अरावली को बचाना क्यों जरूरी है? अवैध खनन के खिलाफ तीन दशक के संघर्ष से निकले अनुभव

Aravalli Sanrakshan Yatra
Aravalli Sanrakshan Yatra
अरावली की पर्वत श्रृंखला में विकास पर बीते नवंबर में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने देश भर में पर्यावरण की चिंता करने वालों को सड़कों पर उतार दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर रोक लगा दी, सार्वजनिक चर्चा भी ठंडी पड़ गई, लेकिन अरावली का सवाल लगातार जिंदा है। लोग अरावली संरक्षण पदयात्रा पर निकले हुए हैं। बीते तीन दशक से अरावली में अवैध खनन, वातावरण और पानी पर लगातार संघर्ष चल रहे हैं, विडम्‍बना है कि लोगों का ध्‍यान अभी गया। पिछले वर्षों के संघर्षों, दमन और सबक को याद कर रहे हैं राजस्‍थान के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा

अरावली क्या है? अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से एक है। यह गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। गुजरात के तीन जिलों, राजस्थान के 27 जिलों और हरियाणा के सात जिलों से होते हुए यह दिल्ली तक पहुंचती है। पूरे उत्तर भारत में गर्म हवाओं को रोकने का काम अरावली करती है। तमाम वैज्ञानिक शोधों ने माना है कि यह पानी के सबसे बड़े रिचार्ज स्रोतों में से एक है। अरावली की तलहटी में छोटी खेती और पशुपालन आजीविका के बहुत बड़े स्रोत रहे हैं। छोटी-छोटी नदियां, जो अरावली से निकलती हैं, वहां के जीवन और आजीविका को चलाती रही हैं।

बीस नवंबर के आदेश के बाद पूरा देश उलझा हुआ है। दुनिया भर में इस पर चर्चा हो रही है। हम लोग तो लगभग तीस साल पहले से इसे जी रहे हैं। मैं एक चरवाहा परिवार से आता हूं। हमारे परिवार की पृष्ठभूमि यह थी कि हमें कभी ‘नोटिफाइड क्रिमिनल ट्राइब’ कहा गया था। उस पहचान के कारण हमारे बुज़ुर्गों ने बहुत कष्ट झेले। हमारी पूरी आजीविका छोटी खेती और पशुपालन पर निर्भर थी। 1995–96 के बाद जब वहां खनन का कारोबार शुरू हुआ, धीरे-धीरे लोगों की दिक्कतें बढ़ने लगीं। हमें इस देश की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा गर्व था, बड़ा विश्वास था। 1997 से हमने लिखना शुरू किया कि खनन से समस्याएं हो रही हैं।

जब खनन और क्रशिंग शुरू हुई, तो यह सपना दिखाया गया कि गांव में रोजगार आएगा, गांव का कायाकल्प हो जाएगा, लेकिन खनन और पैसे के आने से जो हालात बने वे बिल्कुल उलट थे। मेरे ताऊ के लड़के- मेरे चचेरे भाई- गंभीर बीमारी की चपेट में आए और बहुत कम उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी उम्र सिर्फ 23 साल थी। यह हमारे परिवार के लिए बहुत बड़ा वज्रपात था। तभी हमने तय किया कि गांव-गांव जाकर लोगों को जगाना होगा।


Struggle against illegl mining in the Aravallis
अरावली में अवैध खनन के खिलाफ संघर्ष की एक पुरानी तस्वीर

मैंने कुछ साथियों के साथ मिलकर 1999 में पदयात्राएं शुरू कीं। अक्टूबर में हम पदयात्रा करते थे। गांवों में जो कीर्तन और गीत गाने वाले लोग थे, उनसे संपर्क किया और कहा कि इस विषय पर गीत बनाइए। हमारे कुछ साथियों ने ऐसे गीत रचे।

पहली पदयात्रा नीम का थाना से शुरू हुई। वहां बागेश्वर नाम की जगह है- अरावली की बहुत सुंदर जगह। वहीं से यात्रा शुरू की। खनन से प्रभावित गांवों से होते हुए दो दिन की पदयात्रा टपकेश्वर तक पहुंची। एक छोटा सा हैंडबिल बनवाया गया जिसे पहले मोटरसाइकिल से गांव-गांव बांटा गया, कि हम लोग इस इलाके से होकर आने वाले हैं।

पहले दिन जिस तरह से लोगों ने उत्साह दिखाया, खाने-पीने की व्यवस्था की, हमारी बात सुनी, वह अद्भुत था। रात को दरीबा गांव में जब हम रुके तो एक उत्सव जैसा माहौल था। यात्रा टपकेश्वर में समाप्त हुई। जहां हमने 40–50 लोगों से शुरुआत की थी, वहां अंत तक लगभग 300 लोग हो गए। मैं बहुत उत्साहित था। खनन कारोबार से जुड़े लोग इससे परेशान भी दिख रहे थे।

