इंदौर : दो दर्जन मौतों के बाद वह इस्तीफा, जिसका इंतजार तो सबको था पर अब तक हुआ नहीं

Kailash Vijayvargiya
Kailash Vijayvargiya
कैलाश विजयवर्गीय ने कभी कहा था कि संघ ही देश को बचा सकता है। जाहिर है, फिर संघ ऐसा कहने वाले को क्‍यों न बचाता? खासकर तब, जब उस शख्‍स की ऐसी तूती बोलती है कि खुद कांग्रेस के नेता भी उसी के भरोसे राजनीति करते हैं। नतीजा, कलक्‍टर तक संघ के दफ्तर तलब कर लिए गए। इंदौर के भागीरथपुरा में जब दो दर्जन लोग गंदा पानी पीकर मरे और अभूतपूर्व ढंग से एक स्‍वर में कैलाश की गरदन मांगी गई, तो इस मांग का मजाक बनना तय था। पूरी कहानी सुना रहे हैं इंदौर से लौटकर अमन गुप्‍ता

आखिरकार, संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इंदौर के दौरे पर आए, पीड़ितों से मिले और चले गए। उन्‍होंने भागीरथपुरा हादसे के मृतकों के परिवारों को एक-एक लाख रुपये की राशि दी, स्‍मार्ट सिटी के मॉडल पर सवाल उठाया और ‘डबल इंजन’ की सरकार को गंदे पानी से हुई मौतों के लिए जिम्‍मेदार ठहराया। पलटकर, कुछ भाजपा नेताओं ने सवाल कर दिया कि राहुल गांधी को आने में इतनी देर क्‍यों हुई, तो सरकार के मुखिया मोहन यादव ने 1984 के भोपाल गैस हादसे की याद दिलाकर कांग्रेस को ही कठघरे में खड़ा कर डाला। चालीस साल पुराने एक औद्योगिक हादसे के जिक्र से ताजा हादसे की आपराधिक‍ता को छुपाने और पाटने के खेल के बीच वह बात हवा में उड़ गई जो दो हफ्ते से यहां की फिजाओं में तैर रही थी- कैलाश विजयवर्गीय का इस्‍तीफा!  

उस पर से कुछ और सवाल खड़े हो गए। मसलन, राहुल गांधी के दौरे से पहले प्रशासन द्वारा उन्‍हें कई जगहों पर जाने और लोगों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई थी। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी इंदौर की पूर्व सांसद और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से मिलने उनके घर चले गए थे। मुलाकात के बाद सुमित्रा महाजन ने राहुल की अनुमति को लेकर प्रशासन की आलोचना की और कहा कि उन्हें पूरी ताकत के साथ सरकार का विरोध करना चाहिए, विपक्ष का काम ही यही है।

जीतू और सुमित्रा महाजन की इस मुलाकात के बाद कई तरह के कयास लगाए गए। कयासों के पीछे सुमित्रा महाजन और कैलाश विजयवर्गीय की पुरानी राजनीतिक अदावत बताई जाती है। भागीरथपुरा की घटना के बाद सुमित्रा महाजन सरकार और प्रशासन की आलोचना पहले ही कर चुकी हैं और जिम्मेदार लोगों को सजा देने की मांग कर चुकी हैं। जाहिर है, जिम्‍मेदार कौन है इसे इंदौर का हर नागरिक जान रहा है, लेकिन इस्‍तीफा?



मध्य प्रदेश की राजनीति में बवाल मचा हुआ है। राजनीतिक पार्टियां, संगठन और लोग, सभी एक स्वर में शहर की एक नंबर सीट से विधायक कैलाश विजयवर्गीय का इस्तीफा बीते दो सप्‍ताह से मांग रहे थे। भागीरथपुरा का इलाका विजयवर्गीय के विधानसभा क्षेत्र में आता है। दबाव महापौर, सांसद सहित प्रशासनिक अधिकारियों पर भी था, लेकिन सबके निशाने पर हैं कैलाश विजयवर्गीय, जो इंदौर से कई बार के विधायक, मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव और पार्टी में पश्चिम बंगाल के प्रभारी जैसे पदों पर रह चुके हैं।

