GenZ-भागवत संवाद : काल के कठघरे में खड़ा संघ और सवाल पूछता नए दौर का प्रतिवादी

RSS Chief Shri Mohan Bhagwat
RSS Chief Shri Mohan Bhagwat
सत्ता के ऊपर फुलप्रूफ नियंत्रण के बावजूद देश में स्थितियां कुछ ऐसी बन चुकी हैं कि न सिर्फ पांचसाला चुनाव लड़ने वाली भाजपा, बल्कि भविष्‍य को अपने वैचारिक निर्धार के हिसाब से गढ़ने वाली उसकी मातृसंस्‍था आरएसएस भी बेचैन है। बेचैनी इस हद तक कि पचहत्तर पार कर रहे इनके शीर्ष बुजुर्गों को युवाओं से सीधा संवाद करने की मजबूरी आन पड़ी है। कभी संकेतों में राजनीति करने वाला संघ अब अपने ही कहे का व्‍याख्‍याकार है। संघ प्रमुख आजकल जितना बोल रहे हैं, वह अभूतपूर्व है। क्‍या बदले हुए समय और पीढ़ी के साथ यह महज तादात्‍म्‍य बैठाने की कवायद है या कुछ और? हालिया घटनाक्रम पर संघ के जानकार व्‍यालोक की टिप्‍पणी

कहते हैं, एक बूढ़ा कुम्हार था। उसके बनाए घड़े बहुत प्रसिद्ध थे, लेकिन उन घड़ों से जुड़ी कहानियां कुछ ज्‍यादा ही मशहूर हो गयी थीं। इतनी, कि घड़ा खरीदने-बेचने से ज्यादा लोग उसकी कहानी सुनने के लिए उसके पास आने लगे थे। कोई पूछता- तुम्हारे घड़ों में ऐसा क्या है? कुम्‍हार घड़े में पानी भरकर सामने रख देता और कहता- पीकर बताओ!

फिर एक दिन कुम्हार मर गया। दुकान पोते के पास आ गयी। पोता पढ़ा-लिखा था, जमाने को समझता था, इसलिए उसने घड़ों की ब्रांडिंग शुरू कर दी। उसके दादा कौन थे, उनके घड़े कौन-कौन ले जाता था, यह काम सात पीढ़ियों से हो रहा था, फलाने शहर में उनकी कितनी प्रतिष्ठा थी, वह सब ग्राहकों को बताता रहता था। लोग सुनते, सिर हिलाते और चले जाते। इसके बावजूद उसकी दुकान पहले जैसी फल-फूल नहीं रही थी। बिक्री ठीक नहीं हो पा रही थी।

एक दिन उसका एक दोस्त आया, जो उसके दादा के पास बचपन में बहुत बैठा करता था। उसने बहुत देर तक उसकी समस्या सुनी और अंत में पूछा- अच्छा, बाकी सब तो ठीक है, लेकिन इसमें पानी है? पोते ने कहा- पानी तो है! लड़के ने कहा- तो फिर इतनी कहानी किसलिए? घड़े को पानी सहित सामने रखो, लोगों को पानी पिलाओ, ब्रांडिंग खुद हो जाएगी। लड़के ने वैसा ही किया। उसके घड़ों की बिक्री में अभूतपूर्व उछाल आ गया।

यह किस्‍सा मामूली है, लेकिन पुरानी संस्थाओं की मुश्किल अक्सर ऐसी ही मामूली समस्‍याओं से शुरू होती है। एक समय के बाद लोग यह सुनना बंद कर देते हैं कि तुम कितने पुराने हो और पूछने लगते हैं कि आज तुम मेरे किस काम के हो? राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ शायद ऐसा होने वाला है, या होने लगा है।

