मुसलमानों की एक और इबादतगाह ‘विवादित’ हो गई। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित नवाब अब्दुल समद के मकबरे को प्राचीन ठाकुर जी विराजमान मंदिर बता दिया गया। जिले की मंदिर मठ संरक्षण संघर्ष समिति की तरफ से बीते 7 अगस्त को जिलाधिकारी को पहले एक मांगपत्र सौंपकर कहा गया कि 11 अगस्त को मकबरे में साफ-सफाई कर के वहां पूजा-पाठ किया जाएगा। फिर, 11 अगस्त को प्रशासन की लगाई बैरीकेडिंग को धता बताते हुए मकबरे में घुस कर हिंदुत्ववादी संगठनों ने मज़ार और कब्र को क्षतिग्रस्त किया और इमारत की छत पर भगवा झण्डा फहरा दिया।
दैनिक अमर उजाला की एक खबर के अनुसार लगभग बीस मिनट तक यह ऐतिहासिक मकबरा हिंदुत्ववादियों के कब्जे में रहा। इतनी देर में कब्र और मज़ार को तोड़ा गया, पूजा-अर्चना की गई, शंख बजाकर छत पर भगवा झण्डा फहराया गया, और जय श्रीराम के नारे लगाए गए। इन सबकी हिंदुत्ववादी स्वयंसेवकों ने कमेंट्री सहित बाकायदा वीडियोग्राफी की, जिसे सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर आसानी से देखा जा सकता है।
पुलिस-प्रशासन ने इन लोगों को रोकने के लिए हल्का-फुल्का बलप्रयोग करना भी जरूरी नहीं समझा, बल्कि यह कहा जा सकता है कि प्रशासन ने उन्हें पूरा सहयोग किया, जैसा कि मामले के बाद दर्ज एफआइआर से स्पष्ट होता है जिसमें अज्ञात डेढ़ सौ लोगों के साथ नामजद कुल दस व्यक्तियों के बीच उस मुख्य किरदार का नाम नदारद है जिसने 11 अगस्त को मकबरे पर कार्रवाई का आवाहन किया था।
फतेहपुर, अगस्त 2025
जैसा कि इस किस्म की हर घटना के बाद होता है, इस बार भी फतेहपुर के संदर्भ में लोगों को बाबरी की याद आई। खासकर इसलिए भी क्योंकि फतेहपुर में 11 अगस्त की घटना से जुड़े जो दृश्य और बयान सामने आए हैं, उन्होंने 6 दिसंबर 1992 की यादों को ताजा कर दिया है। बाबरी विध्वंस से फतेहपुर की समानता विवरणों में छुपी हुई है।
फतेहपुर के एक राजनैतिक कार्यकर्ता ने बताया कि 11 अगस्त को लोगों को मज़ार पर लाने के लिए गाड़ियों और बसों का इंतजाम किया गया था। भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठन जो कि सांगठनिक रूप से देश भर में काफी मजबूत हैं, जाहिरा तौर पर फतेहपुर में भी काफी मजबूत स्थिति में ही होंगे क्योंकि वहां उनके चार विधायक हैं। भाजपा के जिला अध्यक्ष इस बात को बार-बार कह रहे थे कि इस मुद्दे को लेकर बहुत जन-आक्रोश है, हालांकि मीडिया में जो वीडियो दिख रहे हैं उसमें कहीं भी जनभागीदारी या जनसैलाब जैसा कुछ नजर नहीं आ रहा है।
फतेहपुर के हिंदू संगठनों के नेताओं के बयानों पर आने से पहले बाबरी विध्वंस के ठीक पहले भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के कहे को एक बार याद कर लेना चाहिए क्योंकि तीन दशक से ज्यादा वक्त पहले दिए उनके बयान और फतेहपुर के हिंदुत्ववादी नेताओं के ताजा बयानों में जो समानता है, उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। आडवाणी ने कहा था कि “लोग कहते हैं कि आप अदालत का फैसला क्यों नहीं मानते हैं, क्या अदालत इस बात का फैसला करेगी कि यहां राम का जन्म हुआ था या नहीं हुआ था, आप से तो इतनी ही आशा है, बीच में मत पड़ो, रास्ते में मत पड़ो। क्योंकि ये जो रथ है, लोक रथ है, जनता का रथ है, जो सोमनाथ से चला है और जिसने मन में संकल्प लिया है कि 30-अक्टूबर को वहां (अयोध्या) पहुंचकर कारसेवा करेंगे और मंदिर वहीं बनाएंगे, उसको कौन रोकेगा, कौन सी सरकार रोकने वाली है।”