इसके साथ-साथ हमने पशुपालन और जंगल से जुड़े मुद्दों पर भी छोटे-छोटे काम शुरू किए- पशु चिकित्सा शिविर, नदियों के किनारे कैचमेंट एरिया में पानी बचाने के तरीके, भू-जल संरक्षण, खाद को ज्‍यादा उपयोगी कैसे बनाया जाए, जैसे गड्ढों में डालकर, वर्मी जैसे छोटे प्रयोग।

अगले साल फिर अक्टूबर में पदयात्रा शुरू की। इस बार उत्साह और ज्‍यादा था। पिछली यात्रा की छोटी सी खबर हिंदुस्तान टाइम्स में छपी थी जिससे कुछ पत्रकार साथी संपर्क में आ गए। हमने जयपुर तक सूचना भेजी। मोटरसाइकिल से फिर गांव-गांव हैंडबिल बांटे। लगभग 80–85 लोगों ने यात्रा शुरू की। शाम को जहां हमारा पड़ाव होता, वहां 200–250 लोग जमा हो जाते। मुझे चिंता होती थी कि खाने की व्यवस्था कैसे होगी, लेकिन गांववालों ने इतने शानदार तरीके से सब संभाला कि मैं अभिभूत हो गया। रात को गीतों के माध्यम से संवाद होता।


Old photograph of Struggle in Aravallis
जन सभा की एक तस्वीर

दूसरे दिन जब आगे बढ़े, तो लोग और बढ़ते गए। उस समय मोबाइल फोन नहीं थे। मोटरसाइकिल से ही संपर्क किया जाता था। हमने अनुमान लगाया कि 500 लोग हो सकते हैं। गांववालों ने कहा- “आने दो, सब आराम से आओ।” आधी दूरी पर राजेंद्र सिंह भी हमारे साथ जुड़े, जिन्हें बाद में मैग्सेसे पुरस्कार मिला। रायपुर जागीर गांव पहुंचते-पहुंचते हम हजार से ऊपर हो गए। माहौल ऐसा था जैसे गांव में मेला लगा हो।

यह सिलसिला चलते-चलते खनन कारोबारियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया क्योंकि ज्‍यादातर खनन पट्टे राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों या उनके रिश्तेदारों के पास थे। उस गठजोड़ ने दमन का रास्ता अपनाया- साथियों को धमकाया गया, पुलिस केस की धमकी दी गई।

मैं हाइकोर्ट गया क्योंकि प्रशासनिक व्यवस्था से जो उम्मीद थी वह पूरी नहीं हुई। हाइकोर्ट का अनुभव काफ़ी खट्टा-मीठा रहा। जिस तरह का व्यवहार हुआ उससे मैं निराश भी हुआ। केस को ‘ड्यू कोर्स’ में डाल दिया गया। कई तरह की बाधाएं आईं, लेकिन अंततः 16 फरवरी 2010 को हमारे पक्ष में फैसला आया।

मैंने फैसले की 200 प्रतियां निकलवाईं। बहुत खुशी थी कि न्यायालय ने कहा कि खनन गतिविधियां पर्यावरण को ध्यान में रखकर ही की जानी चाहिए। मैंने तुरंत सुप्रीम कोर्ट के अरावली से जुड़े पुराने फैसले इकट्ठा किए- खासकर पानी के बहाव क्षेत्र से छेड़छाड़ न करने वाले आदेश। मैं बहुत उत्साहित था।

इसके बाद हरियाणा सीमा के पास डाबला गांव का मामला सामने आया। वहां दलित मोहल्ला गांव के बिल्कुल कोने में था। खनन और क्रशिंग से वहां के लोगों का जीवन असहनीय हो गया था। धमाकों से घर टूट रहे थे, धूल से जीना मुश्किल था। वहां एक शांति देवी थीं। तब उनकी उम्र 73 साल थी। उन्होंने तय किया था कि नरेगा में काम करने वाले मजदूर मिलकर आंदोलन करेंगे। तब तक उस इलाके में मेरा नाम जाना-पहचाना हो चुका था। लोगों ने मुझसे संपर्क किया। मैं गाँव गया, लोगों से बातचीत की। हर समाज, हर तबके के लोग आए। वहीं हमने आंदोलन की रणनीति तय की और फिर से पदयात्रा को ही एक मजबूत माध्यम के रूप में अपनाया।

हमने यह समझा कि अगर हम इस काम में रोज एक घंटा लगाएं- चूंकि खनन कारोबारी ज्‍यादातर बाहर के पैसेवाले लोग थे या प्रशासनिक–राजनीतिक पहुंच वाले थे- तो उन्हें यह समझ आ जाएगा कि अगर हम हर दिन का एक रुपया भी बचाकर या 30 रुपये रोज और 30 घंटे इस आंदोलन में लगाए जाए तो हम जीत सकते हैं। धरना शुरू हुआ। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया। जस्टिस जगपाल सिंह द्वारा दिया गया आदेश था कि गांव की जो कॉमन्स हैं- चरागाह, तालाब, आदि- उनसे किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। उधर हमारा धरना चलता रहा, आसपास के गांवों के लोग आने लगे। दिन में लोकगीतों के माध्यम से संवाद होता, बातचीत चलती रही।

