पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज की एक टिप्पणी की प्रतिक्रिया में अमेरिका से रातोरात इंटरनेट पर पैदा किए गए एक आभासी समूह ने चौबीस घंटे के भीतर लाखों अनुयायी जुटा लिए और बिना किसी जमीनी कार्रवाई के बीते दो हफ्ते से वह लगातार राष्ट्रीय विमर्श में बना हुआ है। विडम्बना देखिए कि अपने देश के भीतर मध्य प्रदेश में जमीन पर बूढ़ों, औरतों और नौजवानों ने लगातार बारह दिन तक पानी में खड़े रहने से लेकर फांसी पर चढ़ने और चिता पर लेटने तक तमाम ऐसी कार्रवाइयां कीं जिससे सत्ता को वे अपनी आवाज सुना सकें, लेकिन उनकी चर्चा इतनी नहीं हुई।
केन और बेतवा नदियों को आपस को जोड़ने की परियोजना से प्रभावित लोगों ने बीते अप्रैल में अपना आंदोलन तेज किया था। इस परियोजना का शिलान्यास प्रधानमंत्री पांच साल पहले कर चुके हैं, लेकिन करीब दो हजार प्रभावित परिवारों का संघर्ष अब तक जारी है क्योंकि उनकी मुआवजा संबंधी मांगों को लगातार नजरअंदाज किया गया है। आंदोलन का ताजा चरण 5 अप्रैल से शुरू होकर 12 दिनों तक चला। आंदोलन शुरू होने के दूसरे ही दिन 6 अप्रैल को प्रशासन द्वारा बीएनएस की धारा 163 लागू कर के पांच लोगों के एक साथ जुटने पर पाबंदी लगा दी गई। मंजूरी के बिना सभा करने पर रोक लग गई, जबकि अन्य जिलों के निवासियों को जिले की सीमा न छोड़ने का आदेश जारी कर दिया गया।
इसके बावजूद, प्रभावित लोगों ने केन नदी में खड़े होकर जल सत्याग्रह किया। फिर उन्होंने मिट्टी सत्याग्रह किया और अपने शरीर पर मिट्टी पोती। इसके बाद प्रभावितों ने चिता आंदोलन किया। लोग सांकेतिक रूप से वास्तविक चिताओं पर लेट गए। प्रभावितों ने भूख और चूल्हाबंदी प्रदर्शन भी किया। वे यहीं नहीं रुके। उन्होंने अंत में सांकेतिक फांसी आंदोलन किया। आंदोलन के ऐसे तमाम प्रयोग आज से नौ साल पहले बिलकुल इसी मौसम में तमिलनाडु से दिल्ली गए सैकड़ों किसानों की याद दिलाते हैं, जो खुदकशी से मृत अपने किसान भाइयों के नरमुंड अपने गले में लटकाए और हाथ में उनकी अस्थियां लेकर जंतर-मंतर पर सौ दिनों तक प्रदर्शन करते रहे थे। संयोग देखिए कि ये किसान जिस बैनर तले दिल्ली आए थे, वह दक्षिण भारत में नदीजोड़ परियोजना विरोधी संघ ही था।

इतना ही नहीं, मध्यप्रदेश के केन-बेतवा आंदोलन में लगे नारे दक्षिण ओडिशा के खनन-विरोधी आंदोलन के साथ भी एक भौगोलिक संयोग निर्मित करते हैं। ‘मिट्टी हमारी-मनमानी तुम्हारी नहीं चलेगी’, ‘नदी हमारी मनमानी तुम्हारी नहीं चलेगी’, ‘गांव हमारा मनमानी तुम्हारी नहीं चलेगी’, जैसे मध्य प्रदेश के कई नारे ओडिशा के रायगड़ा-कालाहांडी में तीन साल से चल रहे आदिवासियों के आंदोलन की गूंज लगते हैं। इस पर्यावरण दिवस पर दक्षिण ओडिशा के ‘मां माटी माली सुरक्षा मंच’ ने जो परचा जारी किया है, उसका शीर्षक है ‘मिट्टी बेचने के लिए नहीं, पहाड़ मुनाफे के लिए नहीं’। इस परचे में दो नारे लगाए गए हैं, ‘पांचवीं अनुसूची के इलाकों को मत छुओ’ और ‘बॉक्साइट को जमीन में ही रहने दो’।
उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक अपने जल, जंगल, पहाड़ और जमीन को बचाने के लिए लगाए जा रहे एकसमान नारे, एकसमान आंदोलनात्मक प्रयोग, इस बात का पता देते हैं कि जन आंदोलन अब संविधान और लोकतंत्र के दायरे में आंदोलन के परंपरागत नुस्खों से आगे जाकर सोच रहे हैं। बेशक, इलाकों के हिसाब से आंदोलनों की मांगों में अंतर हो सकता है, लेकिन मूल लड़ाई हर जगह स्थानीय बनाम वैश्विक की ही उभर कर आ रही है।
केन-बेतवा आंदोलन: हताशा के बीच उम्मीद
इस संदर्भ में मध्य प्रदेश को जन आंदोलनों के प्रयोग की जननी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा, जिसकी परंपरा नर्मदा बचाओ आंदोलन से निकलती है जो चार दशक बाद अब भी जिंदा है।
इस कड़ी में हालिया केन-बेतवा आंदोलन इसलिए खास है क्योंकि इस आंदोलन ने रैली निकालने, ज्ञापन देने, नाटक करने, नारे लगाने की विरोध परंपरा से आगे बढ़कर चिता, मिट्टी, फांसी, जलडूब, भूख-चूल्हाबंदी जैसे पंचतत्वों को मिलाकर सत्याग्रह के नए प्रयोग किए हैं। जैसा कि मध्य प्रदेश की सामाजिक कार्यकर्ता जया जयश्री कहती हैं, ‘’हालिया केन-बेतवा आंदोलन में जो देखने को मिला है उसे वास्तव में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने रास्ता दिया है।‘’