कैलाश इंदौर और मध्य प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा वजनदार और सीनियर नेताओं में से एक हैं, जिनका मालवा और निमाड़ के इलाके में अच्छा प्रभाव है। उनकी एकमात्र इच्छा मुख्यमंत्री बनने और अपने बेटे का राजनीतिक कैरियर स्‍थापित करने की है। गाहे-बगाहे उनको मुख्यमंत्री बनाए जाने की अटकलें भी लगती रहती हैं। वह बीते दो दशकों से मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं।

मध्य प्रदेश की राजनीति के जानकार कहते हैं कि विजयवर्गीय मालवा और निमाड़ के बड़े नेता हैं, इसमें किसी को कोई शक नहीं है। इसलिए उनका इस्तीफा मांगा जाना भाजपा के अंदर चल रही उठापटक का साफ संकेत है। कैलाश के इस्तीफे की मांग ने तब और जोर पकड़ लिया जब राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने इसको लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट लिखकर जिम्मेदार लोगों से जिम्मेदारी लेने के लिए कहा। आंख का ऑपरेशन कराकर लौटीं उमा भारती ने अपनी पोस्ट में शासन-प्रशासन की कार्यशैली, मुआवजे की रकम, आदि पर भी सवाल उठाया। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि कड़ी कार्रवाई कर के जिम्मेदार लोगों को दंड दिया जाए। गौर करने वाली बात है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में आखिरी इस्तीफा उमा भारती का ही हुआ था- उस समय कैलाश, उमा भारती के नजदीकी हुआ करते थे।

बीच में इंदौर से लेकर भोपाल तक यह भी चर्चा चली कि मुख्यमंत्री मोहन यादव, कैलाश विजयवर्गीय का कद कम करना चाहते हैं। इसके लिए वह हर जोड़-तोड़ में लगे हैं। चर्चा तो यह भी थी कि कांग्रेस ने कैलाश के खिलाफ जो मोर्चा खोल रखा है, वह मुख्यमंत्री के इशारे पर है। अब राहुल गांधी के आने और लौट जाने के बाद कांग्रेस की आखिरी मोर्चाबंदी शायद खत्‍म हो चुकी है, लेकिन गंदे पानी की कहानी अभी खत्‍म नहीं हुई। 17 जनवरी तक कुल मौतों की संख्‍या 24 पहुंच चुकी थी।    

दस साल की तमाम मान-मन्‍नत के बाद पैदा हुए अव्यान की महज पांच महीने में अकाल मौत हो गई। मौत का कारण बस इतना था कि उसकी मां पांच महीने के नवजात को दूध में जो पानी मिलाकर पिला रही थी, वह गंदा था। उसमें सीवर का पानी मिला हुआ था। यह घटना देश में सबसे स्‍वच्‍छ शहर का तमगा हासिल कर चुकी मध्य भारत की आर्थिक राजधानी इंदौर की है।

इंदौर के भागीरथपुरा में सीवर का गंदा पानी पीकर मरने वालों में अव्यान अकेला नहीं है। उसके अलावा 23 और लोग हैं जिनकी मौत हो चुकी है। सरकार जब आठ मौतों का दावा कर रही थी तभी वह 18 परिवारों को मुआवजा दे चुकी थी। मुख्‍यमंत्री कह रहे थे कि उनके लिए मौत के आंकड़े मायने नहीं रखते। अदालत इस बात पर उखड़ चुकी थी। सरकारी ऑडिट रिपोर्ट में अब भी मौत के खाते में गिनती पंद्रह से आगे नहीं बढ़ी है, हालांकि मौतें बढ़ सकती हैं क्‍योंकि दर्जनों लोग अब भी अस्पताल में भर्ती हैं।

