पश्चिम बंगाल : जीत-हार से परे, राजनीति की ऑप्टिक्स को कैसे बदल रहा है प्रवासी ‘हिन्दुस्तानी’ वोटर

A saffron clad man crossing College Street in Kolkata
A saffron clad man crossing College Street in Kolkata
पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे और आखिरी चरण का मतदान होना है। वोटिंग कलकत्ते में भी है, जो उत्तर-भारतीय प्रवासियों का सबसे बड़ा केंद्र है। इसी वोटबैंक के दम पर भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने का दावा कर रही है। चुनाव के सबसे बड़े सवाल हार-जीत से इतर, असल कहानी यह है कि हिंदी बोलने वाले उत्तर भारत के प्रवासी बंगाल की राजनीति को देखने-समझने के तरीकों को कैसे बुनियादी ढंग से बदल रहे हैं। अमन गुप्‍ता पिछले साल भर से बंगाल जाकर वहां की बदलती हुई जमीन का जायजा लेते रहे हैं। अब भी वे कोलकाता में ही हैं। बंगाल में राजनीतिक धारणा-निर्माण और प्रवासियों के बीच रिश्‍ते पर अमन गुप्‍ता के अनुभवों का निचोड़ बताती उनकी ही कहानी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पहले चरण के मतदान में 23 अप्रैल को हुई ऐतिहासिक वोटिंग (1947 से अब तक सबसे ज्‍यादा) के साथ ही यह सवाल और बड़ा हो गया है कि चुनाव कौन जीत रहा है। सवाल एक है, लेकिन जवाब सबके अलग-अलग हैं। वैसे तो बंगाल के अलावा चार और राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, लेकिन दिल्‍ली में बैठी सत्ता की दिलचस्पी पश्चिम बंगाल में ज्यादा है। कारण, कि बाकी राज्यों के मुकाबले बंगाल उत्तर भारत के सबसे ज्यादा करीब है। दूसरा, यहां से बनने वाले नैरेटिव को पूरे भारत में बेचा जा सकता है, जिसके आधार पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) केंद्रीय सत्ता में 2029 के बाद भी बने रहने की उम्‍मीद बांध सकती है।

बंगाल में जो लोग भी चुनाव के बारे में खुलकर बात कर रहे हैं,  वे इस सवाल का जवाब दो तरह से दे रहे हैं। पहला, तृणमूल कांग्रेस फिर से सरकार बना रही है- ऐसा कहने वालों में आम तौर पर बंगाली वोटर है, जो खुलकर अपनी राय जाहिर करने से बच रहा है। उसके लिए भाजपा एक ‘बाहरी’ पार्टी है, जिसके सत्ता में आने से बंगाल के बर्बाद होने का डर है। इस बंगाली वोटर को गुमान है कि इसने शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान, साहित्य, सिनेमा के जरिये दुनिया को बाकी भारत से थोड़ा पहले देख-समझ लिया था। इसका चरित्र इसकी खुद की नजर में ‘सॉफिस्टिकेटेड’ है। इसीलिए उसे उत्तर भारत के मतदाताओं की तरह भाजपा की सांप्रदायिक और आक्रामक राजनीति पर भरोसा नहीं है।


प. बंगाल: पंद्रह लाशों के ढेर पर लोकतंत्र के पंचवर्षीय नृत्य का सज चुका है मंच


इसमें सबसे निर्णायक तबका कलकत्ता का भद्रलोक है, जो आगामी 29 अप्रैल को अपना मत डालेगा। ये वही तबका है जो आज भी बाहर के लोगों के लिए बंगाली होने के मायने को वैचारिक स्‍तर पर नियंत्रित करता है। उसको डर है कि भाजपा अगर सत्ता में आई तो ‘सब कुछ’ तहस-नहस कर देगी- सब कुछ का मतलब बंगाली होने से जुड़ी हर सांस्‍कृतिक चीज है। इसका बड़ा कारण यह है कि भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में जिन मुद्दों को उठाया है, वे उसके अभ्यस्त नहीं हैं क्‍योंकि बंगाल में बीते दशकों के दौरान राजनीतिक दलों और सरकार के प्रमुख का चेहरा बदलते रहने के बावजूद किसी ने कभी भी बंगाली होने के मायनों को बदलने का प्रयास नहीं किया था। यह काम अब संगठित रूप से भाजपा कर रही है और इस कवायद की बुनियाद में उत्तर भारत का प्रवासी मतदाता है।