पिछले महीने जब जंतर-मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन हुआ; उसके बाद आनन-फानन में जिस तरह से आधी रात को प्रधानमंत्री ने युवाओं (आमफहम भाषा में जेन ज़ी) को संबोधित करते हुए रील बनायी; फिर अचानक ही मुरली मनोहर जोशी की अंतरात्मा जाग उठी; और अंततोगत्‍वा सरसंघचालक ने युवाओं से मुंबई में संवाद करने की ठानी; तो मुझे आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी के अंतर्संबंधों पर लिखे अपने पिछले आलेखों की अगली कड़ी का एक सिरा जैसे मिल गया।  

राजनीति में कुछ लोग (और संगठन) बोल कर इतिहास बनाते हैं और कुछ लोग चुप रहकर। संघ दूसरी श्रेणी का संगठन रहा है। वह बोलता कम था, संकेत अधिक देता था। उसके सरसंघचालक साल भर में शायद ही दो-चार बार सार्वजनिक रूप से दिखाई देते थे। विजयादशमी का भाषण हुआ नहीं कि उसके भीतर से बीस खबरें, पचास व्याख्याएं और सौ राजनीतिक अर्थ निकल आते थे। कौन-सा वाक्य भाजपा के लिए था, कौन-सा स्वयंसेवकों के लिए, कौन-सा सरकार के लिए और कौन-सा उस इतिहास के लिए जिसे संघ अपने ढंग से देखता रहा है; यह समझते-समझते मौसम बदल जाता था।

संघ की यह बड़ी सुविधा थी कि उसे अपनी कही हुई बात का अर्थ खुद नहीं बताना पड़ता था। वह इशारा करता था और व्याख्या करने वाले तैयार बैठे होते थे। समर्थक अपने अर्थ निकालते, विरोधी अपने और पत्रकार अपने। कभी संघ चुप रहता था तो उसकी चुप्पी पर बहस होती थी; कभी कुछ कह देता था तो उसके एक वाक्य पर छह महीने की राजनीति खड़ी हो जाती थी। यह रणनीतिगत कमाल था- कम बोलो और दूसरों से अपने बारे में ज्यादा कहलवा लो।



अब वह समय लद चुका है। अब सरसंघचालक लगातार बोल रहे हैं- आरक्षण पर, समाज पर, राजनीति पर, लोकतंत्र पर, युवाओं पर। उनका एक बयान आता है, फिर दूसरा आता है, फिर कोई और बात सामने आ जाती है। पहले पत्रकारों का काम था कि भाषण में से संघ को खोजें। अब कई बार लगता है कि संघ खुद अपने को खोजे जाने से पहले ही सामने आ जाना चाहता है।

सवाल यह नहीं है कि सरसंघचालक कह क्या रहे हैं? सवाल यह है कि उन्हें इतना बोलना क्यों पड़ रहा है? सौ साल की उम्र पार कर चुका कोई संगठन अगर अपनी बात पहले से ज्यादा समझाने लगे तो इसे केवल समय की मांग कह देना आसान है, उत्तर पा लेने की सहूलियत भी है, लेकिन राजनीति में आसान जवाब अक्सर सही जवाब नहीं होता।

शायद समाज बदल गया है, शायद माध्यम बदल गया है, और शायद यह भी कि जिस समाज में कभी एक संकेत काफी था, वहां अब संकेत को पकड़ने वाला आदमी ही बदल गया है। शायद इसीलिए सरसंघचालक मोहन भागवत को जेन ज़ी के साथ मंच साझा करना पड़ रहा है।

संघ की यह बेचैनी नयी नहीं है। संघ के संस्‍थापक रहे डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार के लिए सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण समाज था। दूसरे सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के समय तक जनसंघ की राजनीतिक हैसियत इतनी बड़ी नहीं थी कि दिल्ली उसकी बात सुनने के लिए बेचैन हो, लेकिन उसी समय संघ को यह भी समझ में आ रहा था कि केवल संगठन बना लेना पर्याप्त नहीं है। समाज में प्रभाव और समाज के बौद्धिक जीवन में स्वीकार्यता दो अलग चीजें हैं।

