एदुआर्दो गालेआनो की किताब ‘ओपेन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका’ जितनी प्रेरणा देती है उतना ही बेचैन करती है। यह किताब लैटिन अमेरिका में निष्कर्षक पूंजीवाद की उत्पत्ति की गवाह है, जिसकी जड़ में उस धरती के संसाधनों, श्रम और लोकसंपदा का शोषण निहित है। यह किताब एक अपशकुन का संदेश लेकर आती है, कि धरती से उपजा धन प्राय: अपने लोगों की गरीबी का कारण बन जाता है।
भारत में खनन और धातु उत्पादन की कहानी भी ऐसी ही है जिसने जमीन की लूट, पारिस्थितिकी के विनाश और लोगों की बदहाली को चरम पर पहुंचा दिया है। पूर्वी भारत के विशाल इलाके ‘खनिजों के शाप’ तले रेंग रहे हैं। कच्चे लोहे, कोयले और क्रोमाइट की प्रचुरता ने इन इलाकों को खनन कंपनियों और महाकाय स्टील कंपनियों का सबसे पसंदीदा ठिकाना बना दिया है। इसने वहां के कुछ खास समुदायों को, उनके मानव और लोकतांत्रिक अधिकारों को पूरी तरह से हाशिये पर डाल दिया है।
आम तौर पर ऐसा होता है कि जब आदिवासी अपनी जमीनें गंवाते हैं तो उनके पुनर्वास व पुनर्स्थापन को लेकर बहुत हल्ला मचता है, पर उनकी अगली पीढ़ी का क्या हुआ इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। इस संदर्भ में 2 जनवरी 2006 को जाजपुर के कलिंगनगर में हुआ नरसंहार कुख्यात है जिसमें 13 आदिवासी मारे गए थे। आज कलिंगनगर नरसंहार को बीस साल बीत चुके हैं। आदिवासियों और दलितों की अगली पीढ़ी अब भी टाटा स्टील के कलिंगनगर संयंत्र के गेट पर उन नौकरियों और मकानों के लिए जमीनों की मांग लेकर इकट्ठा होती है जिसका उनसे वादा किया गया था।
बीस साल पहले : 2/1/2006
उस दिन ओडिशा के इंडस्ट्रियल इनफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (इडको) के अफसरों के साथ स्थानीय प्रशासन वहां टाटा स्टील के लिए जमीन समतल करने पहुंचा था। इडको ने कंपनी को वह जमीन खरीद मूल्य से कोई दस गुना कीमत पर बेची थी, इसलिए गांववाले मुआवजे की दूसरी राशि पर मोलभाव करने वहां एक ज्ञापन लेकर पहुंचे। मौके पर बर्बर पुलिस फायरिंग हुई।
(इस फायरिंग की जड़ में 9 मई, 2005 की एक अहम घटना है। कलिंगनगर नरसंहार से आठ महीने पहले महाराष्ट्र सीमलेस कंपनी इडको के माध्यम से अधिग्रहित जमीन का जब भूमिपूजन करने जा रही थी उस वक्त वहां के पट्टाधारकों ने उसका विरोध किया था। उन्हें बर्बर पुलिसिया हिंसा का शिकार होना पड़ा था। इस घटना में दो पुलिसवाले जख्मी हुए और कथित रूप से तीन ग्रामीण मारे गए थे, जिनमें दो बच्चे शामिल थे। यही वह घटना थी जिसने पुलिस-प्रशासन और आदिवासियों के बीच पहले से गहराते अविश्वास को ओर पुख्ता कर दिया। उसी साल 17 नवंबर को लोगों ने महाराष्ट्र सीमलेस स्टील का निर्माण कार्य रुकवा दिया। उसके बाद से 2 जनवरी की गोलीबारी तक वहां कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ – संपादक)।
पूरे घटनाक्रम के लिए देखें पीयूसीएल की कलिंगनगर पर रिपोर्ट
pucl-police-firing-at-kalinganagarकलिंगनगर फायरिंग के खिलाफ देश भर में प्रदर्शन हुए। ग्रामीणों ने राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम कर दिया और पूरे 14 महीने तक धरने पर बैठे रहे। अंतत:, उन 13 शहीदों और सैकड़ों तबाह लोगों की कुरबानी ने ओडिशा सरकार को 2006 की पुनर्स्थापन और पुनर्वास नीति बनाने पर बाध्य किया। इसके बाद पुनर्वास की शर्तों पर लोगों को राजी करने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए गए। उन्हें डराया-धमकाया गया। कंपनी ने लोगों पर दबाव डालने के लिए एनजीओ और दलालों को काम पर लगाया और आकर्षक प्रस्ताव भिजवाए। यह सब कुछ भारी पुलिस तैनाती के बीच होता रहा जबकि कुछ लोग अब भी विरोध में जुटे हुए थे। फिर, दमन का एक और चक्र चला। आश्चर्य नहीं कि मारे गए आदिवासियों की स्मृति में बनाए गए शहीद स्मारक बीरभूमि में कुछ और शहीदों की शिलाएं जोड़नी पड़ीं।
जमीनी स्तर पर समुदाय के भीतर एजेंटों और दलालों ने फूट डालने का काम किया। कुछ आदिवासी बताते हैं कि कैसे उन्हें परंपरागत आदिवासी पोशाक पहनाकर विरोध कर रहे आदिवासियों पर उनसे हमला करवाया गया ताकि दिखाया जा सके कि आदिवासी खुद ही औद्योगीकरण चाहते हैं। इस तरीके से समुदाय को कंपनी-समर्थक और कंपनी-विरोधी के दो खेमों में बांट दिया गया। लोग इन साजिशों को अब समझ चुके हैं। आज स्थिति यह है कि जिनके ऊपर कंपनी-समर्थक का ठप्पा लगा है, उन्हें भी इस बात का एहसास है कि कैसे दलालों ने उनका इस्तेमाल उन्हीं के भाई-बंधुओं के खिलाफ किया था।
जिनका पुनर्वास हुआ भी, जैसे पुनर्वास कॉलोनी में बसे लोग, उनकी मुश्किलें इतनी बढ़ गई हैं कि उनके भीतर गहरा असंतोष पल रहा है। गोबरघाटी के पूर्व सरपंच बताते हैं कि वे टाटा कंपनी के सबसे शुरुआती समर्थकों में से एक थे। इसलिए जब विरोध प्रदर्शन अपने चरम पर पहुंचे, तब तक वे लोग अपने आदिवासी नेताओं को यह नहीं बता सके कि जमीनें देने के लिए वे राजी हो गए थे। नतीजतन, महीनों तक वे छुपते रहे। आज जब उन्हें खुद को हुए नुकसान का एहसास होता है, तब वे सोचते हैं कि आखिर वे दलाल कहां गायब हो गए जिन्होंने जमीनें छोड़ने के लिए उन्हें मनाने में इतना पैसा कमाया था।
अब तो न वे धान उगाने की स्थिति में हैं, न ही चावल खरीद पा रहे हैं। जंगलों को तो पहले ही साफ किया जा चुका था। उन्हें अपने भविष्य का कोई अंदाजा नहीं है कि आगे क्या होगा। इस बीच जो बच्चे बड़े हुए, उन्होंने अपने परिवारों को रहमतों पर पलते हुए देखा है, जब हर जरूरत के लिए ये परिवार कंपनी पर ही निर्भर रहे। इनमें कई ऐसे परिवार भी हैं जो जिंदल और नीलांचल इस्पात निगम लिमिटेड (एनआइएनएल) के संयंत्रों के कारण विस्थापित हुए थे (एनआइएनएल एक सार्वजनिक उपक्रम था जिसके लिए प्रशासन ने यहां 1997 में जमीन अधिग्रहित की थी)।
इस दौरान टाटा स्टील ने अपनी उत्पादन क्षमता को तीन एमटीपी से बढ़ाकर छह और अब आठ एमटीपी कर लिया है। सितम्बर 2016 के बाद से कंपनी ज्यादा से ज्यादा जमीनें कब्जाये जा रही है। इसके लिए वह बलप्रयोग कर रही है। उसके बाद से ही लोग जिला प्रशासन और पुलिस के पास भागदौड़ कर रहे हैं, लेकिन कुछ भी काम नहीं आ रहा। कंपनी की हिंसक विस्तार योजना का पता चारदीवारी के निर्माण से लगता है, जिसे रामराय जारिका, मनोज बनार, सिकंदर बनार और सिनी सोय ने चुनौती दी थी क्योंकि कंपनी वन की जमीन पर दावा कर रही थी। इस याचिका पर एनजीटी की पूर्वी पीठ ने 8 फरवरी 2017 को टाटा स्टील को एक नोटिस भेजा। इसके बाद 2017 में पूरे साल बालीगोठो गांव के लोगों को प्रताड़ना झेलनी पड़ी। प्रशासन ने गांव के बचे-खुचे मकानों को भी तोड़ डाला।
