मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला हमेशा से नक्सलवाद के नाम पर ही सुर्खियों में रहा है। पिछले साल दिसंबर में जब अंतिम दो माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राज्य को नक्सलमुक्त घोषित किया, तब उन्हें शायद बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि इस जिले के आदिवासियों के सिर पर लाल सियासी आतंक से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा मंडरा रहा था- लाल चकत्ते का आतंक!
ऐसा नहीं है कि उस दौरान हर कोई गाफिल था। दिसंबर 2025 में ही कई पत्रकारों का ध्यान नक्सलवाद से हटकर वहां के आदिवासियों पर पड़ा था। उम्र के हिसाब से कम वजन और कम कद यानी कुपोषण के शिकार आदिवासी बच्चों के शरीर पर खुजली के निशान दिखे थे। पहली नजर में ऐसा लगा कि बच्चों को त्वचा संक्रमण हुआ होगा। तब स्थानीय पत्रकारों ने जिला कलेक्टर मृणाल मीना को इसकी जानकारी दी थी। उनके निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य शिविर भी लगाए। ये शिविर कुछ दिन तक चले। शायद खानापूर्ति रही होगी। फिर किसी ने उधर ध्यान नहीं दिया, जब तक कि जून में बच्चों की मौत की खबरें आना शुरू नहीं हो गईं।
गांवों में बच्चों की जान जाती रही, लेकिन 120 किलोमीटर दूर स्थित जिला मुख्यालय तक मासूमों के माता-पिता की चीख नहीं पहुंच सकी। जब मौतों का आंकड़ा आधिकारिक रूप से तीन पर पहुंचा तब जाकर प्रशासन उन गांवों तक पहुंचा, लेकिन स्थिति तब तक असामान्य हो चुकी थी। संक्रमण तेजी से फैलने लगा और बदले हुए मौसम ने अपनी अलग भूमिका निभाई। आज पूरे इलाके में ऐसा कोई घर नहीं है जिसमें कोई बीमार न हो लेकिन मौत के आधिकारिक आंकड़ों पर अब तक असमंजस फैला हुआ है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव मृतकों के परिजनों को मुआवजे के तौर पर दो लाख रुपये देकर खानापूर्ति कर चुके हैं, लेकिन दस दिन से प्रदर्शनरत आदिवासियों ने 3 सितम्बर को बालाघाट बंद का आह्वान किया है। दो दर्जन से ज्यादा मौतों के बाद भी मुख्यधारा के कथित मीडिया में ब्लैकआउट किए गए बालाघाट की सूचनाएं अब दिल्ली तक पहुंच चुकी हैं। इसमें बड़ी और इकलौती भूमिका कुछ युवा स्वतंत्र पत्रकारों की है। यह दर्दनाक कहानी कैसे शुरू हुई, प्रशासन को इसकी खबर समय रहते क्यों नहीं मिली और अब स्थिति नियंत्रण के बाहर कैसे जा चुकी है, इसे सिलसिलेवार जानना जरूरी है।
जून 2026: मौत के तांडव की शुरुआत
बालाघाट से करीब 110 किलोमीटर दूर अडोरी ग्राम पंचायत के तहत आने वाले तीन गांवों में महामारी अपने पैर पहले से ही पसार रही थी। इन गांवों के नाम हैं कुंडेकसा, बोंदारी और कोरका। यहां लोग बीमार पड़ रहे थे, लेकिन वे इतने जागरूक नहीं थे कि सबसे पहले अस्पताल जाएं। ऐसे में वे झाड़-फूंक और पंडे-पुजारी के भरोसे बने हुए थे।
पहली मौत 16 जून, 2026 को बोंदारी गांव में 16 साल के रूपलाल धुर्वे की हुई। यह मौत गुमनाम रही। यहां पर किसी के रोने की आवाज तक सुनाई नहीं दी। इसके ठीक दस दिन बाद 14 साल की लमनीन की मौत हुई। फिर ठीक एक दिन बाद चार साल के साहिल की मौत हुई।
इनके पिता सम्हारू धुर्वे का कहना है कि शुरुआत में उन्होंने झाड़-फूंक जरूर करवाया था, लेकिन आराम नहीं हुआ। हफ्ते भर से ज्यादा समय तक बीमार रहने के बाद वे बच्चों को गांव से 15 किलोमीटर दूर सोनगुड्डा प्राथमिक सामुदायिक केंद्र तक ले गए। वहां पर मामूली इलाज किया गया और वे उन्हें घर ले आए। फिर लगातार दो दिन के भीतर ही दोनों बच्चों की मौत हो गई।