इस लिहाज से गोलवलकर उपाख्य गुरुजी के विश्वविद्यालयों, अकादमिक प्रतिष्ठानों और वैचारिक स्वीकृतियों से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग खासे दिलचस्प हैं। संघ जानता था कि शाखा में आदमी बन सकता है, कार्यकर्ता बन सकता है, संगठन खड़ा हो सकता है; लेकिन इतिहास सिर्फ शाखा में नहीं लिखा जाता। किताब में लिखा जाता है, विश्वविद्यालय में लिखा जाता है, पाठ्यक्रम में लिखा जाता है और उस बौद्धिक समाज में लिखा जाता है जो तय करता है कि किस विचार को गंभीर माना जाएगा और किसे किनारे कर दिया जाएगा।

उस समय जनसंघ कमजोर था, सत्ता दूर थी, इसलिए बौद्धिक वैधता की संघ की भूख समझ में आती है। आज सत्ता दूर नहीं है। संघ के पास संसद है, सरकारें हैं, प्रशासनिक प्रभाव है, राजनीतिक प्रभुत्व है। सरसंघचालक के पास महंगी कार है, जेड प्लस सुरक्षा है और यत्र-तत्र-सर्वत्र बौद्धिक देने का स्वयंभू अधिकार भी है। आखिर, प्रधानमंत्री खुद एक स्वयंसेवक है। जिस विचार को कभी सत्ता के दरवाजे पर जगह बनाने के लिए दशकों इंतजार करना पड़ा, वह अब दरवाजे के भीतर है। फिर भी संघ की बेचैनी खत्म नहीं हो रही।

यही बात ज्यादा दिलचस्प है। अब सवाल यह नहीं कि सत्ता मिलेगी या नहीं। सत्ता तो मिल चुकी। संगठन बढ़ेगा या नहीं? वो तो बढ़ चुका। राजनीतिक प्रभाव होगा या नहीं? वो तो है। फिर क्या बाकी है? शायद वह चीज, जो सत्ता से बाहर है। शायद वह समाज के उस हिस्से में है जो तुम्हें देखता तो है लेकिन तुम्हारे इतिहास का उत्तराधिकारी बनकर पैदा नहीं हुआ।

शायद यहीं कुलगुरु बनने की वह दमित वासना भी है जिसे गोलवलकर ने पूरा करने के लिए नेहरू से लेकर इंदिरा तक खतो-किताबत की और भागवत अब मोदी से “हमीं से मुहब्बत, हमीं से लड़ाई” के नगमे गाते हुए पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।

हम युवाओं को जेन ज़ी या जेन ज़ेड कह देते हैं। सुविधा है। वर्षों तक पश्चिम के अखाद्य और कचरे को सजावट और मिठाई मानकर खाने की, पूरे शरीर में लथेड़ने की रवायत जो इससे पूरी होती है! दो अक्षर में पूरी पीढ़ी को समेट दो और फिर उसकी व्याख्या शुरू कर दो।

दिक्कत ये है कि यह पीढ़ी किसी की व्याख्या मानने के लिए पैदा नहीं हुई है। संघ के संघर्ष इस पीढ़ी की निजी स्मृतियां नहीं हैं। स्वतंत्रता संग्राम भी उसकी निजी स्मृति नहीं है। वामपंथ की शब्दावली भी उसके घर की भाषा नहीं है। इस पीढ़ी के लिए बाबरी महज इतिहास है, आपातकाल केवल पाठ्यक्रम का सवाल है और मंडल आंदोलन किसी पुराने वीडियो में पड़ी हुई चीज।

पिछली पीढ़ी जिन घटनाओं की पैदाइश रही, नई पीढ़ी उन घटनाओं को बाहर से देखती है- कभी वीडियो में, कभी डॉक्‍युमेंट्री में, कभी किसी मीम में। वह इतिहास को श्रद्धा से कम और सामग्री की तरह ज्यादा इस्तेमाल करती है। आज जरूरत पड़ी तो खोला, कल दूसरा मुद्दा आया तो उसे बंद कर दिया। इसमें उसे कोई अपराधबोध भी नहीं होता। और ऐसा हर नई पीढ़ी के साथ होता है। यह कोई मौलिक बात नहीं है।


RSS@100 : संविधान की छाया में चक्रव्यूह… संघ अब राजकीय नीति है, नारा नहीं!


