G-20 के लिए लोगों को उजाड़ने के खिलाफ बोलना भी जुर्म, दिल्ली में रुकवा दिया गया We-20 सम्मेलन

दिल्‍ली से लेकर वृंदावन, अयोध्‍या, बनारस, ओडिशा, बंगाल यानी समूचे देश में लोगों को उजाड़ा जा रहा है। बहाना है आगामी सितंबर में होने वाला जी-20 शिखर सम्‍मेलन और उसके लिए शहरों का सुंदरीकरण। इस बेदखली, विस्‍थापन और बेघरी के खिलाफ 700 से ज्‍यादा लोग दिल्‍ली में तीन दिन बंद कमरे में विचार-विमर्श करने को जुटे थे। दिल्‍ली पुलिस ने दूसरे दिन माहौल बिगाड़ा और तीसरे दिन के सत्र को होने ही नहीं दिया। यह सम्‍मेलन आधे में ही खत्‍म हो गया।

देश भर के 70 से ज्‍यादा सामाजिक संगठनों के 500 से ज्‍यादा प्रतिनिधि दिल्‍ली में 18 अगस्‍त को तीन दिन के एक सम्‍मेलन में इकट्ठा हुए थे। यह सम्‍मेलन आगामी जी-20 शिखर सम्‍मेलन की जनविरोधी प्रकृति के खिलाफ बुलाया गया था और इसे वी-20 नाम दिया गया था। इस सम्‍मेलन के दूसरे दिन ही दिल्‍ली पुलिस ने अड़ंगा डालना शुरू किया और तीसरे दिन की कार्रवाई को होने से रोक दिया। सम्‍मेलन की कार्रवाई को एक घोषणापत्र के साथ बीच में ही खत्‍म करना पड़ा।  

सम्‍मेलन के तीसरे दिन यानी 20 अगस्त, 2023 को तड़के दिल्ली पुलिस एक लिखित आदेश के साथ कार्यक्रम स्‍थल पर पहुंची। उसने आयोजाकों को कार्यक्रम को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया। हरकिशन सिंह सुरजीत भवन में आयोजित इस कार्यक्रम को दूसरे दिन भी बाधाओं का सामना करना पड़ा था क्योंकि दिल्ली पुलिस ने शांतिपूर्ण कार्यवाही को बाधित करने की कोशिश की थी, लेकिन लोगों के प्रतिरोध और उत्‍साह के चलते उन्‍हें पीछे हटना पड़ा था। इसके बाद सम्‍मेलन निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दूसरे दिन तो जारी रहा, लेकिन अंतिम दिन पुलिस के दबाव में सम्मेलन को रोकना पड़ा।



कार्यक्रम स्थल पर मौजूद कई आंदोलनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पुलिस की कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए इसे बेहद अलोकतांत्रिक और हमारे संविधान के लोकाचार के खिलाफ बताया। सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने टिप्पणी की कि “यह अंत नहीं है, हमें गांवों और कस्बों के स्तर पर इन संघर्षों को जारी रखने और लोगों के मुद्दों को स्‍वर देने की आवश्यकता है।‘’

पीपुल फर्स्ट के थॉमस फ्रैंको ने कहा, ‘’संविधान का अनुच्छेद 19(1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वाणी की स्वतंत्रता प्रदान करता है। कोई भी कानून लोगों को शांतिपूर्ण चर्चा के लिए इकट्ठा होने से नहीं रोक सकता। हम भाजपा सरकार की निंदा करते हैं, जो लोगों के अधिकारों को छीनने की कोशिश कर रही है।‘’ नेशनल हॉकर्स फेडरेशन के शक्तिमान घोष ने पुलिस की कार्रवाई की निंदा की और कहा कि “हम इन फासीवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ लड़ेंगे, चाहे जो भी हो।

क्या है वी-20?

