मणिपुर: आग लगाने की तैयारी तो पहले से थी, 3 मई की रैली होती या नहीं…

1. इंफाल में मैतेयी समुदाय का धरना प्रदर्शन | 2 जुलाई | रोहिण कुमार
1. इंफाल में मैतेयी समुदाय का धरना प्रदर्शन | 2 जुलाई | रोहिण कुमार
मणिपुर में दो समुदायों के बीच हिंसा को जल्‍द ही तीन महीने पूरे हो जाएंगे। प्रधानमंत्री ने केवल एक वाक्‍य अब तक कहा है, वो भी संसद का सत्र शुरू होने से ठीक पहले, संसद के बाहर, भीतर नहीं। सुप्रीम कोर्ट शुरू में लापरवाह रहा, फिर सख्‍त हुआ, लेकिन उसका कुछ हासिल नहीं है। उधर, दर्द और हिंसा की कहानियां दोनों तरफ से बराबर आ रही हैं। संवेदना पाले में बंट गई है। सच्‍चाई धुंधली हो गई है। ऐसे में मणिपुर से लौटकर रोहिण कुमार सुना रहे हैं आंखों देखी, कानों सुनी और महसूस की हुई कहानियां किस्‍तों में। पहली कड़ी प्रस्‍तुत है

डीजीपी पी डॉन्गेल पर हमला हो गया सर। एडीजीपी क्ले ख़ोंगसाई के गार्ड उन्हें छोड़कर जा चुके हैं। दोनों कुकी हैं। यहां हालात बिगड़ते जा रहे हैं। रिपोर्ट कीजिए दिल्ली में!” 


पांच मई की दोपहर यह मैसेज मेरे साथी मिन थॉउथैंग ने चुड़ाचंद्रपुर से भेजा। आधे घंटे तक मेरी ओर से कोई जवाब न मिलने पर उसने पैनिक कॉल किया- “कम से कम फोन तो देखा कीजिए। मार दिए जाएंगे हम लोग, तब आप लोगों को होश आएगा क्या?” लगभग डांटते हुए उसने कहा। 

मिन दिल्ली विश्वविद्यालय के दिनों का मेरा सीनियर है। चुड़ाचंद्रपुर का ही रहने वाला है। लंबे समय तक उसने दिल्ली के लाजपत नगर में रह कर यूपीएससी की तैयारी की, फिर कानून की पढ़ाई की और वापस चला गया। दिल्ली में पूर्वांचलियों की सोहबत में उसे ठीकठाक हिंदी आ गई थी। वह हमारे बहुतेरे दोस्तों के लिए पूर्वोत्तर की कुंजी था, मणिपुर के अलावा बाकी पूर्वोत्तर भारत के बारे में उसे कायदे से ज्यादा जानकारी नहीं थी। फिर भी, उत्तर भारतीयों के लिए तो सामान्यत: मणिपुर हो, मिजोरम या अरुणाचल– सब धान बाईस पसेरी ही है! 

वैसे तो मुझे 3 मई की रात से ही इंफाल और उसके बाहरी इलाकों में मैतेयी और कुकी समुदायों के बीच भड़की हिंसा की सूचना मिलने लगी थी। यह अंदाजा भी था कि जो सूचनाएं मिल रही हैं, अगर वाकई वे सच हैं तो ये पूरे राज्य और पूर्वोत्तर को राजनीतिक अस्थिरता की ओर धकेल सकता है। बतौर रिपोर्टर, किसी भी रैंडम सूचना को वेरिफाई करने के मेरे पास सीमित विकल्प थे। तब मैंने अपने एक साथी से संपर्क किया, जो इन दिनों एक अंग्रेजी न्यूज का नॉर्थ इस्ट कॉरेस्पॉन्डेंट है।  उसे बताया कि ऐसी सूचनाएं मिल रही हैं मुझे, तुम जरा अपने सिरे से इसे वेरिफाइ करवाओ। 

शाम तक न सिर्फ डीजीपी पर हमले की सूचना सच निकली, बल्कि और भी ऐसी खबरें आने लगीं जिससे दिल बैठ जाए।

इंफाल में चर्च जलाए जा रहे थे। कुकी रिहाइश के क्षेत्रों में हमले हो रहे थे। कुकी घरों को चिन्हित कर के आग लगाई जा रही थी। आरोप मैतेयी समुदाय पर था। चूंकि इंफाल मैतेयी-बहुल क्षेत्र है और कुकी-जो-हमार (आदिवासी) समुदाय के लोग मुख्यत: ईसाई धर्म को मानते हैं इसीलिए चर्चों के जलाने का आरोप स्वभाविक तौर पर मैतेयी पर ही था। 