संघ की परंपरागत ताकत दूसरी तरह की स्मृति पर बनी थी। शाखा में रोज जाना, एक ही प्रार्थना, एक ही अनुशासन, धीरे-धीरे संगठन में उतरना और संगठन का प्रचारक के भीतर उतरते जाना। यह राजनीति की धीमी आंच थी। संघ को इस धीमेपन से कभी शिकायत नहीं रही। दस साल बाद क्या होगा, बीस साल बाद क्या होगा, पचास साल बाद क्या होगा, उसे इस तरह सोचने की आदत थी। जंतर-मंतर ने समीकरण ही पलट दिए।

संघ तो छोड़िए, भाजपा के डिजिटल शूरवीर भी झख मारते नजर आए, जबकि इसी को हथियार बनाकर मोदी मास्टर-कम्युनिकेटर बने थे और तीन बार लगातार जीते। पर वह फेसबुक का जमाना था। अब इंस्टा की रीलबाजी है। नयी पीढ़ी को देखिए। उसके पास धैर्य कम है, लेकिन सूचना बहुत है। वह शाखा में नहीं जाती और फिर भी एक रील को लाखों लोगों तक पहुंचा देती है। किसी वैचारिक प्रशिक्षण शिविर में नहीं बैठती और फिर भी दस सेकंड की क्लिप देखकर किसी नेता पर फैसला कर देती है। अगले सप्ताह वह अपना फैसला बदल भी सकती है।

पुरानी राजनीति इसे अस्थिरता कहती है, लेकिन नई पीढ़ी इसे अपना अधिकार मानती है कि मैं आज सहमत हूं तो कल असहमत क्यों नहीं हो सकता? इस पीढ़ी के लिए आदर्श कुछ भी नहीं, पवित्र कुछ भी नहीं। चालाकी बहुत है, मेधा अद्भुत है। ऐसी पीढ़ी को बौद्धिक कैसे देंगे भागवत?

यही वजह है कि भागवत जब मुंबई में कथा बांचते हैं तो उनके तेवर बिल्कुल बदले हुए दिखते हैं। वह नयी पीढ़ी की मुद्रा से लेकर भाषा तक की नकल करते हैं। संघचालक के ये तेवर उनके पुराने लोगों को बेचेन कर रहे हैं, जब वे एलजीबीटीक्यू से लेकर संवाद की सार्थकता और युवाओं के उचित आक्रोश तक पर प्रवचन दे रहे होते हैं और संघ की अब तक की पूरी वैचारिकी को ही सिर के बलखड़ा कर देते हैं।  

पहले विचार आदमी तक जाता था। अब आदमी के पास विचारों की भीड़ है। पहले वक्ता बोलता था और श्रोता सुनता था। अब वक्ता बोल रहा है और श्रोता उसी समय उसका वीडियो बना रहा है, उसमें अपनी आवाज डाल रहा है, उसे किसी दूसरे संदर्भ में रख रहा है और शाम तक वही दस सेकंड उस पूरे भाषण पर भारी पड़ सकते हैं।

पूरा भाषण चला गया, एक वाक्य बच गया। बीस साल का राजनीतिक काम चला गया, एक क्लिप बच गयी। वह क्लिप किसी से अनुमति लेकर नहीं चलती। संघ जैसी संस्था के लिए यह केवल तकनीक का बदलाव नहीं है, यह अधिकार के बदलने की कहानी है। किसे सुनना है, पहले यह संस्था तय करती थी। अब किसे कितनी देर सुनना है, यह सुनने वाला तय करता है।

जेन ज़ी का मामला इतना आसान भी नहीं है कि उसे संघ-विरोधी मानकर समस्या को किनारे बुहार दिया जाए। जरूरी नहीं कि यह पीढ़ी संघ से नाराज ही हो। वह शायद संघ को लेकर उतनी भावुक नहीं है। यह स्थिति ज्यादा कठिन है। न प्रेम, न घृणा, बस सवाल! बस अपरिचय और उदासीनता!

