Politics

Prashant Kishor, November 20, 2025, Gandhi Ashram

चुनाव से व्यवस्था को बदलने आए प्रशांत किशोर की सियासी बस क्यों छूट गई?

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भारतीय राजनीति के पारंपरिक अखाड़े के लिहाज से बीते कुछ दशकों में प्रशांत किशोर शायद अपने किस्‍म के इकलौते बाहरी हैं जो इतने धूम-धड़ाके और खर्चे-पानी के साथ पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने उतरे। बाकी बाहरियों से उलट, न तो उनके पास नरेंद्र मोदी जैसा संघ-पोषण था और न ही अरविंद केजरीवाल जैसी एनजीओ की पृष्‍ठभूमि। उन्‍होंने कुछ नेताओं के लिए चुनावी रणनीति जरूर बनाई थी, लेकिन अपने मामले में गच्‍चा खा गए। क्‍यों? गोविंदगंज सीट की दिलचस्‍प कहानी के सहारे केवल एक दाने से पूरा भात कच्‍चा रह जाने का आकलन कर रहे हैं अंकित दुबे

A wall poster of NDS in Bihar

बिहार: युवाओं के ज्वलंत मुद्दे मतदाताओं को बदलाव के लिए एकजुट क्यों नहीं कर सके?

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एक दौर में अपनी छात्र-युवा शक्ति के बल पर इस देश में संपूर्ण क्रांति का नारा देने वाला बिहार बीस साल से एक अदद सरकार तक नहीं बदल पा रहा है जबकि युवाओं की समस्‍याएं दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही हैं। इस बार सभी राजनीतिक दलों ने युवाओं से रोजगार आदि का वादा किया था, लेकिन चुनाव जब जमीन पर उतरा तो सारी कहानी जातिगत ध्रुवीकरण का शिकार हो गई। जो दल जीता, उसने ‘जंगलराज’ का डर दिखाकर वोट खींच लिए। हर बार यही होता है और हर बार बिहार का नौजवान ठगा जाता है। चुनाव नतीजों के बाद विपक्ष के कुछ युवाओं से बातचीत के आधार पर अखिलेश यादव की टिप्‍पणी

Zohran Mamdani

ममदानी की जीत : वामपंथ के लिए कुछ करने और बड़ी तस्वीर पर सोचने का यह वक्त है!

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ट्रम्‍प के राज वाले अमेरिका में उनके मुखर विरोधी और उग्र बदलावकारी राजनीति के नारे देने वाले एक युवा ज़ोहरान ममदानी के न्‍यू यॉर्क शहर का मेयर बन जाने पर दुनिया भर में चर्चा हो रही है। ममदानी की इस उपलब्धि में अमेरिका के ट्रम्‍प समर्थक कामगारों और किसानों के लिए क्‍या कोई राजनीतिक संभावना छुपी है, जो पहले ही सत्ता से हताश चल रहे हैं? ममदानी अगर उस दिशा में कुछ करें, तो उन्‍हें सबसे बड़ा खतरा किससे होगा? प्रोजेक्‍ट सिंडिकेट के सौजन्‍य से ज़ीज़ेक का आकलन

RSS 100 years celebration in Nagpur

RSS@100 : संविधान की छाया में चक्रव्यूह… संघ अब राजकीय नीति है, नारा नहीं!

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राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ सौ साल का हो गया। ठीक उसी दिन, जब महात्‍मा गांधी की जयन्‍ती थी और दशहरा भी था। बीते लोकसभा चुनाव के बाद वाले एकाध महीने छोड़ दें, तो सौवें साल में संघ-शीर्ष तकरीबन शांत मुद्रा में ही रहा। यह मुद्रा विजयादशमी के एक दिन पहले वाकई राजकीय मुद्रा में तब्‍दील हो गई। गांधी-हत्‍या के बाद जिसे खोटा माना गया था, संघ का वह सिक्‍का 77 साल बाद चल निकला। भारतीय राष्‍ट्र-राज्‍य, लोकतंत्र, संविधान और सत्ताधारी दल के लिए इसके क्‍या निहितार्थ हो सकते हैं? पहले भी संघ पर यहां लिखने वाले व्‍यालोक ताजा संदर्भ में एक बार फिर रोशनी डाल रहे हैं