BJP is trying to mobilise North Indian voters by organising programs and meetings in West Bengal
हिंदीभाषी उत्तर भारतीय मतदाताओं की गोलबंदी पर भाजपा का पूरा जोर है

इसी मतदाता को अपने पक्ष में गोलबंद करने के लिए भाजपा ‘उत्तर भारतीय सम्‍मेलन’ जैसे आयोजन करवा रही है। ऊपर लगी तस्‍वीर भाजपा के जोड़ासांको विधानसभा से प्रत्‍याशी विजय ओझा के प्रचार की है, जिनके समर्थन में उत्तर प्रदेश के मंत्री नंद गोपाल गुप्‍ता की उपस्थिति में 26 अप्रैल की शाम ‘उत्तर भारतीय सम्‍मेलन’ होने जा रहा है।

जोड़ासांको वही जगह है जिसने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को पैदा किया। यह संयोग नहीं है कि भाजपा ने बंगाल में सांस्‍कृतिक और प्रतीकात्‍मक महत्‍व रखने वाली हर जगह को छेकने का काम किया है। मसलन, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ कोलकाता के जिस अपार्टमेंट से भाजपा के लिए चुनाव प्रचार कर रहा है, वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जगह है। जाहिर है, वे भाजपा-समर्थक हिंदीभाषी उत्तर भारतीय प्रवासी लोग ही हैं जो साफ तौर पर परिवर्तन की बात करते हुए कह रहे हैं कि अबकी भाजपा की सरकार बनेगी।

इसके अलावा एक तीसरा वर्ग भी है जो कह रहा है कि चुनाव बहुत फंसा हुआ है कुछ भी हो सकता है, लेकिन भाजपा के जीतने के चांस ज्यादा हैं। उनकी इच्छा है कि भाजपा सरकार बनाए। दूसरा और तीसरा जवाब देने वाले वे लोग हैं जो चाहते तो हैं कि भाजपा सरकार बनाए लेकिन उनमें कुछ को इतना भरोसा नहीं हो पाया है कि ऐसा हो सकता है, हालांकि वे अपनी तरफ से इस नैरेटिव को प्रचारित करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं कि सरकार तो भाजपा ही बना रही है। दूसरा और तीसरा जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसा बोलने वाले ज्यादातर लोग पहले जवाब देने वालों की निगाह में ‘बाहरी’ हैं (घुसपैठिया नहीं), जो बीते ड़ेढ़-पौने दो सौ साल से लेकर हाल-फिलहाल तक पश्चिम बंगाल में (खासकर कोलकाता शहर में) आकर बसे हैं।

इनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी छठवीं-सातवीं पीढ़ी बंगाल में है। इनमें बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, और राजस्थान के मारवाड़ी हैं। बंगाल में ऐसे लोगों की पहचान ‘हिंदुस्तानी’ की है, यानी जो हिंदी बोलते हैं। इन लोगों का परंपरागत ठिकाना पुराने जूट मिल वाले इलाके हुआ करते थे। यह संयोग नहीं है कि भाजपा का प्रचार करने के लिए यूपी-बिहार से कोलकाता आए ज्‍यादातर कार्यकर्ता और पत्रकार हावड़ा, बैरकपुर, पानीहाटी, नैहाटी, रिसड़ा आदि हुगली किनारे जूट मिल वाले इलाकों में जोर आजमा रहे हैं या फिर विधाननगर (साल्‍टलेक) जैसे नए बसे बाहरी इलाकों में रहने और काम करने वाले युवाओं के बीच जा रहे हैं।  

बंगाल में रहने वाले हिंदीभाषी उत्तर भारतीय मतदाताओं के जोर पर खड़ा भाजपा का चुनाव प्रचार किस तरह से इन लोगों को प्रभावित कर रहा है, इसको समझने के लिए हमने राह चलते कुछ लोगों से बात की।


Tea Shops in Kolkata are still entres of political discussion
चाय के अड्डे कलकत्ता में अब भी जीवंत राजनीतिक चर्चा का केंद्र हैं

