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‘पॉप’ हिंदुत्‍व: तीन संस्‍कारी नायक और उनकी कुसांस्‍कृतिक छवियां

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भारतीय जनता पार्टी के जन्‍म से ही उसके चुनावी घोषणापत्रों का पहला वादा रहे अयोध्‍या के राम मंदिर में जब प्राण प्रतिष्‍ठा को कुछ दिन ही बच रहे हैं, तब धर्म और शास्‍त्रोक्‍त पद्धतियों पर बहस छिड़ी हुई है। सच्‍चाई यह है कि हिंदू धर्म के रूढ़ हो चुके संस्‍थागत स्‍वरूप को त्‍यागकर उसे लोकप्रिय व सर्वग्राह्य बनाने से भाजपा का यह प्रोजेक्‍ट पूरा हुआ है। नए मीडिया में विभिन्‍न लोकरंजक विधाओं के माध्‍यम से हिंदुत्‍व के प्रचार-प्रसार पर बहुत कम अध्‍ययन हुआ है। इसी विषय पर कुणाल पुरोहित की लिखी पुस्‍तक ‘एच-पॉप’ पर चर्चा कर रहे हैं अतुल उपाध्‍याय

वसुंधरा के लंबे दबाव से उबरा आरएसएस राजस्थान चुनाव में कुछ ज्यादा सक्रिय क्यों है?

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बीस साल से वसुंधरा राजे के पाश में फंसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहली बार खुलकर सांस लेता दिख रहा है, तो राजस्थान के चुनाव में भी पर्याप्त सक्रिय है। उसकी सक्रियता भले ऊपर से दिखती न हो, लेकिन हर प्रचारक गेमप्लान और स्ट्रेटजी की बात करता सुनाई देता है। आखिर क्या है यह रणनीति और संघ इससे क्या हासिल करना चाह रहा है? राजस्थान से लौटकर अभिषेक श्रीवास्तव की रिपोर्ट

शिवराज के सपनों का ‘अद्वैतलोक’ : जहां सत्य, शिव और सुंदर के अलावा सब कुछ है

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हर नेता अपनी जिंदगी में कम से कम एक प्रतिमा गढ़ना चाहता है। शिवराज सिंह चौहान ने भी एक प्रतिमा गढ़ी- 108 फुट ऊंची आदि शंकराचार्य की। शिव के मस्तक में मशीनों से छेद कर के खड़ी की गई इस प्रतिमा ने संघ के कार्यकर्ताओं को फिरंट कर दिया, जंगलों को नष्ट कर दिया, पहाड़-घाटी के लोगों को उजाड़ दिया। बाढ़ और मानवीय त्रासदी के बीच लोकार्पित की गई तीन हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना पर खंडवा के ओंकारेश्वर से लौटकर अमन गुप्ता की लंबी कहानी

भारत का ‘लेफ्ट’ और एजाज़ अहमद की तकलीफ

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बीते 89 वर्ष में आरएसएस ने आखिर ऐसी कौन सी रणनीति अपनाई कि उसके राजनीतिक मोर्चे भाजपा ने 2014 में भारत की केन्द्रीय सत्ता पर कब्‍जा कर लिया? जबकि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी जिसकी विधिवत स्थापना आरएसएस के साथ ही 1925 में हुई थी और आजादी के बाद जो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी, अपने दो प्रदेश भी गंवा बैठी? ऐसा कैसे मुमकिन हुआ? इतिहासकार एजाज़ अहमद और एंतोनियो ग्राम्‍शी से सबक लेते हुए इस प्रासंगिक सवाल पर रोशनी डाल रहे हैं मुशर्रफ़ अली