जिले के प्रशासनिक मुखिया भारी पुलिसबल के साथ आए। हमने उन्हें पूरा मामला बताया। उन्हें समझ में आ गया कि कानूनन यह खनन नहीं चल सकता। मैंने साफ कहा- हम इस देश के कानून में दृढ़ आस्था रखने वाले लोग हैं; जो कानन है वही चले और जो गैर-कानूनी है वह नहीं चले। वे पुलिसबल के साथ लौट गए, लेकिन खनन माफिया के दबाव में धरने के तीसवें दिन 500–600 पुलिसकर्मियों ने घेराबंदी की और जिस बेरहमी से आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया, वह भयावह था। सात दलित महिलाओं को गिरफ्तार किया गया, जिनमें शांति और शांति की बहू भी थीं- एक ही परिवार की दो महिलाएं जेल भेजी गईं। गांव के एक रिटायर्ड सेना के बुजुर्ग को भी पीटा गया। किसी तरह गांववालों ने मुझे वहां से सुरक्षित निकाला।


Old photo of footmarch in the Aravallis
एक पदयात्रा की पुरानी तस्वीर

आंदोलन कैसे चले, इस सवाल के बीच नीम का थाना में भूख हड़ताल शुरू हुई, धरना-प्रदर्शन हुए। सात दिन तक वे महिलाएं जेल में रहीं। यह इस देश की संवैधानिक व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्न था- “शांति भंग” के आरोप में दलित महिलाएं सात-सात दिन जेल में रहीं। जब शांति रिहा होकर आई, तो उससे कहा गया कि रिहाई के कागज पर अंगूठा लगा दो और लिख दो कि “कैलाश हमें बहका रहा था।” शांति ने कहा- हाथ कट सकता है, लेकिन यह झूठ नहीं लिखूंगी। शांति आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन वह संघर्ष की एक प्रेरणा बनकर आज भी हमारे दिलों में जिंदा है।

इसी गांव का एक नौजवान जयराम सिंह करगिल युद्ध के समय टोलरिंग हिल पर लड़ते हुए तीन गोलियां खा चुका था। उसे वीर चक्र मिला था। वह छुट्टी पर आया हुआ था और आंदोलन में जुड़ गया। उस नौजवान को अपराधी घोषित कर दिया गया। यह कितनी अजीब विडम्‍बना है- देश की सीमा बचाने पर वीर चक्र और गांव की पहाड़ी बचाने पर वही युवक अपराधी!

इसी दौरान एक और बहुत खतरनाक घटना हुई। हरियाणा सीमा पर झुंझुनू जिले का पचेरी गांव। वहां ताड़केश्वर शर्मा थे— बड़े स्वतंत्रता सेनानी और रामराज परिषद के सदस्य। उनके परिवार के छह सदस्यों को स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौरान काला पानी की सजा मिली थी, देशनिकाला झेला था, जिनमें दो महिलाएं भी थीं। उन्‍होंने असहनीय यातनाएं झेली थीं। उनके पोते प्रदीप शर्मा हमारे आंदोलन में थे। उन्हें हाइकोर्ट से स्टे मिला था, लेकिन स्टे के दौरान भी माइनिंग चल रही थी। वे उसकी तस्वीरें ले रहे थे, तभी उनकी हत्या कर दी गई।

ये घटनाएं हमें भीतर तक झकझोर देने वाली थीं। उनकी लाश के पास बैठना, उस पीड़ा को शब्दों में कहना मुश्किल है। इसी बीच मुझे गिरफ़्तार किया गया। दिसंबर की ठंड में पीछे हाथ बांधकर, कपड़े उतरवाकर- सिर्फ इस हौसले को तोड़ने के लिए, कि कोई खनन के ख़िलाफ आंदोलन न करे।

इसका मेरे निजी जीवन पर गहरा असर पड़ा। मेरे बड़े भाई इस सदमे से हृदय रोगी हो गए और बीमार होकर गुजर गए। परिवार ने फ़ैसला किया कि इलाका छोड़ देना चाहिए। मेरा बेटा उस समय आठवीं कक्षा में पढ़ता था। पत्नी, बेटा, भाभी- हमने चूरू जिले के हालासर गांव में जमीन देखने तक का सोच लिया था, लेकिन उसी दौरान लोग मेरे पास आने लगे। वे कहते थे, “इल्‍लीगल माइनिंग से हमारी बकरी मर गई”, “खेत में पत्थर गिर रहे हैं।” मैं चुप रहता था, बोल नहीं पाता था। एक दिन मैंने अपने बेटे और पत्नी से कहा- अगर हर अन्याय पर हम चुप रहेंगे तो क्या पूरी जिंदगी चुप ही रहना पड़ेगा? अगली सुबह पत्नी ने साफ कहा- “हम कहीं नहीं जाएंगे। यहीं जिएंगे, यहीं मरेंगे।”