इन नए प्रयोगों के पीछे लंबे समय में बनी एक समझदारी यह है कि सत्ता अब रैलियों और ज्ञापनों की आवाज नहीं सुन रही है। ऐसे में प्रभावितों को आंदोलन के नए तरीके और प्रयोग गढ़ने पड़ रहे हैं। जैसा कि ओडिशा के आदिवासियों का परचा कहता भी है:
‘’हमें अकसर महसूस होता है कि हम लोग व्यवस्था नाम के एक ऐसे विशाल प्रेत से लड़ रहे हैं, जहां चुने हुए प्रतिनिधियों और अधिकारियों से संवाद का कोई मतलब नहीं है। हमारी सैकड़ों अपीलों पर वे कभी कोई जवाब नहीं देते, लेकिन किसी प्रेत की तरह वे अचानक आते हैं और हमारे पास जो कुछ भी है उस सब पर एक झटके में हमला कर देते हैं।‘’

यह अहसास उन तमाम जगहों के संघर्षरत लोगों में अब गहराता जा रहा है जिनके स्थानीय संसाधनों को जबरन बड़ी पूंजी और निवेश के हित राज्य की सरपरस्ती में छीना जा रहा है। मध्य प्रदेश में बरगी बांध विस्थापित संघ के अध्यक्ष राजकुमार सिन्हा बताते हैं, ‘’मैंने अपने जीवन में एक जो बहुत बड़ा आंदोलन देखा और जिया, वह नर्मदा बचाओ आंदोलन था। उस दौर के आंदोलन के कई लक्ष्य थे, जिनमें से एक लक्ष्य सरकार से संवाद भी था। पहले पारंपारिक तौर पर संगठन आंदोलनों का साथ देते थे। इसलिए आंदोलन सफल हुआ करते थे। अब संगठनों द्वारा आंदोलनों के साथ देने की परंपरा सीमित हो रही है। इसलिए आंदोलन अब कमजोर पड़ रहे हैं। आंदोलनों को नुकसान अब इसलिए भी हो रहा है क्योंकि अब सत्ता पहले जैसी नहीं रही। अब तो किसी ने आंदोलन शुरू ही किया तो जेल में डाल दिया जाता है। आज सत्ता की स्थिति यह है कि उसकी खुद की एक मानसिकता है। इसलिए चुनाव से सत्ता परिवर्तन के बाद भी संवादहीनता की स्थिति बनी रहती है। सत्ता खुद के माइन्डसेट को ही सही मानती है। वह उससे बाहर नहीं आना चाहती है। यह स्थिति एक लोकतांत्रिक देश के लिए सही नहीं है। डेमोक्रेटिक स्पेस को सरकार अब खत्म कर रही है। अब जहां भी आंदोलन करना है उस मैदान में अनुमति लेना जरूरी है। अनुमति भी देना है या नहीं देना है यह सिस्टम डिसाइड करता है।‘’
हाफ़िज़ हारून मध्य प्रदेश में बीड़ी मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं। वे मानते हैं कि मध्य प्रदेश में जो भी आंदोलन हुए उनका नतीजा केवल सफलता नहीं है। बहुत से आंदोलन इसलिए भी हुए ताकि लोगों को जागरूक किया जा सके। उन्हें उनके अधिकार समझाए जा सकें। साथ में एकजुट किया जा सके। वे कहते हैं, ‘’मैंने जल, जंगल, जमीन, बीड़ी मजदूर, अन्य मजदूरों, किसानों को लेकर भी आंदोलन किए हैं। आखिरकार, हमने आंदोलन से कुछ खास नहीं पाया। इसकी प्रमुख वजह यह भी थी कि आधिकारी वर्ग ने हमारा साथ नहीं दिया। कई बार आंदोलन तभी सफल हो पाते हैं जब अधिकारी, कर्मचारी वर्ग साथ देता है। आंदोलनों की असफलता का एक मुख्य कारण है यह भी है कि सरकारें आंदोलन की सत्यता और आवश्यकता को नहीं समझ पाई हैं।‘’
मध्य प्रदेश के पुराने सामाजिक कार्यकर्ता चिन्मय मिश्र का मानना है कि सरकारें किसी भी आंदोलन को अच्छी दृष्टि से नहीं देखती हैं, चाहे वे किसी भी दल की हों। इसीलिए वे सभी तरह के आंदोलनों को दबाने का प्रयास करती हैं या आंदोलन की तरफ से ध्यान हटाने का प्रयास करती हैं। ऐसे में कई ऐसे मुद्दे भी सामने लाए जाते हैं जो या तो मुद्दे ही नहीं हैं या उनकी जरूरत नहीं है।
पुराने आंदोलनों की मिश्रित सफलता और हताशा के बीच केन-बेतवा आंदोलन के प्रयोगों ने कुछ लोगों को उम्मीद दी है कि जन आंदोलनों को शायद एक बार फिर से जगाया जा सकता है। उनमें एक मध्य प्रदेश के राकेश दीवान हैं, जो सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ सर्वोदय प्रेस से जुड़े हैं। वे कहते हैं, ‘’केन-बेतवा लिंक परियोजना का आंदोलन देखकर लग रहा है कि मध्य प्रदेश में पुन: आंदोलनों को जीवित किया जा सकता है। पहले जो संगठन आंदोलन के लिए खड़े होते थे, आज उनकी स्थिति बेहद खराब है। पहले के आंदोलनों से ही हम जैसे लोग सर्वोदय प्रेस शुरू कर पाए ताकि आंदोलनों की आवाज को जगह दे पाएं, लेकिन जब आंदोलनों की स्थिति खराब हुई तब सर्वोदय प्रेस जैसा जन आवाज का मंच भी मजबूती से आगे नहीं बढ़ पाया।‘’
दीवान मध्य प्रदेश के कुछ आंदोलनकारी प्रयोगों को विस्तार से गिनवाते हैं:
