आंकड़ों का राष्ट्रवाद: डेटा सुरक्षा और निजता की चिंताओं के बीच गांधी के सबक

संसद का मानसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संक्षिप्‍त संबोधन में कैबिनेट से पारित हो चुके डेटा प्रोटेक्‍शन बिल 2023 का नाम लिया, जिसे इस सत्र में सदन के पटल पर रखा जाना है। ऐसा लगता है कि सरकार नागरिकों के डेटा और निजता को लेकर काफी संवेदनशील है, लेकिन कहानी ठीक उलटी है। ऐसे ही एक बिल डीएनए प्रौद्योगिकी विनियमन विधेयक, 2019 को इस सत्र में वापस लेने के लिए सूचीबद्ध किया गया है। डेटा, राष्‍ट्रवाद, नागरिकों की जासूसी और निजता के रिश्‍तों को विस्तार से समझा रहे हैं डॉ. गोपाल कृष्‍ण

सिटिजंस फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज (सीएफसीएल) ने डीएनए प्रौद्योगिकी (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक, 2019 को वापस लेने के प्रस्ताव का स्वागत किया है और बायोमेट्रिक आधार अधिनियम को निरस्त करने की मांग की है। डीएनए प्रौद्योगिकी विनियमन विधेयक, जिसमें “बायोमेट्रिक जानकारी” और “जैविक विशेषताओं” के संग्रह के प्रावधान किए गए हैं, को 20 जुलाई 2023 से संसद के सत्र में वापस लेने के लिए सूचीबद्ध किया गया है। डीएनए विधेयक 8 जुलाई, 2019 को लोकसभा में पेश किया गया था। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया था कि “डीएनए प्रौद्योगिकी (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक” डीएनए साक्ष्य के आवेदन को सक्षम बनाकर आपराधिक न्याय वितरण प्रणाली को सशक्त बनाने में मूल्यवर्धन करेगा, जिसे अपराध की जांच में गोल्‍ड स्‍टैंडर्ड माना जाता है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन पर संसद की स्थायी समिति की 144 पेज लंबी रिपोर्ट के बाद इसे वापस लेने का प्रस्ताव आया है, जिसे 3 फरवरी 2021 को लोकसभा में पेश किया गया था। समिति के विचार-विमर्श के आधार पर सीएफसीएल ने आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का लक्षित वितरण) अधिनियम, 2016 को निरस्त करने की मांग की है, जो “बायोमेट्रिक जानकारी” और “जैविक विशेषताओं” के संग्रह को सक्षम बनाता है। आधार अधिनियम, 2016 की धारा 2(जी) के अनुसार, ‘बायोमेट्रिक जानकारी’ का अर्थ है किसी व्यक्ति की तस्वीर, फिंगरप्रिंट, आयरिस स्कैन या ऐसी अन्य जैविक विशेषताएं जो नियमों द्वारा निर्दिष्ट की जा सकती हैं। “अन्य जैविक विशेषताओं” में डीएनए जैसी बायोमेट्रिक जानकारी शामिल है।  

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 87 और धारा 43ए के तहत नियम, 2011 के अनुसार, बायोमेट्रिक्स का अर्थ उन प्रौद्योगिकियों से है जो प्रमाणीकरण उद्देश्यों के लिए मानव शरीर की विशेषताओं को मापते हैं और उनका विश्लेषण करते हैं, जैसे ‘फिंगरप्रिंट’, ‘आंखों के रेटिना और आयरिस’, ‘वॉयस पैटर्न’, ‘चेहरे के पैटर्न’, ‘हाथ का माप’ और ‘डीएनए’। इन प्रावधानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि डेटा संग्रह की योजना उंगलियों के निशान और आयरिस स्कैन के संग्रह के साथ समाप्त नहीं होती है; यह इससे काफी आगे जाता है और “अन्य जैविक विशेषताओं” को कवर करता है।


स्थायी समिति की रिपोर्ट

DNA-Report


विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन पर संसद की स्थायी समिति जयराम रमेश की रिपोर्ट की सिफारिशों  के बाद यह विधेयक वापस लेने के लिए सूचीबद्ध है। सीएफसीएल द्वारा दी गई प्रस्तुति को संसदीय रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है। सीएफसीएल ने लंबे समय से तर्क दिया है कि मानव डीएनए प्रोफाइलिंग बिल को आधार अधिनियम, 2016 के खंड 2(जी) के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो ‘बायोमेट्रिक जानकारी’ को परिभाषित करता है और इसमें फोटो, फिंगरप्रिंट और आयरिस स्कैन के अलावा किसी भी भविष्य के विनियमन द्वारा “किसी व्यक्ति की अन्य जैविक विशेषताओं” का उल्लेख करके मानव डीएनए प्रोफाइलिंग और आवाज के नमूने शामिल हैं।

इस संसदीय समिति के सदस्यों द्वारा व्यक्त की गई असहमतिपूर्ण राय को रिपोर्ट में शामिल किया गया है। इनमें  श्री असदुद्दीन ओवैसी, सांसद, लोक सभा (पृष्ठ संख्या 38-49) से प्राप्त असहमति नोट शामिल है, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ डीएनए साक्ष्य की गिरावट, डेटा संरक्षण कानून की अनुपस्थिति और पुट्टास्वामी मामले और सुब्रमण्यम स्वामी मामले में निर्णयों की अवहेलना और श्री बिनय विश्वम, मध्य प्रदेश से प्राप्त असहमति नोट का मुद्दा उठाया गया है। 

अपने लंबे असहमति नोट  में ओवैसी ने डीएनए साक्ष्य द्वारा हल किए गए अपराधों की ओर ध्यान आकर्षित किया, जबकि लाखों लोगों को डेटाबेस में जोड़ा गया था। डेटाबेस पर लोगों की संख्या चार मिलियन से अधिक होने के बावजूद पिछले एक साल में डीएनए का उपयोग करके हल किए गए अपराधों की संख्या वास्तव में गिर गई है। यह खबर ऐसे समय में आई है जब यूरोपीय संघ के न्यायाधीश यह फैसला कर रहे हैं कि डेटाबेस से निर्दोष लोगों के दस लाख से अधिक प्रोफाइल को मिटाया जाए या नहीं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले छह वर्षों से डीएनए साक्ष्य का उपयोग करके हल किए गए अपराधों की संख्या 0.34 और 0.36 प्रतिशत के बीच स्थिर रही है- सभी दर्ज अपराधों में से 300 में से एक। संसद के जवाबों में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, डीएनए मिलान से हल होने वाले अपराधों की संख्या पिछले साल 13 प्रतिशत घटकर 17,614 रह गई क्योंकि दर्ज किए गए अपराधों में कुल मिलाकर गिरावट आई है। इसी अवधि में, राष्ट्रीय डीएनए डेटाबेस पर जिन लोगों की पहचान थी, उनकी संख्या 1.9 मिलियन लोगों से 4.1 मिलियन तक आकार में दोगुनी से अधिक हो गई। अप्रैल 2004 में आंकड़ों में एक बड़ा उछाल आया जब पुलिस रिकॉर्ड करने योग्य अपराध के लिए गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति से डीएनए लेने में सक्षम थी, इससे पहले कि उन पर आरोप लगाया जाए।