इस सिलसिले में पहली मुलाकात जवाहर उर्फ जगदीश से हुई जो पिछले सत्तर साल से कोलकाता में रह रहे हैं। वे भोर में चार बजे पार्क स्ट्रीट पर चाय की एक दुकान के खुलने का इंतजार कर रहे थे। उनकी झुकी हुई कमर, कांपते हुए हाथ से उनकी उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता था। वे मूल रूप से राजस्थान के हैं। शुरू में सामान्य बातचीत और परिचय के बाद चुनाव पर जब बात आई तो वे बोले, ‘मुकाबला बहुत कड़ा है, लेकिन भाजपा की सरकार बननी चाहिए।‘

कारण पूछने पर वह सबसे पहले आरजी कार मेडिकल कॉलेज की घटना की याद दिलाते हुए कहते हैं कि उस लड़की साथ बहुत बुरा हुआ, उसको इंसाफ मिलना चाहिए। इसके अलावा, उनकी परेशानी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ‘छोकड़े लोगों’ से और बांग्लादेशी घुसपैठियों से है, जो यहां का नागरिक बनकर उनका हक खा रहे हैं। जवाहर ने अपने नाम की कहानी भी बताई। उनके पिता का नाम मोतीलाल था। इसलिए उनके स्कूल के मास्टर ने कहा कि जब बाप का नाम मोतीलाल है तो बेटे का नाम जवाहर होना चाहिए।    

घंटे भर बाद वहां से निकलने का वक्‍त हुआ। तब वहां पहुंचे रैपिडो-ओला बाइक चलाने वाले 24 साल के अजय प्रसाद भी चुनावी चर्चा में शामिल हो गए। मूल रूप से बिहार के गया के रहने वाले अजय का जन्म कोलकाता में ही हुआ है। उन्हें चुनाव में कोई रुचि नहीं है, लेकिन वे टीएमसी के छोकड़े लोगों के परेशान करने से बहुत दुखी हैं। दो दिन पहले हुई एक घटना का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि कैसे सिविल पुलिस द्वारा रेड लाइट पर खड़ी उनकी मोटरसाइकिल की चाबी निकाल कर 500 सौ रुपये का चालान कर दिया गया। इसके चलते उनका पूरा दिन बर्बाद हो गया, काम का नुकसान सो अलग।

वह बताते हैं कि टीएमसी ने सिविल पुलिस में सब अपने छोकड़े लोगों को भरा हुआ है, जो खाली गुंडई करते हैं, ‘…और ऐसे गुंडों को सुधारने के लिए भाजपा का सरकार में आना बहुत जरूरी है ताकि बंगाली लोगों का गुंडई कम किया जा सके।‘ बाकी, टीएमसी सरकार से नाराजगी के कारणों में वह उन्हीं सब बातों को दोहराते हैं जो जवाहर थोड़ी देर पहले बोल रहे थे।

बेहतर जीवन की तलाश में बिहार के नवादा से कोलकाता आए दिनेश मंडल भी उन लोगों में से हैं जिन्हें लगता है कि टीएमसी की सरकार ने बंगाल को बर्बाद कर दिया है। उनको सबसे ज्यादा दिक्कत बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों से है जिसके चलते उन्हें शहर में काम नहीं मिल रहा है। उनके मुताबिक ममता बनर्जी घुसपैठियों को बिठा कर खिला रही हैं, ‘बंगाल सरकार बेरोजगारी भत्ता देकर लड़कों को बिगाड़ रही है। पढ़ने वाले लड़कों या फिर काम की तलाश कर रहे लड़कों को बैठे-बिठाए 1500 रुपया मिलेगा तो वह काम क्यों करेगा?’ वे कहते हैं, ‘बंगाली सब हरामी हो गया है, काम ही नहीं करना चाहता है काहे कि दीदी पैदा होने से लेकर मरने तक का सुविधा दे रही है।‘

यही प्रवासी वोटर अबकी चुनाव में भाजपा को लड़ने लायक स्थिति में बनाए हुए है। यह संयोग नहीं है।  यही लोग बाहर से आने वालों की ऐसी धारणा भी बना रहे हैं कि भाजपा न सिर्फ मजबूती से लड़ रही है, बल्कि जीत भी रही है। भाषा के मामले में बाहर से चुनाव का जायजा लेने आए पत्रकारों और प्रेक्षकों की मजबूरी कहें या सीमा, यही भाजपा की जीत की धारणा को और मजबूत करती नजर आती है।