वह पूछती है- तुमने सौ साल काम किया, ठीक है, पर मेरे लिए क्‍या है? तुम्हारे महापुरुषों ने जीवन खपा दिया, सम्मान है, पर मेरे जीवन में उसका अर्थ? तुम्हारा विचार बहुत पुराना है, अच्छा है, पर मेरे समय में इसकी जरूरत क्या है? पुरानी संस्थाओं को अपने विरोधी से निपटना आता है, लेकिन उदासीन प्रतिक्रिया से निपटना कठिन होता है। विरोधी कम-से-कम आपको गंभीरता से तो लेता है, लेकिन जो व्‍यक्ति कहता है कि ठीक है भाई, लेकिन मुझे इससे क्या, उसे पकड़ पाना मुश्किल है।

यहीं पर वह बूढ़ा कुम्हार याद आता है। घड़ा कितना पुराना है, इससे पानी की प्यास नहीं बदलती। दादा कितने महान थे, इससे पोते के गले का सूखापन कम नहीं होता। यह बात संघ के लिए ही नहीं, भाजपा के लिए भी है, बल्कि कहीं अधिक है। भाजपा के पास सत्ता है, उससे नया आदमी पूछता है- मेरे हिस्से में क्या? संघ के पास सौ साल की संगठन-यात्रा है, उससे वह पूछता है- मेरे समय में तुम्हारी जरूरत क्या?


A Gen Z Wall Painting at Jantar Mantar
Gen Z की सीधी भाषा, जो सरकार को कठघरे में खड़ा करती है

यह सवाल बहुत सभ्य भाषा में भी पूछा जा सकता है और बहुत असभ्य भाषा में भी। जेन ज़ी दोनों भाषाएं जानती है। वह गाली का प्रयोग खुलकर करती है। कुछ पुराने लोगों ने उसे शह भी दी। वे भूल गए कि यही भाषा पलटवार भी कर सकती है- जंतर-मंतर चोला बदलकर झारखंड का रांची भी हो सकता है! यही शायद पुरानी राजनीति को सबसे ज्यादा परेशान करता है। यहीं संघ की असली परीक्षा शुरू होती है।

भाजपा के पास सत्ता है; संघ के पास संगठन, लेकिन सामने जो पीढ़ी खड़ी है उसके पास कोई स्थायी राजनीतिक ऋण नहीं है। उसे यह नहीं लगता कि किसी ने चूंकि पचास साल पहले कुछ किया था, इसलिए उसे आज भी वही मानना चाहिए। वह सुनती है, देखती है, परखती है और फिर अपना फैसला करती है। आज तुम्हारे साथ है, कल तुम्हारे खिलाफ हो सकती है और परसों फिर तुम्हारे साथ। इसे देखकर घबराने के बजाय अगर इसे समझ लिया जाए तो शायद राजनीति की कोई नयी भाषा निकले। नहीं समझा तो पुराने घड़े की कहानी सुनाते रहिए।

भाजपा आरएसएस की राजनीतिक संतान है। हर संतान एक उम्र के बाद अपनी चाल चलने लगती है। सत्ता की अपनी मजबूरियां होती हैं। संगठन की अपनी इच्छाएं। सरकार को महंगाई, विदेश नीति, रोजगार, गठबंधन और चुनाव देखना पड़ता है। संघ को यह सब नहीं देखना। देखने की उसकी इच्छा भी नहीं है। उसे जिम्मेदारी के बिना सत्ता का लुत्फ उठाना पसंद है। वह कर्त्तव्य नहीं जानता, अधिकार उसे चाहिए। उसे भाजपा को कसकर रखना है, लेकिन खुद को सांस्‍कृतिक संगठन बताते रहना है। राजनीति से होने वाले फायदे लेने हैं, लेकिन राजनीति की कीच को संभालने के लिए मोदी-शाह हैं न!