‘’मध्य प्रदेश ने प्रमुख तौर पर नर्मदा बचाओ, छत्तीसगढ़ के मजदूर अधिकार और भोपाल गैस त्रासदी जैसे बड़े आंदोलन देश को दिए हैं। इन आंदोलनों ने संघर्ष के नए तरीके भी विकसित किए हैं। जैसे, जल सत्याग्रह करना, मजदूरों द्वारा आंदोलन में निर्माण कार्य करना। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के मजदूरों ने अपने चंदे से शहीद अस्पताल निर्मित किया था। आंदोलनों के बीच शिक्षा और इतिहास पर कार्य करने का प्रयोग भी किया गया। कई किताबें छापी गईं। स्कूल बनाए गए। एक ऐसा ही उदाहरण सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर और जाया जयश्री हैं जिन्होंने ने नर्मदा बचाओ आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने एक अलग तरह की शिक्षा के लिए बड़वानी के सेंधवा क्षेत्र में एक स्कूल बनाया। इस स्कूल को वे कई साल से चलाते आ रहे हैं। इसमें वे समता, न्याय जैसे मूल्यों पर आधारित शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं। यदि आंदोलन ना होता तो सरकार तो कुछ भी देने वाली नहीं थी।‘’
चिन्मय मिश्र केन-बेतवा आंदोलन पर कहते हैं, ‘’एक तरफ अमित भटनागर प्रभावितों की लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी ओर सरकार आंदोलन से घबराकर उन्हें बार-बार जेल में डाल रही है। केन-बेतवा का आंदोलन स्थानीय स्तर पर जरूर हो रहा है मगर दिख राष्ट्रीय स्तर पर रहा है। यह परियोजना दो प्रदेशों से जुड़ी हुई है और वैसी ही असफल परियोजना है जैसी अन्य हैं। ऐसी परियोजना के आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन बनाने की आवश्यकता है।‘’
पुराने और नए आंदोलन
आंदोलनों के मामले में नए प्रयोगों और अतीत के काम को समझने के लिए हमने बड़वानी में शिक्षण कार्य से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर से लंबी बात की (ये केन-बेतवा आंदोलन वाले अमित भटनागर से अलग हैं)।
उन्होंने बताया, ‘’आजादी के बाद मध्य प्रदेश में करीब 1980 से अहिंसक आंदोलन देखने को मिलते हैं। 1980 के दशक से अब तक चार दशकों में जो आंदोलन देखने को मिले उनमें मुख्यत: आदिवासी संगठनों के आंदोलन रहे। इन आंदोलनों के अगुवा खेड़ुत मजदूर चेतना संगठन, आदिवासी मुक्ति संगठन, जायस, किसान संगठन जैसे विभिन्न संगठन थे। इन संगठनों के कारण ही मध्य प्रदेश में आंदोलनों को गति मिली। आज जो वनाधिकार कानून जैसे कई कानून हैं, वह प्रदेश के आंदोलनों की ही देन हैं। पिछले चार दशक में आंदोलनों में गीत गाना, नाटक करना, पोस्टर बनाना, नारे लगाना, पर्चा बांटना, जैसे अन्य रचनात्मक कार्य करने की संस्कृति मजबूती से विकसित हुई है। आज के आंदोलनों में भी हमें पहले के नारे और गीत सुनाई देते हैं। पहले आंदोलनों में जो देसी गीत गाए जाते थे वे गीत आज लोग शादियों में बजाते हैं। इन्हीं चीजों के कारण प्रदेश में मजबूत आंदोलन हुए, जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन। इस आंदोलन ने पूरे देश के लिए यह विचार दिया कि आज जो विकास की परिभाषा गढ़ी जा रही है वह गलत है।‘’
इसके बाद अमित पिछले दशकों के आंदोलनों की तुलना में नए आंदोलनों के उस दूसरे पहलू को भी उभारते हैं जिसका जिक्र चिन्मय मिश्र ने पहले किया था, ‘’आज आंदोलन के नए प्रयोग हमें कई तरह के देखने को मिल रहे हैं। पहले जो आंदोलन सड़कों पर होते वे आज सोशल मीडिया पर फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम तक आ पहुंचे हैं। आज सोशल मीडिया पर कोई भी आंदोलन की स्थिति तेजी से लोगों तक पहुंच रही है, हालांकि आज के आंदोलनों में और सोशल मीडिया पर उनकी पहुंच में जीवंतता नजर नहीं आती। पुराने आंदोलनों के कारण ही आज गरीब, शोषित, वंचित, दलित, आदिवासी, संसाधनहीन लोग डर के महौल से निकल रहे थे। साथ में अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे, लेकिन अब कुछ वर्षों से फिर वही बोलने, आंदोलन करने की आजादी का डर लोगों के सिर पर है।‘’