फतेहपुर में हिंदू महासभा के एक नेता मनोज त्रिवेदी 11 अगस्त को मकबरे पर हुए हमले के समय वहीं मौजूद थे। उन्होंने ही वहां पूजा-अर्चना का कार्य सम्पन्न करवाया था। वह हिंदू महासभा, उत्तर प्रदेश के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। उनका दिया बयान देखिए- “वह भगवान शिव का मंदिर था और हम लोग शांति पर विश्वास रखने वाले लोग हैं, हमारे जिला अध्यक्ष (भाजपा) और आरएसएस ने आवाहन किया था कि वहां पर हमारा मंदिर है और वहां पर हम पूजा-अर्चना करेंगे। उसी आवाहन के तहत आज हम वहां गए… और शांति से हमने नमामि शमीशाम का पाठ किया, धूपबत्ती जलाई और पुष्प चढ़ाया।‘’
आगे जब रिपोर्टर उनसे पूछता है कि इस बात के लिए आप लोग कोर्ट में क्यों नहीं गए? उनका कहना था कि ‘’…. हम लोग कोर्ट में क्यों जाएं, वह हमारा मंदिर है और क्या हम अपने मंदिर में पूजा करने के लिए कोर्ट में जाएं। हम तो केवल अपना अधिकार मांग रहे हैं न। क्या पूजा करने के लिए हमें कोर्ट में जाना पड़ेगा। अब भी? इस समय भी पूजा करने के लिए हम कोर्ट में जाएंगे, ये हम अच्छा नहीं समझते।‘’ उनका यह भी कहना था कि ‘’हम लोग तो सिर्फ शांति से पूजा करने जा रहे थे, वो पूजा हो जाने देते… उनको अगर हमारे खिलाफ कोई कार्रवाई करनी होती तो वो तहरीर देते।”
लगभग इसी तरह का जवाब एक रिपोर्टर को फतेहपुर के भाजपा अध्यक्ष मुखलाल पाल भी देते हैं। वह कहते हैं कि “बात कानून की नहीं है, बात आस्था की है, धर्म की है, हम केवल आरती और पूजा-अर्चना ही तो करने जा रहे थे, अपने मंदिर की’’। ये वही मुखलाल पाल हैं, जो फतेहपुर के पुलिस अधीक्षक को धमकी दे रहे हैं कि “ये मुलायम सिंह की सरकार नहीं है कि आप गोली चलवा देंगे, आपकी हिम्मत है तो गोली चलवा के देखिएगा’’।
यह अंतिम बयान खास तौर से ध्यान देने लायक है। कानून के ऊपर ‘आस्था’ का दावा तो बाबरी के वक्त भी मौजूद था, लेकिन अव्वल तो उस आस्था के पक्ष में फतेहपुर में कोई आंदोलन नहीं चला और दूसरे, एक असंवैधानिक कृत्य को ‘सत्ता’ के संरक्षण के साथ जोड़कर सही ठहराना और सत्ताधारी दल के एक जिलाध्यक्ष का पुलिस कप्तान से कह देना कि ‘’ये मुलायम सिंह की सरकार नहीं है’’, उस नई परिपाटी का साक्ष्य है जिसकी आहट हम पिछले साल संभल में सुन चुके हैं।
हिंदुओं की व्यापक भागीदारी के अभाव और मुखलाल पाल के बयान पर आकर बाबरी विध्वंस के साथ फतेहपुर मकबरे के विध्वंस की सादृश्यता से उपजी समानता संदिग्ध हो जाती है। ऐसा लगता है कि हर बार किसी मुस्लिम इबादतगाह पर हमले की घटना की सेकुलर जमातों और बौद्धिकों द्वारा अयोध्या के साथ तुलना कर के सरसरी तौर पर यह कह देना कि यह ‘’दूसरी अयोध्या’’ बनाने का प्रयास है, बीते दशक में अनुकूल सत्ताओं के संरक्षण तले क्रमश: उग्र होते गए राजनीतिक हिंदुत्व के क्रमिक विकास की उपेक्षा कर देना है। जब हम ऐसा कह रहे हैं, तो वास्तव में यह सवाल पूछ रहे हैं अभी के समय के हिंदुत्व में ऐसा ‘नया’ क्या है, जो बाबरी के दौर में नहीं था।
संभल, नवंबर 2024

इस बात को समझने के लिए दस माह पहले संभल में हुई हिंसा पर एक निगाह डालते हैं, जहां की शाही जामा मस्जिद और श्री हरिहर मंदिर विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते ही दोनों पक्षों को अगली सुनवाई तक यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया है। फतेहपुर से समानता और अयोध्या से फर्क का एक मुख्य बिंदु वहां यह था कि संभल में इबादतबाह पर हिंदू दावे के पक्ष में कोई आंदोलन नहीं चला था। फतेहपुर में भी नहीं चला।