संसदीय रिपोर्ट में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के दावे को दर्ज किया गया है कि “लगभग 60 देशों ने इसी तरह के कानून बनाए हैं” लेकिन इन देशों के नाम नहीं बताए गए हैं। इसमें केवल यूएसए के डीएनए पहचान अधिनियम (1994), ब्रिटेन के आपराधिक न्याय और सार्वजनिक व्यवस्था अधिनियम (1994) और आपराधिक न्याय और पुलिस अधिनियम (2001), कनाडा के डीएनए पहचान अधिनियम (1998) का उल्लेख है। यह बस कहता है कि “नॉर्वे, फिनलैंड, बेल्जियम, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और बांग्लादेश सहित अन्य देशों में इसी तरह के कानून लागू किए गए हैं।

संसदीय समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि कुछ सदस्यों ने आशंका व्यक्त की है कि जब यह विधेयक कानून बन जाएगा तो इसका इस्तेमाल हमारे समाज के कुछ वर्गों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। सरकार को संसद के भीतर और बाहर इन आशंकाओं को दूर करना चाहिए। इसमें कहा गया है कि कुछ सदस्यों का मानना है कि विधेयक के प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने और लोगों की कुछ श्रेणियों को निशाना बनाने से बचने के लिए, विधेयक का आवेदन “पीड़ितों” “अपराधियों”, “लापता व्यक्तियों” और “अज्ञात मृतक व्यक्तियों” शब्दों तक सीमित होना चाहिए और “संदिग्धों” और “विचाराधीन कैदियों” को कवर नहीं किया जाना चाहिए। समिति ने इन चिंताओं को ध्यान में रखा है जिन्हें सरकार द्वारा उपयुक्त तरीके से संबोधित किया जाना चाहिए।

इस मानव डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक का लंबा शीर्षक पीड़ितों, अपराधियों, संदिग्धों, विचाराधीन कैदियों, लापता व्यक्तियों और अज्ञात मृत व्यक्तियों सहित व्यक्तियों की कुछ श्रेणियों की पहचान स्थापित करने के उद्देश्य से डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (डीएनए) प्रौद्योगिकी के उपयोग और आवेदन के विनियमन का प्रावधान करता है। इसका व्यापक दायरा भविष्य में अधिनायकवादी शासन द्वारा इसके दुरुपयोग की गुंजाइश छोड़ देता है।

आंकड़ा ही धन है

धन की परिभाषा में देश के आंकड़े, निजी संवेदनशील सूचना और डिजिटल सूचना शामिल है। मेटा डेटा का एक अर्थ है- आंकड़ों के बारे में आंकड़ा और दूसरा अर्थ है संग्रहित सूचना। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों वाली संविधान पीठ के 1,448 पन्नों के फैसले में इस शब्द का लगभग 50 बार जिक्र किया गया है। यह शब्द आधार कानून 2016 में परिभाषित नहीं है। फैसले के पृष्ठ संख्या 121 पर कहा गया है कि आधार कानून भारतवासियों और नागरिकों का मूल बायोमेट्रिक (उंगलियों व आंखों की पुतलियों) की जानकारी, जनसंख्या संबंधी जानकारी और मेटा डेटा का साइबर सूचना संग्रहालय तैयार करता है। सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर 2018 के अपने फैसले में मेटा डेटा (अधि-आंकड़ा) के प्रावधान को निरस्त कर उसमें संशोधन करने का निर्देश दिया है।

भारत सरकार की बॉयोमेट्रिक्स समिति की रिपोर्ट बॉयोमेट्रिक्स डिजाइन स्टैंडर्ड फॉर यूआइडी एप्लिकेशंस की अनुशंसा में कहा है कि बॉयोमेट्रिक्स आंकड़े राष्ट्रीय संपत्ति हैं और उन्हें अपने मूल विशिष्ट लक्षण में संरक्षित रखना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक आंकड़े भी राष्ट्रीय संपत्ति हैं अन्यथा अमेरिका और उसके सहयोगी देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन की वार्ता में मुफ्त में ऐसी सूचना पर अधिकार क्यों मांगते?

कोई राष्ट्र या कंपनी या इन दोनों का कोई समूह अपनी राजनीतिक शक्ति का विस्तार आंकड़े को अपने वश में करके अन्य राष्ट्रों पर नियंत्रण कर सकता है। एक देश या एक कंपनी किसी अन्य देश के संसाधनों को अपने हित में शोषण कर सकता है। आंकड़ों के गणितीय मॉडल और डिजिटल तकनीक के गठजोड़ से गैरबराबरी और गरीबी बढ़ सकती है और लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। संवेदनशील सूचना के कंप्यूटिंग क्लाउड क्षेत्र में उपलब्ध होने से देशवासियों, देश की संप्रभुता व सुरक्षा पर खतरा बढ़ गया है। किसी भी डिजिटल पहल के द्वारा अपने भौगोलिक क्षेत्र के लोगों पर किसी दूसरे भौगोलिक क्षेत्र के तत्वों द्वारा उपनिवेश स्थापित करने देना और यह कहना कि यह अच्छा काम है, देश हित में नहीं हो सकता है। उपनिवेशवाद के प्रवर्तकों की तरह ही साइबरवाद व डिजिटल इंडिया के पैरोकार खुद को मसीहा के तौर पर पेश कर रहे हैं और बराबरी, लोकतंत्र एवं मूलभूत अधिकार के जुमलों का मंत्रोच्चारण कर रहे हैं। ऐसा करके वे अपने मुनाफे के मूल मकसद को छुपा रहे हैं।  

सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित संसदीय समिति ने 2014 की अपनी एक रिपोर्ट में अमेरिकी नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी द्वारा किये जा रहे खुफिया हस्तक्षेप और विकिलीक्स के खुलासे और साइबर क्लाउड तकनीकी और वैधानिक खतरों के संबध में भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के तत्कालीन सचिव जे. सत्यनारायण से पूछा था। संसदीय समिति उनके जवाब से संतुष्ट नहीं लगी। हैरत की बात है कि इन्हें विदेशी सरकारों और कंपनियों द्वारा सरकारी लोगों और देशवासियों के मेटा डाटा एकत्रित किए जाने से कोई परेशानी नहीं थी।

मोटे तौर पर ‘आधार’ तो बारह अंकों वाली एक अनूठी पहचान संख्या है, जिसके द्वारा देशवासियों के संवेदनशील आकड़ों को सूचीबद्ध किया जा रहा है, लेकिन यही पूरा सच नहीं है। असल में यह 16 अंकों वाला है, मगर 4 अंक छुपे रहते हैं। इस परियोजना के कई रहस्य अब भी उजागर नहीं हुए हैं। शायद इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पांच जजों में से चार जज सरकार द्वारा गुमराह हो गए प्रतीत होते हैं।

