संयुक्त विपक्ष के ‘चाणक्य’ के यहां भाजपा की सेंधमारी, महाराष्ट्र के बाद अब किसकी बारी?

विपक्षी एकता के लिए गैर-भाजपा दलों को एकजुट करने की मुहिम में लगे शरद पवार के घर में ही सेंध लग गई है। उनके भतीजे 40 से ज्‍यादा विधायकों के समर्थन से अचानक महाराष्‍ट्र के उपमुख्‍यमंत्री बन गए हैं। इस तरह शिव सेना के बाद अब एनसीपी भी बीच में से दो फाड़ हो गई है। कुछ और राज्‍यों में विपक्षी दलों के तमाम छोटे-बड़े नेता भाजपा के साथ संपर्क में हैं और सही मुहूर्त की बाट जोह रहे हैं। बंगलुरु में होने वाली संयुक्‍त विपक्ष की दूसरी बैठक खटाई में पड़ गई है।

ठीक दस दिन पहले पटना में विपक्षी दलों की एकता बनाने के लिए हुई बहुप्रचारित बैठक के हासिल को महाराष्‍ट्र में आज बड़ा झटका लगा है। राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और शरद पवार के भतीजे अजित पवार अपने विधायकों के साथ न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं बल्कि दोपहर में उन्‍होंने उपमुख्‍यमंत्री की शपथ भी ले ली है। बाकी नौ विधायकों को कैबिनेट में पद मिलना तय माना जा रहा है। इनमें ज्‍यादातर वे विधायक हैं जिनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की जांच चल रही है। एक विधायक हसन मुशरिफ़ पर इस साल तीन बार छापा पड़ चुका है।

शरद पवार द्वारा पहले पार्टी अध्‍यक्ष पद से इस्‍तीफा देना, फिर तीन सप्‍ताह पहले अपनी बेटी सुप्रिया सुले और प्रफुल पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्‍यक्ष बनाना अजित पवार को नागवार गुजरा था। उसके बाद से ही इस किस्‍म के पालाबदल की अटकलें लगाई जा रही थीं। पहले से अजित पवार का रिकॉर्ड इस मामले में खराब रहा है। पाला बदल के वे पांचवीं बार उपमुख्‍यमंत्री बने हैं। उन्‍होंने दो दिन पहले ही सदन में विपक्ष के नेता के पद से इस्‍तीफा दे दिया था और मुख्‍यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिले थे। इससे अंदाजा लगाया जा रहा था कि राज्‍य की राजनीति में कुछ बड़ा उलटफेर होने जा रहा है।  

इतवार को अजित पवार ने देवगिरि के अपने आवास पर एक बैठक बुलाई थी, जिसमें पटेल और सुले भी पहुंचे थे लेकिन सुले बीच में ही बैठक छोड़ कर चली गईं। अजित पवार को 40 सं ज्‍यादा विधायकों का समर्थन बताया जा रहा है।

यह सब कुछ शरद पवार की नामौजूदगी में हुआ है और पहली नहीं बल्कि दूसरी बार हुआ है। इससे पहले 2019 में भी जब अजित पवार भाजपा में गए थे तो शरद पवार को कानोकान खबर तक नहीं हुई थी। यह इस लिहाज से महत्‍वपूर्ण है कि शरद पवार 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सबको एकजुट करने की मुहिम में लगे हुए हैं और विपक्षी एकता के केंद्र में हैं। दो दिन पहले ही उन्‍होंने बंगलुरु में 13-14 जुलाई को होने वाली विपक्षी एकता की दूसरी बैठक होने की बात कही थी। इससे पहले इस बैठक का स्‍थान शिमला तय था जो बाद में बदलकर बंगलुरु कर दिया गया।

इस बैठक से पहले ही महाराष्‍ट्र की घटना हो गई। इसने विपक्ष के एक चेहरे के बतौर पवार की दावेदारी को तो खटाई में डाल ही दिया है, माना जा रहा है कि 13-14 जुलाई बैठक भी आगे के लिए टाल दी जाएगी।

गैर-भाजपा दलों का बिखरता शीराजा

आज की घटना के बाद माना जा सकता है कि एक ही दांव में शिव सेना और एनसीपी दोनों क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक भविष्‍य अब खतरे में पड़ गया है। अकेले महाराष्‍ट्र में ही संयुक्‍त विपक्ष के घटक दलों का किला नहीं ढह रहा। अलग-अलग राज्‍यों में विपक्ष के दलों में भारतीय जनता पार्टी ने अलग-अलग ढंग से सेंधमारी की है। इनमें ताजा सूचना जनता दल (युनाइटेड) से जुड़ी है। कहा जा रहा है कि ऐसे कम से कम दस नेता जेडीयू के हैं जो भाजपा में जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसी तरह उत्‍तर प्रदेश में बसपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कुछ नेता भाजपा के साथ संपर्क में बने हुए हैं।