गंदा पानी पीने से हुई इन मौतों के लिए तमाम कारण गिनाए जा रहे हैं। हमेशा की तरह पूरा मामला ‘इसकी टोपी, उसके सिर’ पर आकर टिक गया है। इन मौतों की जिम्मेदारी लेने को कोई भी तैयार नहीं है, हालांकि ‘जिम्‍मेदार’ कौन हैं ये सब जान रहे हैं। घटना के कुछ रोज बाद नगर आयुक्त को हटाकर प्रशासन ने खानापूर्ति कर दी थी।



घटना के पांच दिन बाद जब हम वहां पहुंचे तब बस्ती के पीछे वाले खाली मैदान में दर्जनों टैंकर नगर निगम के कर्मचारियों की देखरेख में खड़े थे। इन्हें घटना के बाद से बस्ती के लोगों को साफ पानी देने के लिए नगर निगम द्वारा तैनात किया गया था। इस बीच यहां बोतलबंद पानी की सप्लाई बढ़ गई है। यहां आने वाले हर किसी के हाथ में खरीदा हुआ बोतलबंद पानी दिखता है।

भागीरथपुरा में पिछले साल से ही पानी गंदा आ रहा था। वहां रहने वालों ने कई बार इसकी शिकायत भी की थी, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई जबकि महालेखा नियंत्रक और परीक्षक (कैग) की 2019 की रिपोर्ट में ही इस बात का उद्घाटन हो चुका था कि इंदौर के कई इलाकों में गंदा पानी आ रहा है। भागीरथपुरा का यह हाल तब है जब इंदौर में पीने के पानी की सप्लाई नर्मदा नदी से होती है। इसके लिए अलग से पाइपलाइन डाली गई है। नर्मदा से इंदौर तक पानी पम्‍प करने की कीमत इतनी ज्यादा है कि लोग मजाक में कहते हैं कि इंदौर की रईसी का आलम यह है कि यहां के लोग सबसे महंगा पानी पीते हैं। जानकार बताते हैं कि इंदौर में पानी और सीवर की ये पाइपलाइनें चालीस से पचास साल पुरानी हो चुकी हैं। लोहे की होने कारण कई साल पहले वे गल चुकी हैं। यानी, इंदौर में एक नहीं, कई भागीरथपुरा हो सकते हैं। यानी, मौतें अभी थमी नहीं हैं। बस, छुपी हुई हैं।

कैग की रिपोर्ट के अनुसार इंदौर औऱ भोपाल में 2013 से 2018 के बीच ऐसे रोगों के 5 लाख 45 हजार मामले दर्ज किए गए जिनका सीधा संबंध पीने के पानी से था। इसके साथ ही यह भी बात है कि सरकार 8 लाख 95 हजार घरों तक पीने का साफ पानी पहुंचाने में असफल रही। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन शहरों तक साफ पानी पहुंचाने के लिए एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) जैसी संस्थाओं से जो कर्ज लिया गया था, उसकी शर्तों में अनिवार्य वाटर ऑडिट शामिल थ, लेकिन अब तक एक भी बार वाटर ऑडिट नहीं किया गया है। वाटर ऑडिट का सीधा संबंध पानी के स्रोत, पानी की सप्लाई, उसकी स्वच्छता, जैसे मानकों से होता है।

भागीरथपुरा में रहने वाले ज्यादातर लोग बताते हैं कि वहां पिछले कई महीनों से गंदा पानी आ रहा था। कई बार अधिकारियों ने खुद कहा कि इस पानी का पीने के लिए इस्तेमाल न करें। यहां रहने वाले छुट्टन बताते हैं कि सप्लाई का पानी इतना गंदा होता है कि लोग रात में उसको सड़कों पर बिखेर देते थे जिसके चलते पूरी सड़क काली हो जाती थी।

भागीरथपुरा की घटना के बाद सदन में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इंदौर के कई मोहल्लों की वॉटर ऑडिट कर के उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक की और बताया था कि इंदौर के किन मोहल्लों का पानी पीने के लायक नहीं है। कांग्रेस पार्टी भागीरथपुरा के घटना के बाद से लगातार कैलाश विजयवर्गीय और भाजपा सरकार पर आक्रामक है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि मुख्‍यमंत्री मोहन यादव विपक्ष का इस्तेमाल करके विजयवर्गीय को निशाना बना रहे हैं।

