नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा इस बार केवल किसी व्यक्ति को सम्मानित किए जाने की खबर नहीं है। यह पुरस्कार ऐसे समय में आया है जब दुनिया में युद्ध, नस्ली हिंसा, सामूहिक हत्याओं और मानवाधिकारों के उल्लंघन के बीच अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता लगातार चुनौती के कठघरे में है। इस संदर्भ में दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद् नवि पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया जाना विशेष अर्थ रखता है, चूंकि उनका सार्वजनिक जीवन सत्ता के समक्ष कानून और मनुष्य की गरिमा को खड़ा करने की कोशिशों का इतिहास है।
नवि पिल्लै ने पुरस्कार की सूचना मिलने पर जो पहला सवाल किया, वह शायद इस घटना से जुड़ी सबसे महत्त्वपूर्ण पंक्ति है: ‘क्या यह सच है?’ फिर, जब उनके काम के संदर्भ में उनके साहस की प्रशंसा की गई तो उन्होंने पलट कर सवाल किया- ‘सच बोलने के लिए साहस की जरूरत क्यों होनी चाहिए?’ उनका यह सवाल जितना सरल दिखता है, उतना ही ज्यादा असुविधाजनक है।
एक सभ्य समाज में सच बोलना साहस का काम नहीं होना चाहिए। कानून के सामने तथ्य रखना, युद्ध अपराध को युद्ध अपराध कहना, मानवाधिकारों के उल्लंघन को उल्लंघन कहना और राज्य की शक्ति के सामने पीड़ित के पक्ष में खड़ा होना तो सामान्य नैतिक और कानूनी व्यवहार होना चाहिए। पर सत्ता अगर इतनी शक्तिशाली हो जाए कि उसके सामने सच बोलने वाला व्यक्ति ही जोखिम में पड़ जाए, तब सच अपने आप में एक साहसिक प्रतिरोध बन जाता है। नवि पिल्लै का जीवन इसी प्रतिरोध का एक लंबा दस्तावेज है।
‘सच कहने के साहस’ का सफर
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में नेल्सन मंडेला सहित तमाम रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ताओं का मुकदमा लड़ने से लेकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों तक पिल्लै की यात्रा केवल एक न्यायविद् की पेशेवर यात्रा नहीं रही। उन्होंने उस व्यवस्था को भीतर से देखा जिसमें कानून का इस्तेमाल समानता को सुनिश्चित करने के बजाय लोगों को नस्ल के आधार पर विभाजित करने के लिए किया जाता था।
बाद में वे दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय की न्यायाधीश बनीं, फिर रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आइसीटीआर) और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आइसीसी) में न्यायाधीश रहीं तथा 2008 से 2014 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (ओएचसीएचआर) के पद पर कार्य किया। उनकी इन सभी भूमिकाओं को एक सूत्र में बांधने वाली बात यह है कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून को केवल पुस्तकों, संधियों और संस्थागत दस्तावेजों का विषय नहीं माना। उनके लिए कानून का अंतिम उद्देश्य मनुष्य की रक्षा करना था।
रवांडा का नरसंहार हो या युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध हों या जनसंहार, पिल्लै का आग्रह रहा कि अपराधी की राजनीतिक ताकत उसके अपराध को वैध नहीं ठहरा सकती। यही बात अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था के लिए सबसे कठिन परीक्षा भी है। कानून तब तक आसान है जब तक आरोपित पक्ष कमजोर हो। कानून की असली परीक्षा तब होती है जब आरोपित के पास सेना हो, आर्थिक ताकत हो, राजनयिक प्रभाव हो और उसके पीछे एक शक्तिशाली राष्ट्र खड़ा हो।
गाज़ा पर संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग की अध्यक्ष के रूप में नवि पिल्लै की भूमिका ने उन्हें एक बार फिर उसी कठिन प्रश्न के सामने ला खड़ा किया- कि किसी घटना का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा के आधार पर किया जाए या अंतरराष्ट्रीय कानून के स्थापित मानकों के आधार पर? उनकी अध्यक्षता वाले इस आयोग की 2025 की रिपोर्ट ने गाज़ा में इजरायली कार्रवाई को ‘जनसंहार’ के रूप में परिभाषित किया।
नवि पिल्लै की अध्यक्षता वाले आयोग की गाज़ा पर 2025 की रिपोर्ट
a-hrc-60-crp-3स्वाभाविक रूप से, इस निष्कर्ष के साथ तीखा राजनीतिक विवाद जुड़ा। दूसरी ओर कुछ लोग उनके ‘साहस’ की प्रशंसा भी कर रहे थे, जिस पर पिल्लै को आश्चर्य था कि सच बोलने के लिए आखिर साहस की जरूरत क्यों होनी चाहिए। दरअसल, यह प्रश्न केवल नवि पिल्लै का नहीं है। यह आज की पूरी विश्व-व्यवस्था का केंद्रीय प्रश्न है।
नूरेम्बर्ग की विरासत पर खतरा
नवि पिल्लै को जब नोबेल पुरस्कार दिए जाने की सूचना मिली उस समय वे नूरेम्बर्ग में थीं- वही नूरेम्बर्ग जहां हिटलर के नेतृत्व वाले नाज़ी शासन के किए अपराधों के लिए प्रमुख युद्ध अपराधियों के खिलाफ मुकदमे चले थे। गोया इतिहास एक क्षण के लिए वर्तमान के सामने आ खड़ा हुआ हो!