संघ को केवल यह देखना होता है कि पचास साल बाद समाज किस दिशा में जाएगा। इसलिए भाजपा-संघ के बीच मतभेद यदि कभी दिखाई दें भी तो उसे विद्रोह नहीं समझना चाहिए। वे समय की दो अलग घड़ियों का अंतर भी हो सकते हैं। भाजपा अगले चुनाव की घड़ी देखती है, संघ अगली पीढ़ी की। समस्या तब शुरू होती है जब अगली पीढ़ी चुनावी राजनीति की भाषा सुनना ही बंद कर दे।

2015 का बिहार चुनाव याद कीजिए। चुनाव अपने निर्णायक मोड़ पर था कि आरक्षण की समीक्षा संबंधी मोहन भागवत की टिप्पणी राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई। भाजपा को सफाई देनी पड़ी। विपक्ष को मुद्दा मिल गया। उसके बाद भी समय-समय पर संघ और भाजपा की भाषा के बीच महीन अंतर दिखाई देता रहा। फिर भाजपा अध्यक्ष का वह बयान आया जिसे बहुतों ने संघ से दूरी बनाने की कोशिश के रूप में पढ़ा। बाद में सफाई आई, व्याख्याएं आईं, संतुलन लौट आया, हालांकि प्रश्न वही रह गया- क्या भाजपा और संघ के रिश्ते अब इतने सरल रह गए हैं कि उन्हें एक ही वाक्य में समझा जा सके? या फिर, यह रिश्ता अब उस परिवार जैसा हो गया है जहां प्रेम भी है, अधिकार भी और बीच-बीच में सार्वजनिक असहजता भी?


संघ-भाजपा समन्वय सूत्र : सत्ता सर्वोपरि, हिन्दुत्व बोले तो वक्त की नजाकत और पब्लिक का मूड!


यही कारण है कि यह लेखक भागवत के हालिया वक्तव्यों को अलग-अलग घटनाओं की तरह नहीं पढ़ पाता। वे एक शृंखला की कड़ियां लगते हैं। कभी आरक्षण, कभी सामाजिक समरसता, कभी लोकतंत्र, कभी युवाओं से संवाद। क्या यह केवल सक्रिय सरसंघचालक का स्वभाव है? या फिर संघ अपनी दूसरी शताब्दी का वैचारिक नक्शा स्वयं बनाना चाहता है और भाजपा को समय-समय पर उसकी सीमाएं भी याद दिला रहा है? इस प्रश्न का उत्तर अभी इस लेखक के पास नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि यह प्रश्न अब पूछा जाने लगा है। पिछले कुछ महीनों में संघ और भाजपा पर जितने लेख लिखे गए, उनमें अधिकांश यह खोजते रहे कि दोनों के बीच दूरी बढ़ रही है या नहीं। यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण नहीं है। असली होड़ संघ और भाजपा के बीच नहीं, संघ और भविष्य के बीच चल रही है।

भाजपा तो आज है, कल कोई और भी हो सकता है। संघ खुद दावा कर चुका है कि वह अपने लक्ष्य के लिए किसी भी राजनीतिक दल को समर्थन दे सकता है, अगर वह हिंदू राष्ट्र की संकल्पना को अपना मकसद बना ले। इस कसौटी पर तो हो सकता है कि कभी कांग्रेस भी संघ का आशीर्वाद पा ले, लेकिन संघ यदि स्वयं को शताब्दी पार करने वाली संस्था मानता है तो उसे यह चिंता चुनाव से नहीं, सभ्यता से होगी। और सभ्यता की सबसे बड़ी प्रयोगशाला संसद नहीं, अगली पीढ़ी होती है।