अमित जिन नए सड़कविहीन प्रयोगों की बात कर रहे थे, ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ वाली परिघटना उन्हीं में से एक है जिसके आज इंस्टाग्राम पर दो करोड़ अनुयायी बन चुके हैं। उसने अपने नाम में ‘पार्टी’ लगाया है, जबकि यह न तो जमीन पर मौजूद कोई संगठन है या आंदोलन, और न ही कोई राजनीतिक या सामाजिक पक्ष। इस परिघटना के सूत्रधार अभिजीत दीपके नामक युवक ने 31 मई को एक्स पर लिखा कि वे 6 जून को भारत आ रहे हैं और बहुत जल्द ही यह परिघटना आंदोलन में बदल जाएगी क्योंकि उस दिन यह ऑनलाइन समूह दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करेगा। दिलचस्प है कि उन्हें सोनम वांगचुक जैसे आंदोलनकारी का भी समर्थन मिल रहा है, जो लद्दाख को स्वायत्तता दिए जाने के आंदोलन के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत छह महीने जेल में रह चुके हैं। विडम्बना है कि अभी तक ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ का न तो कोई विचार सामने आया है, न ही उसकी कोई राजनीतिक दृष्टि सार्वजनिक है, बिल्कुल वैसे ही जैसा हाल आम आदमी पार्टी बनाते वक्त अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों का था।

इस संदर्भ में अमित भटनागर की टिप्पणी प्रासंगिक थी, ‘’पहले आंदोलन में हम लोग खुद आटा, दाल लेकर जाते थे। चन्दा जोड़कर आंदोलन किया जाता था। कोई अपनी मुर्गी, बकरी बेचकर आंदोलन में जाता था तो कोई किसी से कर्ज लेकर जाता था। इतने संघर्ष के बाद आंदोलन सफल हो पाते थे। आज आंदोलनों की स्थिति में काफी बदलाव दिख रहा है। आज के आंदोलनों में सामाजिक परिवर्तन, व्यवस्था परिवर्तन की कोई खास सोच नजर नहीं आती क्योंकि आंदोलनों के नाम पर नेतागिरी हो रही है। आंदोलनों की एक कमी यह भी है कि संगठनों, संस्थाओं और आंदोलन से जुड़े लोगों के आफिस गांव में होने के बजाय शहर में बने हुए हैं। इस स्थिति में आंदोलन के लिए लोगों को एकजुट करना आसान नहीं है।‘’
अमित की कही बात का दूसरा पहलू जयश्री खोलती हैं, ‘’अब लोग ही गांव में नहीं रहे, जो आंदोलन कर सकें। लोग शहरों में पलायन कर गए हैं। आंदोलन के लिए वक्त भी लोग कम देते हैं। साथ में लोगों का धैर्य भी खोता जा रहा है। इन परिस्थियों में एक अच्छा आंदोलन कर पाना अपने आप में चुनौती है। सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं के माध्यम से बेशक आंदोलन को और प्रभावी बनाया जा सकता है, मगर सवाल यह है कि युवाओं को अच्छी दिशा कैसे दी जाए ताकि वे असली और नकली मुद्दों को पहचानने में भूल ना करें।‘’
वे इस बात की ओर ध्यान दिलाती हैं कि आज जो संगठन समाज में हैं वे पहले जैसे नहीं रहे, ‘’आज जाति और धर्म के नाम पर काफी संगठन बनाए जा रहे हैं। उससे समाज में फूट की स्थिति नजर आ रही है। साथ में किसी विशेष जनहितैशी आंदोलन में इन संगठनों को जोड़ पाना भी सरल नहीं है।‘’
सवाल गांवों से शहरों में लोगों के पलायन का है या नए आंदोलनों के ही शहर केंद्रित होने का? शायद ये दोनों बातें सच हैं, पर अधूरी। नए आंदोलनों की सीमाओं पर अमित और जयश्री की टिप्पणी को चिन्मय मिश्र परिप्रेक्ष्य में रखते हैं, ‘’आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण बात है स्थानीयता से जुड़ाव। साथ में पूर्व तैयारी की जरूरत है। तभी आंदोलन स्थायी और लंबे समय तक चलने वाला रहेगा। आज जो आंदोलन एकदम से खड़े हो रहे हैं और एकदम से बैठ रहे हैं उसकी प्रमुख वजह यही है कि उनका धरातल नहीं बन पाता है। गांधी के आंदोलन से हमें यह सीख लेने की जरूरत है कि कैसे आंदोलन की तैयारी करनी है और कैसे उसे गति देनी है।‘’
रणकौशल की प्रासंगिक बहस
चिन्मय मिश्र गांधी के आंदोलन से सीख लेने की जब बात करते हैं, बिलकुल वहीं पर संवैधानिक लोकतंत्र के भीतर अपनी मांगों को मनवाने के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों को लेकर एक ऐसी विभाजनकारी बहस खड़ी हो जाती है जिसमें एक पक्ष पर आग्रह के लिए मध्य प्रदेश का आंदोलनकारी तबका खासकर ‘कुख्यात’ रहा है।
यह सच है कि मध्य प्रदेश से ही जन आंदोलन के तमाम नए तरीके निकले, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह भी है कि उन सभी में लोकतांत्रिक दायरे के भीतर ‘अहिंसक तरीकों’ पर विशुद्ध जोर रहा। इस बहस ने आंदोलनों में नवाचार किए, तो आंदोलन की कुछ पद्धतियों को धीरे-धीरे अप्रासंगिक भी बनाया। उदाहरण के लिए, नर्मदा बचाओ आंदोलन के संदर्भ में ‘क्या करें’ वाली दुविधा एक वक्त में तो चरम पर पहुंच गई थी।