नूरेम्बर्ग का सबसे बड़ा सबक यह है कि मानवता के विरुद्ध अपराधों को राष्ट्रीय संप्रभुता की आड़ में नहीं छुपाया जा सकता। यदि कोई राज्य अपने नागरिकों या किसी दूसरे समुदाय के साथ अमानवीय व्यवहार करता है तो दुनिया यह नहीं कह सकती कि यह उसका आंतरिक मामला है। इसी सबक ने आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय की अवधारणा को मजबूत किया।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया ने यह मानने की कोशिश की थी कि शक्ति के ऊपर कुछ सार्वभौमिक नियम लागू होने चाहिए। नूरेम्बर्ग न्यायाधिकरण इस विचार का एक ऐतिहासिक प्रतीक था। उसका संदेश था कि राज्य की शक्ति किसी व्यक्ति को मानवता के विरुद्ध अपराध करने का अधिकार नहीं देती; अपराधी का यह कहना कि ‘मैं केवल आदेश का पालन कर रहा था’ उसके अपराध से बचने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता; युद्ध जीतने वाला ही न्याय का अंतिम निर्णायक नहीं हो सकता।
विडम्बना है कि आज नूरेम्बर्ग की यह विरासत खतरे में है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बनी सार्वभौमिक कानूनी व्यवस्था दबाव में है। यह इत्तेफाक नहीं है कि बीते शुक्रवार को नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा में पिल्लै का नाम सार्वजनिक किए जाने के कुछ घंटे बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने आइसीसी पर बंदिशें लगाते हुए उससे अपने हाथ खींच लिए।
मुखौटा गिर चुका है: शासक की निजी डिजिटल जागीर बनते जा रहे देश और नागरिक के सवाल पर
ट्रम्प प्रशासन लंबे समय से आइसीसी के खिलाफ रहा है। आइसीसी को युद्ध अपराधों की सुनवाई के लिए 2002 में बनाया गया था। ट्रम्प के पहले कार्यकाल में अमेरिकी प्रशासन इसके जजों और वकीलों पर प्रतिबंध लगा चुका है, जिसे बाद में जो बाइडेन के प्रशासन ने पलट दिया था। जनवरी 2025 मं दूसरा कार्यकाल शुरू होते ही वाशिंगटन ने आइसीसी पर नए प्रतिबंध लगाए, लेकिन बीते शुक्रवार का अमेरिकी कदम इस मायने में खास रहा कि उसने उन कंपनियों को ही दंडित कर दिया जो आइसीसी को अपनी सेवाएं देती हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का बयान आया, ‘राष्ट्रपति ट्रम्प कभी भी अमेरिकियों के ऊपर दंड लगाने की छूट आइसीसी को नहीं देंगे… हम इस बागी अदालत के साथ अपना लेनदेन खत्म करते हैं, उसके संसाधनों को बाधित कर रहे हैं ताकि वह आगे काम न कर पाए।‘
दरअसल, अमेरिका को आइसीसी से इसलिए दिक्कत है क्योंकि इस अदालत ने युद्ध अपराधों के लिए जिन 70 नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी के वारंट निकाले हैं उनमें इजरायली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू सहित इजरायली अफसर भी शामिल हैं; साथ ही अफगानिस्तान में की गई कार्रवाइयों के लिए अमेरिकी सैनिकों की जांच के आदेश भी हैं। नवि पिल्लै इसी अदालत के अपीली प्राधिकरण की अण्ध्यक्ष 2003 से 2008 तक रही थीं। लिहाजा ट्रम्प का इस अंतरराष्ट्रीय संस्था से खार खाना और पिल्लै को मिले नोबेल पर भड़कना समझा जा सकता है।
इसी परिप्रेक्ष्य में नोबेल पुरस्कार की समिति ने शांति पुरस्कार की घोषणा करते हुए अंतरराष्ट्रीय कानून पर बढ़ते दबाव और कानूनी संस्थाओं पर हो रहे हमलों की ओर स्पष्ट संकेत किया। समिति ने चेतावनी दी कि जब शक्ति कानून पर भारी पड़ने लगे तो विश्व में स्थिरता, विश्वास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व कमजोर होता है।