Medha Patkar addressing a gathering
नर्मदा बचाओ की नेता मेधा पाटकर और मंच पर सबसे बाएं कैलाश मीणा

यह जीवन का सबसे कठिन दौर था। बार-बार गिरफ्तारियां होती रहीं, जैसे मैं कोई आतंकवादी हूं। मुझे जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए पुलिस आती रहती थी। एक बार दीपावली के दिन मैं अंडरग्राउंड था, फिर घर आया। किसी ने पुलिस को सूचना दे दी। चार गाड़ियां आ गईं। पत्नी ने उनसे अनुरोध किया- इन्हें खाना खा लेने दीजिए, फिर ले जाइए। यह सिलसिला चलता रहा।

गांव दर गांव हम इन्हीं समस्याओं को लेकर लड़ते रहे। आंदोलन और दमन साथ-साथ चलते रहे। इसी बीच मेधा पाटकर जी आईं, हिमांशु कुमार आए, बाहर से कई लोग आए। उन्होंने हमारा हौसला बढ़ाया। हम गांव-गांव यही कहते थे कि यह प्रकृति, यह पहाड़, यह नदी, यह सब “सोने के अंडे देने वाली मुर्गी” है। अगर लालच में एक ही दिन में अंडा निकालने की कोशिश करोगे तो उसके बाद क्या बचेगा? यह बात लोगों को गहराई से समझ में आती थी।

जैसे-जैसे आंदोलन बढ़ा, वैसे-वैसे दमन भी बढ़ता गया। लगभग दो दर्जन मुक़दमों के बीच गांव की महिलाओं ने आंदोलन किए। उसी दबाव में हमने कुछ ट्रकों को पकड़ा जो विस्फोटक लेकर जा रहे थे। विस्फोटक अरावली के सबसे बड़े दुश्मन थे। बॉम्बे ब्लास्ट के बाद एक्‍सप्‍लोजिव्‍स रूल्‍स 2008 बने थे, कि विस्फोटक कैसे ले जाए जाएं, कौन उपयोग कर सकता है, और क्या सजा होगी। हमने देखा कि खुली ट्रक में, वैन में, मोटरसाइकिल पर, यहां तक कि टेंट में भी विस्फोटक ले जाए जा रहे थे। ऐसे छह मामले सामने आए। हमने छह केस स्टडी बनाई।

आप हैरान होंगे- दो महीने से ज्‍यादा किसी को कोर्ट नहीं जाना पड़ा। कुछ पर मामूली जुर्माना लगाकर सबको छोड़ दिया गया। मैंने कहा- यह देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। मैंने न्यायालय में अर्जी लगाई। निचली अदालत ने कहा- “कैलाश मीणा आदतन अदालत का समय ख़राब करता है,” और अर्जी खारिज कर दी।

रविकिरण जैन, बहुत मशहूर वकील, जयपुर आए हुए थे। मैंने उन्हें यह सब दिखाया। उन्होंने कहा- यह बहुत गलत है, ऐसा नहीं हो सकता, आप हाइकोर्ट चलिए। मैं हाइकोर्ट गया। जज ने बात सुनी और तुरंत मजिस्ट्रेट और एसपी को नोटिस जारी किए, लेकिन तीन साल तक हाइकोर्ट के चक्कर काटने के बाद अदालत मुझसे कहती है- “आप पुलिस थे क्या? आपने कैसे पकड़ लिया?” और मामला खारिज कर दिया जाता है।

यह अनुभव है। मुझे इस देश की प्रशासनिक व्यवस्था में आस्था थी, इस देश की संवैधानिक व्यवस्था में आस्था थी, और इस देश की न्यायिक व्यवस्था में आस्था थी। हम अपने जीवन, अपनी आजीविका, अपने अस्तित्व के सवाल पर लड़ रहे थे। संविधान ने बहुत बड़ी कुर्बानियों के बाद हमें जीने का अधिकार दिया था। सवाल यही था- क्या हम बिना किसी को नुकसान पहुंचाए शांति से नहीं जी सकते? किसी के लालच की कीमत हम कितना चुकाएं?

आज अरावली पर आया यह फैसला इस देश में एक बड़ी बहस को खोलता है।

हम बहुत खुश हैं कि गुजरात से लेकर अलग-अलग जगहों पर जो छोटे-छोटे आंदोलन हो रहे थे, उनसे यह बात निकलकर सामने आई है कि अब लोग एक-दूसरे का दर्द समझने लगे हैं।

आज जब दिल्ली का दम घुट रहा है तब यह सवाल उठ रहा है; लेकिन दिल्ली का दम घुट रहा है तो दिल्ली के लोगों ने कभी यह नहीं सोचा था कि पिछले तीस साल से राजस्थान के 32 ब्लॉकों में लोगों का दम कैसे घुट रहा है। राजस्थान के कई इलाक़ों में पीने लायक पानी नहीं है, नदियां खत्म कर दी गई हैं, और अरावली का जितना हिस्सा नष्ट किया गया है उसका परिणाम आज सबके सामने है। उत्तर भारत में इन वर्षों में जो गर्म हवाएं आ रही हैं, हीट वेव चल रही हैं, और उनसे होने वाली मौतों के आँकड़े, ये सब उसी विनाश के नतीजे हैं।