अडोरी पंचायत के सरपंच परसराम धुर्वे के मुताबिक उन्हें इस बात की जानकारी तो थी कि उनके गांव में बीमारी फैली है, लेकिन स्थिति इतनी गंभीर है इससे वह भी अनजान थे। ऐसे में एक दिन गांव के ही व्यक्ति से चर्चा के बाद मामला उजागर हुआ था कि बीमारी गांव के हर घर में फैल चुकी है और स्थिति असामान्य है। इसी बीच 23 जुलाई को तीन साल की प्रीति की मौत हो चुकी थी।
जब प्रीति का अंतिम संस्कार चल रहा था तब जाकर सरपंच ने ग्रामीणों से बातचीत की। इसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने गांव में फैली बीमारी की जानकारी स्थानीय एसडीएम को दी। इसके बाद गांव में जांच शुरु हुई और नौबत यह आ गई कि कुंडेकसा गांव में अस्थाई अस्पताल बनाना पड़ा। उसके बाद तो दिन बीतते गए और बीमारी व मौतों के मामले सामने आते गए।
अगस्त 2026: कार्रवाई नहीं, तबादले
मौतों की संख्या 10 अगस्त, 2026 तक सिर्फ छह थी। प्रशासन सिर्फ अडोरी पंचायत के कुंडेकसा, बोंदारी और कोरका को ही प्रभावित क्षेत्र मान रहा था, लेकिन बीमारियों ने अब तक एक नहीं बल्कि दर्जनों गांवों में अपना घर बना लिया था।
बीमारी फैलती जा रही थी और बालाघाट के जिला अस्पताल में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही थी। शुरुआती तौर पर बच्चों की बीमारियों में देखा गया कि उनमें मीजल्स और मलेरिया के लक्षण है। मछुरदा, मातला, कोटबीर कोना, गठिया, तेंदूडेही, चिखली खेरटोला सहित कई गांवों में बीमारी फैल चुकी थी। इस बीच कांग्रेस के विधायक संजय उइके ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के 19 मौतों की जानकारी सार्वजनिक करवाई जिसके बाद प्रशासन के आंकड़ों पर ही सवाल खड़े होने लगे कि वह बच्चों की मौतें छुपा रहा है।
प्रेस कॉनफ्रेंस के बाद जब असल मामला उजागर हुआ तो बालाघाट से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया। प्रशासन मौतों की असल वजह की जांच में जुट गया। इसके बाद इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की टीम ने जांच की। तब खुलासा हुआ कि इलाके में मीजल्स यानी खसरा का संक्रमण है। साथ ही मलेरिया भी फैला हुआ है। ऐसे में कुपोषण से कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले बच्चों को सही समय पर इलाज नहीं मिल पाने के चलते मौतें हो रही हैं।
विधायक संजय उइके ने आरोप लगाया कि महालेखा परीक्षक और नियंत्रक (कैग) की रिपोर्ट में सामने आया है कि अप्रैल से पहले तक जो टेक होम राशन (टीएचआर) आता था उसमें पोषण आहार नहीं था। दूसरी तरफ अप्रैल से टीएचआर ही बंद कर दिया गया। इन आरोपों के बाद राज्य शासन सहित केंद्र सरकार की नीतियों पर ही सवाल खड़े हो गए। इसके उलट महिला एवं बाल विकास के आंकड़ों में हर दिन पूरी हाजिरी के साथ बच्चों को पोषाहार दिया गया है। ऐसे में बच्चे कैसे कुपोषित रह गए, यह सवाल खड़ा हुआ।
गौरतलब है कि बालाघाट के बैगांचल में हर छठा बच्चा कुपोषित है। ऐसे में उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कमजोर हो जाती है। वैसे, बालाघाट के बैगांचल में फैली महामारी के लिए एक नहीं बल्कि कई कारक जिम्मेदार हैं, जिनमें महिला एवं बाल विकास से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक की गंभीर लापरवाहियां देखने को मिली हैं। ऐसा ही एक विरोधाभास मलेरिया के मामले में भी देखने को मिला।
बच्चों की मौत के मामले में इस रिपोर्टर ने मलेरिया अधिकारी मनीषा जुनेजा से बातचीत की। उनका दावा था कि मलेरिया से एक भी मौत नहीं हुई है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में कई ऐसी मौतें हैं जिनकी वजह मलेरिया को माना गया है। ऐसा नहीं है कि मलेरिया से मौतें इसी साल हुई हों। दरअसल, हर साल बच्चों की मौतें हो रही थीं, लेकिन अफसरों ने उन मौतों से इनकार कर दिया।