यूआइडी/आधार और नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (राष्ट्रीय खुफिया तंत्र) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आधार संख्या सम्मिलित रूप से राजसत्ता और कंपनियां विभिन्न कारणों से नागरिकों पर नजर रखने का उपकरण हैं। यह परियोजना न तो अपनी संरचना में और न ही अमल में निर्दोष है। केंद्रीय मंत्री ने 10 अप्रैल, 2017 को राज्यसभा में आधार पर चर्चा के दौरान कहा कि सरकार नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड और आधार संख्या को नहीं जोड़ेगी। इसी सरकार ने आधार को स्वैच्छिक बता कर बाध्यकारी बनाया है। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) और भारतीय वाणिज्य एंव उद्योग मंडल (एसोचैम) की रिपोर्टों से स्पष्ट है कि नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड और बायोमेट्रिक आधार संख्या परियोजना संरचनात्मक तौर पर जुड़े हुए हैं।

किसानों के आंकड़ों पर गिद्ध दृष्टि

फ़रवरी 1, 2023 को वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कृषि के आंकड़ाकरण और आंकड़ा आधारित कृषि तकनीक का जिक्र किया और बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, रिमोट सेंसिंग, बिग डेटा, ब्लॉक चेन, आइओटी, जीआईएस तकनीक और ड्रोन/रोबोट के उपयोग के माध्यम से कृषि में क्रांति की क्षमता है। सरकार का एग्रीस्टैक– एक सटीक किसान डेटाबेस, सरकारी योजनाओं/कार्यक्रमों से संबंधित जानकारी, कृषि-रसद और बाजार की जानकारी, वास्तविक समय के आधार पर सलाह, आकड़ों की पारदर्शिता और बाजार लिंकेज जैसे प्लेटफार्मों के माध्यम से प्रदान करेगा। एग्रीस्टैक प्रौद्योगिकियों और डिजिटल डेटाबेस का एक संग्रह है जो किसानों तथा कृषि क्षेत्र पर केंद्रित है। इसके तहत प्रत्येक किसान की आधार संख्या जैसी एक विशिष्ट डिजिटल पहचान (किसानों की आइडी) होगी जिसमें व्यक्तिगत विवरण, उनके द्वारा खेती की जाने वाली भूमि की जानकारी, साथ ही उत्पादन और वित्तीय विवरण शामिल होंगे। प्रत्येक आईडी व्यक्ति की आधार संख्या से जुड़ी होगी। गौरतलब है कि आधार संख्या कृषि विभाग के सभी अनुदान योजनाओ के लिये अनिवार्य कर दिया गया है। भू-आधार या विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या परियोजना भी एग्रीस्टैक से संरचनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है।   

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कृषि और किसानों का आंकड़ाकरण एक ऐसे सन्दर्भ में हो रहा है जहां 2010 से ही सरकार सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दे रही है कि निजता और आकड़ों की सुरक्षा के लिए कानून बनने जा रहा है मगर विदेशी कंपनियों के दबाब में वह कानून अभी तक बन नहीं पाया है।  दुनिया के इतिहास में सबसे व्यापक किसान आंदोलन के हस्तक्षेप के बाद सरकार और कॉर्पोरेट जगत की 9.3 करोड़ किसान परिवारों के आकड़ों पर नजर है। इन आकड़ों से उद्योगपतियों को सबसे अधिक लाभ मिलेगा। अर्न्स्ट एंड यंग का अनुमान है कि बावजूद इसके कि तकनीक की पैठ वर्तमान में केवल 1 प्रतिशत है, 2025 तक लगभग 24 अरब डॉलर के आय तक इसके पहुंचने की संभावना है। किसानों के आकड़ों के सहित फसल पैटर्न, मिट्टी का स्वास्थ्य, बीमा, क्रेडिट और मौसम पैटर्न जैसी सभी सूचनाओं को एक ही डेटाबेस में जोड़ने से बड़ी तकनीकी कंपनियों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा।

सरकार ने डिजिटल कृषि मिशन (2021-2025) शुरू किया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 3 अगस्त 2021 को लोकसभा में लिखित तौर पर कहा कि सरकार “इंडिया डिजिटल ईकोसिस्टम ऑफ एग्रीकल्चर” को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है, जो एग्रीस्टैक के लिए एक रूपरेखा तैयार करेगी। इस दिशा में पहले कदम के रूप में सरकार ने पहले से ही संघबद्ध किसानों के डेटाबेस का निर्माण शुरू कर दिया है जो परिकल्पित एग्रीस्टैक के मूल के रूप में काम करेगा 13 दिसंबर 2022 को उन्होंने बताया कि कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, सिस्को, जियो, पतंजलि, आइटीसी, ईएसआरआइ इंडिया टेक्नोलॉजीज लिमिटेड, स्टार एग्रीबाजार टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड, एनसीडीईएक्स ई-मार्केट्स लिमिटेड, निंजाकार्ट- 63आइडियाज इंफोलैब्स प्राइवेट लिमिटेड और राष्ट्रीय उद्यमिता नेटवर्क की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यूनिट (वाधवानी एआइ) जैसी 11 विदेशी व देशी कंपनियों के साथ समझौता किया है।  ऐसा प्रतीत होता है कि किसानों के तीनों विवादित कानून वापस लेने के बाद  सरकार ने प्लान-बी पर काम शुरू कर दिया है।

राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड: ई-कोर्ट परियोजना

राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस कार्यक्रम के तहत एक टास्क फोर्स ने पहचान और पहुंच प्रबंधन पर नीति दस्तावेज 2006 में प्रस्तुत किया। इस दस्तावेज से यह पता चलता है कि प्रत्येक पंजीकृत न्यायिक अदालत में अधीनस्थ न्यायालयों, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में एक यूआइडी (आधार) संख्या होती है। यह प्रयास न्यायिक संस्थानों की निशानदेही और निगरानी का हिस्सा प्रतीत होता है। राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड ई-कोर्ट परियोजना के अंतर्गत एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के तहत 18,735 जिला और संबंधित न्यायालयों और उच्च न्यायालय के फैसले, फैसलों व मामले के विवरण का एक डेटाबेस तैयार हो गया है। यह देश के सभी कम्प्यूटरीकृत जिला और संबंधित न्यायालयों की निगरानी दस्तावेज व निर्णयों से संबंधित डेटा प्रदान कर रहा है। सभी उच्च न्यायालय की वेब सेवाओं के माध्यम से राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड ई-कोर्ट परियोजना में शामिल हो गए हैं। जिला और तालुका अदालतों द्वारा डेटा को वास्तविक समय के आधार पर अपडेट किया जा रहा है। यह परियोजना इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (अंतर-संचालित आपराधिक न्याय प्रणाली) के शुरू करने के चरण में पहुंच गया है, जो आपराधिक न्याय प्रणाली में शामिल पुलिस, जेलों और अदालतों जैसे विभिन्न संस्थानों के बीच डेटा को एकीकृत और इंटरऑपरेबल बना रहा है। ये पहल संविधानवाद और संविधान की शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का पूर्ण अंत का मार्ग प्रतीत होता है। शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का अर्थ है कि लोकतंत्र के प्रत्येक स्तंभ – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका – अलग-अलग कार्य करते हैं एवं अलग-अलग संस्थाओं के रूप में कार्य करते हैं। राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड ई-कोर्ट परियोजना कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों के विभाजन को खत्म कर अधिनायकवाद के रास्ते की दिशा में जा रही है।