दरअसल, दिल्ली या फिर कहीं और से आने वाले गैर-बांग्‍लाभाषी लोगों का सबसे पहला परिचय इन्हीं हिंदीभाषी लोगों से होता है। लंबे समय से यहां रहने के कारण बंगाली बोलना सीख चुका यह समुदाय पहली नजर में सामने वाले को बंगाली होने का एहसास दिलाता है, लेकिन जैसे ही बात आगे बढ़ती है तब समझ आता है कि वह बंगाली नहीं है। चुनावी राय जानने के लिए बाहर से आए लोग सबसे पहले इन्हीं हिंदीभाषी लोगों से बातचीत शुरू करते हैं, बाद में उनका चेहरा और उनकी राय को प्रमुखता से दिखाते हैं। यह मेरी तीन लंबी यात्राओं का अनुभव है जो बीते छह महीने में मैंने की हैं। कोई भी यात्रा दस दिन से कम की नहीं रही। हिंदीभाषी होने के नाते मेरी सीमा भी यही रही कि मैं बंगालियों से उतना संवाद नहीं कर सका जितना बंगाल में रहने वाले प्रवासियों से मेरा संवाद हुआ।  


Bada Bazar is the biggest centre of migrant workers in Kolkata
कोलकाता का बड़ा बाजार प्रवासी मजदूरों का सबसे बड़ा केंद्र है, वहां एक दुकान के बाहर मोबाइल पर व्यस्त एक प्रवासी

उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर से सौ साल पहले यहां आकर बसे सुरेश उन्हीं लोगों में से एक हैं, जिनसे अपनी यात्राओं में मेरा शुरुआती संवाद हुआ था। सुरेश कहते हैं कि इस बार का चुनाव भाजपा पूर्ण बहुमत से जीत रही है। वे बाकायदा जीत का समीकरण गिनवाते हैं, ‘बंगाल में पौने तीन करोड़ के लगभग प्रवासी वोटर है, जो कुल वोटर का 35 प्रतिशत के आसपास होता है और पूरी तरह से भाजपा के साथ जुड़ा हुआ है। वह भाजपा का प्रचारक बना हुआ है। ऐसे ही मटुआ, राजवंशी और गोरखा हैं, जिनकी अपनी अलग पहचान और मांगें हैं। इन सबको मिलाकर संख्या होती है चालीस प्रतिशत के लगभग। थोड़ा सा जो कम पड़ रहा है उसके लिए एसआइआर है, जिसका सीधा असर ममता के वोटबैंक पर पड़ेगा। उसके बाद थोड़ा बहुत जो कम होगा, वह मूल बंगाली वोटर से पूरा होगा। उन्हें भाजपा अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है, जैसे कि उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग इलाके के गोरखा, जो दशकों से गोरखालैंड की मांग कर रहे हैं।‘  

उत्तर भारतीयों के भाजपा से जुड़ने की वजह बताते हुए सुल्तानपुर के विवेक जायसवाल (बदला हुआ नाम) कहते हैं, ‘यहां का मूल बंगाली लोग हमको बंगाली ही नहीं मानता है जबकि हमको यहां रहते हुए सवा सौ साल हो गया। बंगाली हमको हिंदुस्तानी बोलता है। हम लोगों ने यहां की भाषा सीखी, इनके तौर-तरीके सीखे, और इनकी संस्कृति को अपनाया, मेहनत-मजदूरी हम करते हैं, व्यापार हम करते हैं तो ये साला बंगाली करता क्या है? खाली बक-थेथरई?’

वे पूछते हैं, ‘अगर हम हिंदुस्तानी हैं तो फिर बंगाल क्या है, बांग्लादेश? तुम इतने सालों के बाद भी अपने जैसा नहीं मानते हो तो हम काहे तुम्हारा आमार सोनार बांग्ला मानें? फिर पूरा हिंदुस्तान तो एक ही है न! तो बंगाल में खाली बंगाली बाबू का दबदबा रहेगा?’ 