ध्यान देने वाली बात है कि संभल में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। आबादी में उनकी हिस्सेदारी मात्र 22 प्रतिशत है। संभल में हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा मस्जिद की जगह पर हरिहर मंदिर होने के दावे में क्या आम हिंदुओं की कोई भागीदारी दिखाई पड़ती है? क्या ऐसी कोई खबर सुनी गई या देखी गई जिसमें संभल या कहीं और हरिहर मंदिर को लेकर हिंदू संगठनों की तरफ से कोई जलसा, जुलूस या प्रोटेस्ट मार्च हुआ हो और उसमें हिंदुओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी की हो? ऐसा अभी तक तो बिल्कुल भी नहीं हुआ है।
इसके ठीक उलट, बहुसंख्यक मुसलमानों ने इसी महीने शाही जामा मस्जिद की प्रबंध समिति के अध्यक्ष ज़फ़र अली की जेल से रिहाई की खुशी में एक जुलूस निकाला तो निषेधाज्ञा के उल्लंघन के आरोप में अली सहित चार नामजद और करीब 60 अनाम लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर दी गई। दिलचस्प है कि यह एफआइआर एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर की तहरीर पर दर्ज की गई जिसमें अली को फिर से लपेट लिया गया, जो संभल हिंसा के प्रकरण में कैद थे और 1 अगस्त को ही मुरादाबाद जेल से छूटे थे।
संभल में 24 नवंबर, 2024 को हुई हिंसा में पांच लोग मारे गए थे। सभी मुसलमान थे। वे कैसे और क्यों मारे गए, इसे वहां के लोग अच्छे से जानते हैं। इस घटना के बाद हम दोनों संभल गए थे। हमने वहां के हिंदू दुकानदारों, व्यापारियों, ई-रिक्शा चालकों और आर्यसमाजी हिंदुओं से मस्जिद और हरिहर मंदिर के दावे को लेकर विस्तार से बात की थी। सभी के पास अपने-अपने तर्क थे। वे सब इस बात के समर्थन में थे कि संभल की मस्जिद की जगह हरिहर मंदिर ही है, भले किसी के पास उसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य न हो। उस दौरान वहां पर बिना इतिहास पढ़े ही हर कोई इतिहासकार बन गया था। यह इतिहास अपनी-अपनी धार्मिक पहचान से तय हो रहा था और उसका स्रोत लोकप्रिय वीडियो, वॉट्सएप फॉरवर्ड, इत्यादि थे।
मसलन, हमें एक युवा हिन्दू व्यापारी मिले जिनकी उम्र 32 साल थी। उन्होंने ऐप्लिकेशन डेवलपमेन्ट में एक निजी संस्थान से बीटेक की डिग्री हासिल की है। वह अपने आर्यसमाजी पिता से अलग, पौराणिक रीति-रिवाजों का अनुसरण करते हैं। संभल के प्राचीन इतिहास और खास तौर पर हरिहर मंदिर की ऐतिहासिक सच्चाई को बताने के लिए उन्होंने ‘इतिहास’ से तमाम उदाहरण हमें गिनवाए। उन्होंने बताया कि चीन से भारत आए प्रथम यात्री फ़ाहियान ने अपनी किताब ‘फ़ौगुओजी’ (बौद्ध साम्राज्यों का अभिलेख) के अध्याय 46 में संभल नामक स्थान पर भगवान विष्णु के दिव्य मंदिर के बारे में विस्तारपूर्वक लिखा है। इसी प्रकार, यूनानी सम्राट सेल्यूकस के दूत मेगस्थनीज की पुस्तक ‘इंडिका’ में संभल के विशाल एवं दिव्य विष्णु मंदिर का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार ‘इंडिका’ के अध्याय संख्या 65 में हिंदुओं के पवित्र स्थल संभल के आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक महत्व के साथ भगवान विष्णु के मंदिर एवं विष्णु मूर्ति का विवरण दिया गया है। इसी तरह, कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में संभल एवं भगवान विष्णु के मंदिर का उल्लेख अध्याय 30 में मिलता है। ह्वान सांग, अल बरूनी, मिलिंदपञ्ह, आदि के हवाले से भी उन्होंने हरिहर मंदिर के ऐतिहासिक होने के दावे को हमें समझाया।
जब हमने उनसे कहा कि इतिहास में तो आपकी अद्भुत जानकारी है और आपने ये सारी किताबें पढ़ी होंगी, तो उन्होंने बड़ी ईमानदारी से जवाब दिया कि उन्होंने कोई किताब नहीं पढ़ी है, ये सारी जानकारी उन्होंने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेन्स (AI) से इकट्ठा की है।