Representational pic of India Gate, New Delhi

अब जब दिल्ली में मुश्किलें बढ़ने लगी हैं, तो सवाल उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। 20 नवंबर को तो एक फैसला आया है, लेकिन उससे पहले जो हालात बने, उनके लिए जवाबदेही किसकी है? अरावली कोई साधारण पर्वत शृंखला नहीं है, वह पूरे देश के लिए जीवनदायिनी है, रीढ़ की हड्डी है। रीढ़ की हड्डी के बिना शरीर की कल्पना कीजिए। वही अरावली पूरे उत्तर भारत को साफ हवा देती है, पानी रिचार्ज करती है, धूल से बचाती है, गर्म हवाओं को रोकती है। जब इसे इस हद तक नष्ट कर दिया गया, तो उसके परिणाम आज सामने हैं।

और यह सब तब हुआ जब आपके पास पूरा ढांचा था। आप अपने आप को विश्वगुरु कह रहे थे। आपके पास साइंस और टेक्नोलॉजी थी। स्पेस से सब कुछ देखने की क्षमता थी। न्यायिक व्यवस्था थी। प्रशासनिक अमला था। राजनीतिक व्यवस्था थी क्योंकि यह लोकतांत्रिक देश है। इन सबके रहते यह सब हुआ। और जब असर आपके गिरेबान तक पहुंचा, तब आपको तकलीफ हुई!

मैं जयपुर में साथियों से बात कर रहा था। मैंने पूछा, पहले जयपुर में पानी कहां से आता था? शहर के भीतर ही एक जलस्रोत था। फिर पानी लेने 25 किलोमीटर दूर रामगढ़ बाँध गए, उसे भी खत्म कर दिया। उसके बाद बीसलपुर- 150 किलोमीटर दूर। बीसलपुर के पानी पर जयपुर का क्या हक है? वहां की जल संरचनाएं, वहां के कैचमेंट एरिया और नदी उन लोगों ने बचाकर रखी है। लेकिन जब आप बीसलपुर का पानी जयपुर ले आते हैं और पास के सोहेला गांव के लोग पानी मांगते हैं, तो उन पर गोली चलती है। जिस नदी के पानी पर आप हक जताते हैं, उसी नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए जब गांववाले रेत की माइनिंग के खिलाफ खड़े होते हैं तो उनकी हत्याएं होती हैं। यह दोहरा चरित्र समाज को समझ में नहीं आ रहा।

आपको पानी भी चाहिए, 24 घंटे बिजली भी चाहिए, चौड़ी सड़कें भी चाहिए, हरे-भरे लॉन भी चाहिए, लेकिन किसकी कीमत पर? क्या कभी आपने उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया जिनका सब कुछ छीनकर आप यह सब ला रहे हैं? आपकी राजनीति, आपकी तकनीकी सोच और आपका प्रशासनिक ढांचा- सबने मिलकर यह गढ़ा कि जिसके पास है उससे मेरी सुविधा के लिए छीन लेना जायज़ है जबकि संवैधानिक व्यवस्था ने सपना दिखाया था कि ऐसा नहीं होगा। गांधी जी ने हिंद स्वराज में लिखा था कि पृथ्वी पूरी दुनिया का भरण-पोषण कर सकती है, लेकिन एक व्यक्ति का लालच भी पूरा नहीं कर सकती। आपने किस रास्ते को चुना? आपने उसी लालच को जायज ठहराया।

इस पूरे मसले पर बहुत बड़ी राजनीतिक आवाजें नहीं उठीं यह कहने के लिए कि छत्तीसगढ़ में लोग मारे जा रहे थे। क्या आपको लोहा चाहिए, बॉक्साइट चाहिए, तो कितना चाहिए? क्या आपने वहां के लोगों को विश्वास में लिया? नहीं लिया। और जो निकाला गया उसका कितना हिस्सा निर्यात हुआ, यह सवाल भी नहीं पूछा गया। अरावली से कितना निर्यात हो रहा है यह भी सामने है। दुनिया में जिन देशों ने अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचाया वे आज समृद्ध हैं; और जिन्होंने लूटा उनके उदाहरण भी हमारे सामने हैं।



जोहान्सबर्ग में सरकार को कहना पड़ा कि हम पानी नहीं पिला सकते। संसाधनों से भरपूर देश, लेकिन तथाकथित तरक्की ने यह हालत कर दी कि आज किसी की गाड़ी में साफ पानी का कैन दिख जाए तो उस पर हमला हो सकता है। पानी की कमी है, सांसें घट रही हैं, और इसे तरक्‍की कहा जा रहा है। साइंस और टेक्नोलॉजी, जो जीवन को आसान बनाने के लिए थी आज जीवन में नई मुश्किलें पैदा कर रही है। पांच-सात प्रतिशत लोग हैं जिन्हें सब कुछ चाहिए- महंगी गाड़ियां, ऐश-आराम- और पूरा तंत्र उन्हीं की सुविधा में जुट जाता है। बाकी लोगों की आवाज, आवाज नहीं रह जाती; उन्हें जाहिल, बेवकूफ़, विकास-विरोधी कहा जाता है। इस पर बहस नहीं होती जबकि बहस जरूरी है।