वहीं इंफाल के बाहरी क्षेत्र, जो सुगनू, मोइरंग, चुड़ाचंद्रपुर और पहाड़ी जिलों से सटते हैं, वहां मैतेयी समुदाय पर हमले होने की सूचना थी। ये क्षेत्र कुकी-बहुल थे लिहाजा हमले का आरोप कुकी समुदाय के ऊपर था।

दोनों समुदायों से बात करने पर पता लगता कि दोनों ही एक-दूसरे के विक्टिम हैं। यह कह सकना दो महीने पहले मुश्किल था और अब भी है कि आखिर पहला हमला हुआ किस ओर से!

बसंत में पनपती साजिशें

मणिपुर की स्थिति फरवरी-मार्च से ही तनावपूर्ण होती जा रही थी। राज्‍य सरकार पहाड़ों को सुलगाने का माहौल जिस तरह से तैयार कर रही थी, मणिपुर की राजनीति को जानने-समझने वाले इससे चिंतित थे।

इस साल 20 फरवरी को राज्य सरकार के अधिकारी चुड़ाचंद्रपुर के सोंगजोंग गांव को खाली करवाने पहुंचे थे। सरकार का  दावा था कि आदिवासियों, मुख्यत: कुकी-जो-हमार जनजातीय समूहों ने सरकारी जमीन का ‘अतिक्रमण’ किया हुआ था। सरकार जनजातीय समूहों का नाम लिए बिना उन्‍हें “इल्‍लीगल इमिग्रेंट्स” कह रही थी। मणिपुर वन विभाग के एक नोटिफिकेशन के मुताबिक चुड़ाचंद्रपुर और नोने जिलों के अंतर्गत आने वाले लगभग तीन दर्जन गांवों को संरक्षित वन क्षेत्र घोषित कर दिया गया था, जिसका मतलब ये हुआ कि इन गांवों में रहने वाले आदिवासियों ने जमीन ‘अतिक्रमित’ की हुई है और सरकार इन्हें खाली करवाएगी जबकि पुराने सरकारी कागजात में इनमें से ज्यादातर गांव सरकार को हाउस टैक्स देते रहे थे। 

सरकार का यह दिलचस्‍प नोटिफिकेशन कहता है कि “एक ‘अयोग्य’ अफसर ने इन गांवों में जनजातीय समूहों को रहने की मंजूरी दे दी थी, चुड़ाचंद्रपुर-खोपेम 1966 से ही संरक्षित वन क्षेत्र है।”

इसके बाद सोंगजोंग में 17 मकान तोड़ दिए गए। ग्रामीणों ने इसका जमकर विरोध किया। इस दौरान पुलिस व ग्रामीणों के बीच छिटपुट हिंसा भी हुई। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए सरकार को नोटिस भेजा।

विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर राज्य सरकार ने प्रदर्शनकारियों को चेताया कि वे संवैधानिक प्रावधानों को चुनौती दे रहे हैं।  दूसरी ओर राज्‍य सरकार ने प्रेस में यह नैरेटिव बनाया कि ये लोग (सरकार सीधे तौर पर कुकी-जो समुदाय का नाम नहीं ले रही थी जबकि ये क्षेत्र कुकी-जो-हमार बहुल क्षेत्र हैं ) आरक्षित वनों, संरक्षित वनों एवं वन्यजीव अभयारण्यों में अफीम की खेती कर रहे हैं। चूंकि वे इस खेती को जारी रखना चाहते हैं इसीलिए प्रदर्शन कर रहे थे।

उन्‍हीं दिनों मेरी बात इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम  के मुआं टोम्बिंग से हुई थी। उन्होंने बताया था कि पिछले लगभग 50 साल से अधिक समय से यहां लोग बसे हुए हैं।

मुआं टोम्बिंग कहते हैं, ‘’सरकार अचानक एक नोटिस लेकर आती है और कहती है कि आज से यह जमीन संरक्षित वन क्षेत्र हो गया है, जबकि यह ट्राइबल सेटलमेंट एरिया रहा है। पिछली सरकारों ने खुद ही यहां जनजातीय समूहों को बसाया है।” 

इसी इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम के बैनर तले सरकार द्वारा कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के विरोध में 10 मार्च को आदिवासी समुदायों ने बड़ी रैली निकाली। रैली में पीड़ित कुकी समुदाय के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। प्रदर्शन कर रहे लोग सुबह 11:30 बजे के आसपास कंगपोकपी के थॉमस ग्राउंड के पास पहुंचे ही थे, कि विरोध ने हिंसक रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प में तकरीबन 20 प्रदर्शनकारी कथित तौर पर आंसू गैस के गोलों से घायल हो गए जबकि कई पुलिसकर्मियों को भी पथराव से चोटें आईं।