आधार कानून के असंवैधानिक पहलू

आधार कानून की धारा 57 जिसके मुताबिक ‘राज्य या कोई निगम या व्यक्ति’ आधार संख्या का इस्तेमाल ‘किसी भी उद्देश्य के लिए किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करने में कर सकता है’ को अब मिटा दिया गया है। आधार कानून के तहत प्राइवेट कंपनियां 2010 से ही आधार की मांग कर रही थीं। धारा 57 के अनुसार सिर्फ राज्य ही नहीं बल्कि बॉडी कॉरपोरेट या फिर किसी व्यक्ति को चिन्हित करने के लिए आधार संख्या मांगने का अधिकार नहीं है। इस प्रावधान के तहत मोबाइल कंपनी, प्राइवेट सर्विस प्रोवाइडर्स के पास वैधानिक सपोर्ट था जिससे वो पहचान के लिए आपकी आधार संख्या मांगते थे। ऐसे नाजायज प्रावधान को धन विधेयक का हिस्सा बनाया गया था जिसे लोकसभा ने कानून बना दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संविधान पीठ ने सितंबर 2018 में दो फैसले दिए हैं। दोनों फैसलों में आधार कानून पर सवाल उठाया गया है। चार जजों ने आधार के बहुत सारे प्रावधानों पर सवाल उठाया है। एक जज ने तो पूरे आधार कानून को ही असंवैधानिक बताया है। कोर्ट ने आधार कानून की धारा 57 को खत्म कर दिया। संसद ने भी आधार कानून में संशोधन कर इसे डिलीट कर दिया है। जनवरी 2009 से अब तक इस प्रावधान के तहत देशवासियों के साथ कानून के नाम पर घोर अन्याय किया गया। ऐसा करके देश हित और नागरिकों के हित के साथ खिलवाड़ किया गया है। इसकी सांस्थानिक जिम्मेवारी तय होना बाकी है। सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पांच जजों वाली संविधान पीठ ने नवंबर 2019 आधार कानून के संवैधानिकता को 7 जजों के पीठ के हवाले कर दिया है। इस मसले को 3 अप्रैल 2023 को मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी. वाई. चंद्रचूड़ की पीठ के सामने डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा उठाया गया। कोर्ट ने पीठ गठन करने की बात कही है।

आधार संख्या नागरिकता की पहचान नहीं है। यह आधार पंजीकरण से पहले देश में 182 दिन रहने की पहचान प्रदान करता है। कोई बुरुंडी, टिंबकटू, सूडान, चीन, तिब्बत, पाकिस्तान, होनोलूलू या अन्य देश का नागरिक भी इसे बनवा सकता है। नागरिकों के अधिकार को उनके बराबर करना और इसे बाध्यकारी बनाकर और इस्तेमाल करके उन्हें मूलभूत अधिकारों से वंचित करना तर्कसंगत और न्यायसंगत नहीं है।

यह परियोजना विदेशी बायोमेट्रिक टेक्नोलॉजी कंपनियों को मुनाफे देने के लिए बनाई गई है। आधार परियोजना में हर एक पंजीकरण पर 2 रुपये 75 पैसे खर्च हो रहे हैं। भारत की आबादी लगभग 140 करोड़ है। न सिर्फ पंजीकरण के समय बल्कि जब-जब इसे इस्तेमाल किया जाएगा, डीडुप्लिकेशन के नाम पर इन कंपनियों को इसका मुनाफा पहुंचाया जाएगा। इन बायोमेट्रिक टेक्नोलॉजी कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने के लिए ये सब किया जा रहा है। यह देशहित में नहीं है और यह मानवाधिकारों का बड़ा उल्लंघन है। आधार परियोजना पर होने वाले अनुमानित खर्च का आज तक खुलासा नहीं किया गया है। देशवासियों को अंधकार में रखकर बायोमेट्रिक-डिजिटल पहलों से जुड़े हुए उद्देश्‍यों को अंजाम दिया जा रहा है। आधार परियोजना आपातकाल के दौर के संजय गांधी के बाध्यकारी परिवार नियोजन की याद दिलाता है। इसका खमियाजा संजय गांधी और कांग्रेस पार्टी को भोगना पड़ा था। आधार परियोजना के पैरोकार भी उनके रास्ते ही चल रहे हैं।    

आधार संख्या और आपातकाल 

आधार संख्या मामले की सुनवाई के दौरान 2-3 मई, 2017 को जब अटॉर्नी जनरल और भारत सरकार के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को यह बताया था कि उनके द्वारा उठाया जा रहा कदम 1975 से जारी है तो यकायक कांग्रेस सरकार के मार्च 1975 के देश को एक संचार तंत्र में गूंथने के स्वप्न का खयाल आ गया। उस वक्त अधिकतर लोगों को यह कदम देशहित में ही लगा होगा क्योंकि वे इसके दूरगामी परिणाम से अनभिज्ञ थे। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था की मदद से नेशनल इनफ़ॉरमेटिक्स सेंटर का गठन 1975-1977 दौरान हुआ। यह सेंटर सूचना एवं संचार तंत्र का एक मुख्य केंद्र बन गया।

गौरतलब है कि आधार मामले में राज्यसभा में जब इस साल 10 अप्रैल को बहस चल रही थी तो कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण पर बनी कैबिनेट कमिटी के सदस्य व पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि “What sterilisation was to the Emergency, Aadhaar seeding is becoming to your Government” (जो रिश्ता नसबंदी और आपातकाल में था वही रिश्ता आधार और आपकी सरकार में है)। स्पष्ट है कि उनके दिमाग में आपातकाल की याद अभी भी ताजा है। वे आधार परियोजना के एकमात्र ऐसे जन्मदाता है जिन्होंने खुद सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा कर रखी है कि वे अपना आधार नहीं बनवाएंगे। वैसे तो उनमें और पूर्व केंद्रीय कानून व वाणिज्य मंत्री व वरिष्ठ सांसद सुब्रमण्यम स्वामी में शायद ही किसी बात पर सहमति हो मगर आधार के मामले में वे दोनों एक ही राय रखते दीखते हैं। 22 अप्रैल को NewsX चैनल पर स्वामी ने स्पष्ट कहा कि वे तो आधार नहीं बनवाएंगे। ऐसा लगता है कि आपातकाल के खिलाफ लड़ने वाले योद्धा स्वामी को उस दौर की नसीहत अब भी याद है।