दूसरी बात, संभल में हरिहर मंदिर के दावे पर हिंदुओं की प्रत्यक्ष सहभागिता न होने के बावजूद हमने पाया कि हिंदुत्ववादी संगठनों के साथ मिलकर न्यायपालिका (जिसने 19 नवंबर 2024 को दायर याचिका पर उसी दिन सर्वे का आदेश जारी किया), पुलिस-प्रशासन, आला अधिकारी, सभी अपनी हिंदू पक्षधरता को जाहिर करने में जरा-सा भी संकोच नहीं कर रहे थे। जाहिर है, यह सरकार के संरक्षण के बगैर संभव नहीं था। इस बात को संभल के सीओ अनुज चौधरी के प्रसंग से बेहतर समझा जा सकता है।


पूर्व में पहलवान रहे संभल के सर्किल ऑफिसर अनुज चौधरी शुरुआत से ही कथित उपद्रवियों पर सख्त कर्रवाई करने और साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले अपने बयानों के लिए चर्चा में रहे हैं। अनुज चौधरी की पुलिस में नौकरी खेल कोटे से लगी थी। संभल हिंसा के बाद जब किष्किंधा रथयात्रा निकाली गई, उस दौरान चौधरी हाथ में गदा लेकर आगे-आगे चल रहे थे। कुछ नौजवान अनुज चौधरी के नाम की कांवड़ उठाये भी नज़र आये। कांवड़ में एक तरफ शिव की तस्वीर थी, तो दूसरी तरफ ‘दबंग’ स्टाइल में चौधरी की तस्वीर लगी थी। इससे पहले सीओ साहब अपने साथियों के साथ कांवड़ियों की सेवा करते नज़र आए थे।
अनुज चौधरी ने होली से पहले कहा, “इस साल 14 मार्च को होली का त्योहार है और इसी दिन रमजान का दूसरा जुमा भी है। जिस प्रकार से मुस्लिम ईद का इंतजार करते हैं उसी तरह हिंदू भी होली की प्रतीक्षा करते हैं। जुमा हर हफ्ते पड़ता है, जबकि होली साल में एक बार आती है। अगर होली के रंग से किसी का धर्म भ्रष्ट होता है तो वो घर से न निकले।”
चौधरी के बयान का समर्थन करते हुए सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “होली साल में एक बार पड़ती है, जुमे की नमाज़ हर सप्ताह पड़ती है। स्थगित भी हो सकती है। कोई बाध्यकारी तो है नहीं कि होना ही होना है, लेकिन कोई व्यक्ति पढ़ना ही चाहता है तो अपने घर में पढ़ सकता है। जरूरी नहीं कि वह मस्जिद में ही जाए।”
उन्होंने आगे कहा, “या तो जाना है तो रंग से परहेज न करें। जो हमारा वह पुलिस अधिकारी है वो पहलवान रहा है, अर्जुन पुरस्कार विजेता रहा है। पूर्व ओलंपियन है। अब पहलवान की बात है और पहलवान की तरह बोलेगा तो कुछ लोगों को बुरा लगता है। लेकिन सच है, उस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए।”
सवाल यह उठता है कि अनुज चौधरी पहलवान और अर्जुन पुरस्कार विजेता होने मात्र से भारतीय संविधान के नियम-कायदों और कानून से ऊपर हो सकते हैं? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सीओ अनुज चौधरी के पक्ष में बयान तो यही दिखाता है कि उस अधिकारी को शीर्ष नेतृत्व की ओर से किस कदर छूट मिली हुई थी। संभल विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत की कार्रवाई को चलाए रखने और मुस्लिम पक्ष के दावों को खारिज करने का प्रसंग सामने है ही।
न्यायपालिका, निर्वाचित सरकार और प्रशासन की इस जुगलबंदी के बाद बचता है मीडिया, जो वैसे भी इस तरह की हर घटना के लिए मुसलमानों पर तोहमत मढ़ने के लिए वह लगातार तत्पर रहता ही है। खास तौर पर उत्तर प्रदेश में मीडिया की मुस्लिम-द्वेषी भूमिका को 2005 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के मऊ में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद से लगातार देखा जा सकता है, जिसकी इंतेहा 2013 के मुजफ्फरनगर और शामली में हुई हिंसा में दिखाई दी थी।
उत्तर प्रदेश, 2025