इस रैली के बाद संगठन कुकी इंपी ने मुख्‍यमंत्री बीरेन सिंह की आलोचना में कहा, “मुख्यमंत्री द्वारा प्रदर्शनकारी आदिवासियों के लिए अतिक्रमणकारी, ड्रग स्मगलर, अफीम की खेती करने वाले एवं अवैध प्रवासी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाना निराशाजनक है।” कुकी इंपी ने मुख्यमंत्री के बयान को अक्षम्य बताते हुए कहा था, “इस तरह की बातें कुकी समुदाय के प्रति मुख्यमंत्री के सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को दर्शाती हैं।” 

राज्य की भाजपा सरकार को समर्थन देने वाले कुकी पीपुल्स अलायंस ने भी मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के बयान की निंदा की थी। उसने बीरेन सरकार के इस कदम को अनैतिक, अनुचित एवं पूर्ण रूप से अवैध बताया था।

पार्टी के जनरल सेक्रेटरी विल्सन एल हैंगसिंग ने तब कहा था, “सरकार ने लोकतांत्रिक मानदंडों की अनदेखी की है। यह सरकार की नीयत पर संदेह पैदा करता है।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर मुझसे कहा कि एक बहुसंख्यक सरकार को वंचित समूहों और अल्पसंख्यकों के हितों का ध्यान रखना चाहिए, “मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों से जनजातीय समुदायों को हटाकर कोई भी ‘गो टू द हिल्स’ अभियान सफल नहीं हो सकता।” 

जिस ‘गो टू द हिल्स’ कार्यक्रम का वे जिक्र कर रहे थे, वह मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों को ‘विकसित’ करने की एक सरकारी योजना है।

आग में घी

राज्य सुलगने की ओर बढ़ ही रहा था कि  राज्य सरकार ने 11 मार्च को दो जनजातीय उग्रवादी समूहों कुकी नेशनल आर्मी और ज़ोमी रिवॉल्युशनरी आर्मी के साथ हुए सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन (SoO) को रद्द कर दिया। सरकार ने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शनों के आयोजन में ज़ोमी रिवोल्यूशनरी आर्मी एवं कुकी नेशनल आर्मी की भूमिका भी थी।

इस बाबत मुख्यमंत्री ने एक ट्वीट में पहले इशारा किया था, “दोनों उग्रवादी संगठनों ने प्रदर्शनकारियों को उकसाया था इसीलिए सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन (SoO) समझौते की समीक्षा की जा रही है।” 

सरकार ने सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन समझौता (SoO) मुख्य तौर पर दो उग्रवादी संगठनों– कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन और युनाइटेड पीपुल्स फ्रंट के साथ 2008 में किया था। समझौते का उद्देश्य राज्य में हिंसा का अंत और त्रिपक्षीय राजनीतिक वार्ता की शुरुआत थी। मणिपुर के 25 उग्रवादी संगठन (17 कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन और 8 यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट के) इस समझौते में शामिल हैं। अलग राज्य की मांग कर रहे कुकी उग्रवादी संगठन इस समझौते के तहत कुकीलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के साथ आ गए थे, जिन्हें मणिपुर विधानसभा और सरकार में स्वतंत्र वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिल गए।


इंफाल में सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन को रद्द करने की मांग कर रहे लोग, 1 जुलाई | फोटो: रोहिण कुमार

मणिपुर के पिछले विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने वादा किया था कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो कुकी जनजातीय समूहों के लिए ‘एक अलग राज्य की मांग’ का समाधान किया जाएगा। इसी वादे के एवज में कुकी उग्रवादी समूहों ने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया था, लेकिन जब सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन समझौते को सरकार ने ही रद्द कर दिया, तो ऐसे में उग्रवादी समूहों के मंसूबों को वापस हवा मिलने की आशंका पैछा हो गई।

इस समझौते का महत्‍व इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले एक दशक से भी अधिक समय से मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रिय घटनाओं में कमी दर्ज़ की गई है। इन शांति समझौतों का ही असर रहा था कि मणिपुर का पहाड़ी भू-भाग 2008 से अमूमन शांत रहा, उस क्षेत्र में कुकी उग्रवादियों के साथ सरकार का करार टूट जाना कुकी समुदाय के लिए चिंता का सबब था। हो भी क्यों न, ये वही पहाड़ी क्षेत्र थे जिन्होंने आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (आफ्सपा) की ज्यादतियां झेली थीं।