नेशनल इनफॉरमेटिक्स सेंटर का गठन आपातकाल के गर्भ में हुआ। उस दौरान इंदिरा गाँधी ने एक सेंटर का गठन नागरिकों को एक संचार तंत्र में बांधने के लिए किया था। इस सबंध में इलेक्ट्रॉनिक्स आयोग ने संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनडीपी को सहयोग के लिए एक प्रस्ताव दिया था जिसमें दिल्ली में राष्ट्रीय सूचना संग्रह (डेटाबेस) के निर्माण और सरकार और विश्व बैंक समूह के व्यापक आर्थिक कार्यक्रमों के लिए एक राष्ट्रीय कंप्यूटर केंद्र की जरूरत शामिल है। नेशनल इनफॉरमेटिक्स सेंटर के निर्माण के लिए यूएनडीपी धन मुहैया कराने को तैयार हो गया। इस केंद्र का मैनडेट था कि वह मूल आंकड़ों के संग्रह और विस्तारण का केंद्र-बिन्दु बने। इस दूरगामी मकसद को योजना आयोग, वित्त मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स आयोग ने अनुमति दे दी। असल में इन तीनों संस्थानों की मुखिया खुद इंदिरा गाँधी ही थीं। उसी दौरान (1976-1977) इस केंद्र के लिए एक सलाहकार समिति भी बनाई गई थी।

बाद में इलेक्ट्रॉनिक आयोग इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय बना, जिसका जिम्मा आज अश्विनी वैष्णव के पास है। दिलचस्प बात ये है कि इंदिरा गाँधी की तानाशाही के खिलाफ जयप्रकाश आन्दोलन के संचालन के लिए जो 11 सदस्यों वाली समिति बनाई गई थी उसमें लालू प्रसाद यादव भी शामिल थे। सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, कांग्रेस (संगठन), भारतीय लोकदल, और मार्क्सिस्ट कोआर्डिनेशन कमिटी और इनके युवा संगठन आन्दोलन में सक्रिय भागीदार थे। कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और फॉरवर्ड ब्लाक ने आन्दोलन को समर्थन दिया था।

आपातकाल में इंदिरा गाँधी द्वारा गठित उसी नेशनल इनफॉरमेटिक्स सेंटर के गर्भ से उंगलियों और आँखों की पुतलियों के जरिये आधार संख्या परियोजना को लागू करने वाले भारतीय विशिष्ट प्राधिकरण का जन्म हुआ। नेशनल इनफॉरमेटिक्स सेंटर की तरह ही UNDP, विश्व बैंक, योजना आयोग (नीति आयोग), वित्त मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स आयोग (इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) आधार संख्या परियोजना के क्रियान्‍वयन में शामिल हैं। इसके द्वारा सभी देशवासियों समेत 53 केंद्रीय विभागों, राज्य सरकारों के 35 सचिवालयों, 640 जिला मुख्यालयों, 2 लाख 50 हज़ार पंचायतों, हरेक संस्था, जमीन, मशीन, दस्तावेज, भोजन, पानी, प्राकृतिक संसाधन, स्थान, पेड़-पौधे, जानवर, मुकदमे आदि को चिन्हित कर उस पर एक विशिष्ट पहचान संख्या गोदना है। इसके लिए आवश्यक तकनीक के निर्माण और प्रयोग के लिए नेशनल इनफॉरमेटिक्स सेंटर और कुछ विदेशी कंपनियों के साथ ठेका-समझौता हो चुका है।

इस परियोजना के प्रमुख सलाहकारों में से एक सैम पित्रोदा ने भविष्यवाणी की थी कि इलेक्ट्रॉनिक संपर्क के कारण साइबर दुनिया में राष्ट्र-राज्यों का अर्थ आने वाले दिनों में वही नहीं रहेगा जो 70 साल पहले हुआ करता था। 2013 में उन्होंने कहा था कि इस पर करीब एक लाख करोड़ का खर्चा आएगा। विशिष्ट पहचान परियोजना प्राधिकरण ने 2009-10 के दौरान 26 करोड़, 2010-11 में 268 करोड़, 2011-12 में 1187 करोड़, 2012-13 में 1338 करोड़, 2013-14 में 1544 करोड़, 2014-15 में 1615 करोड़, 2015-16 में 1680 करोड़, 2016-17 में 1132 करोड़, 2017-18 में 1149 करोड़, 2018-19 में 1181 करोड़, 2019-20 में 856 करोड़, 2020-21 में 893 करोड़, 2021-22 में 1564 करोड़ और 2022-23 में 1325 करोड़ खर्च किया है। सच यह  है कि सरकार ने आज तक परियोजना के कुल अनुमानित खर्चे का खुलासा नहीं किया है। वित्त पर संसदीय समिति ने संसद में पेश की अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि एक आधार संख्या जारी करने में औसतन 130 रुपये का खर्चा आता है जिसका देश के 140 करोड़ लोगों को भुगतान करना पड़ेगा।

भयावह बात ये है कि बायोमेट्रिक आधार परियोजना को लागू करने के लिए सैफ्रान नाम की जिस फ्रांस की कंपनी को ठेका दिया गया है उस कंपनी का चीन के साथ 40 साल का कोई समझौता है। इस कंपनी में फ्रांस सरकार का 40 फीसदी निवेश भी है। एल1 नामक अमेरिकी कंपनी को अमेरिकी सरकार से राष्ट्रीय सुरक्षा मंजूरी मिलने बाद फ्रांस की इस कंपनी ने खरीद लिया था। इस अमेरिकी कंपनी को भी आधार परियोजना को लागू करने के लिए ठेका दिया गया है। बायोमेट्रिक तकनीक के लिए विदेशी कंपनियों को शामिल करने की कोई ठोस वजह नहीं थी क्योंकि भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के पास खुद ये तकनीक मौजूद थी।

सरकार सूचना का ऐसा खजाना तैयार करने में जुटी है जिसमें विभिन्न दफ्तरों के साथ-साथ आम लोगों से जुड़ी शहरी-देहाती व जंगली जन-जीवन की एक-एक चीजों की पूरी जानकारी उपलब्ध रहेगी। इस प्रकार सभी सरकारी योजनाओं, जेलों, राशन व्यवस्था, खजानों, जमीन के रिकार्डों आदि को भी इस सूत्र में बांधने की कवायद है। सरकार के अनुसार, ‘‘यदि आप व्यक्तियों, जगहों एवं प्रोग्रामों को चिन्हित कर (सूचीबद्ध) कर लेते हैं तो सूचनाओं को सुविधापूर्वक संगठित कर जन-सुविधाओं को उपलब्ध कराने में सहूलियत होगी।’’