सितंबर की शुरुआत में दिल्ली में होने वाले जी-20 नेताओं के शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि में ‘वी-20 पीपुल्स समिट’ का आयोजन किया गया था। वी-20 का मानना है कि सरकारी विज्ञापन पर करोड़ों खर्च करने के बावजूद जी-20 शिखर सम्मेलन एक अनौपचारिक कुलीन क्लब बना हुआ है, जो अपनी सभी चर्चाओं को बंद दरवाजे के भीतर आयोजित करता है, जिसमें उन लोगों की कोई भागीदारी नहीं होती है जो उनके निर्णयों और सिफारिशों से प्रभावित होते हैं। यह लोगों की वास्तविक चिंताओं के बारे में कम और अपने मालिकान के नुस्‍खों को लागू करने के बारे में ज्‍यादा चिंतित है।

मेधा पाटकर और अन्य सामाजिक कार्यकर्ता वी-20 के उद्देश्य के बारे में

वी-20 द्वारा जारी बयान के मुताबिक जी-20 की भारत द्वारा अध्यक्षता को प्रचारित करने में केवल आउटडोर विज्ञापन पर 51 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं, ‘’जिसका परिणाम लोगों के मुद्दों को आगे ले जाने में नहीं हुआ है, बल्कि हम देख रहे हैं कि मुद्दों को पीछे ही धकेला जा रहा है। जी-20 के लिए गरीबों और उनके घरों को न केवल छुपा दिया गया है, बल्कि उन्हें उनकी रिहाइशों से बेदखल कर दिया गया है और जिन शहरों में जी-20 की बैठकें होनी हैं वहां लोगों के घरों पर बुलडोजर चला दिया गया है।‘’

इसी पृष्ठभूमि में, सितंबर की शुरुआत में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें जी-20 नेताओं के शिखर सम्मेलन से पहले जी-20 पर जनता के एक शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह लोगों की आवाज को आगे लाने और अधिक लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण और समावेशी वित्तीय प्रणाली और राजनीतिक व्यवस्था के लिए उनके मुद्दों और चिंताओं को उठाने का एक प्रयास था।

जन आंदोलनों, ट्रेड यूनियनों और नागरिक समाज संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले देश के विभिन्न हिस्सों से 700 से अधिक प्रतिनिधि उद्घाटन कार्यक्रम में 18 अगस्‍त 2023 को दिल्‍ली में एक साथ आए। इनमें तीस्ता सीतलवाड़, मेधा पाटकर, जयति घोष, मनोज झा, हर्ष मंदर, अरुण कुमार, बृंदा करात, हन्नान मुल्ला, राजीव गौड़ा आदि ने भाग लिया। वैश्विक वित्त, बड़े बैंक और लोगों पर इसके प्रभाव, सूचना का अधिकार, डिजिटल डेटा और निगरानी, जलवायु परिवर्तन और भारत और जी-20 से संबंधित मुद्दों पर आयोजित छह कार्यशालाओं में जयराम रमेश, वंदना शिवा, अंजलि भारद्वाज, अमृता जौहरी, निखिल डे और अन्य वक्ताओं ने भाग लिया।



वी-20 ने 20 अगस्‍त को जारी बयान में कहा कि ‘’जनता के इस शिखर सम्‍मेलन को रोकने के लिए पुलिस को भेजकर मोदी प्रशासन एक स्पष्ट संदेश भेज रहा था कि वे लोगों के मुद्दों को सुनना नहीं चाहते हैं। वे गरीबों और वंचितों की झोपड़ियों को तोड़कर और शहर को ‘सुशोभित’ करके दुनिया को एक स्वच्छ और चमकदार भारत दिखाना चाहते हैं। वे असहमति की किसी भी आवाज को दबाने पर आमादा हैं।‘’

बयान कहता है, ‘’आधिकारिक जी-20 शिखर सम्मेलन में दावे किए जा रहे हैं कि भारत “लोकतंत्र की जननी” है, लेकिन हमने यहां वी-20 पीपुल्स समिट में जो स्थिति देखी है वह केवल यह दर्शाती है कि हम एक पुलिस राज्य होने के करीब कैसे बढ़ रहे हैं- एक ऐसी जगह जहां चारदीवारी के अंदर संवाद, विचार-विमर्श और विचारों को भी नियंत्रित किया जा रहा है।‘’

वी-20 का घोषणापत्र

शिखर सम्मेलन द्वारा अनुमोदित एक घोषणापत्र में इसने “सभी लोकतांत्रिक ताकतों, जन आंदोलनों, नागरिक समाज संगठनों, मानवाधिकार रक्षकों और प्रगतिशील व्यक्तियों के बीच एकजुटता और एकता के लिए मजबूत दक्षिण-दक्षिण सहयोग और दुनिया भर के लोगों के लिए एक न्यायसंगत, समावेशी, पारदर्शी और न्यायसंगत भविष्य की मांग” करने का आह्वान किया।   