देश जब अपना 70वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, तब यह इलाका मानसून की भारी वर्षा और जबरदस्त पुलिस तैनाती के बीच कराह रहा था। आदिवासियों की आंखों के सामने ही उनके घर तोड़े जा रहे थे। कुछ महीने बाद ही कलिंगनगर नरसंहार पर बने सरकारी जांच आयोग की रिपोर्ट आई।


जांच आयोग की क्लीन चिट और आगे
ओडिशा सरकार ने 2 जनवरी, 2006 की पुलिस फायरिंग की जांच के लिए बनाए गए पी.के. मोहन्ती आयोग की रिपोर्ट 14 दिसंबर 2017 को सदन में रखी। घटना की बारहवीं बरसी से ठीक पहले आई इस रिपोर्ट का निष्कर्ष यह था कि प्रदर्शन के दौरान किए गए ‘बलप्रयोग की मात्रा’ न्यायसंगत थी क्योंकि हालात ही ऐसे थे जहां लाठी, कुल्हाड़ी, तीर, धनुष लिए हजारों आदिवासी चारदीवारी के निर्माण को रोकने के लिए इकट्ठा हो गए थे।
आयोग की विद्वत राय में आदिवासियों के ये ‘हथियार जानलेवा’ थे। इस रिपोर्ट से ऐसा लगता है कि वहां तैनात आधुनिक हथियारों से सुसज्जित 12 प्लाटून पुलिस को भी आक्रामक प्रदर्शनकारियों के समक्ष ‘आत्मरक्षा’ करनी पड़ी। जांच आयोग जनता के खिलाफ किए गए सरकारों के अपराधों पर कैसे परदा डाल देते हैं, यह उसका विशिष्ट उदाहरण है। दिलचस्प है कि रिपोर्ट में सरकार और बाकी ताकतों को बरी किए जाने के अगले ही साल टाटा स्टील के उत्पादन में गुणात्मक उछाल आ गई।
फिर टाटा स्टील ने कलिंगनगर में भारत का सबसे बड़ा ब्लास्ट फर्नेस लगाया और संयंत्र की उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर प्रतिवर्ष आठ एमटीपी कर दिया। इसके बाद कंपनी दूसरे चरण की विस्तार योजना में जुट गई, जिसकी लागत 27,000 करोड़ रुपये थी। टाटा स्टील ने 4 जुलाई 2022 को सरकारी उपक्रम एनआइएनएल का अधिग्रहण किया। इस संदर्भ में उसकी प्रेस विज्ञप्ति कहती है कि उसकी योजना केवल उस स्टील संयंत्र को चालू करने की ही नहीं है, बल्कि उसकी उत्पादन क्षमता 2030 तक एक एमटीपी से बढ़ाकर 10 एमटीपी करने की भी है।
एनआइएनएल के कर्मचारियों की हालत तो कोरोना महामारी के आते ही गंभीर हो गई थी। मार्च 2020 के अंत में कंपनी के ठप होने के चलते हजारों कर्मचारियों की किस्मत अधर में लटक गई थी। उन्हें फरवरी मध्य तक का ही वेतन मिला था। उस वक्त कोई नहीं जान रहा था कि इस सार्वजनिक उपक्रम की मौत होने वाली है और उसे जल्द ही टाटा स्टील खरीदने वाला है। इस काम को महामारी ने आसान बना दिया। नतीजतन, हजारों वेतनभोगी कर्मचारियों, ठेका कर्मचारियों और भूमिहीनों की माली हालत और बदतर हो गई।
इस स्थिति को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि महामारी से कोई पांच साल पहले ही समूचे कलिंगनगर औद्योगिक परिसर में 25000 कर्मचारियों की नौकरी जा चुकी थी। उनमें 5000 नियमित कर्मचारी थे। एक समाचार रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2015 के अंत तक टाटा स्टील लिमिटेड में करीब 36108 ठेका मजदूर और 2,602 नियमित कर्मचारी कार्यरत थे। मार्च 2016 तक वहां 17699 ठेका मजदूर और 2682 नियमित कर्मचारी कार्यरत रह गए। एनआइएनएल के मामले में तो यह हुआ कि सिलसिलेवार लॉकडाउन के चलते मजदूर भुखमरी के कगार पर पहुंच गए। जब 31 मई को लॉकडाउन की पाबंदियां उठाई गईं तो अपने वेतन की मांग करते हुए हजारों मजदूर सड़क पर उतर आए।
तीन महीने से वेतन नहीं पाए कुल 10,000 के कार्यबल वाले इस सार्वजनिक उपक्रम में व्याप्त गहरे संकट की तस्वीर हमें एआइएनएल के उस तकनीशियन और शिफ्ट प्रभारी में दिख सकती थी, जो अपने परिवार को जिंदा रखने के लिए सड़क किनारे सब्जी बचने को मजबूर था। ठेका मजदूरों में तो भयंकर असंतोष था। जैसे-जैसे कंपनी के विनिवेश की आशंका करीब आती गई, श्रमिकों के भुगतान या उनके प्रति जवाबदेही की संभावना अपने आप खत्म होती चली गई। प्रगति और कामयाबी की राष्ट्रव्यापी दास्तान का यह अदृश्य और शैतानी चेहरा था।
टाटा स्टील के विस्तार के लिए किए गए जोर-जबर और आतंक का उदाहरण गादपुर गांव है, जो टाटा और जिंदल के कारखानों के बीच पड़ता है। जमीन हड़पने की कोशिश के चलते गादपुर के लोगों ने अपनी जमीनें खुद छोड़ दीं। यहां 2017-18 के दौरान भाड़े के गुंडे यहां-वहां आगजनी करते, सड़क को बाधित करते या फिर कुओं और जलस्रोतों में कचरा और पत्थर फेंक देते थे। बाद में गांव के सुरेंद्र कुमार हेब्रू को आरटीआइ से सूचना प्राप्त हुई कि इस गांव की जमीन वास्तव में टाटा को आवंटित ही नहीं की गई थी। आज इस गांव को बाहरी दुनिया से जोड़ने वाली मुख्य सड़क बंद पड़ी हुई है। जिन लोगों की जमीनें गांव के भीतर हैं, वे अब भी वहां जमे हुए हैं।
गादपुर के भूमिहीनों को एक एकड़ जमीन और एक लाख रुपये देने का वादा किया गया था। उन्होंने काफी लंबे समय तक उसका इंतजार किया। फिर सुनील गगराय जैसे कई भूमिहीन आदिवासी गांव छोड़ने को बाध्य हो गए। सुनील याद करते हैं कि 2006 के बाद जिंदल जब वहां प्लांट लगा रहा था, तभी से कंपनी ने स्थानीय समुदायों के बीच से दलालों की भर्ती शुरू कर दी थी ताकि परिवार स्वेच्छा से अपने घरों की जमीनें छोड़ दें (कुछ बिना मुआवजे के ही)। यहां 2010 में तनाव अपने चरम पर पहुंचा जब एक साझा गलियारा (कॉमन कॉरिडोर) बनाने के बहाने पुलिस और भाड़े पर लाये गए गुंडों ने जबरदस्त हिंसा की। कंपनी ने जमीन खाली करवाने के बदले दलालों को हर परिवार के हिसाब से 15000 रुपये दिए (वर्षा प्रियदर्शिनी और दिवंगत चित्तरंजन बेहरा के साथ 17 फरवरी, 2019 को हुई यात्रा के नोट्स से उद्धृत)। गगराय और कुछ अन्य परिवारों ने घुटने नहीं टेके।
जिन लोगों ने प्रतिरोध किया या पुनर्वास नीति को लागू करने की मांग की, उन्हें खासकर निशाना बनाया गया। जब धमकियों, बलप्रयोग और पुलिस के लगाये फर्जी मुकदमों की अति हो गई, तो दबाव को बरदाश्त न कर पाने के कारण उन्होंने 2013 में अपनी जमीन छोड़ दी, हालांकि कानूनी लड़ाई में उन्होंने अब तक हार नहीं मानी है। ये परिवार लगातार यह दलील देते रहे हैं कि भले ही उनके पास वनभूमि का पट्टा नहीं है, लेकिन वह जमीन वनाधिकार कानून के तहत संरक्षित है।