नर्मदा घाटी के कुछ गांवों में अब हर साल तकरीबन नियम की तरह जो जल सत्याग्रह किया जाता है, उसको 2012 के अगस्त में जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने ‘मेड फॉर टीवी प्रोटेस्ट’ का नाम दिया (रिपोर्टर सुचंदना गुप्ता), तब पहली बार आंदोलन को बाकायदे उस रिपोर्ट का खंडन कर के कहना पड़ा (चितरूपा पलित द्वारा जारी) कि खंडवा का आंदोलन टीवी के प्रचार के लिए नहीं था। तब से लेकर आज तक नर्मदा में इतना पानी बह चुका है कि रूढ़ हो चुके जल सत्याग्रह को आज टीवी प्रसारण के लायक भी नहीं समझा जाता। यह एक गतिरोध की स्थिति है जहां मामला कुल मिलाकर सही सवाल पूछने का बनता है ताकि जड़ता टूटे। और यह स्थिति पिछले पंद्रह साल से लगातार कायम है। चिता हो चाहे फांसी हो चाहे खोपड़ी, आंदोलन का कोई भी प्रतीक अब ठोस उपाय की तरह काम नहीं आ पा रहा, यह हकीकत है।

इसी मसले पर आज से बारह साल पहले ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले के ढिंकिया गांव में जन आंदोलनों का एक बड़ा जुटान हुआ था। वहां इस बात का अहसास शिद्दत से किया गया था कि अब विरोध और प्रतिरोध के परंपरागत तरीके काम नहीं आ रहे। ढिंकिया गांव में मेधा पाटकर सहित देश भर से डेढ़ सौ जनसंगठनों के प्रतिनिधि 29-30 नवंबर, 2014 को ”जल, जंगल, ज़मीन और जीविका के हक़ के लिए लोकतंत्र की रक्षा में जनसंघर्षों का राष्ट्रीय सम्मेलन” के लिए जुटे थे। वहां सबने एक-दूसरे से एक ही सवाल पूछा था: ‘’अब क्या करें?” जन आंदोलनों में आई इस जड़ता को तोड़ने के लिए हुई इस दोदिवसीय राष्ट्रीय बहस के बाद उस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए ढिंकिया सम्मेलन के फॉलो-अप के बतौर दिल्ली में दो दिनों का एक विचार सत्र मार्च 2015 में रखा गया जिसका विषय था ”संसदीय लोकतंत्र की बंदिशें, संभावनाएं और विकल्प”।
ऐसा नहीं है कि 2014 में ही इस सवाल पर सोचने की जरूरत अचानक पैदा हुई। शायद उससे भी पांच साल ऐसा ही एक प्रयोग कुछ प्रत्यक्षत: ज्यादा राजनीतिक और जनवादी संगठनों ने दिल्ली में किया था जब पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया के मंच पर वाम अतिवादियों से लेकर सर्वोदयी और गांधीवादी-समाजवादी तक एक साथ आए थे। उस मंच पर अमरनाथ भाई से लेकर मेधा पाटकर सब उपस्थित थे। जनसंगठनों और आंदोलनों के बीच ऐसी विचार-विमर्श की प्रक्रियाएं आज जाने कहां गुम हो चुकी हैं। दिक्कत इस बात की है कि अतीत में चली ऐसी प्रक्रियाओं में जो सवाल उठाए गए उन्हें लेकर आज पुराने आंदोलनकारी तबकों में उदासीनता है जबकि नई पीढ़ी को उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है।
आंदोलनों द्वारा अपनाए जाने वाले तरीकों यानी रणकौशल के खास संदर्भ में ढिंकिया में 2014 में जनसंगठनों द्वारा लिए गए संकल्प को फिर से याद किया जाना प्रासंगिक है:
…संघर्षों को हमको आगे बढ़ाते हुए अपनी रणनीतियों और रणकौशलों दोनों का ही ध्यान रखना होगा और बदलते वक्त के साथ-साथ हमें अपने रणकौशलों में भी परिवर्तन करते रहना होगा। जिस तरह से सरकारें और पूंजीपति अपनी सुविधा के लिए कानूनों को तोड़-मरोड़ रहे हैं ऐसे में हमें इस बात पर एक राय बनानी होगी कि हम अपने आंदोलनों को किस सीमा तक लेकर जाएंगे। ऐसे समय में जब हम पर होने वाले हमले कानूनों के दायरे से बाहर जा रहे हैं या फिर कानूनों में उनके अनुसार परिवर्तन लाए जा रहे हैं, ऐसे में हम केवल संसदीय रास्ते से किसी भी इंसाफ की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। हमें अपने संघर्षों को सफल मुकाम तक ले जाने के लिए ऐसे तरीके अपनाने होंगे जो हो सकता है कि प्रशासन की नजरों में गैर-कानूनी तथा गैर-संसदीय हो किंतु हमारे आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन इस बात को याद रखते हुए कि हमें हिंसक तरीका नहीं अपनाना है। हमें अपने संवैधानिक अधिकारों की बहाली के लिए जनवादी तरीके से संघर्ष करना है।