यह टिप्पणी केवल किसी एक देश या सरकार के लिए नहीं है। इसका दायरा कहीं व्यापक है। दुनिया में बड़ी शक्तियां जब अपने हितों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या करने लगती हैं, तब कानून सार्वभौमिक न रहकर शक्तिशाली देशों का औजार बनने लगता है। फिर उसका असर देशों के घरेलू कानून पर भी पड़ता है जहां शीर्ष न्यायपालिका को निर्वाचित विधायिका या एक राष्ट्राध्यक्ष द्वारा हांका जाने लगता है।
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समस्या यहीं से शुरू होती है। यदि युद्ध अपराध तब अपराध माना जाय जब कोई कमजोर देश उसे करता है, लेकिन किसी शक्तिशाली देश के लिए वही कार्रवाई ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ कहलाने लगे तब अंतरराष्ट्रीय कानून की नैतिक वैधता समाप्त होने लगती है। यदि एक देश पर आर्थिक प्रतिबंध और दूसरे पर मौन, एक देश के नागरिकों के लिए मानवाधिकार और दूसरे के लिए भूराजनीतिक हित, इस दासेहरे चश्मे से कानून को देखा जाने लगे तब दुनिया किस आधार पर यह दावा कर पाएगी कि कानून सबके लिए समान है?
सम्मान का संदर्भ और महत्त्व
नवि पिल्लै का सम्मान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने इस दोहरेपन के बीच कानून की सार्वभौमिकता पर लगातार जोर दिया। उन्हें मिला पुरस्कार गाज़ा पर कोई अंतिम न्यायिक फैसला नहीं है; नोबेल समिति का निर्णय किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय भी नहीं है; नवि पिल्लै की अध्यक्षता वाले आयोग की रिपोर्ट भी न्यायालय के अंतिम फैसले के समान नहीं है; लेकिन इन संस्थाओं और प्रक्रियाओं के बीच फर्क करते हुए भी एक बात स्पष्ट है- गाज़ा में नागरिकों की पीड़ा, युद्ध के दौरान मानवाधिकारों का उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के प्रश्नों को राजनीतिक सुविधा के कारण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यही वह जगह है जहां पत्रकारिता, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका सामने आती है। किसी भी संघर्ष में सबसे आसान काम पक्ष चुन लेना है। कठिन काम तथ्यों की जांच करना और हर पक्ष पर एक ही नैतिक तथा कानूनी कसौटी लागू करना है। नवि पिल्लै का महत्त्व इसी कठिन रास्ते में है। उन्होंने किसी सरकार की लोकप्रियता या किसी राजनीतिक विचारधारा की सुविधा को न्याय का पैमाना नहीं बनाया। उनका आग्रह रहा कि अपराध का मूल्यांकन अपराध की प्रकृति से होना चाहिए, अपराधी की ताकत से नहीं।
इसीलिए उनके पुरस्कार को केवल गाज़ा के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह पुरस्कार उन सभी लोगों के लिए एक संदेश है जो सत्ता और कानून के संबंध को लेकर चिंतित हैं। लोकतंत्र में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन कानून की विश्वसनीयता बनी रहनी चाहिए। सरकारें आती-जाती हैं, राष्ट्राध्यक्ष बदलते हैं, गठबंधन बनते-बिगड़ते हैं, लेकिन मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता का सिद्धांत राजनीतिक मौसम के साथ नहीं बदल सकता।
नवि पिल्लै का जीवन इस बात का उदाहरण है कि कानून की रक्षा केवल न्यायालयों में नहीं होती। उसकी रक्षा सार्वजनिक जीवन में भी करनी पड़ती है। जब बहुसंख्यक किसी अल्पसंख्यक के अधिकारों को कुचलना चाहें, जब राष्ट्रवाद मानवता से बड़ा बना दिया जाए, जब युद्ध को हर प्रश्न का उत्तर समझ लिया जाए या जब राज्य की आलोचना को देशद्रोह कहा जाने लगे, तब कानून की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