पिछले हफ्ते बिहार के वरिष्‍ठ नेता उपेंद्र कुशवाहा ने एक अहम बयान दिया है जिसकी बहुत चर्चा नहीं हुई है। राष्‍ट्रीय लोक जनता दल के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा पहले जेडीयू के संसदीय बोर्ड के अध्‍यक्ष थे। फरवरी में उन्‍होंने पार्टी छोड़ कर अपनी नई पार्टी बना ली। उन्‍होंने दावा किया है कि जल्‍द ही जेडीयू का राष्‍ट्रीय जनता दल में विलय हो जाएगा और उसके कई नेता भाजपा में चले जाएंगे। यह बयान जेडीयू के नेता रामेश्‍वर महतो द्वारा पार्टी के बिहार अध्‍यक्ष उमेश कुशवाहा के ऊपर लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद आया था।

उपेंद्र कुशवाहा ने कहा था, ‘’जेडीयू के नेताओं के अंदरूनी विवादों के चलते पार्टी नष्‍ट हो जाएगी। वे बिहार में आरजेडी के साथ जाने के नीतीश कुमार के फैसले से नाराज थे। उन्‍हें अपना भविष्‍य कमजोर दिख रहा है और हो सकता है कि वे पार्टी छोड़ कर हमारे साथ आ जाएं या भाजपा में चले जाएं।‘’  

आज महाराष्‍ट्र के घटनाक्रम के बाद कुशवाहा ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि ‘’कथित विपक्षी एकता नाम का शिशु गर्भ में ही विकलांग हो गया। यह तो होना ही था, आखिर जन्म देने वाली मां ही कुपोषण का शिकार जो थी। इंतजार कीजिए, अभी बहुत कुछ देखने को मिलेगा।‘’

एनसीपी और शिव सेना की कमजोर होती राजनीतिक स्थिति के समानांतर महाराष्‍ट्र में अप्रत्‍याशित रूप से केसीआर की पार्टी भारत राष्‍ट्र समिति (बीआरएस) के शक्ति प्रदर्शन को मिली सफलता एक और आयाम खोलती है। जिस तरीके से तेलंगाना के मुख्‍यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के 700 से ज्‍यादा कारों के काफिले को महाराष्‍ट्र में बेरोकटोक जाने दिया गया जबकि इसी दिन तेलंगाना में राहुल गांधी की रैली में अड़चनें खड़ी की गईं, वह भी विपक्षी एकता के खटाई में पड़ने के लिहाज से एक अहम संकेत है।

गौर करने वाली बात है कि पिछले ही दिनों केसीआर की पार्टी के कुछ मंत्रियों और सांसदों ने कांग्रेस पार्टी का दामन थामा है। शिव सेना के नेता संजय राउत का कहना है कि केसीआर भाजपा की बी टीम हैं और भाजपा ने महाविकास अघाड़ी को कमजोर करने के लिए महाराष्‍ट्र में भेजा है।

विपक्षी एकता के महत्‍वपूर्ण चेहरों में एक पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने पंचायत चुनावों से पहले हुई हिंसा के दौरान कांग्रेस और मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी को जिस तरह आड़े हाथों लिया और दोनों दलों ने जैसे तृणमूल को हिंसा का दोषी ठहराया था, वह भी विपक्षी एकता के समक्ष अहम सवाल खड़े करता है। इस संदर्भ में तृणमूल कांग्रेस के नेता और सांसद सौगत राय का आया ताजा गयान बहुत मायने रखता है जिसमें उन्‍होंने साफ कहा है कि ‘बंगाल में हमें विपक्षी एकता की जरूरत नहीं है’’।

उधर कर्नाटक में, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने पिछले महीने ही ऐसा बयान दिया था जिससे कयास लगाए जाने लगे थे कि संसदीय चुनावों के लिए भाजपा के साथ उनकी पार्टी जनता दल (एस) का गठबंधन संभव है। देवगौड़ा ने कहा था कि यह एक ‘खुला रहस्‍य’ है कि कांग्रेस के कई नेताओं ने कर्नाटक सहित अन्‍य राज्‍यों में अपने स्‍वार्थ के लिए भाजपा के साथ हाथ मिलाया है।

पार्टी मुख्‍यालय पर एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस के दौरान देवेगौड़ा से जब पूछा गया कि क्‍या वे भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने में नीतीश कुमार के प्रयासों का समर्थन करेंगे, तब उन्‍होंने कहा था कि वे इस सवाल का जवाब तब देंगे जब रिपोर्टर उन्‍हें एक ऐसी पार्टी लाकर दिखा दे जिसने भाजपा से गठजोड़ के बगैर अपनी राजनीति कर ली हो।

यूपी में पालाबदल के दावेदार

लोकसभा चुनावों के मद्देनजर विपक्षी एकता के लिए सबसे महत्‍वपूर्ण राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी पहले दिन से ही अलग राग अलाप रही है। जिस दिन पटना की बैठक थी, पूर्व मुख्‍यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने तकरीबन तंज के अंदाज में उसकी आलोचना की थी। उन्‍होंने ट्विटर पर लिखा था, ‘’लोकसभा आम चुनाव के पूर्व विपक्षी पार्टियां जिन मुद्दों को मिलकर उठा रही हैं और ऐसे में श्री नीतीश कुमार द्वारा कल 23 जून की विपक्षी नेताओं की पटना बैठक ’दिल मिले न मिले हाथ मिलाते रहिए’ की कहावत को ज्यादा चरितार्थ करता है।‘’