आज गाँवों की स्थिति क्या है? अरावली की तलहटी में नदियां तबाह कर दी गई हैं। मैं एक उदाहरण देता हूँ।

नीम का थाना की गिरजन नदी आज भी जिंदा है। बीस साल पहले जब मुश्किलें बढ़ीं तो गांववालों ने तय किया कि बारिश का पानी बचाया जाएगा और खनन नहीं होगा। आपसी सहमति से रास्ता निकाला गया। आज यह नदी बुसा बांध में गिरती है, फिर ‘सोता’ कहलाती है और पटौदी तक जाती है। इसके दोनों ओर 84 गांव और 84 ढाणियां हैं। खेती अच्छी है, पशुपालन फल-फूल रहा है। बाहर से आने वाले लोग कहते हैं कि इतना नीला पानी तो नॉर्थ-ईस्ट में भी नहीं देखा!

आज उसी नदी के उद्गम के पास 180 हेक्टेयर जमीन पर एक बड़े राजनेता के प्रभाव से आयरन माइनिंग की लीज दे दी गई है। पिछले दस महीनों में जिस तेजी से खनन हुआ है, सवाल यही है- नदी बचेगी या नहीं? लोग आंदोलन कर रहे हैं, महिलाएं सड़क पर हैं, बच्चों पर मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। 82 साल की एक बुजुर्ग महिला पर रंगदारी मांगने का मुकदमा दर्ज होता है, जो खुद ठीक से चल नहीं सकती। छोटे-छोटे बच्चों को थाने में बैठाया जाता है। एक टीवी चैनल के स्टिंग में सत्ताधारी दल का नेता रिपोर्टर से कहता है- “गिफ्ट ले लो, लेकिन हमारा काम ठीक दिखाओ।”

यही वहां की हकीकत है। रास्ते चलने लायक नहीं हैं। बॉर्डर इलाकों में धूल की हालत बदतर है। सालोदड़ा गांव में पिछले एक साल में छह लोगों की मौत सिलिकोसिस से हो चुकी है।


Jan Samvad Yatra to save Girjan river in the Aravallis
गिरजन नदी को बचाने के लिए जन संवाद यात्रा

तो आप कल्पना करो- जिस व्यक्ति के पास आजीविका की खेती और पशुपालन खत्म हो गया हो और उन छह में से दो–तीन लोग सिलिकोसिस में सात-सात, आठ-आठ महीने गैस सिलेंडर पर जिये हों; गैस के सिलेंडर पर कितना खर्चा हुआ होगा, और ऐसे में वे चले गए। उसी गांव में एक बच्ची है, अब 11 साल की होगी। दो साल पहले उसने मुझसे कहा था, “अंकल, आप कहते हो ना कि इस देश की कानून व्यवस्था में आपकी दृढ़ आस्था है; आपका कानून मेरे पिताजी को नहीं बचा पाया, आपका कानून मेरे चाचा को नहीं बचा पाया।” उस परिवार में तीन मौतें हो चुकी थीं। उसने पूछा, “अब उनसे बात करके आप घर जाकर चैन से सो सकते हो?” क्या पूरी संवेदना इस दुनिया से खत्म हो गई है?

उस दिन पत्नी ने कहा- खाना खा लो। मैं बहाने बनाने लगा कि भूख नहीं है, कहीं खा कर आया हूं। उन्होंने मुझसे कहा, “कोई न कोई दिक्कत है, तुम छुपा रहे हो।” मैंने बताया- एक ही सिलेंडर पर दो लोग चले गए। यह सुनकर उनकी आंखों में आंसू आ गए। चार महीने पहले उनका निधन हो गया। वह अब इस दुनिया में नहीं हैं। मेरी सबसे बड़ी फाइनेंशियल ताकत वही थीं। तीन भैंसें रखकर छोटी-सी डेयरी से घर चलाती थीं और हर मुश्किल घड़ी में उनसे बड़ा कोई संबल नहीं था। उनका अचानक जाना मेरे लिए बहुत बड़ा आघात था।

क्या ये सब चीजें राजनीतिक चर्चा का विषय नहीं हो सकतीं?

आज पूरे देश में दिल्ली के लिए सहानुभूति है। इसमें कोई शक नहीं, लेकिन मैं पूछता हूं- दिल्ली, जयपुर या दूसरे शहरों के योजनाकारों ने अपने संसाधनों को पहले क्यों नहीं बचाया? दिल्ली के तालाब, यमुना- इन सबको आने वाली पीढ़ियों के लिए क्यों नहीं बचाकर रखा? वही योजनाकार आज कहते हैं कि 80 प्रतिशत लोग साफ पानी नहीं पी सकते, पीने के लिए साफ पानी है ही नहीं। फिर यह जो अरबों का पानी का व्यापार चल रहा है,क्या यह सब किसी योजना का हिस्सा नहीं है?