यही कारण है कि जेन ज़ी के साथ भागवत की बातचीत को केवल “युवाओं से संवाद” कहकर नहीं छोड़ा जा सकता है। यह संवाद उतना ही राजनीतिक है, जितना सांस्कृतिक। आखिर संघ को अचानक यह क्यों लगा कि उसे सीधे युवाओं से बात करनी चाहिए? क्या शाखाओं से आने वाली पीढ़ी और भीड़ पर्याप्त नहीं रही? क्या विश्वविद्यालयों में वैचारिक संघर्ष फिर से तेज हो रहा है? क्या सोशल मीडिया ने उन मध्यस्थों को समाप्त कर दिया है जिनके भरोसे संघ दशकों तक समाज से संवाद करता था? या फिर संघ ने यह महसूस किया है कि भारत का युवा अब किसी भी विचारधारा को जन्मसिद्ध अधिकार नहीं देता, उसे हर पीढ़ी में फिर से अर्जित करना पड़ता है?

ध्यान दीजिए, यही वह जगह है जहां भाजपा और संघ की चिंताएं अलग-अलग हो जाती हैं। भाजपा यदि एक चुनाव हार भी जाए तो पांच साल बाद लौट सकती है। संघ यदि अगली पीढ़ी की कल्पना से बाहर चला गया तो वह चुनाव नहीं, समय को हार जाएगा। सत्ता की हार की भरपाई हो सकती है, समय की हार की नहीं। इसलिए मुझे लगता है कि भागवत का वास्तविक संवाद मोदी सरकार से कम और उस भारत से अधिक है जो 2047 में तीस-चालीस वर्ष का होगा।

यहां एक असुविधाजनक प्रश्न उठता है। यदि संघ स्वयं को समाज का दीर्घकालिक मार्गदर्शक मानता है तो क्या उसके सरसंघचालक की सार्वजनिक भूमिका भी बदल रही है? या फिर, यह महज संगठन की बेचैनी है जिसे पहली बार महसूस हुआ है कि केवल संगठनात्मक अनुशासन से डिजिटल समाज नहीं जीता जा सकता?

इतिहास बताता है कि जब-जब कोई बड़ी संस्था अपने मूल क्षेत्र से बाहर निकलती है, तब-तब उसकी भूमिका पर नए प्रश्न उठते हैं। चर्च ने जब राजनीति में प्रवेश किया, प्रश्न उठे। कम्युनिस्ट पार्टियों ने जब संस्कृति पर दावा किया, प्रश्न उठे। गांधी ने जब राजनीति को नैतिकता से जोड़ा, तब भी प्रश्न उठे। संघ भी अब एक नए मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। वह केवल शाखाओं का संगठन नहीं रहना चाहता, वह भारत के भविष्य की भाषा पर अपना प्रभाव चाहता है। यह आकांक्षा अस्वाभाविक नहीं है। हर दीर्घजीवी संस्था अंततः समाज की सामूहिक चेतना पर अपना हस्ताक्षर चाहती है। प्रश्न केवल इतना है कि वह हस्ताक्षर संवाद से बनेगा या निर्देश से।


आत्मनिर्भर भाजपा : क्या नाक से बड़ी हो चुकी है नथ?


यहीं भाजपा की भी चुनौती दिखती है। पिछले दस वर्षों में भाजपा ने चुनावी राजनीति की लगभग हर तकनीक में महारत हासिल कर ली है, पर अफसोस- सख्त अफसोस- कि राजनीति केवल तकनीक नहीं होती। होती तो प्रशांत किशोर बिहार के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह मुंह की नहीं खाते, फिर उपचुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की छोड़ी सीट न जीत जाते। राजनीति भाषा भी होती है और भाषा वहां हार जाती है जहां वह सुनना बंद कर देती है। यदि नई पीढ़ी प्रश्न पूछ रही है और राजनीति केवल उत्तर सुना रही है, तो दोनों के बीच दूरी बढ़ेगी ही। यदि नयी पीढ़ी भागीदारी चाहती है और राजनीति केवल अनुशासन सिखा रही है, तब भी दूरी बढ़ेगी। संघ शायद इस दूरी को भाजपा से पहले पहचान रहा है। इसीलिए उसके स्वर में कभी-कभी वह आग्रह दिखाई देता है जो चुनावी भाषणों में सुनने को नहीं मिलता।