ऐसे ही एक अकेले योद्धा हैं शम्भू मोहन्ता, जिन्हें अप्रैल 2010 में उनका गांव कालामटिया छोड़ने को बाध्य किया गया जब साझा गलियारे के निर्माण के दौरान पुलिसिया हिंसा चरम पर पहुंची। उन्हें टाटा स्टील में 2500 रुपये मासिक पर रखवाली का मामूली काम दिया गया था, लेकिन जब उन्होंने अपनी मांगें उठानी शुरू कीं तो उन्हें बरखास्त कर दिया गया। फिर उन्होंने अदालत में एक रिट याचिका लगाई और विस्थापित परिवारों को लेकर दरख्वास्त डाली। उनके मुताबिक लाभार्थी परिवारों की सूची में घपला किया गया था और उस सूची में से उनका नाम गायब था। इस तरह के कई भूमिहीन परिवार हैं जिनके नाम या तो जान-बूझ कर या किसी गलती के कारण सूची में नहीं आए हैं।
आयोग द्वारा 2006 के नरसंहार के लिए पुलिस को बरी कर दिए जाने के बाद टाटा द्वारा वनभूमि के गैरकानूनी अधिग्रहण और बचे-खुचे मकानों को ध्वस्त किए जाने से लोगों का आक्रोश और दुख बहुत ज्यादा बढ़ गया था। जिला प्रशासन के सामने रखी गईं तमाम याचिकाएं बेकार साबित हो रही थीं। तभी, 2018 की शुरुआत में एक घटना घटी जिससे विरोध की चिंगारी भड़क गई, जब टाटा स्टील के गुंडों ने बालीगोठो की ममता कालुंडिया के साथ गलत हरकत की। पुलिस ने ममता की एफआइआर दर्ज करने से मना कर दिया। विरोध में 5-6 फरवरी 2018 को आदिवासी-दलित मंच जिला कलक्टर के दफ्तर के सामने धरना देकर बैठ गया।
उसकी मांगों पर प्रशासन की ओर से कोई ठोस जवाब न आता देख एक आदिवासी भीतर से परेशान होकर चीख उठा : ‘मार दो हमें! जहर दे दो! लेकिन इंतजार मत करवाओ। अगर हम सबको मारना चाहते हो, तो यहीं मार दो। आज ही मार डालो!’ एक औरत इंतजार करते-करते वहीं बेहोश हो गई (कलक्टर के पास गए प्रतिनिधिमंडल की सदस्य के रूप में मैं इसकी साक्षी थी)। दो दिन तक चला यह धरना सिफर पर आकर सिमट गया – सिवाय इसके, कि इसने हमेशा के लिए एकजुटता कायम कर दी।
इस घटना ने कलिंगनगर के संघर्षों के बीच रिश्ते के रसायन को बदल डाला। वैसे तो कलिंगनगर कुछ साल पहले ही तमाम किस्म के असंतोष का केंद्र बन चुका था। यहां के विस्थापित समुदायों के बीच जितने किस्म की असमानताएं थीं, उतने ही किस्म के संघर्ष भी खड़े हो चुके थे, लेकिन अब आदिवासी-दलित और भूमिहीन-भूधारी के बीच बढ़ती हुई एकता साफ दिखाई देने लगी थी।
राज्य-कंपनी-सेना का ‘इस्पाती’ गठजोड़
अपनी जमीनों की लूट के खिलाफ आदिवासियों के प्रतिरोध आंदोलनों को कुचलने के लिए खनन कंपनियों और राज्य का आपसी गठजोड़ बहुत पुराना है, लेकिन स्टील उत्पादन की भव्य कामयाबी समाज पर उससे पड़े बोझ और भारी सामाजिक व पारिस्थितिकीय कीमत को ढंक देती है।
स्टील उत्पादन के पीछे की वास्तविकता हालांकि बहुस्तरीय है। इसमें उन समुदायों की कंगाली और बिखराव की कहानी छुपी है जो जमीन के मालिक हैं या थे। इन परतों में भव्य पारिस्थितिकीय विनाश, संसाधनों का उपभोग और जनता के प्रतिरोध का दमन छुपा हुआ है। मामला किसी एक कंपनी से मोलभाव या समझौता करने का नहीं है, हालांकि यह काम भी बहुत कठिन है। लोगों के सामने राज्य, उद्योग और सेना का एक मजबूत गिरोह है। नीतियों की शर्तें, स्थितियां, नियम और प्रक्रियाएं कुल मिलाकर एक ऐसा मायाजाल रचती हैं जिससे पार पाना किसी दुस्वप्न के जैसा है। ये प्रक्रियाएं इतनी जटिल हैं और विलम्ब ऐसा अनंत, कि दिहाड़ी श्रमिकों और भूमिहीन किसानों के लिए खुद कंपनी, प्रशासन और अदालतें ही सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा हो जाती हैं। नतीजतन, अपनी मांगों की लड़ाई लड़ने में इन्हीं की दिहाड़ी मारी जाती है।

वीजा स्टील कंपनी के हाथों अपनी जमीन गंवा चुके पर्यावरणविद् अश्विनी कुमार ढल पहले एनआइएनएल में कलिंगनगर मजदूर यूनियन के महासचिव हुआ करते थे, जो तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी बीजू जनता दल (बीजेडी) से सम्बद्ध थी। वहां रहते हुए उन्होंने एक स्वायत्त संगठन कलिंगनगर परिवेश सुरक्षा समिति की शुरुआत की जिसका उद्देश्य पर्यावरण को बचाना था। उनकी आंख तब खुली जब वे वहां न्यूनतम वेतन और सुरक्षा उपायों पर अध्ययन के लिए एक यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल को लेकर गए। कंपनी को उससे दिक्कत हुई। फिर उन्हें यूनियन छोड़नी पड़ी।
अब वे सुकिंदा घाटी में गिरते पर्यावरण मानकों को चुनौती देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने बताया, ‘मेरे परिवार ने करीब 12 एकड़ पुश्तैनी जमीन गंवा दी। दुर्भाग्य से मेरी जमीन वहीं थी जहां आज वीजा स्टील का कारखाना खड़ा है। अब यह संघर्ष अकेले मेरा नहीं रह गया है, यह इन कंपनियों में काम कर रहे तमाम लोगों के लिए है। सुरक्षा उपायों के अभाव के चलते उनकी गिरती सेहत और कमजोरी एक गंभीर मुद्दा है। उस समूचे इलाके में लोगों के स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए मैंने आरटीआइ लगाई थी। मुझे केवल दो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का आंकड़ा मिला जबकि मैंने सबका मांगा था।‘
भारत में क्रोमाइट के कुल भंडार में से 96 फीसदी जाजपुर जिले की सुकिंदा घाटी में पाया जाता है। यहां से कलिंगनगर का स्टील हब लगभग 40 किलोमीटर नीचे है जिसमें लगभग 14 क्रोमाइट संयंत्र हैं। इतनी ही संख्या में स्टील संयंत्र भी हैं। क्रोमाइट की खदानें दो पहाड़ी श्रृंखलाओं- दक्षिण में महागिरी और उत्तर में दैतारी- के बीच स्थित हैं जो लगभग 200 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली हुई हैं। दुनिया भर में क्रोमाइट की मांग इसलिए ज्यादा है क्योंकि उसका उपयोग क्रोमियम फेरो-मिश्र धातु बनाने और स्टील को कठोरता देने के लिए की जाने वाली प्लेटिंग में किया जाता है।
सुकिंदा की क्रोमाइट खदानों से निकलने वाला पानी अक्सर अन्य भारी धातुओं सहित हेग्ज़ावैलेंट क्रोमियम (Cr6+) से दूषित होता है। यह अत्यधिक जहरीला, पर्यावरण में फैलने वाला और सभी जीवों के लिए हानिकारक है। यह कोशिकाओं की झिल्ली में आसानी से प्रवेश कर जाता है और ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस, म्यूटेशन, कैंसर और जन्मजात विकार पैदा करता है जिससे इसे प्राथमिक प्रदूषक (प्रायोरिटी पॉल्यूटेन्ट) की श्रेणी में रखा गया है। क्रोमियम की विषाक्तता का त्वचा, नाक, फेफड़े, गुर्दे, यकृत, मस्तिष्क, जठरांत्र मार्ग और मानव अंगों पर प्रभाव पड़ता है। सुकिंदा की खदानों से पम्प किया गया यही विषाक्त पानी घाटी के मुख्य जलनिकासी चैनल दमसाला नाला में बहता है जिसके कारण प्रदूषक तत्त्व पर्यावरण में उत्सर्जित होते हैं।
