Supreme Court

Aravalli Sanrakshan Yatra

अरावली को बचाना क्यों जरूरी है? अवैध खनन के खिलाफ तीन दशक के संघर्ष से निकले अनुभव

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अरावली की पर्वत श्रृंखला में विकास पर बीते नवंबर में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने देश भर में पर्यावरण की चिंता करने वालों को सड़कों पर उतार दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर रोक लगा दी, सार्वजनिक चर्चा भी ठंडी पड़ गई, लेकिन अरावली का सवाल लगातार जिंदा है। लोग अरावली संरक्षण पदयात्रा पर निकले हुए हैं। बीते तीन दशक से अरावली में अवैध खनन, वातावरण और पानी पर लगातार संघर्ष चल रहे हैं, विडम्‍बना है कि लोगों का ध्‍यान अभी गया। पिछले वर्षों के संघर्षों, दमन और सबक को याद कर रहे हैं राजस्‍थान के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा

Rajasthan High Court

न्याय के रास्ते धर्मतंत्र की कवायद: जस्टिस श्रीशानंद, विहिप की बैठक और काशी-मथुरा की बारी

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कर्नाटक उच्‍च न्‍यायालय के एक जज की अनर्गल टिप्पणियों पर संज्ञान लेने के पांच दिन बाद उन्‍हें आखिरकार हलके में बरी कर के और साथ ही जजों के लिए किसी दिशानिर्देश का शिगूफा छोड़कर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से पानी में लाठी भांजने का काम किया है। देश की राजधानी में जब केंद्रीय कानून मंत्री और दो दर्जन से ज्‍यादा पूर्व जजों की मौजूदगी में खुलेआम काशी-मथुरा के मंदिरों की योजना बन रही हो, ऐसे में संवैधानिक नैतिकता के सवाल को कौन संबोधित करेगा? अदालती रास्‍ते से हिंदू राष्‍ट्र बनाने की कोशिशों पर सुभाष गाताडे

लोकसभा चुनाव की निगरानी: परदा उठने से पहले एक अरब मतदाताओं के लिए बस एक सवाल

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आगामी लोकसभा चुनावों की निगरानी के लिए एक स्‍वतंत्र पैनल (आइपीएमआइई) बना है। इसकी परिकल्‍पना पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एमजी देवसहायम ने की है। इस पैनल में लोकतंत्र, राजनीति विज्ञान, चुनाव प्रबंधन और चुनावी निगरानी तक विभिन्‍न क्षेत्रों के अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति-प्राप्‍त शख्सियतें शामिल हैं। पैनल का उद्देश्‍य चुनावों पर निगाह रखना, रिपोर्ट प्रकाशित करना और चिंताएं जाहिर करना है ताकि आम चुनाव 2024 निष्‍पक्ष, स्‍वतंत्र, पारदर्शी तथा लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुकूल रहे जिससे भारत के नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा की जा सके। स्‍वतंत्र पैनल की पृष्‍ठभूमि खुद एमजी देवसहायम की कलम से

चंदे का धंधा: स्टेट बैंक ‘एक दिन के काम’ के लिए सुप्रीम कोर्ट से महीनों क्यों मांग रहा है?

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स्‍टेट बैंक ने सुप्रीम कोर्ट से इलेक्‍टोरल बॉन्‍ड का डेटा सार्वजनिक करने के लिए महीनों का समय मांग कर न सिर्फ अपनी मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि डिजिटल इंडिया के नारे पर भी बट्टा लगा दिया है। चूंकि बैंक की मांगी तारीख तक लोकसभा चुनाव संपन्‍न हो चुके होंगे और नई सरकार भी बन चुकी होगी, तो यह मामला उतना सीधा नहीं है। एसबीआइ के लाभकारी मालिकों से लेकर केंद्र सरकार और नरेंद्र मोदी तक सबकी जान सुप्रीम कोर्ट के आदेश में अटकी हुई है। डॉ. गोपाल कृष्‍ण का विश्‍लेषण

सुप्रीम कोर्ट में मेटाडेटा: एक मुकदमा, जो बदल सकता है भारत के लोगों की सामूहिक नियति

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लोकसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट में सात जजों की संविधान पीठ के सामने एक ऐसा मुकदमा आ रहा है जिस पर फैसले के निहितार्थ बहुत व्‍यापक हो सकते हैं। भाजपा सरकार द्वारा मनी बिल की शक्‍ल में वित्‍त विधेयकों को पारित करवाने के खिलाफ करीब दो दर्जन याचिकाओं पर यह फैसला अगले महीने आना है, जो आधार कानून, इलेक्‍टोरल बॉन्‍ड और हवाला कानून आदि का भविष्‍य तय करेगा। इनके बीच सबसे बड़ा और अहम मामला आधार संख्‍या का है, जिसके नाम पर भारत के लोगों का मेटाडेटा विदेशी ताकतों को ट्रांसफर किया जा रहा है।

वेदांता के खिलाफ अब कालाहांडी में खुल रहा है मोर्चा, लेकिन अबकी सामने अदाणी भी है…

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नियमगिरि आंदोलन की कामयाबी के बाद माना गया था कि पूर्वी तट के आदिवासियों के पहाड़ खनन से बच जाएंगे। आज दस साल बाद ठीक उलटा हो रहा है। वेदांता को तो बॉक्‍साइट खदान मिली ही है, अदाणी भी दो खदानों के साथ मैदान में है। संघर्ष का नया मोर्चा खुल रहा है कालाहांडी जिले के सिजिमाली और खंडुआलमाली में, जो देश का सबसे गरीब इलाका है। पिछले हफ्ते हुई दो जनसुनवाइयों में आदिवासियों ने कंपनी का जैसा प्रतिरोध किया है वह प्रेरक है, लेकिन यह लड़ाई तिहरी है और चुनाव पास हैं। अभिषेक श्रीवास्‍तव की लंबी रिपोर्ट

बदलाव के सुराग : केवल एक दंगा कैसे दस साल के भीतर भाईचारे का पलड़ा पलट देता है

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मुजफ्फरनगर में दस साल पहले दंगा हुआ था। सितंबर 2013 का महीना था। तब यूपी में सरकार भाजपा की नहीं थी। कमीशन बना, रिपोर्ट आई, समाजवादी सरकार बरी हो गई। समाज ने धीरे-धीरे खुद को संभाला। फिर हाइवे बने, किसान आंदोलित हुए, यूट्यूब चैनल पनपने लगे। दस साल में दुनिया इतनी बदल गई कि एक मामूली स्‍कूल की छोटी सी घटना तक सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने लगी। मुजफ्फरनगर के गांव-कस्‍बों में लोग इस बदलाव को कैसे देख रहे हैं? क्‍या सोच रहे हैं? मुजफ्फरनगर से लौटकर अभिषेक श्रीवास्‍तव की मंजरकशी

मणिपुर: ‘राजकीय हिंसा’ पर बहस के लिए SC ‘सही मंच नहीं’, मीडिया में बोलने वालों पर FIR

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आज सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई में मणिपुर की हिंसा से अपना पल्‍ला पूरी तरह झाड़ लिया और इसे राज्‍य सरकार का मसला करार दिया। मणिपुर के विभिन्‍न समूहों की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्‍य न्‍यायाधीश चंद्रचूड़ और और पीएस नरसिम्‍हा की पीठ ने साफ कहा कि वह राज्‍य में कानून व्‍यवस्‍था का मसला अपने हाथ में नहीं सकती, ज्‍यादा से ज्‍यादा अधिकारियों को हालात बेहतर करने के सुझाव दे सकती है।