क्या संघ की दूसरी शताब्दी का पहला बड़ा अभियान शाखाओं का विस्तार नहीं, बल्कि भाषा का पुनर्निर्माण है? क्या वह राष्ट्रवाद की ऐसी नई व्याख्या खोज रहा है जिसमें डिजिटल पीढ़ी स्वयं को सहज महसूस कर सके?

यदि ऐसा है, तो यह केवल संघ का परिवर्तन नहीं होगा। यह भारतीय दक्षिणपंथ के अगले संस्करण की शुरुआत होगी। यदि ऐसा नहीं है, तो फिर भागवत के लगातार बदलते सार्वजनिक हस्तक्षेपों का अर्थ क्या है? क्या वे केवल प्रतिक्रियाएं हैं? या किसी बड़े वैचारिक पुनर्संयोजन की प्रस्तावना?

कुछ लोग इसे संघ और भाजपा के बीच तनाव कहेंगे। कुछ इसे स्वाभाविक संवाद कहेंगे। कुछ इसे सत्ता और संगठन का शाश्वत संबंध बताएंगे। इन व्याख्याओं से अधिक रुचिकर वह प्रश्न है जो अभी पूरी तरह पूछा भी नहीं गया है। क्या संघ पहली बार यह स्वीकार कर रहा है कि भारत का भविष्य अब केवल उसके स्वयंसेवकों के हाथ में नहीं है? क्‍या उसे अब उन युवाओं का विश्वास भी जीतना होगा जो शाखा नहीं जाते? यदि इसका उत्तर ‘हां’ है, तो संघ की दूसरी शताब्दी का पहला पाठ आत्मविश्वास नहीं, विनम्रता पर निर्मित होगा। यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो फिर उसकी बढ़ती सार्वजनिक सक्रियता को किस रूप में पढ़ा जाए, यह पहेली कायम रहेगी।


क्‍या लोकतंत्र में तानाशाही को संवैधानिक रूप से बैन किया जा सकता है? एक जरूरी सबक


और अंत में, एक आख़िरी प्रश्‍न। मोहन भागवत आगे क्या बनना चाहते हैं- राष्ट्रपति? कुलाधिपति? या फिर, कुलगुरु? या फिर, भागवत केवल इतिहास में सबसे प्रभावशाली सरसंघचालक के तौर पर दर्ज होना चाहते हैं? अभी इसका कोई सटीक सार्वजनिक उत्तर नहीं है। हां, क्या मोहन भागवत सरसंघचालक की परंपरागत भूमिका का विस्तार कर रहे हैं? क्या वे स्वयं को केवल संगठन का प्रमुख नहीं, बल्कि भारतीय सार्वजनिक जीवन का नैतिक व्याख्याकार भी स्थापित करना चाहते हैं? यदि ऐसा है, तो यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रहेगी। यह भारतीय लोकतंत्र की संस्थाओं, राजनीतिक दलों और वैचारिक संगठनों के संबंधों का नया अध्याय होगा।

आने वाले वर्षों में इस प्रश्न का उत्तर शायद मिल जाएगा। फिलहाल, इतना ही कहा जा सकता है कि संघ की दूसरी शताब्दी में उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नहीं है, वामपंथ नहीं है, विपक्ष भी नहीं है। उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी समय है। समय, जो हर विचारधारा से एक ही प्रश्न पूछता है- क्या तुम अगली पीढ़ी की भाषा को समझते हो? क्योंकि इतिहास की सबसे निर्मम अदालत चुनाव नहीं, समय होता है। चुनाव तो पांच साल पर फिर से आते हैं। समय अपील का अवसर नहीं देता।



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