यानी, पिछले साल संभल में जो कुछ हुआ, वह हिंदुत्व की उस राज्य-संरक्षित वृहद परियोजना का हिस्सा है जिसके तहत मुस्लिम इबादतगाहों को सुनियोजित ढंग से एक के बाद एक विवादित बनाया जा रहा है। यह परियोजना सिर्फ संभल या फतेहपुर या बहराइच तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग जगह इसके अलग-अलग पैटर्न दिखाई दे रहे हैं। कहीं पर इस काम को हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा, तो कहीं अन्य सरकार के वफादार नौकरशाहों द्वारा सीधे अंजाम दिया जा रहा है। इसके उदाहरण प्रदेश भर में भरे पड़े हैं।
संभल में ईद के समय वहां के जिला प्रशासन ने यह आदेश दिया कि कोई भी मुसलमान न तो सड़क पर और न ही अपनी छत पर नमाज़ अता कर सकता है। मेरठ में भी ईद के समय मुसलमानों को सड़क पर नमाज़ अता करने के एवज में उनके लाइसेंस या पासपोर्ट रद्द करने की चेतावनी दी गई।
फर्रूखाबाद में एक स्कूल परिसर में स्थित मस्जिद में मुसलमानों को तरावी की नमाज़ पढ़ने से रोका गया और ऐसा आदेश न मानने पर उन्हें एक करोड़ रुपये का जुर्माना भरने का निर्देश दिया गया। इसी साल बरेली के एक निजी मकान में, जहां पर कुछ लोग पिछले 37 साल से नमाज़ पढ़ रहे थे, प्रशासन ने उस पर रोक लगा दी। पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसी दर्जनों घटनाएं हैं, जहां पर मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने से रोक गया। अब मामला सिर्फ नमाज़ पढ़ने से रोकने तक ही सीमित नहीं रह गया है।
बांदा में 2023 में एक मस्जिद के जीर्णोद्धार का कार्य चल रहा था। उसकी पूर्व अनुमति मस्जिद की कमेटी ने पहले से ही प्रशासन से ले रखी थी। इसके बावजूद हिंदू संगठनों के लोग अचानक से वहां पहुंचते हैं और निर्माण कार्य के लिए लगे सामानों को तोड़-फोड़ कर शटरिंग को सड़क पर फेंक देते हैं। संभल के एक पत्रकार ने हमें बताया था कि वहां पर भी कुछ मस्जिदों के जीर्णोद्धार का काम प्रशासन ने रोक दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश में साफ कहा गया था कि सरकारी भूमि पर किसी भी धार्मिक स्थल का निर्माण कार्य नहीं होगा। इसके बावजूद शहर में कई जगह सरकारी जमीनों पर मंदिरों का निर्माण हुआ है या नए मंदिर निर्माणाधीन हैं। संभल के उक्त पत्रकार के अनुसार, शहर में अब आधिकारिक रूप से किसी भी मस्जिद का नक्शा पास नहीं हो रहा है। ऐसी स्थिति में लोग बिना अनुमति के ही मस्जिदें बना रहे हैं। उन मस्जिदों का भविष्य में क्या होगा, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन मौजूदा ढांचों पर राज्य की सीधी कार्रवाई खुद सरकारी रिपोर्टों में जाहिर है।


इसी साल 11 मई को जारी एक आधिकारिक बयान में उत्तर प्रदेश की सरकार ने बताया कि नेपाल की सीमा पर 350 से ज्यादा अनाधिकारिक धार्मिक ढांचों को ढहाया जा चुका है, जिनमें मदरसे, मस्जिदें, मज़ारें और ईदगाहें शामिल हैं। ध्यान देने वाली बात है कि ये सभी ढांचे एक ही धर्म विशेष से ताल्लुक रखते हैं। पीलीभीत, श्रावस्ती, बलरामपुर, बहराइच, सिद्धार्थनगर, और महाराजगंज में ये ढांचे सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर तोड़े गए हैं जिन्होंने साफ कहा था कि धार्मिक अतिक्रमण को बरदाश्त नहीं किया जाएगा।
सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार श्रावस्ती जिले में 10 और 11 मई को 104 मदरसे, पांच मज़ारें और दो ईदगाहें निजी और सरकारी जमीन पर अवैध निर्मित पहचानी गईं, जिसके बाद उन्हें नोटिस देकर सील कर दिया गया। बहराइच में ऐसे 13 मदरसे, आठ मस्जिदें, दो मज़ारें और एक ईदगाह पाए गए, जिनमें से पांच को सील कर दिया गया और ग्यारह को तोड़ दिया गया। सिद्धार्थनगर जिले में चार मस्जिदें, 18 मदरसे अवैध पाए गए जिनमें से पांच मदरसों को सील कर दिया गया और नो को तोड़ दिया गया।