कुछ अध्ययनों ने खदानों के पास रहने वाले परिवारों और समुदायों के ऊपर क्रोमाइट खनन के अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रभावों को बहुत स्पष्ट रूप से स्थापित किया है:
- तीस साल पहले ओडिशा वॉलंटरी हेल्थ एसोसिएशन (ओवीएचए) ने बताया था कि खनन वाले क्षेत्रों में 84.75 फीसदी मौतें और आसपास के औद्योगिक गांवों में 86.42 फीसदी मौतें क्रोमाइट खनन से संबंधित बीमारियों के कारण हुई थीं। खदानों से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित गांव सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे जिसमें 24.47 फीसदी निवासी प्रदूषण से पैदा बीमारियों से ग्रस्त पाए गए।
- अठारह साल पहले 2007 में ब्लैकस्मिथ इंस्टीट्यूट ने सुकिंदा को दुनिया के दस सबसे प्रदूषित स्थानों में से एक घोषित किया था।
- आठ साल पहले सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त आंकड़ों से पता चला था कि कैसे जखापुरा और रबाना के दो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में 25,000 से अधिक लोग दूषित पानी से होने वाली बीमारियों से ग्रस्त थे। सौ से अधिक लोग मारे गए थे। यदि हम दानागड़ी, सुकिंदा और कालियापानी के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के आंकड़ों को जोड़ दें तो प्रभावित व्यक्तियों की संख्या एक लाख को पार कर जाती है (देखें ओडिशा पोस्ट, 24 नवंबर, 2017)।
यह शोध से स्थापित तथ्य है कि आदिवासी समुदायों और खदानों व संबंधित उद्योगों के पास रहने वाले लोगों में टीबी का रोग ज्यादा पाया जाता है। सिलिकोसिस भी व्यापक रूप से पाया जाता है क्योंकि मजदूरों और समुदायों को सिलिका की महीन तीखी धूल का लंबे समय तक सामना करना पड़ता है। इस धूल में सांस लेने से फेफड़े के मैक्रोफेज को नुकसान होता है। ये वही कोशिकाएं हैं जो सामान्यत: माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस को मारती हैं। इसी वजह से मजदूर टीबी के प्रति ज्यादा संवेदी बन जाते हैं और प्रदूषित हवा से संपर्क कट जाने के बाद भी उनका स्वास्थ्य और जीवन वर्षों तक खतरे में रहता है।
खनन से निकलने वाली धूल, विशेष रूप से ओपेन-कास्ट या खुली खदानों से, भारी धातुओं की एक श्रृंखला का उत्सर्जन करती है जो सभी जीवित प्राणियों के लिए जहरीली होती है। खनन से निकलने वाले अपशिष्ट पानी को प्रदूषित करते हैं – सतह और भूमिगत, जो पीने और घरेलू उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं – और सभी के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं- चाहे जवान हों, बूढ़े, औरतें या मर्द।
सुकिंदा और आसपास के गांवों के लोग कई वर्षों से टीबी जैसी कई अशक्त करने वाली बीमारियों सहित विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हैं। इन लोगों के पास सामान्य उपचार तक भी पहुंच नहीं है। वे निदान सुविधाओं का विकल्प भी चुनने की हालत में नहीं हैं। कई टीबी रोगी इलाज का कोर्स ही पूरा नहीं करते हैं। जल्द निदान न होने के कई खतरे हैं। ऐसे में पूरा समुदाय असुरक्षित हो जाता है और जोखिम बढ़ जाता है।
इसी के मद्देनजर अश्विनी कुमार ढल ने ओडिशा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के खिलाफ एक याचिका दायर कर के सवाल किया था कि 7000 लोगों से ज्यादा की आबादी वाले गांव में स्थित जखापुरा रेलवे स्टेशन का इस्तेमाल कच्चे लोहे, कोयले और डोलोमाइट के लिए क्यों किया जा रहा है। इन खनिजों को भारी मात्रा में चढ़ाने-उतारने की प्रक्रिया में सुरक्षा उपायों की सख्त कमी थी। रेलवे स्टेशन के करीब एक स्कूल था, लेकिन स्टेशन पर प्रदूषण नियंत्रित करने का कोई साधन नहीं था जो हवा में प्रदूषकों के उत्सर्जन को नियंत्रित कर सके, न ही गंदे पानी के शोधन के लिए कोई संयंत्र था। वीजा स्टील इन खनिजों को बिना ढंके ही वाहनों में लाती ले जाती थी।
वर्ष 2024 में सुकिंदा सहित देश भर में टीबी की दवाओं की कमी पाई गई थी। भारत को 2025 तक टीबी-मुक्त बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बहुप्रचारित राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) शायद ही कभी खनन क्षेत्रों और स्टील संयंत्रों के आसपास के गांवों तक पहुंचा होगा। दूसरी ओर, बीमारी और प्रदूषण के मारे लोगों ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण में जब एक याचिका दायर की तो उसे सरसरी तौर पर खारिज कर दिया गया।
प्रतिरोध: फरवरी, 2024
काम और जमीन के नुकसान, विफल हो चुकी वार्ताओं, लगातार फैलते स्टील संयंत्रों, लगातार बढ़ते प्रदूषण, बेरोजगारी और बिगड़ती सेहत- कुल मिलाकर काफी लंबे समय से चली आ रही हताशाएं 2024 में एक के बाद एक हुए जबरदस्त प्रतिरोध की शक्ल में फूट पड़ीं।
एनआइएनएल के बाहर 9 फरवरी 2024 को कोई 60 लोगों का एक समूह धरने पर बैठ गया। ये लोग एनआइएनएल में रोजगार से निकाले गए उन कर्मचारियों के निकटतम संबंधी (एनओके / नेक्स्ट ऑफ किन) थे जिनकी रोजगार की अवधि में ही मौत हो गई थी। धरने पर बैठे लोगों ने बताया कि 2011 में हुई आरपीडीएसी की बैठक के अनुसार एनओके को एनआइएनएल और कलिंगनगर औद्योगिक परिसर के भीतर स्थित दूसरे संयंत्रों में रोजगार मिलना था। चूंकि बार-बार याचिकाएं देने पर भी उन्हें कोई जवाब नहीं मिला था, तो उन्होंने दिसंबर 2023 में प्रबंधन को एक हफ्ते का नोटिस दिया कि वे अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने जा रहे हैं।
उस वक्त धरने में शामिल 23 वर्षीय कारी माझी के मुताबिक, ‘मेरे पिता केवल 45 साल के थे और किडनी के रोग से ग्रस्त थे। हमने उनका केआइएम, भुबनेश्वर और यहां के टाटा मेमोरियल अस्पताल में इलाज करवाया। वे 2019 में नहीं बच सके। कलिंगनगर में किडनी और सांस के रोगी बढ़ते जा रहे हैं। मेरा एक भाई और एक बहन है जिनकी मुझे देखभाल करनी है। हमारा भविष्य दांव पर है। आखिर हम और कितना इंतजार कर सकते हैं? यहां मुझसे भी छोटी उम्र का एक लड़का है जिसके पिता गुजर गए। हम जिस गेट पर बैठे हैं, कभी यह हमारी ही जमीन थी। हम लोगों को भुखमरी तक धकेलने वाली यह नीति आखिर कौन बना रहा?’