यह अनायास नहीं है कि हिंदीभाषी गैर-बंगाली जिन मुद्दों को अपनी चर्चाओं में उठा रहा है, बिलकुल उन्‍हीं मुद्दों को योगी आदित्यनाथ, हेमंत विस्वा सरमा, अमित शाह, जैसे भाजपा के तमाम नेता अपने प्रचार का विषय बना रहे हैं। कई बार तो समझ में ही नहीं आता कि कौन किसके एजेंडे पर खेल रहा है। इस चक्कर में बंगाल की जमीन से अपरिचित भाजपा के कुछ नेता प्राय: गलतबयानी भी कर जा रहे हैं।

चुनावरत पांच राज्‍यों के बीच केरल, तमिलनाडु और बंगाल ही ऐसे राज्‍य हैं जहां भाजपा कभी सरकार नहीं बना पाई। इनमें भी बंगाल इकलौता है जहां भाजपा की सरकार बनाने की उम्मीदें सबसे ज्यादा हैं। भाजपा को लग रहा है कि पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने का यह सबसे बड़ा मौका है, अगर अब नहीं जीते तो पता नहीं वह मौका दोबारा कब आए। इसीलिए वह चुनाव जीतने के लिए हर जतन कर रही है। पार्टी ने अपने उत्तर भारतीय समर्थकों को छह महीने पहले से ही अपने लिए माहौल बनाने के काम पर लगा दिया था।  


प. बंगाल: चुनाव नतीजे से पहले शाह से मिले गवर्नर, बोले ‘बसंत दूर नहीं है’!


बीते साल दुर्गा पूजा के समय अमित शाह कोलकाता आए हुए थे। उनकी यात्रा के चलते दुर्गापूजा पर खूब राजनीति हुई थी। खूब आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला था। एक दुर्गापूजा पंडाल का उद्घाटन करते हुए अमित शाह ने कहा था कि उन्होंने मां दुर्गा से आमार सोनार बांग्ला बनाने का आशीर्वाद मांगा है। उन्‍होंने संतोष मित्रा स्कवायर के जिस पंडाल का उद्घाटन किया था वह कलकत्ता के सबसे पुराने पंडालों में से एक है। उस समय मैं कोलकाता में ही था। एक होटल के मैनेजर ने तब बात करते हुए कहा था, ‘देखते हैं अब दीदी को कौन बचाता है। उसको आरजी कार की पीड़िता का शाप लगेगा जिसे वह इंसाफ नहीं दिला पाई।‘ जो बातें आज भाजपा के प्रचार का प्रमुख हिस्सा हैं, वे सभी बातें उस व्‍यक्ति ने मुझसे छह महीने पहले कही थीं।

इसीलिए यह भी कोई संयोग नहीं है कि भाजपा ने आरजी कार बलात्‍कार कांड की पीड़िता की मां रत्‍ना देबनाथ को पानीहाटी विधानसभा से अपना उम्‍मीदवार बनाया है। रत्‍ना के समर्थन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले मतदान के अगले ही दिन 24 अप्रैल को पानीहाटी में एक चुनावी जनसभा की थी और तृणमूल को ‘महिला-विरोधी’ पार्टी करार देते हुए घोषणा की थी कि 4 मई को आने वाले चुनाव नतीजे के बाद बंगाल में बनने वाली भाजपा की नई सरकार आरजी कार कांड से जुड़ी सारी फाइलों को दोबारा खोलेगी।


Mother of RG Kar rape victim Ratna Debnath is a BJP candidate from Panihati in West Bengal Elections
भाजपा ने पानीहाटी विधानसभा से रत्ना देबनाथ को अपना प्रत्याशी बनाया है

भाजपा ने इस बार 2021 के विधानसभा चुनाव से उलट अपना प्रचार भले देर से शुरू किया, लेकिन हिंदीभाषी उत्तर भारतीय पैदल सिपाही बनकर हमेशा से उसका प्रचार-प्रसार कर रहे थे। पिछले विधानसभा चुनाव में 38 प्रतिशत वोट और 77 सीटें तथा 2024 के लोकसभा चुनाव में 39 प्रतिशत वोट और 12 सीटें पाने वाली भाजपा की पहली प्राथमिकता यही रही कि उत्तर भारतीय वोटर को हर हाल में अपने पाले में बनाए रखा जाए, उसके बाद अतिरिक्‍त 10 प्रतिशत वोट के लिए मेहनत की जाए। इस मामले में भाजपा काफी हद तक कामयाब रही है: सुरेश जैसे भाजपा-समर्थक गवाह हैं, जो पिछले चुनाव में भी भाजपा के जीतने का दावा कर रहे थे और आज भी उसी पर कायम हैं।