शायद इसीलिए कांग्रेस पार्टी मुख्यमंत्री और इंदौर के प्रभारी मंत्री मोहन यादव के इस्तीफे की मांग पर उतनी आक्रामक नहीं दिखी जितना कैलाश के इस्तीफे की मांग पर अड़ी दिखी। इस पर हमने उमंग से बात की, लेकिन वे चुप्पी साध गए।

इंदौर के पत्रकार सुचेंद्र मिश्र कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री मोहन यादव इंदौर के प्रभारी मंत्री हैं, इतनी बड़ी घटना के बाद सवाल तो उनसे भी पूछा जाना चाहिए था, किसी ने पूछा क्या? आखिर प्रभारी मंत्री का काम क्या होता है?’ 

लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री हफ्ते में दो दिन तो इंदौर प्रवास पर ही रहते हैं। इंदौर के तेजाजी नगर में रहने वाले निशांत कहते हैं कि इंदौर का कोई भी आदमी मुख्यमंत्री को न्योता भर भेज दे, वह दौड़े चले आते हैं। लोग उन्हें इंदौर और उज्जैन का मुख्यमंत्री मानते हैं। घटना के बाद वह आखिरी बार 30 दिसंबर को इंदौर आए थे। उसके बाद वह सीधे 14 जनवरी को आए और 800 करोड़ रुपये की लागत वाली अमृतप्रदाय योजना का लोकार्पण किया। हफ्ते में दो बार शहर आने वाला मुख्यमंत्री घटना के बाद से केवल एक बार आया है, तो लोगों के मन में सवाल है कि आखिर उसे किस बात का डर है। 

भागीरथपुरा की घटना के विरोध में बीती 11 जनवरी को कांग्रेस ने इंदौर में विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था जिसमें हजारों लोगों शामिल हुए। राज्य के सभी अखबारों ने इसको ढंग से तवज्जो दी। लोग कह रहे थे कि जिस कांग्रेस ने दशकों से ढंग का एक विरोध प्रदर्शन नहीं किया वह अचानक इतनी सक्रिय कैसे और क्यों हो गई।

मध्य प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी इंदौर जिले की राऊ विधानसभा क्षेत्र से आते हैं और अपना पिछला चुनाव हार चुके हैं। इस रैली से पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडिल पर मुख्यमंत्री मोहन यादव को संबोधित करते हुए लिखा था कि वह कैलाश विजयवर्गीय से इस्तीफा लें नहीं तो ग्यारह तारीख को कांग्रेस विरोध प्रदर्शन करेगी। इसके पहले उमंग सिंघार इंदौर के मोहल्ले मोहल्ले की पानी की रिपोर्ट सार्वजनिक कर के पानी का हाल बता रहे थे।



इंदौर से देशगांव मीडिया चलाने वाले पत्रकार आदित्य सिंह कहते हैं, “भागीरथपुरा की घटना के बाद विजयवर्गीय का इस्तीफा मांगने वालों की हिम्मत इसलिए बढ़ गई क्योंकि उन्होंने एक वरिष्ठ पत्रकार अनुराग द्वारी को कैमरे के सामने अपशब्द कहे इसका पहले अनुराग ने विरोध किया, बाद में उनके संस्थान के अलावा दूसरे संस्थानों सहित, सोशल मीडिया पर अनुराग का साथ देते हुए इस घटना का पुरजोर तरीके से विरोध किया। कैलाश मामले को संभाल पाते तब तक बहुत देर हो चुकी थी।” 

वह कहते हैं कि उनके द्वारा अपशब्द कहा जाना मूल घटना से ज्यादा बड़ा मुद्दा बन गया। एकबारगी तो ऐसा लगा कि महज कुछ सेकेंड की घटना के चलते पूरा मुद्दा ही गायब न हो जाए। आश्चर्यजनक रूप से मध्य प्रदेश के अखबारों ने घटना के कई दिन बाद तक फॉलोअप करके इसे जिंदा बनाए रखा और शासन-प्रशासन से लगातार सवाल पूछा।