विस्थापितों के एनओके के लिए नौकरी की मांग करने वाले कलिंगनगर श्रमिक संघ के पुराने ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता प्रदीप जेना ने मुझे बताया था (निजी साक्षात्कार, 10 अप्रैल, 2024), ‘टाटा द्वारा 2022 में अधिग्रहण के बाद एनआइएनएल दोबारा जिंदा हो गई है, लेकिन आरपीडीएसी की बैठक में बनी सहमति के मुताबिक एनओके को नौकरी देने को लेकर कोई संकेत नहीं दिखाई दे रहे। आइटीआई डिग्रीधारियों की भर्ती तो की जा रही है लेकिन धरने पर बैठे उन निकटतम संबंधियों को नहीं रखा जा रहा जिनके पास समान डिग्री है। हम लोग आरपीडीएसी की बैठकों में लिए गए फैसलों को लागू करने की मांग प्रबंधन से कर रहे हैं।‘
आरपीडीएसी (द रीहैबिलिटेशन ऐंड पेरिफेरल डेवलपमेंट एडवायजरी कमेटी) राज्य सरकार द्वारा ओडिशा पुनर्स्थापन और पुनर्वास नीति, 2006 के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत बनाई गई एक कमेटी है जिसका काम पुनर्वास और विकास से जुड़े परिधिगत मामलों की निगरानी करना है। पहले समूचे कलिंगनगर औद्योगिक परिसर के लिए एक आरपीडीएसी होती थी लेकिन समय के साथ उद्योगों की वृद्धि के चलते इनकी संख्या छह हो गई। आरपीडीएसी की बैठकों में आरडीसी, कलक्टर, विधायक, कंपनियों के प्रबंधन, मजदूर यूनियनें और निकाले गए कर्मचारियों के संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। ऐसी एक बैठक 2012 में हुई थी जिसमें यह बात सामने आई थी कि अब उद्योग नियमित रोजगार पर ज्यादा लोगों को नहीं रख रहे बल्कि आउटसोर्सिंग और ठेके पर ज्यादा भर्तियां कर रहे हैं। जब सदस्यों ने ठेका मजदूरों की रोजगार सुरक्षा का सवाल उठाया, तो नियोक्ताओं ने उसे संबोधित भी किया था। यह बात भी उठी थी कि 90 फीसदी रोजगार स्थानीय लोगों को दिए जाने चाहिए। ऐसी ही 2015 में हुई एक बैठक में टाटा स्टील ने सूचना दी थी कि तब तक 759 विस्थापित लोगों को रोजगार नहीं दिए गए थे। कमिटी ने टाटा स्टील को निर्देश दिया था कि वह छह माह के भीतर सभी के लिए रोजगार सुनिश्चित करे।

ये प्रक्रियाएं बहुत धीमी गति से चली हैं, इसलिए नई पी़ढ़ी अपने भविष्य को लेकर बेहद चिंतित है। उसके कंधों पर अब परिवार की जिम्मेदारी आन पड़ी है और रोजगार की सूरत कहीं नहीं दिख रही। उन्हें शक है कि आरपीडीएसी की बैठकों में आदिवासी नेता उनके मामलों को उठा भी रहे हैं या नहीं, चूंकि संभव है वे खुद अपने को जोखिम में न डालना चाह रहे हों।
मितु मुंडया ऐसे ही एक विस्थापित हैं, जिन्होंने बालीगोठो गांव के विस्थापितों की सूची में से गायब अपने पिता साधुराम मुंडया का नाम वापस जुड़वाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। इस धरने में वे टाटा स्टील के मुख्य द्वार पर लगे भीम आर्मी जाजपुर जिला इकाई के टेन्ट में बैठे मिले। मितु ने बताया, ‘मेरे चाचा रामलाल मुंडया 2 जनवरी 2006 को पुलिस गोलीबारी में मारे गए थे। उनके और उनके भाइयों के पास 15 एकड़ जमीन थी। प्रशासन ने माना था कि मेरे पिता का नाम गलती से छूट गया था पर उस गलती को दुरुस्त करने के लिए कुछ नहीं किया गया। मेरे पिता इतने साल इंतजार कर के चल बसे। ओडिशा पुनर्स्थापन और पुनर्वास नीति 2006 के अनुसार मैं भी राहत और पुनर्वास के योग्य था। उस समय मैं 25 साल का था, अब 42 का हो चुका हूं। मैंने कंपनी, प्रशासन और अपने आदिवासी नेताओं से बीते 17 बरस में बात की है। कंपनी झूठा दावा करती है। घर-घर जाकर कोई भी सर्वे नहीं किया गया। मैं कितनी देर इंतजार करूंगा?’ (प्रदर्शन स्थल और सनसिलो की पुनर्वास कालोनी में किया गया निजी साक्षात्कार, 6 अप्रैल, 2024)
वे बताते हैं कि कंपनी के एजेंटों की लोगों के ऊपर हमेशा नजर रहती है। अगर तीन या चार लोग एक साथ दिख गए, तो किसी एक के पास कंपनी का एजेंट आता है और दूसरे से दूरी बनाने के लिए पैसे की पेशकश करता है। वे कहते हैं, ‘उस वक्त तो बहुत सदमे में थे हम लोग, बहुत डरे हुए थे। हमारे गांवों में पुलिस भरी हुई थी, कंपनी के एजेंट थे और एनजीओ वाले भी थे। कुछ समय बाद हमारे अपने आदिवासी नेता ही ठेकेदार बन गए और कंपनी को फलने-फूलने में मदद करने लगे। फिर हम लोग किसके पास जाते? हम लोगों को इस बात का एहसास होने में काफी वक्त लग गया कि कैसे निगरानी, रिश्वत और नकली दुश्मनी पैदा कर के हमारी बिरादरी को भीतर से कमजोर किया जा रहा था।‘
वे कहते हैं, ’हमारे पुरखे लड़ते हुए मर गए। यह देखना शर्मनाक है कि शहीद दिवस पर कंपनी खेल के आयोजन करवाती है। जो लोग हमारे पुरखों की शहादत के लिए जिम्मेदार हैं आखिर कैसे वे नौजवानों के लिए खेल प्रतियोगिताएं आयोजित करवा के उन्हें टाटा परिवार लिखी हुई टीशर्टें बांट सकते हैं?’
मितु के लिए 2019-2020 में चला नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी आंदोलन साहस देने वाला क्षण था, जब उन्होंने चंद्रशेखर आजाद को मुसलमानों के हक में खड़े होकर जामा मस्जिद पर संविधान की उद्देश्यिका पढ़ते हुए देखा: ‘उससे हमें प्रेरणा मिली! वह हमारे लिए एक निर्णायक मोड़ था। ओडिशा में ऐसी कोई विपक्षी पार्टी नहीं है जो उद्योगों से विस्थापित लोगों के अधिकारों के हक में खड़ी होती हो। हमें तब महसूस हुआ कि अगर वे पुलिस को चुनौती देकर मुसलमानों के लिए खड़े हो सकते हैं, तो हम लोग भी अपने सरोकार के लिए और हिम्मत से लड़ सकते हैं। अब हम लोग ताजा सर्वे चाहते हैं।‘

प्रतिरोध: अप्रैल 2024
अक्टूबर 2023 में और उसके बाद कंपनी के प्रबंधन को भेजी अपीलों का कोई जवाब न मिलने पर विस्थापितों के इस समूह ने अपनी मांगों का ज्ञापन भेजकर 12 मार्च 2024 से धरना प्रदर्शन की फिर से घोषणा कर दी। यह धरना प्रदर्शन एनआइएनएल और टाटा स्टील दोनों जगह हुआ। इसने विभिन्न प्रभावित समूहों के बीच एक व्यापक एकता की राह बनाई, जिसकी परिणति अंतत: 10 अप्रैल 2024 को एक विशाल जनसभा में हुई, जिसका आयोजन सुकिंदा बचाओ विस्थापित जमीहारा और क्षतिग्रस्त विचार मंच के बैनर तले हुआ। यह 15 स्थानीय संगठनों का गठबंधन था। सभा में कुल 2000 से ज्यादा ग्रामीण शामिल हुए।
शहीदों को बीरभूमि पर पुष्पांजलि देने के बाद नेताओं ने जनसभा को संबोधित किया। स्वर्णलता बनार ने लोगों को बदहाली में धकेलने वाली औद्योगिक गतिविधियों को निशाने पर लेते हुए कहा:
‘आज हम लोग अलग-अलग राजनैतिक धड़ों से यहां सभी के लिए न्याय मांगने आए हैं। आज कलिंगनगर में हम जो देख रहे हैं वह विकास नहीं विनाश है। लोगों से जब जबरन जमीनें ली गईं तो उसके बाद वे बरसों न्याय के लिए भटकते रहे। हम में से कुछ के पास काफी जमीनें थीं, तो मुआवजा मिल भी गया, कुछ लोगों को नहीं मिला, पर एक बिरादरी के रूप में असर हम सभी पर पड़ा। हमारे बच्चों को शिक्षा, कपड़ा और खाना चाहिए। उन्हें अपना कोई भविष्य नहीं दिखता। इतनी मुश्किलों के बाद पढ़ाई पूरी कर के वे आज कंपनियों के गेट पर बैठे हैं। चाहे भूमिहीन हो या भूधर, आदिवासी जोतदार होने के नाते हमारे पास खाने को पर्याप्त था। हम अपना धान उगाते थे, लेकिन आज हमारा चावल का कटोरा खाली है। चाहे जितना उसका पेंदा खुरच लो, कुछ हाथ नहीं आने वाला। कुछ नहीं बचा।‘

उन्होंने पूछा, ‘हमसे 2005 में क्या यह नहीं कहा गया था कि हम लोग टाटा परिवार का हिस्सा हैं? अगर हम लोग टाटा का परिवार हिस्सा हैं तो हमारे बच्चे कंपनी के गेट पर क्यों हैं? अपनी ही जमीन पर हम भिखारी बन के रह गए हैं। ऐसा कैसे हो गया कि कंपनी जिस जमीन पर आज खड़ी है, जो हमारी ही जमीन है, उस पर हम स्वीपर या क्लीनर भी नहीं बन पा रहे? अब या तो हमें अपने अधिकारों का दावा करना होगा या फिर कंपनी के गेट जबरन खोलकर अपनी जमीनों पर दावा जताना होगा।‘