स्थानीय मीडिया हमेशा से वहां मौत की खबरें दिखाता रहा है, लेकिन प्रशासन ने कभी कोई सख्त कार्रवाई नहीं की। मलेरिया अधिकारी पर आरोप है कि बीते वर्षों में जिन इलाकों में 57 प्रतिशत मलेरिया के केस आते थे वे कागज पर अचानक 29 प्रतिशत कैसे हो गए। दूसरी तरफ हाई रिस्क मलेरिया जोन में न तो रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव हुआ और न ही मेडिकेडेट मच्छरदानी बंटी। एक वजह यह भी थी कि बच्चों की हालत बिगड़ी। दिलचस्प है कि मलेरिया अधिकारी की जांच करने के बजाय स्वास्थ्य मंत्री ने उनका ट्रांसफर जबलपुर कर दिया।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में दावा किया गया था कि बीमारीग्रस्त इलाकों में 93 प्रतिशत तक टीकाकरण हुआ है। उस इलाके में यदि खसरा का टीकाकरण हुआ था, तो वहां पर खसरे की शिकायत क्यों पैदा हुई यह भी एक सवाल है। उस इलाके में ही नहीं, बल्कि हर इलाके में बच्चे खसरे से पीड़ित है। यहां टीकाकरण का प्रभार मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचएमओ) डॉक्टर परेश उपलव के पास था। ऐसे में सवाल उनके ऊपर सीधे उठता था कि टीकाकरण हुआ है या नहीं। अगर हुआ है तो टीका में क्या गड़बड़ी थी? कार्रवाई के तौर पर डॉक्टर उपलव से केवल प्रभार छीना गया।

बीती शाम 2 सितंबर को प्रशासन का एक आदेश आया जिसके मुताबिक बालाघाट के सीएमचओ डॉक्टर परेश उपलव को हटा दिया गया है। अब उनके स्थान पर डॉ. मनोज पांडेय को फिर से जिले के सीएमचओ की जिम्मेदारी दी गई है, जो अब तक डिंडोरी में तैनात थे।
लाचार स्वास्थ्य सेवाएं
बालाघाट के जिन गांवों में महामारी फैली है वहां तक आज भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंची हैं। वहां न तो सड़कें हैं और न ही पानी की व्यवस्था। एक जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि उन गांवों के पानी में एडिनो वायरस है, जिसे पीने से सर्दी, खांसी और जुकाम होता है।
एक महिला नाले के पानी से अपने बच्चों को नहला रही थी और खुद ही उस झिरिया का पानी पी रही थी। उसे देखकर इस रिपोर्टर ने सवाल पूछा कि ऐसा पानी कब से पी रही हो। तब उन्होंने बताया कि वे लोग बरसों से उस इलाके में ऐसे ही पानी पी रहे हैं। नल जल योजना का क्या हुआ, यह पूछने पर वे कहती हैं कि उधर पाइप ही नहीं बिछाये गए। यहां बाढ़ आ जाए तो लोगों को भूखे ही सोना पड़ता है। तब पानी और भी मटमैला हो जाता है जिससे वह इस्तेमाल के लायक नहीं रह जाता।
एक बड़ी समस्या यहां के गांवों में यह है कि उस इलाके में ज्यादातर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं है। वहीं एएनएम और नर्स भी राजनीतिक जुगाड़ या सिफारिश लगवाकर शहर या आसपास के गांव में अपना ट्रांसफर करवा लेते हैं।
बीते 4 अगस्त को जब चैन सिंह के बेटे सचिन की तबीयत बिगड़ी तो वह पहले उसे लेकर सोनगुड्डा के प्राथमिक अस्पताल गया। फिर 45 किलोमीटर दूर बिरसा के अस्पताल लेकर गया। वहां से सचिन को बैहर सीएचसी रेफर किया गया। जिला अस्पताल में बात नहीं बनी तो महाराष्ट्र के गोंदिया के निजी अस्पताल में सचिन को भर्ती करवाया गया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और सचिन की मौत हो गई।
अब बिरसा ब्लॉक के बीएमओ डॉक्टर सुनील सिंह की डिग्री पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल है कि उन्होंने उन इलाकों का दौरा क्यों नहीं किया जहां बीमारी फैली हुई है। उन्होंने सही जानकारी आखिर प्रशासन तक क्यों नहीं पहुंचाई?