महाराजगंज के नौतनवा में एक मदरसे को बंद करवाया गया। कुल मिलाकर इस जिले में अब तक 29 मदरसे और पांच मज़ारों को तोड़ा जा चुका है। इसी दौरान लखीमपुर खीरी जिले में भी मुसलमानों के 13 धार्मिक ढांचों में से एक को नोटिस दिया गया, नौ सील किए गए और तीन तोड़ दिए गए। पीलीभीत में एक मस्जिद से जुड़े पक्ष को नोटिस दिया गया। इस जिले में सरकारी सूचना के मुताबिक 30 मदरसों, 10 मज़ारों और एक ईदगाह को तोड़ा जा चुका है।
‘अवैध’ ढांचे बताकर उन्हें तोड़ने की सरकारी दलील को एक ओर रख दें, तो कुछ खोजी रिपोर्टें भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि संभल जैसी हिंसा का शिल्पकार खुद स्थानीय प्रशासन रहा है। पिछले ही महीने एपीसीआर और कारवां-ए-मोहब्बत द्वारा संभल हिंसा पर एक वृहद् तथ्यान्वेषी रिपोर्ट जारी की गई थी। वह रिपोर्ट कहती है कि साम्प्रदायिक हिंसा को उत्तर प्रदेश के प्रशासन ने संभल में सुनियोजित ढंग से रचने का काम किया। यह रिपोर्ट चेताती है कि मौजूदा संकट संभल को ‘’नई अयोध्या’’ में तब्दील कर सकता है। राज्य को कठघरे में खड़ा करने के साथ ‘अयोध्या’ का आवाहन दरअसल हिंदुत्व के उन नए तत्वों को नजर से प्राय: ओझल कर देता है, जैसा हमें संभल से लेकर फतेहपुर तक देखने को मिला।
दोहरी रणनीति
भूलना नहीं चाहिए कि अयोध्या आंदोलन के वक्त हिंदुओं के अंदर जो उन्माद दिखाई दिया था, वह एक लंबे आंदोलन का परिणाम था। फतेहपुर के भाजपा जिलाध्यक्ष भले कह रहे हों कि 11 अगस्त की घटना जन-आक्रोश का परिणाम थी, लेकिन क्या वाकई में वहां पर कोई जनसैलाब दिखाई पड़ रहा है? क्या हिंदू जन की भागीदारी के लिए कोई आंदोलन चलाया गया? अगर चलाया भी जाता तो क्या जन की भागीदारी संभव होती या फिर वह जन आंदोलन किसके खिलाफ चलाया जाता, क्या आंदोलन सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ होता या फिर हिंदुओं पर हुए ऐतिहासिक अन्याय के लिए अपनी ही सरकार के खिलाफ?
फतेहपुर में मकबरे में हुए हमले के कई वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। विभिन्न खबरों के अनुसार मकबरे के अंदर हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं की संख्या महज 200 से 300 के बीच है। मकबरे के अंदर एक कार्यकर्ता वीडियो बनाते समय वहां होने वाली घटनाओं पर कमेंट्री भी कर रहा है। वह कह रहा है कि “हम आपको दिखाना चाहते हैं कि यहां पर जो बैरीकैडिंग लगी थी उसको हिंदू समाज ने तोड़कर मंदिर में पहुंचकर यहां बने मज़ारों का पूरी तरह से धवस्तीकरण कर दिया है।” इस वीडियो में कुछ नौजवान मज़ारों को तोड़ते दिख रहे हैं, उनके नेता शंख बजा रहे हैं, जोर-जोर से जय श्रीराम के नारों का उद्घोष हो रहा है। एक अन्य वीडियो में एक नेता लगातार पूजा अर्चना और मंत्रोच्चार किए जा रहे हैं।
इन दृश्यों में दिखने वाले पात्र (कार्यकर्ता) और उनके कृत्य कई तथ्यों की ओर इशारा करते हैं। पहला, वे सभी राजनैतिक पृष्ठभूमि से हैं और वे जानते हैं कि वे असंवैधानिक कार्य कर रहे हैं, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि ऐसा करते हुए भी सरकार उन्हें कुछ नहीं होने देगी। एक कार्यकर्ता रिपोर्टर के सवाल पर साफ कह रहे हैं, ‘’क्या संविधान का ठेकेदार सिर्फ हिंदू है? इनके लिए संविधान नहीं है? कोई संविधान नहीं है। हिंदू संविधान से चलेगा?”