एक आदिवासी नेता बाबुली हेब्रू ने कहा, ‘हम लोग भूल गए थे कि हम कभी एक समुदाय हुआ करते थे। हम अपने-अपने वजूद के लिए अकेले ही लड़े जा रहे थे। याद कीजिए ट्रांजिट शिविरों के वे भयावह दिन जब हम झुलसाती गर्मियों और भारी बरसातों में भी टिके रहे थे। हमने अपनी जिंदगी को दोबारा खड़ा करने के लिए छोटी-छोटी चीजें पाने का संघर्ष किया, लेकिन हमारे बीच कई ऐसे लोग हैं जो अब भी अपने हक के लिए इंतजार कर रहे हैं। कागजों पर उन्हें दिया गया रस्मी आश्वासन जादुई स्याही की तरह जाने कहां उड़ चुका है। सरकार अगर दुनिया के सामने अपनी बढ़ती स्टील उत्पादन क्षमता और उसके स्तर के बारे में हांकने में इतना ही गर्व महसूस करती है, तो प्रशासन हमारे एक मामूली-सी सभा करने से ही क्यों डर जाता है? इसलिए क्योंकि वे जानते हैं कि उन्होंने कभी भी अपने वादे पूरे नहीं किए।‘
उन्होंने आगाह किया, ‘यहां प्रशासन ने हमें बिरसा मुंडा चौक नहीं बनाने दिया। उनकी विस्तार योजना से हमें अपने शहीद स्मारक तक को बचाकर रखना होगा। कंपनी लोगों को यह दिखाने जमशेदपुर, ग्वालियर और जाने कहां-कहां लेकर गई कि कैसे वे छोटे उद्यमी बनने के लिए प्रशिक्षण पा सकते हैं। अगर वे दावा करते हैं कि टाटा एक परिवार है, तो ऐसा क्यों है कि इन लोगों के पास एक भी ट्रक नहीं, एक भी कारखाना नहीं है? जिन्हें टाटा-समर्थक कहा जाता है, आज वे लोग कहां गए? पुनर्वास कालोनियों की हालत खस्ता है। एनजीओ यहां आए और उन्होंने हमें अपने भूमि व पुनर्वास के अधिकारों के बारे में जानकारी दी, फिर जब उनके प्रोजेक्ट पूरे हुए तो वे निकल लिए। आदिवासी और दलित गरीब के गरीब ही रह गए, जैसा हमेशा होता है।‘
शम्भू मोहन्ता ने साझा संसाधनों के मालिकाने पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘2 जनवरी 2006 को हुई पुलिस फायरिंग में शहीद हुए लोगों की अंत्येष्टि में हम शामिल थे। हम लोग राष्ट्रीय राजमार्ग पर धरना देकर साल भर से ज्यादा बैठे रहे। हमें विस्थापित, जमीहारा, मजदूर और भूमिहीनों में बांट दिया गया ताकि कंपनी और ओडिशा सरकार की साजिश पूरी हो सके। खुद को अकेला पाकर हमने अधिकारियों से संपर्क साधा, यहां तक कि अपने उन नेताओं से भी मिले जो आज यहां मंच पर बैठे हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि हमें ऐसी सभा में भाग लेने को कहा गया हो। हम लोग खुद को भूमिहीन नहीं कहते क्योंकि हम जिस जमीन पर रहते थे उस पर हमारा पूरा अधिकार था। ये साझा संसाधन किसके हैं? जनता के या कंपनी के? ओडिशा की सरकार टाटा को ज्यादा से ज्यादा जमीन लेने में मदद क्यों कर रही है जबकि महज 10 डेसिमल जमीन हमें देने से इनकार करती है? उधर स्टील का उत्पादन बढ़ रहा है, इधर अपना हक पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाकर हमारी चप्पलें घिस गई हैं। प्रबंधन ने तो हमें नौकरियों की रिश्वत भी दी थी। हमने जवाब दिया कि हमें घर बनाने के लिए जमीन चाहिए और सबके लिए इंसाफ चाहिए। हमने हाइकोर्ट में याचिका दायर की और 2006 की पुनर्वास नीति को लागू करने की मांग की। अदालत ने एडीएम को आदेश भी दिया लेकिन हमें इस आदेश के बारे कभी पता नहीं चल पाया क्योंकि इसे प्रभावित पार्टी के साथ साझा ही नहीं किया गया था।‘

एनआइएनएल के धरना प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे कारी माझी ने बताया, ‘हम लोग नब्बे के दशक के मध्य में विस्थापित हुए थे, तब से हम देखते हैं कि यहां कितना विकास हो गया है। वह हमें अपने घरों और परिवेश में दिखता है। ओडिशा को अपनी पुनर्वास नीतियों और स्टील उत्पादन के लिए बहुत तमगे मिले हैं, लेकिन वादों और आश्वासनों की क्या स्थिति है? इन्होंने हमें बहुत तरीकों से ठगा है। हम लोग चिलचिलाती धूप में कंपनी के गेट पर बैठे रहे लेकिन वे लोग एक बार भी हमारी मांगों पर बात करने के लिए बाहर निकलकर नहीं आए। कलिंगनगर हमें एक ही सबक सिखाता है कि संघर्ष ही इकलौता रास्ता है।‘
अलग-अलग मांगों को लेकर लोगों के विभिन्न समूह पुनर्वास नीति के कार्यान्वयन के लिए अब साथ आ चुके हैं। विस्थापित परिवारों के तमाम समूह स्वतंत्र संघर्ष चलाकर अपने वाजिब हक मांग रहे हैं जो या तो जान-बूझ कर उन्हें नहीं दिए गए या फिर जिनकी अनदेखी की गई- मकान बनाने के लिए जमीनें, रोजगार, या मुआवजा। कई समूह अदालतों, प्रशासन और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के समक्ष लगातार याचिकाएं लगाकर सक्रिय हैं।
पूंजीवाद और स्टील
कलिंगनगर नरसंहार के केंद्र में स्टील का जो कारोबार है, उसकी जड़ें तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल के इलाके में ईसा पूर्व छठवीं सदी के दौरान पाए जाने वाले वूट्ज़ स्टील तक जाती हैं। दमिश्क का मशहूर स्टील इसी वूट्ज़ स्टील से बनाया जाता था। वह मजबूत, तेज और टिकाऊ होता था, इसलिए तलवारें बनाने के लिए उसे आदर्श माना जाता था। ईसा पूर्व तीसरी सदी में सिकंदर के सैन्य अभियानों में उसका जिक्र आता है।
यूरोप, मध्य-पूर्व और चीन सहित समूचे प्राचीन और मध्यकालीन जगत में वूट्ज़ स्टील का व्यापार हुआ। करीब दो सहस्राब्दी तक उसे बनाने का नुस्खा गुप्त रखा गया, जिसमें लौह अयस्क और चारकोल को एक कुठाली के भीतर गलाया जाता था। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में जाकर यूरोपियों को पता लग पाया कि भारत में वूट्ज़ स्टील को कैसे बनाया जाता है। उसके बाद हुई औद्योगिक क्रांति ने स्टील के उत्पादन और व्यापार को बुनियादी रूप से बदल डाला।
आज स्टील लगातार फलती-फूलती हुई आधुनिक निर्माण प्रौद्योगिकी का सुराग है। उसके उत्पादन की प्रक्रियाएं जबरदस्त ऊर्जा मांगती हैं, जिसमें खनिज और अन्य ऊर्जा संसाधन लगते हैं जो उत्पादन के स्थल पर तो पारिस्थितिकी का क्षरण करते ही हैं, शेष पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाते हैं। लोहे को गलाने के लिए जीवाश्म ईंधनों को जलाया जाता है जिससे ज्यादा से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड पैदा होती है, साथ ही अन्य प्रदूषक तत्त्व भी निकलते हैं। दुनिया भर में स्टील का उत्पादन आज उस स्तर को पार कर गया है जहां वह मनुष्य और धरती के वजूद के लिए खतरा बन चुका है।
भारत 2018 में ही जापान को पीछे छोड़ते हुए चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक बन गया था और ओडिशा देश का सबसे बड़ा स्टील उत्पादक राज्य बनकर वैश्विक होड़ में फंस गया। उसके बाद झारखंड और छत्तीसगढ़ का स्थान आता है। भारत का स्टील उत्पादन 2024-25 में 8 फीसदी की वार्षिक वृद्धि के साथ 15.2 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो निर्यात की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ, फ़्लाईओवर, राजमार्गों, बंदरगाहों और रेलवे जैसी विशाल बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की आपूर्ति करता है।
ओडिशा में 1955 में केवल एक स्टील संयंत्र था। आज यहां 52 संयंत्र स्थापित करने की तैयारी है। इनमें से 95 फीसदी से अधिक संयंत्र सन् 2000 के बाद स्थापित किए गए हैं जब आर्थिक सुधारों ने ज्यादा निजी खिलाड़ियों को यहां आकर्षित किया। राउरकेला में पहला एकीकृत स्टील संयंत्र दूसरी पंचवर्षीय योजना के कार्यान्वयन के दौरान पश्चिम जर्मनी के सहयोग से स्थापित किया गया था। सत्तर और अस्सी के दशक के दौरान भूषण स्टील, एनआइएनएल और मेस्को का उदय हुआ।