कांग्रेस की अतिसक्रियता के मसले पर कांग्रेस के एक नेता ने बताया कि ‘मध्य प्रदेश की राजनीति में कैलाश जी इस समय सबसे बड़े और सीनियर नेता हैं जिनका 50 से ज्यादा सीटों पर प्रभाव है। ऐसे में अगर उनका इस्तीफा होता है तो यह कांग्रेस के कमजोर आत्मविश्वास को बढ़ाएगा।‘

सुचेंद्र कहते हैं कि कैलाश के इस्तीफे की क्या अहमियत है और कौन लोग इसके पीछे हैं इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि केवल जनसंपर्क पर चलने वाला अखबार नई दुनिया भी ग्राउंड रिपोर्ट करने के लिए मैदान में उतर आया, हालांकि दूसरे अखबारों का हाल इससे जुदा नहीं है। राज्य के बड़े पाठक वर्ग को प्रभावित करने वाले दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका 10 जनवरी को भी भागीरथपुरा की घटना को पहले पेज पर लीड खबर के तौर पर छाप रहे थे।

एक पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि भागीरथपुरा की घटना पर मीडिया ने जो स्टैंड लिया वह साफ तौर से कैलाश के कद को कमजोर करने के लिए था, जिसे मुख्यमंत्री के इशारे पर चलाया जा रहा था। घटना के शुरुआती दिनों में अखबारों को भर-भरकर विज्ञापन दिए गए थे।

इंदौर के पत्रकार नितिन पटेल कहते हैं कि एकमात्र विजयवर्गीय का कद कम होने से बहुत सारे लोगों को फायदा होगा। इसमें पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ के लोग शामिल हैं। वह बताते हैं, ‘कैलाश विजयवर्गीय और दिग्विजय सिंह की राजनीतिक दोस्ती मध्य प्रदेश में किसी से छुपी नहीं है, वहीं नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की दिग्विजय के साथ अदावत भी नई नहीं है।‘ नितिन इसे दो राजनीतिक परिवारों की प्रतिष्ठा का प्रश्‍न बताते हैं। ऐसे में यह संभावना प्रबल हो जाती है कि मोहन यादव और उमंग मिलकर कैलाश को निशाना बना कर एक तीर से कई निशाने साध रहे थे।


TOI copy covering water issue in NCR inspired by Indore story
इंदौर के हादसे ने देश भर में पेयजल को मुद्दा बना दिया है, TOI का पन्ना

राजनीतिक हलकों में एक चर्चा और थी कि पार्टी अध्यक्ष होने के नाते जीतू पटवारी ने कैलाश के खिलाफ मोर्चा तो खोल दिया क्योंकि वह पार्टी के फैसले के विरोध में किसी भी कीमत पर नहीं जा सकते, लेकिन अंदरखाने की बात यह है कि जीतू और उनका परिवार जमीन के व्यापार में बड़े स्तर पर काम करता है। इस समय उज्जैन से इंदौर के पूरे हिस्से में एक नई सिटी बनाने की बात चल रही है। जाहिर है, ऐसे में उज्जैन वालों के लिए जीतू पटवारी का महत्त्व बढ़ जाता है। दूसरी ओर, कैलाश विजयवर्गीय सीधे तौर पर जमीन के मामलों में तो नहीं जुड़े है लेकिन वह जमीन से जुड़े व्यापार करने वाले लोगों को संरक्षण जरूर देते हैं। ऐसे में जीतू वास्‍तव में कैलाश को निशाना बना पाते, यह बात थोड़ी मुश्किल जान पड़ती है।