वर्तमान सरकार पिछली सरकार की तरह 1975 में तय संरचना में ही काम कर रही है। सारी सूचनाएं सरकार के कुछ विश्वासी लोगों और कुछ खास निजी कंपनियों के हाथों में होगी, जिनके साथ पहले ही समझौता हो चुका है। नंदन निलेकणी को भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण का चेयरमैन जुलाई 2009 में नियुक्त किया गया था पर दस्तावेजों से यह प्रमाणित होता है कि निलेकणी के पदभार ग्रहण से कम से कम दो साल पहले ही विशिष्ट पहचान परियोजना लागू हो चुकी थी। यह परियोजना सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के अंतर्गत चल रही थी। आइडेंटिटी मैनेजमेंट (पहचान प्रबंधन) सम्बन्धी एक टास्क फोर्स की 2007 की रिपोर्ट और विप्रो की 2006-07 की रिपोर्ट से भी यह खुलासा होता है। 2006 के आसपास आइटी क्षेत्र की विप्रो कंपनी ने योजना आयोग को एक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसका शीर्षक था ‘भारतीय विशिष्ट पहचान की रणनीतिक दृष्टि’ (दि स्ट्रैटेजिक विजन ऑन दि यूआइडीएआइ)। इस रिपोर्ट को गुप्त रखा गया था मगर काफी बाद में सुप्रीम कोर्ट में इस 14 पृष्ठ के दस्तावेज को पेश किया गया। विप्रो का दस्तावेज यह भी उजागर करता है कि मतदाता सूची और विशिष्ट पहचान/आधार संख्या की सूची दोनों एक दूसरे के पार्टनर डेटाबेस हैं। सच्चाई ये है कि निलेकणी को केवल इसके  मार्केटिंग, प्रचार और प्रसार के लिए ब्रांड एम्बेसडर के तौर पर लाया गया था। उन्होंने शुरुआती दिनों में स्वीकार भी किया था कि इस परियिजना की सफलता और असफलता सिर्फ मार्केटिंग पर निर्भर है। असल में यह कार्यक्रम तो मूल रूप में 1975 से ही चल रहा है।

विकीलिक्स ने यूआइडीएआइ का एक 41 पृष्ठों वाला दस्तावेज उजागर किया। इस दस्तावेज में जान-बूझ कर गलतबयानी की गई है कि सबसे पहले भारत सरकार ने देशवासियों को स्पष्ट पहचान देने का प्रयास 1993 में किया था जो चुनाव आयोग द्वारा जारी फ़ोटो पहचान पत्र के रूप में 2003 में सामने आया, जिसके जरिये भारत सरकार ने बहुउद्देशीय राष्ट्रीय पहचान पत्र को स्वीकृति दे दी। यह तथ्य पूर्णतः गलत है क्योंकि 2003 में जो पहचान पत्र चुनाव आयोग द्वारा जारी किया गया वह नागरिकों के लिए है न कि देशवासियों के लिए। यहां नागरिक एवं देशवासी के बीच अंतर को समझना अत्यंत जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसी विकीलिक्स द्वारा जारी दस्तावेज में लिखा है, ‘‘सभी देशवासियों को अनूठा पहचान पत्र जारी किया जा सकता है। यह अनूठा पहचान पत्र ‘पहचान’ का सबूत तो है, मगर यह नागरिकता का द्योतक नहीं है।’’ यह दस्तावेज 13 नवंबर, 2009 का है।

घोटालों के उजागर होने के कारण सूचना अधिकार कानून से तिलमिलाई कंपनियों ने सरकार से स्पष्ट मांग रखी कि सियासी दलों को अगर उनसे चन्दा चाहिए तो उनका नाम गुमनाम रखना होगा। इसका खुलासा तत्कालीन वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण 2017-18 में किया है। वित्त विधेयक 2017 को धन विधेयक के रूप में लोकसभा में लाकर उन्होंने कंपनियों की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया है। कंपनियां उनके इस कारनामे से काफी खुश होंगी। इस वित्त कानून 2017 ने अप्रत्याशित तौर पर लगभग 40 कानूनों में तक़रीबन 250 संशोधन किया है। आधार कानून 2016 में भी संशोधन कर बायोमेट्रिक आधार को अनिवार्य कर दिया गया है। इस तरह वर्तमान और भविष्य के भारतवासियों को अनंतकाल के लिए पारदर्शी बना दिया गया है और कंपनियों को लगभग सौ साल बाद “लिमिटेड लायबिलिटी” के अधिकार के साथ-साथ गुमनाम रहने का परम निर्णायक अधिकार मिल गया है। कंपनियों को ‘लिमिटेड कंपनी’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि कानून ने उन्हें यह सहूलियत प्रदान की है कि वे अपने क्रियाकलाप से “अनलिमिटेड” (अंतहीन) नुकसान कर सकती हैं मगर उनके ऊपर अंतहीन भारपाई की जिम्मेवारी नहीं होगी। बायोमेट्रिक आधार परियोजना ऐसे ही नुकसान का उदाहरण है।

गुमनाम रहने के चरम अधिकार के फलस्वरूप कंपनियों को गुमनाम रहकर अंतहीन नुकसान पहुंचाने का अधिकार मिल गया है। अब वे सियासी दलों को जितना चाहें उतना चंदा दे सकते हैं और उसके बदले देश के प्राकृतिक संसाधनों, मानव संसाधनों और लोक संस्थानों को अपनी पूंजी के बलबूते आसानी से अपने वश में कर सकती हैं। सवाल ये है कि यह अनहोनी खुलेआम कैसे हो गई और लोग खामोश क्यों हैं? सरकार व कंपनियों के विचारकों के अनुसार भारत “मंदबुद्धि लोगों का देश” है। शायद इसीलिए वो मानते जानते हैं कि लोग खामोश ही रहेंगे। ऐसा भारतीय गृह मंत्रालय के तहत नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नैटग्रिड) विभाग के मुखिया रहे कैप्टन रघुरमन का मानना है।

कैप्टन रघुरमन पहले महिंद्रा स्पेशल सर्विसेस ग्रुप के मुखिया थे और बॉम्बे चैम्बर्स ऑफ इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स की सेफ्टी एंड सिक्योरिटी कमेटी के चेयरमैन थे। इनकी मंशा का पता इनके द्वारा ही लिखित एक दस्तावेज से चलता है, जिसका शीर्षक “ए नेशन ऑफ नम्ब पीपल” अर्थात् असंवेदनशील मंदबुद्धि लोगों का देश है। कैप्टन रघुरमन बाद में नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड के मुखिया बने। इस ग्रिड के बारे में तीन लाख कंपनियों की नुमाइंदगी करने वाली एसोसिएट चैम्बर्स एंड कॉमर्स (एसोचेम) और स्विस कंसलटेंसी के एक दस्तावेज में यह खुलासा हुआ है कि विशिष्ट पहचान/आधार संख्या इससे जुड़ा हुआ है।