सरकारी आंकड़े दावा करते हैं कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के स्टील उत्पादन की हिस्सेदारी 1990-91 के क्रमशः 46 फीसदी और 54 फीसदी से बदलकर 2001-02 में 32 फीसदी और 68 फीसदी हो गई। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में राज्य ने विशेष रूप से 1991 में भारतीय लौह और इस्पात क्षेत्र के विनियमन और नियंत्रण को समाप्त में सूत्रधार की भूमिका निभाई। स्टील उत्पादन को नए कानूनों, विशेष रूप से 2017 में राष्ट्रीय इस्पात नीति और 2019 में राष्ट्रीय खनिज नीति द्वारा सुगम बनाया गया। ओडिशा ने कई बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कंपनियों को लोहा और स्टील उद्योग में निवेश करने के लिए आकर्षित किया।
कच्चे लोहे के भंडार जाजपुर, क्योंझर, मयूरभंज, सुंदरगढ़ और नबरंगपुर जिलों में फैले हुए हैं जिनकी आबादी बड़े पैमाने पर आदिवासियों, अन्य वनवासियों और छोटे किसानों की है। उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वे बमुश्किल अपना गुजर-बसर कर पाते हैं। ज्यादा से ज्यादा कॉरपोरेट मुनाफा पैदा करने के उद्देश्य से निष्कर्षक पूंजीवाद आदिवासियों, दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों की जमीनें छीनकर उन्हें जीवनयापन के साधनों से महरूम कर देता है। जब कंपनियां बैठाई जाती हैं, तब विकास के घोषित दावे उन बहिष्कृत लोगों तक नहीं पहुंच पाते जो विस्थापित और बेदखल किए गए थे।
गुजर-बसर वाली अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों और शारीरिक श्रम के बल पर ही जीवन निर्वहन किया जाता है। ये लोग काफी हद तक पूंजीवादी विकास से अछूते रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उनका जीवन सर्वव्यापी बाजार अर्थव्यवस्था से अछूता है। अपने जंगल और जमीन से वे जो भी कमाते हैं, उसके अलावा मजदूरी के बदले या उपज की बिक्री से हुई नकद कमाई उनके जीवनयापन को संभव बनाती है।
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दुनिया भर में अत्यधिक उत्पादन के कारण अब स्टील और कच्चे लोहे के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर शुल्क-युद्ध और डंपिंग-रोधी शुल्क पर बातें हो रही हैं। इनसे जुड़े देश अब इसे अपनी सुरक्षा से जोड़ कर देख रहे हैं। स्टील उत्पादन में शामिल प्रमुख देशों के आपसी भूराजनैतिक खेल ने उत्पादन के स्तर को और बढ़ा दिया है। इस तरह से पूंजी का संकेंद्रण – जिसे खनन और धातु उत्पादन के विशिष्ट संदर्भ में निष्कर्षण पूंजी कहा जाता है – अबाध रूप से जारी है। विभिन्न भौगोलिकताओं और संदर्भों में आदिम संग्रहण की प्रक्रियाएं विश्वव्यापी पूंजीवादी संग्रहण के अनिवार्य अंग के रूप में परिलक्षित हो रही हैं। वैसे तो आदिम संग्रहण ने ही पूंजीवाद की राह बनाई है, पर निष्कर्षण पूंजीवाद तमाम सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असमानताओं को और गहरा करते जा रहा है जिसके लिए वह तीन सफेद झूठ का सहारा लेता है : वृद्धि, प्रगति और विकास।
निष्कर्षण पूंजीवाद को आगे बढ़ाने के लिए सार्वजनिक उपक्रमों की बलि दी जा चुकी है। उदाहरण के लिए, जाजपुर जिले में राष्ट्रीय बीज निगम नाम का एक सरकारी उपक्रम होता था। उसके मजदूरों के निरंतर विरोध के बावजूद उसका निजीकरण कर दिया गया। करीब 400 से ज्यादा अस्थायी कामगारों को निकाल दिया गया। ये लोग करीब 20 साल से वहां काम कर रहे थे (देखें नोवेयर टु गो: द प्लाइट ऑफ विमेन वर्कर्स ऑफ सुकिंदा सीड फार्म, पीयूसीएल की रिपोर्ट, 2017, भुबनेश्वर)। उनमें से अधिकतर एससी और एसटी वर्ग की औरतें थीं। सबसे बुरी बात यह हुई है कि इन खनिज-संपन्न जिलों में शिशुओं और बच्चों की कुपोषण से मौत अबाध जारी है। यहां का आदिवासी समुदाय साल के चौथाई हिस्से तकरीबन भुखमरी के हालात में जीता है।
अब निष्कर्षण पूंजीवाद ने राज्य की भूमिका को निगमों के सहजकर्ता तक सीमित कर डाला है। आदिवासियों की जमीनों को औने-पौने दामों पर देने, नये कानून बनाने और मौजूदा कानूनों को बदलने के एवज में सरकारों को गुप्तदान मिलता है। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक को निर्देश दिया कि वह चुनाव आयोग को चुनावी बॉन्ड से जुड़ी सारी सूचना मुहैया करवाए, तो यह उद्घाटन हुआ कि केंद्र की सत्ताधारी पार्टी ही चुनावी बॉन्ड की सबसे बड़ी लाभार्थी है। कोई आश्चर्य नहीं कि उसे चंदा देने वालों की सूची में स्टील और खनन से जुड़े कई निगम थे, चूंकि इस देश में खनिजों और कोयले के व्यापक दोहन तथा स्टील के उत्पादन में भारी मुनाफा छुपा है। उस वक्त ओडिशा की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी बीजेडी सबसे अमीर क्षेत्रीय पार्टी बनकर उभरी थी जिसे चुनावी चंदे के रूप में 994 करोड़ रुपये से ज्यादा धनराशि प्राप्त हुई थी।
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याद करिए कि कैसे अदाणी समूह जनवरी 2023 में अमेरिकी शॉर्ट-सेलर कंपनी हिंडेनबर्ग के खुलासे से लगे झटकों से अचानक उबर आया था, जिसने कंपनी पर शेयरों में हेरफेर और धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। उसे ओडिशा सरकार ने ही बचाया, जिसने अदाणी के नाम पर रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में स्थित कुटरूमाली पहाड़ियों की नीलामी कर डाली थी। समाचार रिपोर्टों में सामने आया था कि जिस दिन ओडिशा सरकार ने कंपनी को नीलामी में ये सौगात दी, उसके अगले ही दिन अदाणी एंटरप्राइजेज के शेयरों में 15 फीसदी का उछाल देखा गया।
यही वह निष्कर्षण पूंजीवाद है जो स्थानीय मूलनिवासियों को उनकी जमीनों और गांव के संसाधनों से उखाड़ फेंकता है, उन्हें पुनर्स्थापन और पुनर्वास के उपायों से महरूम रखता है, हवा, पानी और धरती को जहरीला बना देता है, रोग और मौतें फैलाता है, तथा समूचे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रदूषित करता है। लोगों की वंचना और बेचारगी की प्रक्रियाओं को गहरा करने वाली नवउदारवादी आर्थिकी गहराती हुई संरचनात्मक असमानताओं की रोशनी में खुद को नंगा पाती है।
ओडिशा में जब-जब विस्तार का अगला चरण और स्टील परियोजनाओं का विलय कारोबारी जगत की सुर्खियां बना, तब-तब अधिकारियों का विश्वासघात और संवेदनहीनता और स्पष्ट होती गई। इसलिए, व्यक्ति और समुदाय के बतौर जो एकता कायम हुई उसने लोगों में साहस और उम्मीद भरने का काम किया।
साझा ज्ञापन, जिंदा सपने
फरवरी और अप्रैल 2024 में हुए धरना प्रदर्शनों के पीछे एक गहन बेचैनी थी। धरने पर बैठे विस्थापित परिवारों को दूसरे प्रभावित समूहों का भी समर्थन मिला। जब तत्कालीन विस्थापन विरोधी मंच के पुराने नेता इसमें जुड़े, तब जाकर भरोसा बना। फिर पुनर्वास कालोनियों के निवासी भी जुड़े। यहां तक कि अपेक्षाकृत ठीकठाक भूधर आदिवासी भी साथ आए। फिर इन सब ने मिलकर कंपनियों और प्रशासन को नोटिस दिया।
सभी असंतुष्ट समूहों की शिकायतों को शामिल करना और सबकी मांगों को दुहराना ठोस काम की मांग करता था। किसान, भूमिहीन, दिहाड़ी मजदूर, औद्योगिक मजदूर और विस्थापित लोगों के विभिन्न संगठनों ने मिलकर एक संयुक्त ज्ञापन में कुल 34 मांगें रखीं और एक बुनियादी सवाल उठाया : जमीन का सच्चा मालिक कौन है और स्टील उत्पादन की अदृश्य कीमत क्या है?