सुचेंद्र बताते हैं कि भागीरथपुरा में हुई घटना के बाद कैलाश ने खुद को बड़ा दिखाने के लिए खुद ही इस घटना की जिम्मेदारी लेने का प्रयास किया, लेकिन राजनीतिक मकड़जाल में उलझ गए। मध्य प्रदेश की राजनीति में यह बात हर किसी को पता है कि मोहन यादव ने भले ही कभी यह नहीं कहा हो कि कैलाश उनकी बात नहीं सुनते, लेकिन कैलाश विजयवर्गीय यह कह चुके हैं कि इंदौर के अधिकारी किसी भी काम के लिए जाने पर प्रभारी मंत्री के आदेश की बात करने लगते हैं, और इंदौर के प्रभारी मंत्री मुख्यमंत्री खुद हैं!

देश की राजनीति में अघोषित रूप से ही सही, इस्तीफे की परंपरा लगभद बंद-सी हो गई है। मध्‍य प्रदेश या किसी भी अन्‍य भाजपा-शासित राज्‍य के लिए यह बात सही है।

महज चार महीने पहले ही इंदौर से पांच सौ किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा में कफ सीरप पीने से हुई पच्चीस बच्चों की मौत पर किसी की कोई प्रतिक्रिया तक नहीं आई। किसी ने घटना की जिम्मेदारी तक नहीं ली। इसी इंदौर शहर में लगभग मई 2023 में सिन्धी कालोनी में एक बावड़ी की छत टूटकर गिर गई थी। तब भी किसी का इस्तीफा नहीं मांगा गया था। उस घटना में भी करीब पैंतीस लोगों की मौत हो गई थी। वह भी  कैलाश विजयवर्गीय का ही क्षेत्र था। स्‍थानीय सांसद शंकर लालवानी ने भागीरथपुरा के मसले पर अपना मुंह तक नहीं खोला है। उनसे बात करने की कोशिश की गई तो उनका फोन नहीं उठा।

सुचेंद्र कहते हैं कि ‘इंदौर की जनता बीते चालीस साल से भाजपा की गुलामी कर रही है। ऐसे में उससे क्या ही उम्मीद की जा सकती है।‘ विरोध के मसले पर वह कहते हैं कि यह कांग्रेस है जो मुद्दे को उठा रही है। विपक्ष का तो काम ही यही है। हर छोटी सी बात में राजवाड़े पहुंच जाने वाली इंदौर की जनता इतनी बड़ी घटना पर चुप्पी साध गई, एक भी पब्लिक प्रोटेस्ट नहीं हुआ, उल्टे कैलाश का मेकओवर करने के लिए लोग लंबी-चौड़ी पोस्ट लिख रहे हैं।

भागीरथपुरा की घटना के बाद इंदौर के भाजपा नेताओं से संपर्क की तमाम कोशिशों के बाद कोई भी नेता इस घटना पर बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ। कई बार फोन करने के बाद भी उनके फोन नहीं उठे। कई नेताओं के तो फोन तक बंद आ रहे हैं। भाजपा के एक नेता, जिनसे हमारी बात हो सकी, उन्‍होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी की तरफ से सख्त आदेश है कि भागीरथपुरा के मसले पर किसी से कोई बात नहीं की जाए। विपक्ष के नेताओं का भी कमोबेश यही हाल है। हमने नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष चिंटू चौकसे से बात करने की कोशिश की थी, उनका भी फोन नहीं उठा।

बीते डेढ़ दशक में भाजपा की राजनीति को देखें तो हम पाएंगे कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विषम रही हों या हादसा कितना भी बड़ा क्यों न हो, पार्टी के भीतर से किसी नेता के इस्तीफे की मांग नहीं उठी। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, पार्टी अध्यक्ष रहते हुए पहले ही साफ कर चुके हैं कि भाजपा में किसी भी नेता का इस्तीफा नहीं होता है। विपक्ष भी इस्तीफा मांगने की रस्म निभाने तक सीमित हो कर रह गया है। इसी परिप्रेक्ष्‍य में कैलाश विजयवर्गीय के इस्‍तीफे की हो रही चौतरफा मांग महत्‍वपूर्ण हो जाती है।