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आजादी से पहले गठित अघोषित और अलोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टी “फिक्की” (फेडरेशन ऑफ़ इंडियन कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) द्वारा 2009 में तैयार राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर टास्कफोर्स (कार्यबल) की 121 पृष्ठ की रिपोर्ट में गैर सरकारी तत्वों की साजिशों पर चिंता जताई गई है जो “वैश्विक निवेशकों” के भरोसे को डिगाता है। फिक्की की रिपोर्ट सभी जिला मुख्यालयों और पुलिस स्टेशनों को ई-नेटवर्क के माध्यम से नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नैटग्रिड) में जोड़ने की वकालत करती है और कहती है “जैसे ही भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआइडीएआइ) तैयार हो जाएगा, उसमें शामिल आंकड़ों को नेशनल ग्रिड का हिस्सा बनाया जा सकता है।’’ ऐसा पहली बार नहीं है कि नैटग्रिड और यूआइडीएआइ के रिश्तों पर बात की गई है। कंपनियों के हितों के लिए काम करने वाली संस्था व अघोषित और अलोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टी “एसोचैम” और स्विस परामर्शदाता फर्म केपीएमजी की एक संयुक्त रिपोर्ट ‘होमलैंड सिक्योरिटी इन इंडिया 2010’ में भी यह बात सामने आई है। इसके अलावा जून 2011 में एसोचैम और डेकन क्रॉनिकल समूह के प्रवर्तकों की पहल एवियोटेक की एक संयुक्त रिपोर्ट ‘होमलैंड सिक्योरिटी एसेसमेंट इन इंडिया: एक्सपैंशन एंड ग्रोथ’ में कहा गया है कि ‘राष्ट्रीय जनगणना के तहत आने वाले कार्यक्रमों के लिए बायोमेट्रिक्स की जरूरत अहम हो जाएगी।’

वैसे तो दस्तावेजों के मुताबिक अमेरिका में बायोमेट्रिक यूआइडी/अनूठी पहचान के बारे में क्रियान्वयन की चर्चा 1995 में अमेरिका के फ़ेडरल ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन के एक ट्रेनिंग केंद्र पर हो चुकी थी मगर हाल के समय में धरातल पर अमेरिकी रक्षा विभाग में यूआइडी और रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआइडी) की प्रक्रिया को माइकल वीन के रहते उतारा गया। वीन 2003 से 2005 के बीच एक्विजिशन, टेक्नोलॉजी एंड लॉजिस्टिक्स (एटीऐंडएल) में अंडर सेक्रेटरी डिफेंस हुआ करते थे। एटीऐंडएल ने ही यूआइडी और आरएफआइडी कारोबार को जन्म दिया। अंतरराष्ट्रीय फौजी गठबंधन “नाटो” के भीतर दो ऐसे दस्तावेज हैं जो चीजों की पहचान से जुड़े हैं। पहला मानकीकरण संधि है जिसे 2010 में स्वीकार किया गया था। दूसरा एक दिशा-निर्देशिका है जो नाटो के सदस्यों के लिए है जो यूआइडी के कारोबार में प्रवेश करना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की तरह भारत का भी नाटो से कोई रिश्ता बन गया है। यहां हो रही घटनाएं इसी बात का आभास दे रही हैं।

ध्यान देने वाली बात ये है कि चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मौजूद सूचना के मुताबिक हर ईवीएम में यूआइडी होता है। हैरतंगेज बात यह है कि राज्यों में जहां विरोधी दलों की सरकार है वे भी यूआइडी/आधार परियोजना को बड़ी तत्परता से लागू कर रहे हैं मगर संसद में उसके खिलाफ तर्क दे रहे हैं। यह ऐसा ही है जैसे अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति जब पहली बार शपथ ले रहे थे तो उन्हें यह पता ही नहीं चला कि जिस कालीन पर खड़े थे वह उनके परम विरोधी पूंजीपति डेविड कोच की कम्पनी इन्विस्ता द्वारा बनाई गई थी।  डेविड कोच ने ही अपने संगठनों के जरिये पहले उन्हें गैर चुनावी शिकस्त दी और फिर बाद में चुनावी शिकस्त भी दी।

भारत में भी विरोधी दल जिस बायोमेट्रिक यूआइडी/आधार और यूआइडी युक्त ईवीएम की कालीन पर खड़े हैं वह भी कभी भी उनके पैरों के नीचे से खींची जा सकती है। लोकतंत्र में विरोधी दल को अगर आधारहीन कर दिया जाता है तो इसका दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता है क्योंकि ऐसी स्थिति में उनके लोकतान्त्रिक अधिकार छिन जाते हैं। आधार मामले में विरोधी दलों का जो विरोधाभासी रुख है वह उनकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उठाता दिख रहा है।

इसी कड़ी में जनगणना के 15वें चरण में एक दूरगामी परिणाम वाली योजना राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को भी जोड़ दिया गया जो अनूठी पहचान संख्या से संरचनात्मक तौर से संबंधित है। इन योजनाओं का रिश्ता कुछ अन्य प्रस्तावों एवं प्रस्तावित विधेयकों से भी है। इस तरह निशानदेही करने के पुराने सिलसिले को संसद और नागरिकों को अंधकार में रखकर आगे बढ़ाया जा रहा है। इस संबंध में कांग्रेस नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार की तरह ही भाजपा नेतृत्व वाली सरकार भी अदालत और संसद की अवमानना तक कर रही है। हैरत की बात है कि गैर कांग्रेस और गैर भाजपा सियासी दल कथनी में तो उनका विरोध करते हैं मगर करनी में उन्हीं की नीतियों पर चल रहे हैं।

गांधी जी के पहले सत्याग्रह के सबक

गांधीजी वकालत के सिलसिले में मुंबई से मई 1893 में दक्षिण अफ्रीका के ट्रांसवाल इलाके में पहुंचे थे। वहां उन्होंने  एशियाई लोगों और विशेष रूप से भारतीयों और चीनी लोगों के बायोमेट्रिक पहचान-फिंगरप्रिंट आधारित पंजीकरण का विरोध किया था। गाँधी फिल्म में इस घटना का जिक्र है। अपनी पुस्तकसत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका’ में गांधीजी ने 1906 के एशियाई कानून संशोधन अध्यादेश और ट्रांसवाल एशियाटिक पंजीकरण अधिनियम का “काला अधिनियम” के रूप में वर्णन किया है। क्या भारत में राजनीतिक दल 1906 के ब्रिटिश एशियाई कानून संशोधन अध्यादेश और 1907 के ट्रांसवाल एशियाटिक पंजीकरण अधिनियम के विरोध में गांधीजी के पहले सत्याग्रह का समर्थन करते हैं? अधिनियम के तहत प्रत्येक एशियाई पुरुष को खुद को पंजीकृत करना था और मांगे जाने पर अंगूठे से मुद्रित पहचान प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना था। अपंजीकृत व्यक्तियों और प्रतिबंधित आप्रवासियों को अपील के अधिकार के बिना निर्वासित किया जाना था या अधिनियम का पालन करने में विफल रहने पर मौके पर ही जुर्माना लगाया जाना था। ट्रांसवाल एशियाटिक अध्यादेश के तहत सभी को दस उंगलियों के निशान के साथ पंजीकरण करने और पुलिस द्वारा मांगे जाने पर पंजीकरण प्रमाण पत्र दिखाने की आवश्यकता थी। गांधीजी ने अध्यादेश को समुदाय के प्रति घृणा से भरा और अपमान माना। उन्होंने कानून की अवहेलना करने का फैसला किया।