दूसरा, इस पूरी घटना की स्क्रिप्ट ऐसे तैयार की गई है कि सभी पात्र जिस अभिनय की अदायगी कर रहे हैं, उसमें वे दिखाना चाहते हैं कि हिंदू बहुत आक्रोश में हैं और अब वे ऐतिहासिक अन्याय का हिसाब चुका के रहेंगे। संविधान पर सवाल उठाने वाला हिंदू कार्यकर्ता कहता है, ‘’हम अपना हक ले के रहेंगे, भले हमें खून बहाना पड़े।‘’ तीसरा, इन दृश्यों के माध्यम से हिंदुत्व अपनी ताकत का इजहार भी कर रहा है, जैसा उसी वीडियो में एक अन्य कार्यकर्ता कहता है- ‘’हमारी सरकार है, हम लोग अपना रास्ता देख रहे हैं। हमारी जमीन पर कोई कब्जा करेगा तो हम पहले (कोर्ट) नहीं जाएंगे, हम पहले कब्जा करेंगे।‘’
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यानि एक तरफ तो इस ऐक्ट के माध्यम से मुसलमानों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना उद्देश्य है। दूसरी तरफ, हिंदुओं को हिंदुत्व की ताकत का एहसास कराना है। इस तरह की वीडियोग्राफी और इसके सम्प्रेषण को सिर्फ फतेहपुर की घटना तक सीमित नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे भीड़ द्वारा की गई मुसलमानों की हत्याओं, हिंदू संगठनों द्वारा किए जाने वाली हिंसा या ऐसी ही अन्य किसी घटना के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
एक तरफ तो आज का हिंदुत्व ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, मुसलमानों की बढ़ती आबादी और सेकुलर पार्टियों की ‘मुस्लिमपरस्ती’ से हिंदुओं को उनके समक्ष आसन्न खतरों का अहसास करवाता है, अथवा उनके भीतर असुरक्षा को गढ़ता है। दूसरी तरफ इस तरह के बहुत सारे वीडियो ‘अघोषित’ हिंदू राष्ट्र में हिंदुओं के पास जो प्रिविलेज हैं, उसका उन्हें अहसास करवाता है। हिंदुत्ववादी राजनीति ऐसे वीडियो के माध्यम से जो संप्रेषित करना चाह रही है, उससे एक हिंदू- चाहे वह किसी भी जाति का हो, सामाजिक और आर्थिक रूप से चाहे कितना भी हाशिये पर हो- अपने हिंदू होने के प्रिविलेज से खुद को सशक्त महसूस करता है। आज हिंदुओं के आंदोलनरत न होने के बावजूद इस असर को हलके में नहीं लेना चाहिए।
यही असर संभल से लेकर फतेहपुर और बाकी देश में हिंदुओं के बीच एक सहमति-निर्माण का काम कर रहा है, वह सहमति भले ही इतिहास-सम्मत न हो और एकजुट जमीनी कार्रवाई में तब्दील होती न दिखे, जबकि अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन में सहमति भी थी और व्यापक गोलबंदी भी थी।
अयोध्या, दिसंबर 1992
अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को जो कुछ हुआ, वह हिंदुओं के बीच चले लंबे आंदोलन का परिणाम था। इस संदर्भ में दिवंगत पत्रकार और जनमोर्चा के संस्थापक शीतला सिंह की किताब ‘अयोध्या रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद का सच’ पढ़ी जानी चाहिए। बाबरी विध्वंस से काफी पहले के घटनाक्रम का उसमें प्रसंग ब्योरा शायद यह समझने के काम आए कि आज मुस्लिम इबादतगाहों पर हमले का चरित्र तब के मुकाबले क्यों और कैसे अलहदा है।
याद रखना चाहिए कि राममंदिर आंदोलन में देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंदुओं की भागीदारी को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से संभव बनाया गया था। वह लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा हो, शहरों, कस्बों या गांवों में राम मंदिर के राम शिला से जुड़े जुलूस हों या फिर ऐसे अनेक कार्यक्रम- उनके बहाने हिंदुओं के व्यापक हिस्से तक पहुंचने की कोशिश की गई थी। इसीलिए राम मंदिर आंदोलन में हिंदुओं के बड़े समूह की भागीदारी संभव हो पाई थी। ऐसा क्यों और कैसे हुआ?

इंदिरा गांधी की हत्या का समाचार मिलने का प्रसंग शीतला सिंह की किताब में पृष्ठ संख्या 56 पर दर्ज है। वे लिखते हैं कि 31 अक्टूबर, 1984 को वे जनमोर्चा, फैजाबाद के दफ्तर में बैठे हुए थे। उनसे वहां मिलने बंबई के फिल्मकार और कवि शैल चतुर्वेदी, अयोध्या के दन्तधावन-कुण्ड के महन्त नारायणाचारी और रासमंडल मंदिर के महन्त माधवाचार्य आए हुए थे। सुबह के साढ़े नौ बजे थे कि टेलिप्रिन्टर पर समाचार फ्लैश हुआ। इंदिरा गांधी की हत्या की खबर पाकर शैल चतुर्वेदी रोने लगे और ‘’समाचार सुनकर सामने बैठे दोनों साधु भी रो पड़े और कहने लगे कि अब रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का क्या होगा?”
