुनाव में गठबंधन ने करीब 32 प्रतिशत वोट हासिल किया था। यह तथ्य है कि उस समय अगर भाजपा ने अपना वोट टीएमसी की तरफ ट्रांसफर नहीं करवाया होता तो शायद गठबंधन सरकार बना लेता। भाजपा की सहायता से टीएमसी सत्ता में आ गई। इस पर भाजपा के नेता दिलीप घोष ने खुलकर बयान भी दिया था।
जीत-हार के बाद
बंगाल को उत्तर भारत के बाकी राज्यों से थोड़ा अलग माना जाता रहा है। वहां का चुनाव भी उत्तर भारत के जैसा नहीं होता है। इसीलिए यह माना जा रहा था कि भाजपा को चुनाव जीतने के लिए वहां या तो जरूरत से ज्यादा और अतिआक्रामक धार्मिक ध्रुवीकरण करना पड़ेगा या फिर कोई और प्रयोग। बंगाल के दो दौरे में हमने स्थानीय मतदाताओं में तो कम से कम आक्रामक धार्मिक ध्रुवीकरण जैसा कुछ भी महसूस नहीं किया, बेशक प्रवासी ‘हिंदुस्तानियों’ के बारे में यह बात सही नहीं है (जैसा कि हमने विस्तार से पिछली कहानी में बताया था)।
जहां तक स्थानीय बंगाली मतदाताओं की बात है, उस संदर्भ में पहले चरण के मतदान से ठीक पहले इतिहास के प्रोफेसर किंग्शुक चटर्जी की कही बात जरूर एक दृष्टि दे सकती है, ‘बंगाल में हिंदू-मुसलमान की जो एकता दिखाई जाती है, वह अपर क्लास अमीर की एकता है, जिनके हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस एकता में रैयत हमेशा से अलग-थलग रही है। वही स्थिति आज भी है। हां, बंगाल का भद्रलोक आज भी टीएमसी के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन अकेले भद्रलोक इतना प्रभावशाली नहीं है कि भाजपा जैसी पार्टी को रोक सके। उसके साथ किसी को तो आना ही पड़ेगा।‘
इसके साथ उन्होंने एक टिप्पणी और की थी, जो अब ध्यान देने योग्य है- ‘बंगाल के भद्रलोक में ज्यादातर संख्या तो हिंदुओं की ही है?’ तो क्या बंगाल का भद्रलोक भाजपा के साथ चला गया, इसकी गुंजाइश हो सकती है? या फिर इस सवाल को ऐसे पूछें, कि क्या टीएमसी के हक में भद्रलोक अकेला पड़ गया, उसके साथ और कोई तबका नहीं आया? चुनाव परिणाम आने के बाद हमने वापस उन जानकारों से राय ली जिनसे हमने चुनाव के पहले बात की थी।

सुशोवन का कहना है कि ममता सरकार के खिलाफ एंटी-इन्कम्बेंसी का माहौल तो था ही, यह माना जा रहा था कि उनकी सीटें कम होंगी लेकिन इतनी नहीं कि भाजपा 200 के लगभग सीटें पा जाए। उनकी राय में टीएमसी को सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम वोटों के बिखराव के चलते हुआ है, जिसको ममता की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा था।
वे कहते हैं, ‘भाजपा की पहले दिन से मंशा थी कि मुस्लिम वोटों में बिखराव हो। इसके लिए भाजपा ने बंगाल में खूब पोलराइजेशन किया। इसके अलावा, माना जा रहा था कि मटुआ समुदाय जो भाजपा के कोर वोटर की तरह था, एसआइआर में काटे गए नामों की वजह से उससे छिटक सकता है लेकिन उसमें बिखराव नहीं हुआ।‘
कोलकाता की वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी का मानना है कि भाजपा की इतनी बड़ी जीत ममता बनर्जी के अकेले और अलग-थलग पड़ जाने की वजह से हुई है। वे कहती हैं कि भाजपा तो 2021 के बाद से ही लगातार ममता के खिलाफ एंटी-इन्कम्बेंसी का माहौल बना रही है, लेकिन स्थिति तब और खराब हो गई जब कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने भी इसको हवा दी, जिसका फायदा भाजपा को मिला।