ट्रांसवाल एशियाटिक पंजीकरण पत्र

11 सितंबर 1906 को एक बड़ी सार्वजनिक बैठक में उन्‍होंने पंजीकरण न कराने की शपथ ली। गांधी और अन्य लोगों ने पंजीकरण कार्यालयों और अदालती कारावास पर धरना देना शुरू कर दिया और नवंबर 1907 में “सत्याग्रह” का निर्णय लिया। 1911 में दक्षिण अफ़्रीका संघ के गठन के बाद बातचीत से समाधान की उम्मीद में सत्याग्रह को निलंबित कर दिया गया था, लेकिन वार्ता विफल रही। इसके अलावा, केप सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ईसाई रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं किए गए सभी विवाह- यानी अधिकांश भारतीय विवाह- अमान्य थे। इससे बच्चे नाजायज हो गए और उन्हें विरासत से वंचित कर दिया गया। आंदोलन के दौरान गांधीजी को कई बार जेल जाना पड़ा। अंततः  सरकार से समझौता कराने में वे कामयाब हुए। 1914 में इंडियन रिलीफ़ एक्ट पास कर के भारतीयों पर अलग से लगने वाला टैक्स भी ख़त्म किया गया। इससे भारतीयों की शादी को भी सरकारी मान्यता मिलने लगी।

हैरत की बात यह भी है कि एक तरफ गाँधीजी के सत्याग्रह पर सरकारी कार्यक्रम हो रहे हैं वहीं वे गाँधीजी के द्वारा एशिया के लोगों की बायोमेट्रिक निशानदेही आधारित पंजीकरण के खिलाफ उनके पहले सत्याग्रह और आजादी के आन्दोलन के सबक को भूल गए। उन्होंने उंगलियों की निशानदेही के द्वारा पंजीकरण कानून को काला कानून कहा था और सबंधित दस्तावेज को सार्वजनिक तौर पर जला दिया था। चीनी निवासी भी उस विरोध में शामिल थे। ऐसा लगता है जैसे चीन को यह सियासी सबक याद रहा मगर भारत भूल गया। चीन ने बायोमेट्रिक निशानदेही आधारित आधार जैसी पहचान परियोजना को रद्द कर दिया है।

साइबर और बायोमेट्रिक पहलों से मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है। प्रौद्योगिकी आधारित सत्ता प्रणाली की छाया लोकतंत्र के मायने ही बदल रही है जहां प्रौद्योगिकी और प्रौद्योगिकी कंपनियां नियामक नियंत्रण से बाहर हैं क्योंकि वे सरकारों, विधायिकाओं और विरोधी दलों से हर मायने में कहीं ज्यादा विशाल और विराट हैं।

कांग्रेस ने यह स्वीकार कर लिया है कि आधार आपातकाल में लागू की गई संरचना का ही हिस्सा है। जयराम रमेश ने राज्यसभा में नसबंदी और आधार की तुलना के बाद कहा कि “यह बात सही है कि बच्चा हमने पैदा किया, लेकिन बच्चे को भस्मासुर आप बना रहे है।” दस्तावेज बताते है कि असल में इसकी पैदाइश भस्मासुर के रूप में ही हुई थी।

सरकार ने कंपनियों को गुमनाम रहने का अधिकार दे दिया है। कंपनियों के दबाव में सरकार जो कि जनता की नौकर है वह खुद को अपारदर्शी और जनता जो उसकी मालिक है, उसे पारदर्शी बना रही है। उसके बाद यह अलोकतांत्रिक दावा किया जा रहा कि सरकार का देशवासियों के शरीर पर अधिकार है। इस दावे के दूरगामी परिणाम होंगे।

इंदिरा गाँधी और उनके एक वंशज को भी ऐसा ही लगा था। वे केवल पुरुषों के शरीर पर हाथ रख रहे थे। इसका खमियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ा। आधार परियोजना में मामले में तो स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर के संवेदनशील हिस्सों पर हाथ डाला जा रहा है। इतिहास अपने को दोहरा रहा है। ताज्जुब की बात ये है कि विस्मृति का स्वांग कर आपातकाल की संरचना और दर्शन के खिलाफ आन्दोलन करने वाले आज तानाशाही की संरचना को ही लागू करते दिख रहे हैं। राहुल गाँधी, सीताराम येचुरी, डी. राजा,  के.सी. त्यागी, दीपांकर भट्टाचार्य सहित विपक्ष के कई प्रमुख नेताओं ने आधार संख्या परियोजना को “सियासी हथियार” के रूप में चिन्हित कर लिया है मगर कांग्रेस सहित विपक्ष की सभी सरकारे  इस परियोजना को तत्परता से लागू कर विरोधाभासी रुख अख्तियार कर रही हैं। आधार सामूहिक बहिष्कार का सबसे बड़ा हथियार रहा है। इसे राशन से जोड़ने लोग भूख से मर रहे हैं। इसे मनरेगा और नौकरी से जोड़ने की वजह से लोग मजदूरी से वंचित हो रहे हैं। इसे मतदाता सूची से जोड़ने से लोग मताधिकार से वंचित हो रहे हैं। ऐसे में विपक्ष की बातों पर तभी भरोसा होगा जब सभी दल ये वादा करें कि वे आधार कानून व आधार परियोजना को निरस्त करेंगे।

आंकड़ों के राष्ट्रवाद की विचारधारा के तहत यूरोप में जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन के अलावा अमेरिका, चीन, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में इस तरह की परियोजनाओं को रोक दिया गया है। अभी तक अदालत ने दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलाजी कंपनी आइबीएम के कारनामों की अनदेखी की है। आइबीएम ने नाजियों के साथ मिलकर यहूदियों की संपत्तियों को हथियाने, उन्हें नारकीय बस्तियों में महदूद कर देने, उन्हें देश से भगाने और आखिरकार उनके सफाये के लिए पंच-कार्ड (कंप्यूटर का पूर्व रूप) और इन कार्डों के माध्यम से जनसंख्या के वर्गीकरण की प्रणाली के जरिये यहूदियों की निशानदेही की, उसने मानवीय विनाश के मशीनीकरण को संभव बनाया। इसकी आशंका प्रबल है कि आधार से वही होने जा रहा है, जो जर्मनी में हुआ था। सूचना अधिकार के तहत हासिल किये गए अधूरे दस्तावेजों से अब तो यह स्पष्ट है कि जर्मनी की तरह भारतीय आधार परियोजना एक्सेंचर व सैफ्रान जैसी विदेशी कंपनियों को आंकड़ा मुहैया करा रही है।

इस मामले में दिल्ली हाइ कोर्ट में एक सेवानिवृत्त फौजी वैज्ञानिक द्वारा दायर एक मुकदमा 2014 से लंबित है। इस मामले की अगली सुनवाई जस्टिस प्रतिभा सिंह के आदेश द्वारा 1 सितम्बर 2023 को तय है। मानवता के इतिहास की सबसे बड़े डेटाबेस परियोजना में आइबीएम व अर्नस्ट और यंग जैसी विदेशी कंपनियां भी शामिल है। आधार कानून, एग्रीस्टैक, राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड और सभी सबंधित परियोजनाएं, आंकड़ों के राष्ट्रवाद के लिटमस टेस्ट बन गए हैं।



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