दोनों साधुओं का यह प्रश्न आज किसी को भी आश्चर्य में डाल सकता है। शीतला सिंह ने इसकी पृष्ठभूमि अगले ही पैरा में बताई है। दोनों साधुओं ने उनके सामने रहस्योद्घाटन किया कि ‘’हम हाल ही में हरिद्वार के भारत माता मंदिर के स्वामी सत्यमित्रानन्दजी और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं के साथ दिल्ली में प्रधानमंत्री से मिले थे तथा रामजन्मभूमि-मुक्ति का अनुरोध किया था।‘’
उस बैठक में जो हुआ, उसका ब्योरा अगले पन्ने पर है। शीतला सिंह लिखते हैं:
‘’विश्व हिंदू परिषद के पहले कदम के रूप में उसका एक प्रतिनिधिमंडल श्रीमती इंदिरा गांधी से मिल चुका था और उनसे रामजन्मभूमि को मुक्त कराने तथा वहां राममंदिर बनाने की बहुसंख्यक समुदाय की कामना पूर्ण करने का आग्रह किया था। परमहंस रामचन्द्र ने एक दिन बातों-बातों में कहा कि जब विहिप का प्रतिनिधिमंडल मिलने गया था तब इंदिराजी ने कहा था कि लोकतंत्र में बिना आंदोलन के कोई निर्णय नहीं हो सकता। इसीलिए हम लोगों ने इस संबंध में आंदोलन करने का निर्णय लिया है। इंदिराजी ने हम लोगों से नवंबर 1984 में पुन: मिलने के लिए कहा है।‘’
नवंबर में विहिप के साथ तय दूसरी मुलाकात से पहले ही इंदिरा गांधी की हत्या हो जाती है। हम नहीं जानते कि यदि वे जिंदा रहतीं और मुलाकातों का सिलसिला चलता तो इतिहास की क्या गति होती, लेकिन शीतला सिंह का किया यह उद्घाटन दो बातों को स्पष्ट करता है, जो नए हिंदुत्व और नए राज्य के चरित्र को समझने के लिए जरूरी हैं।
नया हिंदुत्व? नया राज्य?
पहला, इंदिरा गांधी के समय से लेकर अब तक सत्ता का चरित्र बुनियादी रूप से बदल चुका है क्योंकि वर्तमान लोकतंत्र में बिना आंदोलन के निर्णय अब सीधे सत्ता-शीर्ष के स्तर पर लिए जा रहे हैं और उनका अनुपालन लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रतिनिधि कर रहे हैं। यानी, ऊपर से लेकर नीचे तक निजाम को चलाने की पद्धति बदल चुकी है। वह लोकतांत्रिक नहीं, निरंकुश और एकतरफा है।
दूसरी बात पहली से जुड़ी हुई है- जिन्हें कथित ‘बहुसंख्यक समुदाय की कामना’ की फिक्र है, वे अब ‘अनुरोध’, ‘आग्रह’ या ‘आंदोलन’ का रास्ता छोड़ चुके हैं और बदले हुए सत्ता-चरित्र की सुविधा तले कामनाओं को थोप और रोप रहे हैं। यही वजह है कि संभल हो या फतेहपुर, हमें ‘आस्था’ के सवाल पर अब बहुसंख्यकों का कोई लोकप्रिय जुटान देखने को नहीं मिलता, बावजूद इसके मीडिया, तकनीक, आभासी मंचों से उनके बीच ‘सहमति-निर्माण’ का काम निरंतर जारी है।
बदलते हुए राष्ट्र-राज्य और लगातार खुद को परिवर्द्धित करते हिंदुत्व से मिलकर बदली हुई यह नई परिस्थिति किसी दूसरी या नई अयोध्या के लिए जगह नहीं बनाती, बल्कि नए संभल, नए फतेहपुर और नए बहराइच की जमीन तैयार करती है। यह नई जमीन हालांकि सवालों से परे नहीं है।
जैसे, कोई भी राजनीतिक विचारधारा (दक्षिणपंथी हिंदुत्व) जन आंदोलन के अभाव में केवल सत्ता-संरक्षण के भरोसे कैसे और कब तक टिकी रह सकती है? कोई भी आधुनिक राष्ट्र-राज्य लोकतंत्र के अभाव में कैसे और कितने दिनों तक कायम रह सकता है?