आदित्य सिंह कहते हैं कि इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ बोलने वाले लोग बहुत कम हैं। कारण सिर्फ एक है- उनका भय, जो उन्होंने यहां के लोगों में बना रखा है। सबको लगता है कि उन्‍हें रहना यहीं है। ऐसे में कैलाश से बैर मोल लेना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं। किसी भी वजह से हो, अगर कैलाश का इस्तीफा होता है, तब भाजपा और संघ का वह ढक्कन खुल जाएगा जिसने इनकी सत्ता को विपक्षी प्रभावों से अब तक सुरक्षित रखा हुआ है। बीते पंद्रह साल में यह मान लिया गया है कि संघ और भाजपा का किला अभेद्य है, उसमें सेंधमारी की गुंजाइश न के बराबर है। इसीलिए, जिसकी गरदन के पीछे खुद अपने पड़े हैं वह अब तक बचा हुआ है।

भागीरथपुरा की घटना के वक्‍त इंदौर और उसके आसपास के इलाकों में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्‍य में लगातार कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे थे। अब भी ऐसे आयोजन जारी हैं। धार्मिक कथाओं का आयोजन भी मुख्य रूप से किया जा रहा है जिसमें कैलाश सहित भाजपा के तमाम नेता सक्रिय हैं।

मालवा और निमाड़ में भाजपा और उसका मातृ संगठन संघ हमेशा से मजबूत रहा है। यहां होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना का प्रभाव देश के दूसरे इलाकों पर भी पड़ता है। नागपुर और दिल्ली के बाद इंदौर संघ के लिए सबसे मुफीद और सुरक्षित जगहों में से एक है। संघ यहां बैठकर चारों तरफ विस्तार कर सकता है। शायद इसीलिए इंदौर में संघ ने अपना मिनी मुख्‍यालय बनाया है।

भागीरथपुरा में हुई घटना को भाजपा के साथ संघ ने भी अपने तरीके से हल करने का प्रयास किया। इस बात की गवाही वह चर्चित घटना है जब इंदौर के महापौर के साथ यहां के जिलाधिकारी और नगर आयुक्त, संघ के जिला कार्यवाहक से उनके कार्यालय में जाकर से मिले। आम तौर पर ऐसा कम ही होता है कि संघ के पदाधिकारी किसी भी मसले पर सीधे अधिकारियों से मुलाकात करें।



इसे मालवा-निमाड़ में संघ के घटते प्रभाव के तौर पर देखा जा रहा है। संघ में कई साल तक अहम पदों पर रह चुके एक व्यक्ति नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘संघ कमजोर हो रहा है, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है, और संघ से जुड़े लोग इसे जान रहे हैं। लेकिन सवाल तो यह है कि आखिर कमजोर होने में हाथ किसका है, संघ का ही न?’ वह इसकी तुलना मोदी राज में गुजरात में संघ की स्थिति से करते हैं, जहां संघ सत्ता का बगलगीर होकर भी अपने निचले स्तर पर पहुंच गया।

भागीरथपुरा की घटना के बाद संघ को शायद अंदेशा हो गया था कि स्थिति हाथ से निकल रही है। मालवा-निमाड़ के इलाके में संघ किसी भी सूरत में कमजोर होता दिखाई नहीं देना चाहता। भागीरथपुरा के वर्तमान पार्षद कमल वाघेला संघ के जरिये ही राजनीति में आए थे। उनकी महत्वाकांक्षा थी कि वे सक्रिय राजनीति में जाएं, लेकिन उनकी हैसियत इतनी बड़ी नहीं थी कि वे विधानसभा या लोकसभा स्तर की राजनीति करें। उनके पास कार्यकर्ताओं तक का टोटा है। उनको जितवाने के लिए बहुत पापड़ बेले गए। पार्षद स्तर की राजनीति करने वाले मांगीलाल रेडवाल को विजयवर्गीय ने अपने पाले में मिलाया, तब जाकर वाघेला चुनाव जीत सके।