‘मणिपुरी बनाम बाहरी’ का नैरेटिव

लोगों से घर खाली करवाने के पहले सरकार को उनके पुनर्वास का इंतजाम करना चाहिए। क्या इंसान से अधिक महत्वपूर्ण पेड़ और पत्थर हैं?” कुकी इंपी के अध्यक्ष च अजंग कोंगसई सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना था कि कुकी समुदाय के प्रदर्शनों का उग्रवादी संगठनों से कोई नाता नहीं है।


हमारा आंदोलन शांतिपूर्ण था। हमारा प्रदर्शन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371 (सी) के तहत प्रदत्त अधिकारों को छीने जाने के विरोध में था।

कुकी इंपी के अध्यक्ष च अजंग कोंगसई

अनुच्छेद 371(सी) मणिपुर के जनजाति बहुल पहाड़ी क्षेत्र को प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करता है। कुकी स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष सासंग वैफेरी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “वे (सरकार) सिर्फ जमीन को ही मुक्त नहीं करा रहे हैं, वे हमारे अस्तित्व (जीवन) के अधिकार और प्रथाओं पर भी हमला कर रहे हैं।” 

इस संबंध में कुकी इंपी ने राज्यपाल अनुसुइया उइके को ज्ञापन भी सौंपा, जिसमें उन्होंने बताया कि औपनिवेशिक काल से ही आधिकारिक तौर पर मणिपुर की जनजातियों के पास भूमि के स्वामित्व का अधिकार रहा है। इन क्षेत्रों में ग्रामीण भारत की स्वतंत्रता के पूर्व से रह रहे हैं। उस समय भारतीय वन कानून 1927, वन्यजीव संरक्षण कानून 1972 एवं अन्य कानून लागू भी नहीं हुए थे, जिनका हवाला देकर आज सरकार उन्हें बेदखल कर रही है। 

कुकी समाज से आने वाले जैंगखोलेन थॉउथैंग ने मार्च में ही मुझसे कहा था, “राज्य सरकार जिस सख्ती से कुकी प्रदर्शनकारियों से निबट रही है, वह मणिपुर के दूसरे जनजातीय समूहों के लिए भी एक चेतावनी है। इससे यह संदेश जाता है कि अगर आपने भी सरकार की अलोकतांत्रिक तरीकों के खिलाफ आवाज उठाई तो सरकार अमानवीय तरीकों से निबटेगी आपसे।”

बहरहाल, कुकी प्रदर्शनकारियों से विचलित होकर भाजपा सरकार ने नैरेटिव गढ़ना शुरू किया कि पहाड़ों पर रह रहे लोग “मणिपुरी” नहीं है। वे “बाहर” से आए हैं। जैंगखोलेन कहते हैं कि अगर सरकार को संदेह है कि म्यांमार से लोग मणिपुर के बॉर्डर में घुस रहे हैं तो उन्हें चिन्हित किया जाना चाहिए, न कि अपने लोगों को संदेहास्पद नजरिये से देखा जाना चाहिए।

ये सारी बातें मार्च और अप्रैल में ही हो रही थीं। तनाव बढ़ने लगा था। हिंसा के छिटपुट वाकये सामने आए थे।

अप्रैल के आखिरी हफ्ते में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह चुड़ाचंद्रपुर के लम्का में सद्भावना मंडप में जिम के उद्धाटन के लिए आने वाले थे। कथित तौर पर कुकी प्रदर्शनकारियों ने वहां तोड़-फोड़ की। उसी हफ्ते कुकी प्रदर्शनकारियों ने चुड़ाचंद्रपुर के टूइबंग क्षेत्र में फॉरेस्ट रेंज अधिकारी के ऑफिस और तीन सरकारी वाहनों को आग लगा दी। 

इसके बावजूद सरकार के पास स्थिति संभालने का पर्याप्त वक्त था, लेकिन… 

3 मई का ट्रिगर …

इधर जमीन का विवाद अपने चरम पर था, उधर मणिपुर हाइकोर्ट के जस्टिस एमवी मुरलीधरन वाले एक सदस्यीय पीठ ने मैतेयी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल किए जाने का फैसला दे दिया। मैतेयी समुदाय के लोगों ने कोर्ट में इस संबंध में याचिका दायर की थी। कोर्ट के इस फैसले ने भीतर ही भीतर सुलग रहे पहाड़ों की आग में घी का काम किया। 

फैसले से कुकी समुदाय में संदेश गया कि एक मैतेयी मुख्यमंत्री कुकी समुदाय के अधिकारों के पीछे पड़ चुका है। पहले पहाड़ों से उन्हें हटाने की मुहिम, और अब उनके साथ एसटी स्टेटस में मैतेयी समुदाय को शामिल कर उनके अधिकारों को कम करने की साजिश!

सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई को मणिपुर हाइकोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताते हुए बेहद सख्त टिप्पणी की, कि भारत के राष्ट्रपति के अलावा किसी को भी एसटी-एससी स्टेटस में बदलाव करने का अधिकार नहीं है।  तब तक हालांकि बहुत देर हो चुकी थी। जनजातीय लामबंदियां मुकम्‍मल हो चुकी थीं- कुकी-जो-हमार एक तरफ और मैतेयी एक तरफ। नगा अबकी न्यूट्रल थे।

इसी बीच 3 मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर ने कोर्ट के फैसले के विरोध में बड़ी रैली निकाली। रैली खत्म होने के बाद से ही मणिपुर के अलग-अलग हिस्सों से हिंसा की खबरें आने लगीं। यहां फिर से दोहराना जरूरी है कि हिंसा पहले किसकी ओर से शुरू हुई, यह अस्पष्ट है।

मई से शुरू हुई हिंसा जुलाई के अंत तक थम नहीं सकी है। अब तक लगभग 120 लोगों की हत्या हो चुकी है। दो सौ से ज्यादा चर्च और लगभग तीन सौ गांव जला दिए गए हैं। तकरीबन पचास हजार लोग विस्थापित हो चुके हैं। वे रिलीफ कैंपों में रहने को मजबूर हैं। आंकड़ों के मुताबिक बारह हजार के आसपास लोग मिजोरम के शरणार्थी कैंपों में रहने को मजबूर हैं। यहां बर्बरता की ऐसी कहानियां हैं कि मुर्दा भी कांप उठे।


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मौजूदा दौर की हिंसा को लेकर कई अटकलें हैं। जून और जुलाई में जब मैं मणिपुर के दोनों ही मैतेयी और कुकी-बहुल क्षेत्रों में पहुंचा तो मैंने पाया कि यहां जनजातीय विभाजन शीशे की तरह साफ था। क्लीशे ही सही पर दोनों ही समुदायों के अंदर एक दूसरे के लिए नफरत भरी थी, वे एक दूसरे के ‘खून के प्यासे’ हो चले थे।

मैतेयी बहुल इंफाल क्षेत्र में किसी से भी हिंसा की वजह पूछने पर एक ही जवाब मिलता– “हिंसा की जड़ कुकी हैं। कुकी मणिपुरी नहीं हैं। वो हम पर गोली और बम बरसा रहे हैं। हमारे पास हथियार तक नहीं है। कुकी गैरकानूनी अप्रवासी हैं। उन्हें वापस म्यांमार भेजना होगा। तभी मणिपुर में शांति आ सकती है। इंफाल में मैतेयी खुद को विक्टिम बताते हैं।

कांगपोकपी और चुड़ाचंद्रपुर क्षेत्र में कुकी-जो-हमार दो टूक कहते हैं, हम लोग ट्राइबल हैं। हम हिंसा नहीं करते। वो (मैतेयी) हम पर हमला करते हैं, हम सिर्फसेल्फ डिफेंसकरते हैं। उन्होंने हमारे गांव जला दिए। चर्च जला दी। हमारे लोगों को बेरहमी से मारा। हम मैतेयी के साथ नहीं रह सकते। हमेंसेपरेट एडमिनिस्ट्रेशन’ (अलग प्रशासन) चाहिए।

बस एक ही बात थी जिस पर दोनों समुदायों की आम सहमति थी। वह यह, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शांति की अपील करनी चाहिए।

इंफाल के होटल में काम करने वाले रोनाल्ड (32) ने चिढ़ते हुए कहा, “आयोजनों-प्रायोजनों पर मणिपुरी टोपी लगाकर ड्रम पीटने वाला पीएम नहीं चाहिए। उससे क्या फायदा है मणिपुर का? हमारे अपने यहां मारे जा रहे हैं। बिजनेस खराब हो गया है। बच्चों का पढ़ाई छूट गया है। अनाज का रेट आसमान छू रहा है। बावजूद इसके भारत के प्रधानमंत्री दो महीने से मणिपुर पर एक भी एक शब्द नहीं बोल सके हैं। हम लोग इंडियन नहीं हैं क्या”, कहते हुए उनकी आंखें भर आईं, “हमें शांति चाहिए। हमें जीना है।”


यह रिपोर्ट मणिपुर पर लंबी कहानी की पहली कड़ी है, कहानी जारी है


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