Bihar Assembly Elections 2025

‘वोट चोरी’ और SIR के आर-पार, क्या सोच रहा है चुनावी बिहार? जमीनी स्वर और शुरुआती संकेत…

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ऐसा लगा कि समय से पहले ही राहुल गांधी ने एक यात्रा निकाल कर बिहार में चुनावी माहौल जमा दिया था, लेकिन अब उसका असर छीजता दिख रहा है। तेजस्‍वी अपने दम पर अकेले एक नई यात्रा निकाल रहे हैं; मोदी-नीतीश योजनाएं और पैकेज देने में जुट गए हैं; तो विपक्ष की हवा बनाने वाला चुनाव आयोग का एसआइआर 7 अक्‍टूबर तक अदालत में फंस गया है। इस बीच लोग क्‍या सोच रहे हैं? बीस साल से कायम सत्ता की यथास्थिति टूटने की क्‍या कोई भी संभावना है? लगातार आठ दिन चौबीस घंटे बिहार की सड़कों को नाप कर दिल्‍ली लौटे गौरव गुलमोहर का बिहार विधानसभा चुनाव 2025 पर एक पूर्वावलोकन

Indira Gandhi

‘इमरजेंसी’ आधी सदी बाद भी दबंग शासकों के लिए आईना क्‍यों है? एक निस्‍संग किताब से कुछ सबक

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इस साल प्रकाशित श्रीनाथ राघवन की इंदिरा गांधी पर लिखी किताब एक ओर सत्ता के काम करने के तरीके उजागर करती है, तो दूसरी तरफ आज के शासकों को चेतावनी भी देती है। पचास साल पहले इस देश में इमरजेंसी लगाने वाली युद्धोत्‍तर काल की पहली दबंग शासक इंदिरा गांधी पर आज की तारीख में कहानी कहना लोकतंत्र की उस नजाकत को उभारने जैसा काम है, जिसका मूल सबक यह है कि लोकतांत्रिक परिवर्तन और पतन दोनों एक ही राह के हमजोली होते हैं। ‘’इंदिरा गांधी ऐंड द ईयर्स दैट ट्रांसफॉर्म्‍ड इंडिया’’ पर अंतरा हालदर की समीक्षा

Tomb of Nawab Abdul Samad in Fatehpur, UP

फतेहपुर : हिंदुत्‍व की पुरानी समझदारी से इबादतगाहों के नए विवादों को समझने की अड़चनें

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देश की सेकुलर जमातों के ऊपर बाबरी विध्‍वंस का कर्ज इस कदर हावी है कि पिछले साल संभल हो, इस साल बहराइच या ताजा-ताजा फतेहपुर, हर जगह उन्‍हें नई अयोध्‍या ही बनती दिखाई देती है। इसके बरक्‍स, हर बार राज्‍य का धर्म में हस्‍तक्षेप और प्रत्‍यक्ष होता जाता है; हिंदुत्‍व की राजनीति और जटिल होती जाती है; जबकि हर बार जमीन पर बहुसंख्‍यकों की गोलबंदी कमतर। अयोध्‍या की घटना तो एक सुगठित आंदोलन की परिणति थी, लेकिन फतेहपुर के मकबरे पर इस माह दिखे बाबरी जैसे दृश्‍य? बाबरी के मुहावरे में आज के हिंदुत्‍व को समझना क्‍यों भ्रामक हो सकता है, संभल और फतेहपुर की जमीन से बता रहे हैं शरद और गौरव

Ngugi wa Thiong'o

न्गुगी वा थ्योंगो : जिन्हें नोबेल मिलना भारत की मुक्तिकामी आवाजों को शायद बचा ले जाता!