अभी तीन दिन पहले मध्य प्रदेश में क्या हुआ? उन बच्चों का क्या अपराध था? क्या प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती? कोटपुतली के पास जोधपुरा गांव है। वहां की महिलाएं 1170 दिनों से धरने पर बैठी हैं। उनकी मांग क्या है? वे कहती हैं- जिस साफ हवा ने हमें जीवन दिया है, उस पर हमारा अधिकार है; हमें सांस लेने दो। वे कहती हैं- यह पानी है, यह धरती के नीचे है, इस पर हमारा हक है। इसके बदले उन्हें क्या मिला? बार-बार जेल, लाठीचार्ज।

परसों शाम की ही बात है। सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश है। मैं पिछली जनवरी में हाइकोर्ट गया था और कहा था- इस आदेश को लागू कराइए। सुप्रीम कोर्ट का साफ आदेश है कि ओवरलोड वाहन नहीं चल सकते। मैंने कहा- इसे लागू करो। एक साल से ज्यादा हो गया। ग्‍यारह महीनों में नीम का थाना-कोटपुतली इलाके में लगभग 240 दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें तीन पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। जिन वाहनों की क्षमता 15–20 टन है, उनमें 70–80 टन लादकर चलाया जा रहा है। लोगों के जीवन से खुलेआम खिलवाड़ हो रहा है। इसके वीडियो साफ दिखते हैं। मैं आपको भेज सकता हूं। रोज अखबारों में छोटी-मोटी खबरें आती हैं। बीबीसी तक ने रिपोर्ट किया है।



इसके बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और प्रशासनिक ढांचे के होते हुए यह सब हो रहा है। तो जिम्मेदारी किसकी है? हर बार आप किसे जिम्मेदार ठहराते हो? छत्तीसगढ़ में जो अपने गांव को बचाने की बात करता है- उसे। आपकी व्यवस्था ने ऐसा ताना-बाना खड़ा कर दिया है कि एक नौजवान जो पढ़-लिखकर सुबह घर से निकलता है, मां-बाप उसे दूध पिलाकर कहते हैं- जा, दौड़, तुझे घर चलाना है। वह पुलिस या फौज में भर्ती होता है। उसका दायित्व क्या है? घर चलाने का। और उसके सामने किसे खड़ा कर दिया जाता है? उसी को, जो अपने घर, अपनी जमीन बचाने के लिए खड़ा है। यह द्वंद्व है- घर चलाने और घर बचाने के बीच का! एक तरफ वह अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ रहा है, दूसरी तरफ जिसे आपने ट्रेनिंग दी है वह घर चलाने की मजबूरी में उसी पर गोली चलाता है।

इस व्यवस्था में आपने तय कर दिया है कि गरीब को गरीब ही बने रहना है, लेकिन वह जो संसाधन बचा रहा है उन्हीं संसाधनों पर आपका अस्तित्व टिका है। यह मेरी नाराजगी नहीं है। मैं इस देश के योजनाकारों से कहता हूं- माफी मांगो। जब आपकी सांसें रुकने लगीं, जब बात आपके गिरेबान तक पहुंची, तब आप सोचने को मजबूर हुए। इस देश में उन लोगों से माफी मांगो जिन्होंने संसाधनों को बचाने की लड़ाई लड़ी।

दुनिया से सीखो। दुनिया में कई देश हैं जिन्होंने अपने संसाधनों को बिना नष्ट किए तरक्की की है, आज वे समृद्ध हैं। उनकी टेक्नोलॉजी क्या है? वहां निर्माण कैसे होता है? उन्होंने बिना संसाधन खोये हमसे बेहतर विकास कैसे किया? हमें उनसे सीखना चाहिए। लेकिन नहीं! हर जगह सवाल बस मुनाफे का है। मुनाफा कैसे आएगा और किसकी कीमत पर आएगा, यह बताने को कोई तैयार नहीं।

रास्ते नहीं छोड़ेंगे, पढ़ने के अधिकार नहीं छोड़ेंगे। इसका सबसे बड़ा नुकसान क्या हो रहा है? गांव-गांव बच्चों का आपराधीकरण। यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। न्यायपालिका में आस्था की बात मैं इसलिए करता हूं क्योंकि मैंने हाइकोर्ट देखा है, एनजीटी के कितने आदेश मेरे पक्ष में आए हैं नदियों को लेकर। लंबी बहस के बाद आदेश हुआ कि छोटी नदियां बचनी चाहिए, उनका पुनर्जीवन होना चाहिए। मेरे पक्ष में आदेश हुआ। मैं दोबारा कोर्ट गया। लोगों ने कहा- कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का सामना करना पड़ेगा। मैंने कहा- भाई, आदेश है तो लागू क्यों नहीं?