अपने ताजा ट्वीट में पार्टी की ओर से समान आचार संहिता का आज बाकायदा समर्थन करने वाली मायावती ने तब लिखा था, ‘’यूपी में लोकसभा की 80 सीट चुनावी सफलता की कुंजी कहलाती है, किन्तु विपक्षी पार्टियों के रवैये से ऐसा नहीं लगता है कि वे यहां अपने उद्देश्य के प्रति गंभीर व सही मायने में चिन्तित हैं। बिना सही प्राथमिकताओं के साथ यहां लोकसभा चुनाव की तैयारी क्या वाकई जरूरी बदलाव ला पाएगी?’’

मायावती के इस बयान के पीछे की राजनीतिक हलचलों को भी देखा जाना होगा। नगर निकाय और पंचायत चुनाव से पहले मार्च में उत्‍तर प्रदेश के एक मंत्री दयाशंकर सिंह ने बयान दिया था कि विपक्षी दलों के कई बड़े नेता भाजपा में आने के लिए लाइन लगाए हुए हैं। दिलचस्‍प है कि इन ‘बड़े’ नेताओं में दो सांसद खुद मायावती की पार्टी बसपा से हैं, हालांकि बसपा के संयुक्‍त विपक्ष का हिस्‍सा फिलहाल न होने के कारण इसका कोई प्रभाव नहीं होगा।

समाजवादी खेमे से सबसे पहला नाम सजायाफ्ता गायत्री प्रजापति का है जिनके ऊपर 2019 के लोकसभा चुनाव में अमेठी में स्‍मृति ईरानी के लिए वोट जुटाने में मदद करने का आरोप लगा था। यूपी कांग्रेस के एक नेता बताते हैं कि उस वक्‍त प्रजापति को बाकायदा इसलिए जमानत दी गई ताकि वे भाजपा के लिए प्रचार कर सकें। हाल ही में स्‍मृति ईरानी के साथ प्रजापति की पत्‍नी मंच साझा करती दिखी थीं। इसके बाद से अटकलें लगाई जा रही हैं कि आज नहीं तो कल प्रजापति को जेल से ही भाजपा में ही शामिल होना है।

गायत्री प्रजापति की ही तरह समाजवादी पार्टी, बसपा और कांग्रेस के कई नेता हैं जिन्‍हें विपक्षी एकता की हांडी फूटने का इंतजार है ताकि वे सही समय पर सही सौदा पटा कर पाला बदल सकें। इनमें सबसे बड़ा नाम दारा सिंह चौहान का है जो मऊ के घोसी से विधायक हैं। वे साल भर पहले समाजवादी पार्टी में चले गए थे। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले उपयुक्‍त समय पर वे घर वापसी करेंगे।

पालाबदल की संभावनाओं में सबसे बड़ा नाम कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता पीएल पुनिया का है। इसकी आशंका को लेकर लखनऊ में चर्चा आम है कि पुनिया को यदि निकट भविष्‍य में उत्‍तर प्रदेश कांग्रेस का अध्‍यक्ष नहीं बनाया गया तो वे भाजपा में जा सकते हैं।

कुछ महीने पहले ही उत्‍तर प्रदेश कांग्रेस का अध्‍यक्ष बृजलाल खाबरी को बनाया गया है। खाबरी बसपा से आए हैं। संगठन में इस बात की बड़ी शिकायत है कि खाबरी को कोई खबर नहीं रहती, न ही वे संगठन में अहम नेताओं को जानते हैं। यूपीसीसी के भीतर खाबरी के खिलाफ गोलबंदी हो चुकी है और बहुत संभव है कि लोकसभा चुनाव से पहले संगठनात्‍मक फेरबदल में खाबरी को अध्‍यक्ष पद से हटा दिया जाय। ऐसे में जिन दो नामों की चर्चा आम है वे हैं पीएल पुनिया और अजय राय, जो बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ दो चुनाव लड़ चुके हैं।

जाहिर है, कांग्रेस की सांगठनिक फेरबदल में निराश नेता भाजपा की चौखट पर ही जाएंगे। यही हाल राजस्‍थान में है जहां भाजपा ने कांग्रेस के बागियों और असंतुष्‍टों को पचासेक सीटों पर खड़ा करने की योजना बनाई है। कांग्रेस का आंतरिक आकलन कहता है कि सचिन पायलट और अशोक गहलोत की लड़ाई में पचास से ज्‍यादा सीटें दांव पर लग सकती हैं और भाजपा चुनाव निकाल सकती है।

मध्‍य प्रदेश के शहडोल में एक सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि विपक्षी एकता की कोई गारंटी नहीं है। महाराष्‍ट्र के आज के घटनाक्रम को देखते हुए कह सकते हैं कि जो स्थिति बन रही है, उसमें संयुक्‍त विपक्ष की एकता काठ की ऐसी हांडी साबित होती दिखती है जिसमें बीरबल की खिचड़ी के पकने की वाकई कोई गारंटी नहीं है।


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