वे कहती हैं, ‘ममता का सबसे बड़ा सपोर्ट आता था मुस्लिमों और महिलाओं से। कांग्रेस और सीपीएम ने अपना खाता खोलने के लिए मुस्लिम वोटर को ही टार्गेट किया, जिससे मुस्लिम वोटर में कई जगहों पर बिखराव हुआ। कई जगहों पर महिला वोटर भी भाजपा के वादों पर यकीन करके ममता का साथ छोड़ गईं। फिर घुसपैठिया का डर दिखाकर भाजपा हिंदू और रिफ्यूजी वोटरों को अपने पाले में लाने में सफल रही, जो उसकी जीत का कारण बना।‘
आंकड़ों के हिसाब से देखें, तो भाजपा के पास प्रवासी वोटर के तौर पर करीब 39 प्रतिशत वोट पहले से ही था। उसकी लड़ाई सिर्फ 5-7 प्रतिशत वोट बढ़ाने की थी जिसके लिए उसने ग्रामीण इलाकों पर फोकस किया जहां से उसे करीब तीन प्रतिशत वोट मिला। इसके अलावा एसआइआर में काटे गए 27 लाख वोटर, जिसमें सबसे ज्यादा महिलाएं और मुसलमान हैं, उसने टीएमसी को नुकसान पहुंचाया जिसका नतीजा भाजपा की इतनी बड़ी जीत के रूप में सामने आया।
नबो दत्ता मानते हैं कि टीएमसी की यह हार मोटे तौर से एंटी-इनकम्बेंसी का नतीजा है, हालांकि 27 लाख काटे गए वोट अगर बचे होते तो बहुत संभव है कि परिणाम कुछ और होते। इस मामले में उनके नागरिक मंच ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र भी लिखा था।
भय का विस्तार
चुनाव परिणाम के बाद बंगाल में काफी हिंसा देखी जा रही है। तृणमूल और सीपीएम के कई दफ्तरों को जलाया गया है। टीएमसी कार्यकर्ताओं की पिटाई हुई है। कलकत्ते के न्यू मार्केट में बुलडोजर चला है, जो चटर्जी के मुताबिक वहां पटरी पर माल बेचने वाले सौ फीसद खुदरा मुसलमान व्यापारियों को सीधा संदेश है कि अगर टीएमसी के दफ्तर का हम ये हाल कर सकते हैं तो कल को तुम्हारे साथ भी यही होगा। इस बीच चुनाव के पहले से तैनात ढाई लाख का अर्धसैन्य बल चुप है।

चुनाव परिणाम के अगले दो दिनों तक बहुत से उन बुद्धिजीवियों ने फोन नहीं उठाया जिनसे बीते दो महीनों में लगातार मेरी बात होती रही थी। एकाध ने विशेष अनुरोध किया कि उनका नाम न छापा जाए। ऐसे एक प्रोफेसर ने साफ कहा, ‘ममता के खिलाफ भयंकर एंटी-इन्कम्बेंसी आज से नहीं थी, इसकी शुरुआत टीएमसी सरकार बनने के बाद से ही हो गई थी जो 29 अप्रैल की वोटिंग तक बनी रही। उनमें एक अहंकार था, जिसके चलते उन्होंने सरकारी सिस्टम, लोकतांत्रिक संस्थाओं, आदि का निजी फायदे के लिए इस्तेमाल किया और घोटाला किया। इस चुनाव में इसका असर पड़ा। असर समाज के हर तबके पर पड़ा, सबसे निचले स्तर के मज़दूरों से लेकर ऊपर तक।‘
जादवपुर के बाजार और कॉलेज के इलाकों में फिलहाल अभूतपूर्व सन्नाटा कायम है। बीच-बीच में रह-रह कर पटाखों की या जय श्रीराम की आवाज आ जाती है, वरना कोई किसी से कुछ बोल नहीं रहा है। इस अजीबोगरीब माहौल को बयां करते हुए विद्यार्थी चटर्जी अपनी ओर से आखिरी बात कहते हैं, ‘बंगाली में एक कहावत है कि जब तुम्हारा समय ठीक न चल रहा हो तो सामने वाले से सोलह आना लेकर अपमान, कलंक, जख्म सब बरदाश्त कर के चुप रह जाओ, लेकिन जब सही समय आए तो पलट कर उसको अठारह आना दो।‘
इसका मतलब क्या है? चटर्जी कहते हैं, ‘एक साल के भीतर भाजपा को समझ आ जाएगा कि बंगाल को चलाना कितना मुश्किल है और लोगों को समझ आ जाएगा कि उन्होंने क्या गलती कर दी है। ये बिहार या यूपी नहीं है। उसके बाद का क्या होगा पता नहीं, लेकिन फिलहाल तो बंगाल को पीएमओ ही दिल्ली से चलाएगा।‘
दत्ता कहते हैं, ‘ममता बनर्जी का अगर सेहत ठीक रहा तो वह छोड़ेगा नहीं। हम उसके साथ वैचारिक रूप से नहीं हैं, लेकिन वो फाइटर है। और विपक्ष में रहते हुए ममता से डेडली कोई नहीं होता…।‘
(अभिषेक श्रीवास्तव के साथ)