इन मांगों के इर्द-गिर्द लोगों को गेट मीटिंगों और गांवों व पुनर्वास बस्तियों में गोलबंद करने का काम किया गया। तमाम अधिकारियों को – एडीएम से लेकर मंत्रालय तक और कंपनी प्रबंधन से लेकर आरपीडीएसी तक – उन मांगों से अवगत करवाया गया। 20 मई का प्रदर्शन अभूतपूर्व रहा जिसमें हजारों लोग डुबुरी चौक तक जाने वाले चारों रास्तों पर जमा हो गए। ज्यादातर आदिवासी नेता इस प्रदर्शन में मौजूद रहे। यह प्रदर्शन इस बात की गवाही दे रहा था कि उन तमाम लोगों को आपस में एक समुदाय होने का सामूहिक एहसास हो चुका है, जो औद्योगीकरण और खनन से बराबर प्रभावित हैं।
उस समय एक प्रमुख आदिवासी नेता चक्रधर हल्दा ने कुछ अहम सवाल उठाए थे, ‘हम लोगों ने मेहनत और खेती के माध्यम से खुद को एक समुदाय के रूप में टिकाये रखा। हम जमीनों और जंगलों पर निर्भर थे। हम अंग्रेजों से लड़े और अब अपनी ही सरकार से अपनी जमीनों के लिए लड़ रहे हैं। लोग कहते हैं कि हमें घर और जमीन मिली है। क्या एक आदिवासी केवल ईंट का मकान पाकर कभी जिंदा रह सकता है? जब हमारी पुश्तैनी जमीन हमसे बलपूर्वक छीन ली जाए, तो हमारी पहचान और जड़ ही कट जाती है। यह हमारी पवित्र भूमि है। वे लोग तो हमें श्मशान तक देना भूल गए। कंपनियों को सुविधाएं दी जा रही हैं ताकि भारत को स्टील उत्पादन में शाबाशी मिल सके। जब कलिंगनगर में स्टील उत्पादन सुर्खियां बटोर रहा है, ऐसे में आज एससी और एसटी के रूप में हमारी सुरक्षा का क्या? क्या हम लोग भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत सुरक्षित नहीं हैं?’
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उनका कहना था कि आदिवासियों की जमीन को इतिहास में और आज भी गौरवान्वित किया जाता है, इसके बावजूद आदिवासी हमेशा गरीब और शोषित रहा है: ‘प्राचीनकाल में इस इलाके को कलिंग कहते थे। केशरी साम्राज्य का यहां राज हुआ करता था। कलिंगनगर का नाम उस दौर की याद दिलाता है जब ओडिशा समुद्री व्यापार और वाणिज्य में समृद्धि पा रहा था। एक प्राचीन प्रांत की राजधानी से स्टील का केंद्र बनने तक उन लोगों ने इस नाम को बनााए रखा ताकि पुराने दिनों की महानता को दर्शाया जा सके, लेकिन इस संपन्न धरती पर हम लोग तब भी गरीब थे। आधुनिकीकरण और उद्योगों के आने के बाद और गरीब होते चले गए। हमारी ही जमीनों, पहाड़ों और जंगलों के दोहन से ओडिशा दुनिया भर में जाना जा रहा है। तो क्या यह संपन्नता हमारी जमीनों को छीनने और हमारे लोगों को कंगाल बनाने से आनी चाहिए? इस धरती के लोग अब पलायन कर रहे हैं, परिवार भूखे मर रहे हैं। आप यहां पर आई होंगी तो आपने धुआं और प्रदूषण देखा होगा। हमारे लोग जवानी में ही प्रदूषण से मर जा रहे हैं। उन्हें किडनी के रोग हो रहे हैं। जब भारतीय राज्य और कंपनियों ने हमारी धरती को स्टील संयंत्रों में तब्दील कर डाला है तो हमारे साथ कौन खड़ा है? क्या गैर-आदिवासी हमारे लिए खड़े हो रहे हैं?’
सुकिंदा विस्थापित जमीहारा और क्षतिग्रस्त विचार मंच का ज्ञापन बहुत सशक्त ढंग से हमारे दौर के टकराव को दर्ज करता है। वह साझा संसाधनों की राजनीति को निष्कर्षण पूंजीवाद की राजनीति के बरअक्स खड़ा करता है। वह दिखाता है कि इस धरती के लोगों को बहुत अच्छे से पता था कि उनसे क्या छीना गया है और उन्हें किस चीज से महरूम किया गया है। यह ज्ञापन जल, जंगल और जमीन में आस्था जताते हुए उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बताता है और प्रकृति की पवित्रता में उनके विश्वास को व्यक्त करता है। स्टील उद्योग की वृद्धि के दौरान क्या वादे किए गए थे, क्या नहीं दिया गया और क्या-क्या नष्ट हुआ, यह ज्ञापन उसका एक सशक्त सामूहिक आकलन है।
यह ज्ञापन देने गए प्रतिनिधिमंडल की सदस्य सिनी सोय कलक्टर के ऊपर उखड़ गईं जब उसने ‘प्रक्रिया के अनुसार’ का हवाला देते हुए अपनी निस्सहायता जाहिर की। गुस्से से तमतमाई सिनी ने कलक्टर से पूछा कि उनके हक को मारने के लिए अधिकारी आज जो ये भाषा बोल रहे हैं, क्या जनवरी 2006 की गोलीबारी के दौरान भी ऐसी ही कोई प्रक्रिया अपनाई गई थी! अगले दिन बिरसा मुंडा जयन्ती की तैयारियों में लगी सिनी सोय ने हमसे हुई बातचीत में जो उम्मीद जताई, उसे सुनकर लगा कि यहां सपने अभी मरे नहीं हैं (निजी साक्षात्कार, 14 नवंबर, 2024):
‘मैं अकेले अपने बेटे भागबान सोय का शोक नहीं मनाते रह सकती, जो पुलिस की गोलीबारी में मारा गया था। मैं तो आज पैदा हुए बच्चों के बारे में भी सोच रही हूं कि हम लोग कैसे उनके लिए अपनी भाषा और संस्कृति को जिंदा रख सकते हैं। हम लोगों को अपने पुरखों से जो सांस्कृतिक विरासत और जीवनशैली मिली है उसे हम अपने बच्चों के लिए छोड़ जाना चाहते हैं। इसीलिए हम लोग सारी प्रथाएं मना रहे हैं और अपनी हो भाषा की लिपि का भी प्रसार करने में लगे हुए हैं। हम लोग बिखर गए थे। लोगों ने खुद को बचाने के लिए अलग-अलग रास्ते चुन लिए थे, लेकिन सवाल उठता है कि आदिवासियों के लिए मकान और पैसा असली मुआवजा हो सकता है क्या? हमें अपने पेड़ और पहाड़ अब वापस नहीं मिलने वाले। पानी और हवा भी अब पहले जैसी नहीं रह जाएगी। हमने जो गंवा दिया है हमें उसका अच्छे से आभास है और दर्द है, इसके बावजूद हम अपनी बिरादरी के भविष्य के लिए संघर्ष करेंगे।‘

संघर्ष और उम्मीद
प्रभावित समुदाय आजीविका, स्वच्छ पानी, ताजा हवा और सबसे बढ़कर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लोगों को हुए नुकसान पर उनकी शुरुआती गवाहियां और बाद में सामूहिक मोलभाव के लिए अलग-अलग प्रभावित समूहों के एक साथ आने की कहानी ही स्टील उत्पादन की वास्तविकताओं को उजागर करने की हमारी प्रेरणा बनी।
एकबारगी नंगे हो चुके पहाड़ों की बहाली, स्वच्छ हवा-पानी, पेड़ों, पशुओं और अनगिनत प्रजातियों को एक तरफ रख दें, तो यह हमला वास्तव में मनुष्य और उसकी आने वाली पीढ़ियों की देह और सहजबोध पर किया जा रहा है। इसे अब भी एक ऐसी भाषा की तलाश है जो विकास के मुहावरे और सतत विकास की अफवाह का परदाफाश कर सके। चूंकि यह असर पीढ़ियों तक रहने वाला है, इसलिए पर्यावरण और राजकाज से जुड़े कानूनों के केंद्र में यह पीढ़ीगत समता के सिद्धांत को ला देता है। इस नवउदारवादी अर्थव्यवस्था को परिभाषित करने वाला लक्षण रोजगारहीन वृद्धि है। आज 40 और 50 साल की अवस्था के लपेटे में जो भूमिहीन दिहाड़ी मजदूर हैं, वे बताते हैं कि उनके बच्चे अब अपने भविष्य को लेकर उनसे सवाल पूछने लगे हैं, कि उनके परिवारों को अब तक मुआवजा क्यों नहीं मिला।
यह सवाल करने का वक्त अब जा चुका है। समय बहुत तेजी से बीता है। छत्तीसगढ़ के सिलगेर गांव में जो नौजवान 2022 में सुरक्षाबलों के शिविर हटाने की मांग को लेकर महीनों तक धरने पर बैठा था, उसने बड़ा होते हुए अपने बुजुर्गों को सलवा जुड़ुम के अत्याचारों का सामना करते देखा है। उसी तरह, वेदांत के बॉक्साइट खनन का विरोध कर रहे सिजिमाली के आदिवासी और दलित युवा अपने बुजुर्गों को लार्सन ऐंड टुब्रो और उत्कल अलुमिना का प्रतिरोध करते देख चुके हैं। इसीलिए वे फर्जी मुकदमे और हिरासत झेलने के बावजूद अपने जंगल और पहाड़ को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। इनकी ये लड़ाइयां ही सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक न्याय का रास्ता बना रही हैं और आगे की पीढ़ियों के लिए इंसानी रिहाइशों को बचा रही हैं। उम्मीद यहीं है।