ढिंकिया संकल्प दो बातों पर जोर देता है- पहला, आंदोलनों को किस सीमा तक ले जाना है और दूसरा, केवल संसदीय रास्ते से किसी भी इंसाफ की उम्मीद नहीं की जा सकती। संकल्प साफ़ कहता है कि ‘हमें अपने संघर्षों को सफल मुकाम तक ले जाने के लिए ऐसे तरीके अपनाने होंगे जो हो सकता है कि प्रशासन की नजरों में गैर-कानूनी तथा गैर-संसदीय हो किंतु हमारे आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं’। इस संदर्भ में पहला आयाम हमें कृषि कानूनों के विरोध में 2020-21 के दौरान साल भर चले किसान आंदोलन में चरितार्थ होता दिखा। आंदोलन की ‘सीमा’ का सवाल तो यहां हल होता दिखा। बिलकुल इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ के सिलगेर में एक साल से ज्यादा समय तक जो आदिवासी धरने पर बैठे रहे, वहां भी हम आंदोलन की सीमाओं को टूटता पाते हैं। हमने बीते कुछ वर्षों में आंदोलनों को टिकते हुए देखा है। उनकी सांस लंबी हुई है।
संकल्प का दूसरा आयाम अब भी फंसा हुआ है। यह सवाल रणकौशल का है। संसदीय रास्ते से अगर इंसाफ नहीं मिलेगा तो क्या-क्या किया जा सकता है, इस पर आंदोलनों के बीच अब तक कोई सहमति नहीं बनी है। पैटर्न के तौर पर केवल दो ही बदले हुए रूप देखने में आए हैं- लंबी पदयात्राएं और लंबी अवधि वाले धरने। ये दोनों ही तरीके संसदीय लोकतंत्र को कभी नागवार नहीं गुजरेंगे, यह बताने की जरूरत नहीं।
बहस और सवाल की खाली जगह
इस लिहाज से केन-बेतवा का ताजा संघर्ष 2014 में बंद हो चुकी बहस की खिड़की को दोबारा खोलने का अवसर देता है। ऐसा इस समय खासकर इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत के आसपास नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया में पिछले दिनों जैसे आंदोलन रातोरात उभरे और सत्ता परिवर्तन का बायस बने, उनका हश्र हम देख चुके हैं।
इसके अलावा, जन आंदोलनों और जनसंगठनों के पास 2011 के बाद से की हुई उनकी ऐतिहासिक गलतियों का भी सबक मौजूद है, जब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की आंधी में एनबीए की मेधा पाटकर और समाजवादी जन परिषद के नेताओं समेत तमाम आंदोलकारी लोगों ने अन्ना टोपी पहन ली थी और चुनाव लड़कर अपनी जमानत तक गंवा बैठे थे। इतना ही नहीं, किसान आंदोलन से लेकर मजदूर आंदोलन और विस्थापन विरोधी आंदोलनों से लेकर पर्यावरण रक्षा आंदोलनों तक के सबक हमारे पास इकट्ठा हो चुके हैं।
इस संदर्भ में मध्य प्रदेश की सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट आराधना भार्गव की यह बात समझ आ सकती है कि ‘’जनता के अधिकारों के लिए चलाए गए आंदोलन की लड़ाई सड़क, संसद और अदालत में तीनों जगह जरूरी रही है। इसी से आंदोलनों को समग्रता दी जा सकती है।‘’ आंदोलन की ‘समग्रता’ का उदाहरण खुद आराधना भार्गव का अदाणी के खिलाफ ख्लाया संघर्ष है जिसके बारे में वे बताती हैं, ‘’एक आंदोलन कुछ सालों से मैं छिन्दवाडा में चलाती आ रही थी। वजह यह थी कि किसानों की जमीनों को अदाणी समूह ने दबा रखा था। आंदोलन के परिणामस्वरूप हम कामयाब हुए और किसानों को उनकी जमीन दिला पाए। आज किसानों को अपनी जमीन पर खेती करते हुए चार वर्ष हो गए हैं।‘’
ऐसे ही अनुभव झारखंड से हैं जहां आर्सेलर मित्तल कंपनी द्वारा प्रस्तावित इस्पात संयंत्र को लोगों के भीषण संघर्ष के आगे झुकना पड़ा था। सवा आठ अरब डॉलर की लागत से बनने वाली वह 12 मिलियन टन क्षमता की एक विशाल परियोजना थी, जिसे खूंटी और गुमला जिलों के लिए बनाया गया था। पत्रकार और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता दयामनी बारला के नेतृत्व में इसका कड़ा विरोध हुआ था। अंततः, व्यापक विरोध के कारण परियोजना रुक गई और कंपनी को अपना संयंत्र कहीं और लगाना पड़ा था।
रणकौशल के मामले में झारखंड के साथ-साथ खुद ढिंकिया का पास्को विरोधी आंदोलन भी मिसाल है, जहां लोगों ने आंदोलन चलाकर कोरियाई कंपनी को भगा दिया था। 2013 में नियमगिरि में भी आंदोलन को ऐसी ही कामयाबी मिली थी। ये सब हालांकि अतीत के प्रसंग हैं जिन्हें पंद्रह से बीस वर्ष हो चुके हैं। बीते दसेक वर्षों में रेखांकित किए जाने लायक ज्यादा आंदोलनात्मक प्रयोग हमें नहीं मिलते क्योंकि संगठनों और आंदोलनों के बीच बातचीत का सिलसिला टूट चुका है। अफसोस की बात यह भी है कि ढिंकिया से लेकर दिल्ली तक आंदोलन-केंद्रित विचार-विमर्श की प्रक्रिया को मूर्त्त रूप देने वाले शिक्षाविद् अनिल चौधरी का पिछले साल हुआ निधन एक ऐसी जगह खाली कर गया है जिसे भरने वाला कोई आंदोलनकारी शिक्षक फिलहाल नहीं दिखता।

पर्यावरण की आड़ या तरकीब?