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उनका यह पूछना कि ‘सच बोलने के लिए साहस क्यों चाहिए?’, हमारे समय के लिए शायद नोबेल पुरस्कार से भी बड़ा संदेश है क्योंकि सच की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि वह हमेशा अज्ञात रहता है। कई बार सच सामने होता है, लेकिन उसे स्वीकार करने की राजनीतिक कीमत बहुत बड़ी होती है। तब समाज धीरे-धीरे ऐसे शब्द गढ़ता है जिनसे हिंसा को सभ्य बनाया जा सके- बमबारी को सुरक्षा, कब्जे को व्यवस्था, सामूहिक दंड को प्रतिरोध, विस्थापन को रणनीति और नागरिकों की मौत को ‘साइड इफेक्ट’ कहा जाने लगता है।
भाषा के बदलते ही नैतिकता भी बदलने लगती है। नवि पिल्लै इस बदलती हु्ई भाषा के विरुद्ध खड़ी दिखाई देती हैं। उनका आग्रह है कि अपराध को उसके सही नाम से पुकारा जाए। शायद यही कारण है कि उनके लिए साहस कोई विशेष गुण नहीं, बल्कि न्याय के प्रति सामान्य प्रतिबद्धता का हिस्सा है।
नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद डोनाल्ड ट्रंप का उल्लेख करते हुए पिल्लै की टिप्पणी इस संदर्भ में अर्थपूर्ण थी। उन्होंने कहा कि यदि तालियां थोड़ी और बजें तो शायद वे यह पुरस्कार ट्रंप के साथ साझा कर देंगी। यह एक क्षणिक हास्य था, लेकिन इसके पीछे उस समय की विडंबना भी थी जिसमें शांति पुरस्कार की आकांक्षा रखने वाले राजनीतिक नेता और अंतरराष्ट्रीय कानून की कसौटी पर सवालों के घेरे में आने वाली शक्तियां एक ही वैश्विक मंच पर मौजूद हैं।
व्यक्ति नहीं, सिद्धांत का सम्मान
नोबेल शांति पुरस्कार की अपनी सीमाएं हैं। उसका इतिहास भी विवादों से मुक्त नहीं है। पुरस्कार देना दुनिया में शांति स्थापित नहीं करता और न ही किसी व्यक्ति के निष्कर्ष अपने आप अंतिम सत्य बन जाते हैं, लेकिन कभी-कभी पुरस्कार किसी व्यक्ति से अधिक उस सिद्धांत को सम्मानित करता है जिसका वह व्यक्ति प्रतिनिधि बन जाता है। नवि पिल्लै के मामले में वह सिद्धांत है- कानून की सार्वभौमिकता और मनुष्य की गरिमा! आज दुनिया को इसकी जरूरत पहले से अधिक है।
जब युद्धों की संख्या बढ़ रही हो, जब विस्थापन सामान्य होता जा रहा हो, जब नागरिकों की हत्या को भूराजनीतिक गणित में बदल दिया जाता हो और जब शक्तिशाली राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अपनी सुविधा के अनुसार स्वीकार या अस्वीकार करते हों, तब शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति का नाम नहीं रह जाती। शांति के लिए न्याय चाहिए, जवाबदेही चाहिए और ऐसा कानून चाहिए जो कमजोर और शक्तिशाली के बीच फर्क न करे।
भ्रमित नैतिकता और खंडित नागरिकता के इस दौर में अरस्तू कैसे प्रासंगिक हैं
नवि पिल्लै का नोबेल पुरस्कार इसी बुनियादी सत्य की याद दिलाता है। और शायद उनके अपने शब्दों में इसका सबसे संक्षिप्त अर्थ यही है- सच बोलना साहस का काम क्यों हो? जिस दिन किसी समाज में यह सवाल पूछना ही अनावश्यक हो जाएगा, उस दिन शायद हम सचमुच एक न्यायपूर्ण दुनिया के करीब होंगे। तब किसी न्यायविद् को युद्ध अपराध को युद्ध अपराध कहने, जनसंहार को जनसंहार कहने या पीड़ित मनुष्य के पक्ष में खड़े होने के लिए असाधारण साहस की जरूरत नहीं होगी।
तब कानून सचमुच कानून होगा और शक्ति, शक्ति भर होगी। नोबेल पुरस्कार का वास्तविक अर्थ भी शायद इसी अंतर को बचाए रखना है।