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महान अफ्रीकी लेखक और मुक्तिकामी राजनीति के हस्‍ताक्षर न्गुगी वा थ्योंगो का 28 मई को निधन हो गया। वैश्विक स्‍तर पर उनके निधन की ठीकठाक चर्चा हुई है लेकिन भारत में और खासकर हिंदी जगत में एक परिचित किस्‍म का सन्नाटा है- बावजूद इसके कि न्‍गुगी पहली बार 1996 में और दूसरी बार 2018 में न सिर्फ भारत आए, बल्कि बीते तीन दशक में उनके लिखे साहित्‍य का हिंदी में विपुल अनुवाद भी हुआ। भारत की राजनीति और समाज से जबरदस्‍त समानताएं होने के बावजूद अफ्रीकी जनता के नवउदारवाद-विरोधी संघर्ष को हिंदी के व्‍यापक पाठक समाज ने यदि तवज्‍जो नहीं दी, तो क्या उसकी वजह न्‍गुगी को नोबेल न मिल पाना है? अगर उन्‍हें नोबेल मिल जाता, तब क्‍या तस्‍वीर कुछ और होती? न्‍गुगी की दूसरी भारत यात्रा के संस्‍मरणों को टटोलते हुए इस काल्‍पनिक सवाल के बहाने अभिषेक श्रीवास्‍तव का स्‍मृति-लेख

1984 by George Orwell

युद्ध ही शांति है : पचहत्तर साल पहले छपे शब्दों के आईने में 2025 की निरंकुश सत्ताओं का अक्स

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सर्वसत्तावाद, अंधराष्‍ट्रवाद, स्‍वतंत्रता पर बंदिशों, निरंकुशता और एक पार्टी के एकाधिकारी राज का संदर्भ जब-जब आता है, 1949 में प्रकाशित जॉर्ज ऑरवेल के उपन्‍यास 1984 की सहज याद हो आती है। पचहत्तर वर्ष बाद यह उपन्‍यास अपने लेखनकाल के मुकाबले कहीं ज्‍यादा प्रासंगिक हो चुका है, इतना कि आए दिन कोई न कोई नेता, अदालत या असहमत इसको उद्धृत करता है। ऑरवेल ने 1984 में अपने काल्‍पनिक किरदार इमानुएल गोल्‍डस्‍टीन की एक काल्‍पनिक पुस्‍तक ‘द थ्‍योरी ऐंड प्रैक्टिस ऑफ ओलिगार्चल कलेक्टिविज्‍म’ के तीसरे अध्याय में युद्ध पर सर्वसत्तावादी पार्टी के नजरिये से विचार किया था। निरंकुश सत्ताओं को समझने के लिए प्रस्‍तुत युद्धविषयक तकरीर को वर्तमान संदर्भों में पढ़ा जाना चाहिए

Serbia Protests

सर्बिया : एक रेल हादसा, दो दर्जन मौतें, और आज पूरा देश निरंकुश सरकार के खिलाफ सड़क पर है…

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दिल्‍ली में रेलवे स्‍टेशन पर हुई भगदड़ में दो दर्जन से ज्‍यादा लोगों की मौत हुई है। भारत के रेलमंत्री ने औपचारिक अफसोस जताकर स्थिति को नियंत्रण में बता दिया है। तकरीबन ऐसा ही हादसा नवंबर में सर्बिया में हुआ था और इतने ही लोग मरे थे। पूर्व मंत्री सहित तेरह लोगों पर मुकदमा भी चला, इसके बावजूद सर्बिया के लोगों ने सड़क का रुख किया तो छात्रों के नेतृत्‍व में शुरू हुआ विरोध पूरे देश में आंदोलन बनकर फैल गया। लोकतांत्रिक संस्‍थाओं को जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की लड़ाई में सर्बिया से उठे नए किस्‍म के जनउभार पर स्‍लावोइ ज़ीज़ेक