इसके बावजूद, एक बदलाव जरूर आया है जिसे रेखांकित किया जाना होगा। यह सकारात्मक है या नहीं, उससे इतर इस पर कुछ विवरण और बयान देखने योग्य हैं।
केन-बेतवा के आंदोलन से ही उदाहरण लेते हैं। यहां लड़ाई विशुद्ध मुआवजे की है। यानी गांववाले उचित पुनर्वास/पुनर्स्थापन लेकर परियोजना से समझौता करने को तैयार हैं। ओडिशा जैसा मामला नहीं है जहां समझौते की गुंजाइश ही न हो। इसके बावजूद नैगुवां गांव की 35 वर्षीय आदिवासी महिला शकुंतला सौर के जेहन में अपने जंगल की चिंता जरूर है। वे कहती हैं, ‘’जंगल हमें मिट्टी से लेकर खाने तक की सुविधा देता है। जंगल से हम लकड़ी, पत्तियां, महुआ, तेंदुपत्ता, औषधियां, शहद जैसे विभिन्न उत्पादों पर निर्भर रहते हैं लेकिन यह परियोजना हमारी जंगल पर निर्भरता और रिश्ता समाप्त कर देगी।‘’
उसी गांव के बावन साल के आदिवासी अंदु सौर एक कदम आगे बढ़कर कह रहे हैं, ‘’मेरी मांग है कि मुझे सरकार घर बनवा कर दे। साथ में जैसे मेरे संसाधन हैं वैसे मुझे संसाधन दे।‘’ यह बात भले नादान लगती हो, लेकिन अपने प्राकृतिक संसाधनों को उसी रूप में वापस मांगने वाले अंदू की भावना को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उस शोध से समझा जा सकता है जो उसने केन-बेतवा नदीजोड़ परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव पर किया था।
शोध निष्कर्ष के अनुसार इस परियोजना के कारण पन्ना बाघ अभयारण का एक बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाएगा जिससे बाघों के आवास क्षेत्र का करीब 10 फीसदी प्रत्यक्ष अनुमानित नुकसान होगा। बाघों के साथ-साथ अन्य वन्यजीव, जैसे चीतल, सांभर आदि खतरे में हैं। साथ ही 20 लाख पेड़ों का भी नुकसान होगा। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति की एक बैठक की कार्यवाही के अनुसार इस परियोजना के लिए करीब 46 लाख पेड़ काटे जाएंगे।
देहरादून के पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट में एनवायरमेन्टल क्वालिटी मॉनीटरिंग ग्रुप के निदेशक अनिल गौतम कहते हैं, ‘’कोई भी नदी तब तक नदी मानी जाती है जब तक उसका अपनी बहता रहता है। अगर पानी को एक जगह रोक दिया जाए तब पानी की गुणवत्ता भी खत्म होगी और जलीय जीव-जंतुओं पर भी खराब प्रभाव पड़ेगा। नदियां प्राकृतिक हैं। इसलिए केन-बेतवा नदियों को लिंक करना प्रकृति के विरुद्ध है। यदि हम प्रकृति के विरुद्ध जाएंगे तो स्वाभाविक है कि तमाम तरह के प्रभाव हमें झेलने पड़ेंगे।‘’
अमित भटनागर भी पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं, ‘’इस परियोजना में 46 लाख पेड़ों का काटा जाना, जंगल उजाड़ना, टाइगर रिज़र्व का बर्बाद होना, आदिवासी जनजीवन का नष्ट होना, यह सब बताता है कि यह परियोजना एक अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति पैदा करेगी।‘’
यानी, स्थानीय प्रभावित लोगों से लेकर आंदोलन के बौद्धिक नेतृत्व और वैज्ञानिक आदि तक, सभी की चिंता में कमोबेश पर्यावरण का सवाल केंद्र में है। यह बात अहम क्यों है?