उत्तर प्रदेश के एक एमएलसी जो बीते दो महीने से पश्चिम बंगाल में डेरा डाले हुए हैं, नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘पार्टी की तरफ से हमको केवल अपने इलाके के वोटरों को साधने के लिए बंगाल भेजा गया था। हमारे क्षेत्र के बंगाल में बहुत लोग हैं।” उत्तर प्रदेश से ही प्रचार के लिए आए भाजपा के एक और नेता कहते हैं कि ‘हम बंगाल जीतने के लिए हर वो काम करेंगे जो हमको जीत दिलाए।‘

वे बताते हैं कि कलकत्ता का एक पांचसितारा होटल बीते दो महीने से पूरा बुक है। वहां रहने वालों का काम सिर्फ इतना है कि अपने-अपने क्षेत्र के लोगों से मिलकर उनको भाजपा के पक्ष में लाना और उनको जिम्मेदारी का एहसास दिलाना कि अगर वे राज्य में बेहतर जीवन और सुरक्षा चाहते हैं तो ज्यादा से ज्यादा लोगों को भाजपा के पक्ष में जोड़ें। इसके लिए हर एक उत्तर भारतीय को सौ वोटरों को अपने साथ जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई है। उनके मुताबिक इस काम में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है।  

इसके अलावा, भाजपा के बड़े नेताओं की जिम्‍मेदारियां भी स्‍पष्‍ट हैं। जैसे, राजस्थानी मारवाड़ी-जैन समुदाय को भाजपा के पाले में लाने की जिम्मेदारी राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को दी गई है। यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्‍यमंत्री हेमंत विस्वा सरमा का काम सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना है।

आज से ठीक दो महीने पहले बंगाल बिल्कुल शांत था। कह पाना मुश्किल था कि यह वही जबह है जहां अगले 15 दिनों में चुनावी प्रक्रिया शुरू होने वाली है। चुनाव से ठीक पहले की यह शांति थोड़ा आश्चर्यचकित करने वाली थी, चूंकि आम बंगाली बहुत वोकल होता है। ऐसा लग रहा था कि मतदाता राजनैतिक यथास्थिति कायम रहने को लेकर आश्‍वस्‍त हैं। जानकारों से बात करने पर कुछ हद तक यह बात अब भी सही जान पड़ती है।

कलकत्ता युनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर किंशुक चटर्जी इस बात को दूसरे ढंग से समझाते हैं, ‘दो बंगाली कहीं रह रहे हों, वे मिलकर एक नया बंगाल बना देंगे, लेकिन वे बंगाल में किसी नॉन-बंगाली को जल्दी स्वीकार कर लेंगे इसकी संभावना कम है।’ वे कहते हैं कि मूल बंगाली आपके बोलने के तरीके से पकड़ लेगा- जैसे ही उसे पता लगेगा कि आप बंगाली नहीं हैं वह आपको साइड करना शुरू कर देगा।


Around 57 percent women voters have been deleted in SIR that would impact TMC in West bengal Elections
SIR में लगभग 57 लाख औरतों का नाम मतदाता सूची से काटा गया है, जो टीएमसी के लिए नुकसानदायक है

कलकत्ता यूनिवर्सिटी में ही इतिहास के एक और प्रोफेसर सौमित्र मुखर्जी इस मामले में थोड़ा अलग राय रखते हैं, ‘ममता भाजपा के साथ केवल ऑप्टिक्स की लड़ाई लड़ रही हैं, इसके अलावा बंगाल में भाजपा का विरोध करने की कोई वजह नहीं है। आखिर वही तो उन्हें लेकर आई हैं।‘   

कोलकाता की वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी बिलकुल ठोस आकलन बताती हैं, ‘एसआइआर के तीनों चरणों में सबसे ज्यादा लगभग 57 लाख महिलाओं का वोट काटा गया है, जो 57 फीसदी के लगभग है। टीएमसी के सत्ता में आने के बाद से लेकर अब तक महिलाएं ममता बनर्जी के साथ बनी हुई हैं। राज्य सरकार की ज्यादातर  योजनाएं महिलाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर एसआइआर के जरिये महिला वोटरों को नाम मतदाता सूची से हटाया जाना टीएमसी को नुकसान तो पहुंचाएगा ही।‘


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