इसमें यह भी कहा गया है कि जी-20 देशों में मानवीय जरूरतों को पूरा करने के वास्तविक, न्यायसंगत, और पारिस्थितिक रूप से विवेकपूर्ण तरीकों की दिशा में हजारों जमीनी, सामुदायिक नेतृत्व वाली पहलें उपलब्ध हैं, जिनसे सरकारें और अन्य सीख सकते हैं और दूसरे समुदायों तक विस्तार करने में मदद कर सकते हैं।

बरगी बांध विस्थापित संघ के राजकुमार सिन्हा ने टिप्पणी की, “जी-20 ने एक बड़ी आबादी की चिंताओं और मुद्दों की उपेक्षा की है। पीपुल्स समिट ने हमें असमानता, जलवायु संकट, ऊर्जा संक्रमण, श्रम अधिकार, सामाजिक संरक्षण, कृषि के निगमीकरण, प्राकृतिक संसाधनों पर हमला और वास्तविक विकल्पों जैसे प्रमुख मुद्दों के बारे में बात करने का अवसर दिया।

न्यायपूर्ण, समावेशी, पारदर्शी और न्यायसंगत भविष्य के लिए मुनाफे के ऊपर लोग और प्रकृति‘ नामक घोषणापत्र में पुलिस कार्रवाई की निंदा की गई और जी-20 की आलोचना करते हुए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में आमूलचूल बदलाव की मांग की गई। इसने जी-20 द्वारा प्रस्तावित जलवायु संकट के झूठे बाजार-आधारित समाधानों का परदाफाश किया, जिसके परिणामस्वरूप प्रकृति का वित्तीयकरण हुआ है और प्राकृतिक संसाधन-निर्भर समुदायों में वंचना बढ़ी है, और ऋण संकट अधिक गहरा हुआ है। इसने विश्व व्यापार संगठन में कृषि पर समझौते और उभरते द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के माध्यम से वैश्विक खाद्य शासन पर कॉर्पोरेट पूंजी के कब्जे को खारिज कर दिया। 

घोषणा में यह भी कहा गया है कि बढ़ती असमानताओं का मूल कारण अनियंत्रित पूंजीवादी विस्तार है, जो राष्ट्र-राज्यों तथा शक्तिशाली अमीर लोगों द्वारा कर चोरी से समर्थित है। ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण द्वारा प्रचारित स्वास्थ्य सेवा के जिंसकरण और निजीकरण का भी विरोध किया गया है।

घोषणापत्र ने जी-20 के ब्‍लू इकोनॉमी एजेंडे को खारिज कर दिया जिसका उद्देश्य समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और संसाधनों का आर्थिक रूप से दोहन करना है और संरक्षण को एक लाभदायक उद्यम में बदलना है। इसने महज आर्थिक वृद्धि की सनक के नाम पर ‘तैयार रहें’ के नारे को खारिज किया जो पर्यावरण और पारिस्थितिक सुरक्षा उपायों को कमजोर कर रहा है।

घोषणापत्र में लोकतांत्रिक संस्थानों और सार्वजनिक स्‍थलों के क्षरण, संवैधानिक मूल्यों, नागरिक समाज समूहों, मानवाधिकार रक्षकों और अकादमिक निकायों पर हमले, डिजिटल निगरानी और डेटा गोपनीयता के उपयोग, सूचना के अधिकार से संबंधित कानूनों को कमजोर करने, असंतोष के आपराधीकरण, लोगों की आवाज को दबाने के लिए सरकारी एजेंसियों के अन्यायपूर्ण इस्‍तेमाल की भी कड़ी निंदा की गई है। दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा पैदा किए जा रहे सामाजिक टकराव और सांप्रदायिक तनाव में वृद्धि की भी इसने आलोचना की है।

सम्‍मेलन में शामिल लोगों ने आने वाले दिनों में अपने-अपने राज्यों और कस्बों में जी-20 के मुद्दों को उठाने का संकल्प लिया।