जिन इलाकों में महामारी फैली है वहां पर बीमारियों को ईश्वरीय प्रकोप मानने का चलन है। ऐसे में लोग इलाज करवाने के बजाय सामान्यत: झाड़-फूंक करवाते हैं। अपने ईश्वर को मनाने के लिए वे मुर्गों की बलि देते हैं। जब मामला बिगड़ने लगता है तब वे डॉक्टर के पास जाते हैं। तब तक काफी देर हो चुकी होती है।
क्षतिपूर्ति या खानापूर्ति?
बीमारी और मौत की सुर्खियां बनने के बाद इस दौरान मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार बालाघाट आ चुके हैं। कांग्रेस के नेता विक्रांत भूरिया भी बालाघाट के प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचे। उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने की मांग रखी।
सत्तापक्ष की ओर से जनजातीय कार्य मंत्री कुंवर विजय सिंह भी यहां आए और प्रभावित गांवों का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की और बैगा आदिवासी समुदाय की आय बढ़ाने की बात कर चले गए। फिर अगले ही दिन उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री का भी दौरा हुआ।
आखिरकार मुख्यमंत्री मोहन यादव 29 अगस्त को बालाघाट के दौरे पर आए। वे सिर्फ एक प्रभावित गांव बोंदारी तक पहुंचे थे। उन्होंने चुनिंदा लोगों से बातचीत की और वापस निकल लिए। इस दौरान क्षतिपूर्ति के तौर पर मृतकों के परिजनों को उन्होंने दो लाख रुपये दिए। उन्होंने 24 बच्चों के परिजनों के खाते में पैसे ट्रांसफर किए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार ने दबी आवाज में ही सही बच्चों की मौत की जिम्मेदारी को स्वीकार कर लिया। इसके अलावा, उन्होंने संरक्षित जनजाति बैगा के विकास के लिए 225 करोड़ रुपये खर्च करने का ऐलान भी कर डाला।
इस ऐलान पर कांग्रेस विधायक संजय उइके ने आरोप लगाया है कि सरकार ने जो 100 गांव पहले चिह्नित किए थे ये वही गांव हैं जबकि बैगा बहुल कुल 150 गांव हैं, तो 50 गांवों को क्यों छोड़ दिया गया।
और आंदोलन…

बैगा आदिवासियों के बच्चों की मौत के विरोध में आदिवासी समुदाय के युवा लगातार 22 अगस्त से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। अंतत: आजिज आकर 29 मौतों के विरोध में समस्त आदिवासी समाज और जिलावासियों ने 3 सितंबर को बालाघाट बंद का आह्वान किया है।
प्रदर्शन कर रहे एक युवक ललित उइके का कहना है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव बालाघाट आए और सिर्फ दो लाख रुपये का मुआवजा देकर गए हैं, जो न्यायोचित नहीं है। उन्हें कम से कम एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाना चाहिए, साथ ही ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए।
आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में एक मांग यह थी कि सीएचएमओ को उनके पद से हटाया जाए। प्रशासन ने बंद से ठीक पहले 2 सितंबर की शाम नया सीएचएमओ नियुक्त कर दिया है।
(सभी तस्वीरें और वीडियो लेखक के सौजन्य से)
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