एक प्रचारक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि ‘संघ ने बहुत सारे लोगों को भाजपा में भेजा, जिन्होंने अपने क्रियाकलापों से संघ को ही किनारे लगाना शुरू कर दिया। अब संघ के पदाधिकारियों को समझ ही नहीं आ रहा है कि इस मसले को कैसे हल किया जाए क्योंकि उनकी खुद की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि वे चाहकर भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है।‘

संघ के एक और जानकार इसकी पुष्टि करते हैं। मालवा और निमाड़ में संघ के कमजोर होते जाने का कारण बताते हुए वह कहते हैं कि संघ कई धड़ों में बंट चुका है। एक जो बिल्डरों के साथ मिलकर पैसा कमा रहा है, उसे किसी से कोई मतलब नहीं। दूसरा, जो सरकार में शामिल होकर अपने लिए ठेके पट्टे का जुगाड़ कर खुद पैसा कमा रहा है और अधिकारी और नेताओं को दे रहा है। सबसे आखिरी और दयनीय वे स्वयंसेवक हैं जो चाहते हैं कि संघ मजबूत रहे लेकिन वे खुद अपना खयाल रख पाने की स्थिति में नहीं हैं।



वे एक उदाहरण देकर इस बात को समझाते हैं। वे बताते हैं कि प्रान्त स्तर के एक प्रचारक का भाई जिसका घर इंदौर में है और वह खुद छिंदवाड़ा जिले में पदस्थ है, पारिवारिक कारणों के चलते वापस इंदौर आना चाहता है। यहां उसके बूढ़े मां-बाप का खयाल रखने के लिए घर में कोई नहीं है। तमाम प्रयासों के बावजूद वह प्रचारक अपने भाई का ट्रांसफर नहीं करवा पा रहा है, जिसके लिए वह पिछले एक साल से परेशान है। जब प्रांत स्तर के संघ पदाधिकारी का यह हाल है तो दूसरों के बारे में क्या ही कहा जाए? वह भी तब, जब सरकार उन्‍हीं की है!

इस बीच भागीर‍थपुरा में हुई दो दर्जन मौतों पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चुप्पी पर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। हादसे के शुरुआती दिनों में कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह की चुप्पी पर भी सवाल उठे थे, लेकिन राहुल गांधी के साथ इंदौर में टहल कर फोन न उठाने वाले कांग्रेसी चिंटू से लेकर दिग्विजय तक, सबने अपने-अपने हिस्से के दाग धो लिए हैं।

शिवराज फिलहाल केंद्र में मंत्री हैं लेकिन उनका मन राज्य की राजनीति में ज्यादा लगता है। उनकी दबी-छुपी इच्छा वापस मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री या फिर पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की है। राज्य के पिछले विधानसभा चुनाव में जीतने के लिए उन्होंने कितनी मेहनत की थी यह किसी से छुपा नहीं है। कई कांग्रेसी भी अपनी हार में दूसरे कारण गिनवाने के साथ शिवराज की मेहनत को श्रेय देना नहीं भूलते। इतने बड़े मसले पर उनकी चुप्पी के कई मायने निकाले जा रहे हैं।   

इंदौर के लोगों का कहना है कि अगर कैलाश का इस्तीफा होता है तो शिवराज फायदे में रहेंगे और अगर कैलाश के साथ मिलकर मोहन यादव को वे कमजोर कर सके तो भी फायदा उनका ही है (संदर्भ के लिए, बीते जून में इंदौर में ही बंद कमरे में शिवराज और कैलाश के बीच चली 18 मिनट की रहस्यमय बैठक का सार अब तक किसी को नहीं पता चल सका है)। यानी चित और पट दोनों स्थितियों में खेल शिवराज के हक में निपटना बनता है। लेकिन यक्ष प्रश्‍न एक ही है कि कैलाश विजयवर्गीय का इस्‍तीफा होगा या नहीं? यह सवाल राहुल गांधी के लौटने के बाद पल-पल धुंधला पड़ता जा रहा है।



Tags from the story
, , , ,
More from अमन गुप्ता