उद्घाटन सत्र

पहले दिन के उद्घाटन सत्र में अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने जी-20 और भारत के प्रमुख क्षेत्रों पर इसके प्रभावों पर अपने वक्‍तव्‍य में कहा, “हमारी नीतियों में हाशिये के वर्गों की अनदेखी की जाती है। फोकस पहले से ही अमीरों पर है। क्या जी-20 में लोगों के लिए कोई अवसर है? हमारा शासक वर्ग विकसित देशों के शासक वर्ग के साथ जुड़ा हुआ है।‘’

नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर ने पूछा कि जी-20 जैसे ब्लॉक की क्या जरूरत है। यह मूल रूप से किसके हित के लिए बनाया गया था? यह स्पष्ट रूप से कॉर्पोरेट्स का जनादेश है, जिसका उपयोग हमारे कानून और संविधान पर हमला करने के लिए भी किया जा रहा है।



राजीव गौड़ा ने टिप्पणी की, ‘मोदी सरकार के सर्वोत्तम प्रयासों और कर रियायतों के बावजूद निजी खिलाड़ियों ने अब तक उन क्षेत्रों में निवेश करना पसंद नहीं किया है जैसा सरकार चाहती है।‘’

ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन के थॉमस फ्रैंको ने कहा, ‘पूरे वित्तीय क्षेत्र को विश्व बैंक, आइएमएफ और फाइनेंशियल स्‍टेबिलिटी बोर्ड ने अपने नियंत्रण में ले लिया है। सुधार के नाम पर वे निजीकरण, निगमीकरण और बहुसंख्यकों को हाशिये पर धकेलने को बढ़ावा देते हैं। हमने 1991 से अब तक इन सुधारों का मुकाबला किया है और किसी भी बैंक का निजीकरण नहीं किया जा सका। अब जरूरत फासीवादी, कॉरपोरेट और सांप्रदायिक ताकतों को हराने की है।‘’

बस्ती सुरक्षा मंच के साथ काम करने वाले शकील भाई और बेला एस्टेट में बेदखली से प्रभावित रेखा ने एक साधारण सवाल में अपनी दुर्दशा को संक्षेप में बताया, “क्या उपराज्यपाल और प्रधानमंत्री हमसे भी गरीब हैं कि वे पुलिस को भेजकर हमारा सामान उठा ले रहे हैं?”

जी-20 और बदलते वित्तीय ढांचे के बारे में अर्थशास्त्री जयति घोष ने कहा, ‘’जी-20 की भारत द्वारा अध्‍यक्षता के साथ ही हमसे कई वादे किए गए थे- हम असमानता को खत्म करेंगे, ऋण संकट को दूर करेंगे, कर सुधार लाएंगे, अवैध वित्तीय प्रवाह को रोकेंगे, आदि। लेकिन यह सबसे कम उत्पादक जी-20 का दौर रहा है।‘’

राज्यसभा सांसद मनोज झा ने टिप्पणी की, “फासीवाद से लड़ाइ्र सड़क से संसद तक संयुक्त रूप से होनी है।‘’ कारवां-ए-मोहब्बत के हर्ष मंदर ने कहा, “अगर 2024 में सरकार नहीं बदली तो सार कहानियां मणिपुर की कहानी के जैसी बनकर रह जाएंगी।”

जी-20 के नाम पर बेदखली

जी-20 सम्‍मेलन की मेजबानी के लिए चल रही तैयारियों के सिलसि‍ले में दिल्‍ली के सुंदरीकरण को बढ़ावा देने और जनांदोलनों को रोकने के लिए पिछले साल से ही जोर-शोर से इंतजाम हो रहे हैं। उसी समय इस शहर के निवासी दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), पुरातत्व विभाग (एएसआइ), राष्‍ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) या कोर्ट ऑर्डर के खौफ में हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों में लोगों को पिछले एक साल में बुलडोजर का सामना करना पड़ा है।

पिछले साल से डीडीए राजधानी के अलग-अलग इलाकों में घरों और दुकानों को अवैध कब्ज़े के नाम पर लगातार तोड़ रही है। अप्रैल 2022 में जहांगीरपुरी में डेमोलिशन सांप्रदायिक तनाव के चलते हुआ। मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र में डेमोलिशन का दौर चलता आ रहा है। बाबरपुर, मौजपुर, मदनपुर खादर, शाहीन बाग जैसे इलाकों में बुलडोजर पहुंचा तो था लेकिन कुछ जगहों में जाति-धर्म के विभाजन को खारिज करते हुए एकताबंद तरीके से बुलडोजर का सामना किया गया। कालिंदी कुंज के लोगों पर पुलिस ने दंगे करवाने का आरोप लगाकर केस भी डाला जो आज तक चल रहा है।



महरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क को संरक्षित करने के नाम पर दशकों से रह रहे निवासियों को बेदखल किया जा चुका है। इसी तरह तुगलकाबाद के निवासियों को एएसआइ से नोटिस मिलने के बाद उजाड़ा गया है।

बीता साल “आवास की बात” एमसीडी चुनाव प्रचार का एक अहम अंग था। चुनाव के ठीक पहले प्रधानमंत्री ने कालकाजी में बनाये गए इन-सीटू रिहैबिलिटेशन प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया था। भूमिहीन कैंप के 575 निवासियों को 25 जनवरी तक इन फ्लैटों में शिफ्ट करना था जबकि पहले ही ये फ्लैट खस्ताहाल हैं। पाई-पाई जोड़कर 1,47,000 रुपये देकर भी लोगों के फ्लैटों में प्रवेश करने के पहले ही दीवार, टाइल, पाइप आदि टूट चुके हैं और कोई भी घर रहने लायक स्थिति‍ में नहीं है। शहर में जिनके भी घर टूटे हैं उनको कालकाजी के इन्हीं फ्लैटों की चमकती तस्वीरें और खोखले वादे दिए जा रहे थे।

अरावली का जंगल और पहाड़ी इस देश की राजधानी के पर्यावरण, मौसम और पानी के स्तर को बनाये रखते हैं। सदियों से बसे शहर के लोगों ने अरावली के साथ अटूट रिश्ता बनाया है। लोगों और प्रकृति का तालमेल लोगों के जीवन के लिए ज़रूरी है। अरावली बचाने के नाम पर एक तरफ गरीब जनता को खदेड़ा जा रहा है तो दूसरी तरफ फार्महाउसों का निर्माण बिना रुके किया जा रहा है।

डेमोलिशन को चिन्हित करते हुए ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट बताती है कि डेमोलिशन सत्ता के हाथ एक हथियार बन चुका है। आज चाहे वृंदावन हो या अयोध्या, दोनो धार्मिक शहरों में बुलडोजर का दौर है। अयोध्या में तीर्थयात्रियों के बड़े मंदिर तक आवागमन को सुलभ बनाने के नाम पर आसपास के घर, दुकान और छोटे मंदिर तक तोड़ दिए गए हैं। वृंदावन में यही आलम पसरा हुआ है जहां छोटे कारोबारी, मंदिर के पुजारी और सदियों से बसे निवासी खून से मुख्यमंत्री योगी को खत लिख रहे हैं।


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इसी बेदखली के सिलसिले में विरोधस्‍वरूप वी-20 के तीन दिवसीय सम्‍मेलन का आयोजन भी दिल्‍ली पुलिस ने पूरा नहीं होने दिया। इस आयोजन को आकार देने में पानी हक समिति और घर बचाओ घर बनाओ सहित अन्य संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वैश्विक वित्त, बड़े बैंक और लोगों पर उनके प्रभाव, सूचना का अधिकार, डिजिटल डेटा और निगरानी से लेकर शहरों की नई परिकल्‍पना पर इस सम्‍मेलन में कुल नौ कार्यशालाएं शामिल थीं। शहरों की नई परिकल्‍पना पर आखिरी दिन का अहम सत्र पुलिस के हमले के कारण आयोजित नहीं हो सका, जिसमें दिल्‍ली सहित दूसरे शहरों में हो रहे निर्माण और बेदखली की कहानियां सामने आनी थीं।

नेशनल अलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट्स, फोकस ऑन द ग्लोबल साउथ, ऑल इंडिया यूनियन ऑफ फॉरेस्ट वर्किंग पीपुल, नर्मदा बचाओ आंदोलन, पर्यावरण सहायता समूह (ईएसजी), पीपुल्स रिसोर्स सेंटर, पीपुल फर्स्ट, आल्टरनेटिव लॉ फोरम, मंथन अध्ययन केंद्र, दिल्ली फोरम, झारखंड माइन एरिया कमेटी, परिसर, बस्ती सुरक्षा मंच, नेशनल हॉकर्स फेडरेशन सहित 70 से अधिक संगठनों, यूनियनों और जनसमूहों ने इस जन सम्‍मेलन में भाग लिया। 


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