बीते तीन नवंबर को जोधपुरा गांव के लोगों के समर्थन में एनजीटी का आदेश आया कि जीवन का अधिकार इनका है, साफ हवा पर इनका अधिकार है, स्वस्थ रहने का इनका अधिकार है। एनजीटी ने आदेश दिया कि बीमार लोगों को मुआवजा दिया जाए, जांच बाद में चलती रहेगी। 268 लोगों की सूची थी जिनके घरों में दरारें आई हैं। उन्हें 50,000 रुपये देने का आदेश था। तीन नवंबर से आज तक कितने दिन हो गए?

मेधा पाटकर जी और हम चीफ सेक्रेटरी से मिले। तमाम माइंस सेक्रेटरी से भी मिले। उन बैठकों में चीफ सेक्रेटरी ने मॉनिटरिंग के स्तर पर ये सब करने की बात कही थी। इस देश का गरीब आदमी, इस देश के निचले पायदान पर खड़ा वह व्यक्ति, और इस देश के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने वाले लोग, इन सबकी बहुत बड़ी परीक्षाएं ली गई हैं। इतना दमन होने के बाद भी हमारी दृढ़ आस्था इस देश की संवैधानिक व्यवस्था में बनी हुई है। सवाल यह है कि कौन लोग हैं जिनकी आस्था नहीं है इस देश की संस्थाओं में और कौन इस व्यवस्था से खिलवाड़ कर रहे हैं?



अरावली के बहाने इस देश के विकास के मॉडल पर पुनर्विचार करने का यह एक बड़ा मौका है। गांव-गांव में उबाल है, लोग घुट रहे हैं, और उनकी घुटन अब बाहर निकलकर सामने आ रही है। आप पढ़े-लिखे, लंबे अनुभव वाले लोग हैं। मेरा आपसे अनुरोध है- उस घुटन को समझिए; उसमें जो पीड़ा है, जो जीवन जीने की इच्छा है, वह टकराव नहीं चाहती। गांव के लोग शहरी समाज से बस इतना कह रहे हैं कि कम से कम आप हमारी तरफ हाथ तो बढ़ाइए। आप उनकी तरफ हाथ बढ़ाइए, उनसे एक बार माफी मांगिए कि हमारे योजनाकारों की गलतियों की वजह से आप पर इतना दमन हुआ है। इससे उनका हौसला बढ़ेगा।

इतने इम्तिहानों के बाद भी उन्होंने इस देश की संवैधानिक व्यवस्था में, न्यायिक व्यवस्था में, और प्रशासनिक व्यवस्था में भरोसा बनाए रखा है। यहां तो लोग छोटे-छोटे लालच में ही भरोसा तोड़ देते हैं। कितने पूंजीपति इस देश को छोड़कर भाग गए- जरा-सा मुनाफा कम हुआ और देश छोड़ दिया। लेकिन जरा देखिए- इतने दमन, इतने उत्पीड़न, संसाधन छीने जाने के बावजूद इन लोगों के भीतर आपकी इस व्यवस्था का डर है और इसी भरोसे पर वे टिके हुए हैं।

एक बात कहकर मैं अपनी बात खत्म करूंगा। इस देश में अरावली पर जो कमेटी बनी उसकी बहुत चर्चा हुई। कमेटी ने अध्ययन किया कि अरावली की ऊंचाई क्या है, यह है, वह है। मैं इस देश की सरकार से, इस देश की न्यायपालिका से, आपके माध्यम से अपील करना चाहता हूं- एक कमेटी वह भी बननी चाहिए जो यह देखे कि इस पूरे दौर में कितने लोगों ने अपनी आजीविका खोयी, कितने लोगों ने अपने परिवार के सदस्य खोये, बीमारियों या दमन के कारण कितने लोग संसाधनों से वंचित हुए, कितने लोग उजड़ गए। उनके पुनर्वास की बात भी होनी चाहिए। तब लगेगा कि इस देश में हम उन लोगों के लिए भी चिंतित हैं जो हमारी गलतियों की वजह से आज यह सब झेल रहे हैं।

काश! ऐसा हो या हो जाए। मैं बहुत उम्मीद से हूं क्योंकि जिस तरह गांव-गांव से प्रतिक्रिया मिल रही है और जो नारा गांव के लोगों ने दिया है- “अरावली बचाओ, जीवन बचाओ”- वह बहुत साफ है। अरावली बचेगा तो पूरे देश का ढांचा बचेगा- आपकी प्रशासनिक व्यवस्था, आपकी राजनीतिक व्यवस्था, आपका विकास मॉडल। यह अवसर है एक विकास मॉडल पर सवाल उठाने का और उसके पीछे छुपे एजेंडों के चेहरों से नकाब उतारने का। इसमें आप सब साथ दीजिए!



(हिसार, हरियाणा के समग्र सेवा सदन, गांधी भवन में पर्यावरण की चुनौतियों पर लेखक द्वारा दिए गए एक व्‍याख्‍यान का संपादित रूप)सभी तस्वीरें लेखक के सौजन्य से।


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