आज से दसेक साल पहले जन आंदोलनों को जमीन के सवाल पर एकजुट और खड़ा करने का जो फैसला ढिंकिया सम्मेलन में लिया गया था और जिसने बाद में भूमि अधिग्रहण कानून के रद्द होने के रूप में अपना ठोस असर भी दिखलाया, वह साझा मुहावरा अब बदल कर पर्यावरण के इर्द-गिर्द केंद्रित होता जा रहा है। जल, जंगल और जमीन के आंदोलनों ने अपनी लड़ाई लड़ने के लिए पर्यावरण को बाईपास बनाने की भरसक कोशिश की है।
पिछले साल नवंबर में दिल्ली के इंडिया गेट पर कुछ छात्रों और युवाओं ने शहर की खराब हवा और प्रदूषण को लेकर एक प्रदर्शन किया था, लेकिन प्रदूषण का सवाल केवल एक आड़ निकला क्योंकि उन छात्रों के हाथों में मारे गए एक माओवादी कमांडर की तस्वीर वाले पोस्टर थे। जिस लड़की का बयान मीडिया में आया, उसने प्रदूषण के सवाल को असमान पूंजीवादी विकास के साथ जोड़ते हुए छत्तीसगढ़ में मारे गए माओवादियों का सवाल उठाया। दूषित हवा के बहाने दिल्ली में छत्तीसगढ़ का मुद्दा उठाने के लिहाज से यह तरकीब कारगर रही हो या नहीं, लेकिन इसने सत्ता के गलियारों में चर्चित खतरनाक सरकार विरोधी सवालों की सूची में पर्यावरण की भी जगह बना डाली।
कलकत्ते में नागरिक मंच चलाने वाले नबो दत्ता इसे ऐसे समझाते हैं, ‘’अगर हम लोग सीधा विस्थापन, संसाधन की लूट, कॉरपोरेट के मुनाफे, जमीन का मालिकाना, जैसी परंपरागत भाषा और मुहावरे में मुद्दों को उठाएंगे तो सरकार पूछेगी तुमसे क्या मतलब? और उठाकर जेल में डाल देगी। इसलिए सबसे सुरक्षित है कि हम लोग पर्यावरण के बहाने बात करते हैं। पर्यावरण पर बात करने से किसी को क्या दिक्कत है?”
रणकौशल के लिहाज से यह बात बेशक व्यावहारिक हो सकती है। दक्षिण ओडिशा के मुआवजा-विरोधी आदिवासी आंदोलन भी अब पर्यावरण दिवस के बहाने ही अपनी बात परचे से सार्वजनिक कर रहे हैं। यह नुस्खा हालांकि अब नजर में आ चुका है। बीती 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरणवादियों के खिलाफ आई एक खतरनाक टिप्पणी उन्हें विकास-विरोधी (और प्रकारांतर से राष्ट्रविरोधी) मान रही है। यानी, अब पर्यावरण का मुखौटा भी जन आंदोलनों के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है।
अंतिम मुखौटा भी गिर चुका…
सुप्रीम कोर्ट की उक्त टिप्पणी के विरोध में बीती 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस पर कर्नाटक, ओडिशा, उत्तराखण्ड, हरियाणा और राजस्थान के कुछ जमीनी आंदोलनकारी दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में जुटे। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। उक्त कॉन्फ्रेंस में आयोजकों, वक्ताओं और पत्रकारों को मिलाकर कुल 37 लोग उपस्थित थे।
इन आंदोलनकारियों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को लिखी एक चिट्ठी वहां जारी की जिसमें पर्यावरणीय कानूनों को नागरिकों के जीवन का अधिकार बताते हुए अदालत की टिप्पणी को आपत्तिजनक करार दिया गया है। इस चिट्ठी पर 340 व्यक्तियों के दस्तखत हैं। जाहिर है ये दस्तखत ऑनलाइन लिए गए होंगे। यानी जितने लोगों ने दस्तखत किए उनका दस फीसदी हिस्सा भौतिक रूप से कॉन्फ्रेंस में मौजूद था। स्थिति पर क्षोभ जताते हुए एक कार्यकर्ता जोसेफ हूवर ने कहा, ‘’मेरी बीवी कहती है कि तुम समय बरबाद कर रहे हो और सरकार कहती है कि तुम राष्ट्रविरोधी हो।‘’
यह बिलकुल वही समय था जब सर्वोच्च अदालत की कॉक्रोच वाली टिप्पणी पर सत्ता के गलियारों में तूफान मचा हुआ था। ध्यान देने वाली बात यह है कि कॉक्रोच वाली टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 15 मई को की थी जबकि पर्यावरण कार्यकर्ताओं के खिलाफ टिप्पणी उन्होंने 11 मई को की थी। इन चार दिनों के बीच केन-बेतवा का इलाका इतना गरमा चुका था कि महीने भर पहले अहिंसक सत्याग्रह कर रहे लोग मजबूर होकर हिंसा पर उतर आए थे। छतरपुर में 13-14 मई को जब परियोजना का अतिक्रमण हटाओ दस्ता इलाका खाली करवाने पहुंचा तो लोगों ने पुलिस प्रशासन पर पत्थरबाजी की, अधिकारियां से भिड़ गए और तहसीलदार की गाड़ी को तोड़ दिया।
केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ लोगों का महीने भर के अंतराल पर पहले अहिंसक सत्याग्रह और फिर हिंसक प्रतिक्रिया, दोनों ही राष्ट्रीय सुर्खियों से बाहर रहे। इस बीच एक ही अदालत से, एक ही व्यक्ति के मुंह से निकली दो टिप्पणियों में एक खबर नहीं बन सकी, जबकि दूसरी लगातार सुर्खियों में है। जो टिप्पणी खबर नहीं बन सकी, उसका लेना-देना केन-बेतवा जैसे तमाम परियोजना-विरोधी आंदोलनों से है।
क्या यह संयोग है कि पर्यावरण दिवस के ठीक अगले ही दिन दिल्ली का जंतर-मंतर कॉक्रोच वाली टिप्पणी से आहत लोगों से आबाद होने जा रहा है?
(दिल्ली से अभिषेक श्रीवास्तव के योगदान के साथ)


