पूंजी के राज में मजदूर कैसे बेदखल और अदृश्य हो गया? अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार का व्याख्यान

Prof. Arun Kumar
Prof. Arun Kumar
मौजूदा दुनिया में जब भी मजदूरों की बात होगी, सबसे बुनियादी अंतर्विरोध पूंजी बनाम श्रम से ही बात उठेगी। पिछले सौ साल में कैसे पूंजी की बढ़ती हुई ताकत ने श्रमिकों को संगठित होने से रोका, कमजोर किया, कभी उनके संगठित होने का फायदा उठाया तो कभी उन्‍हें बिखेर दिया, यह न सिर्फ पूंजीवाद बल्कि मजदूर आंदोलन का भी इतिहास है। इसी इतिहास की रोशनी में और भारत के असंगठित मजदूरों के खास संदर्भ में आज की दुनिया और भविष्‍य के खतरों पर अर्थशास्‍त्री प्रो. अरुण कुमार ने दिल्‍ली में 5 जून 2026 को एक लंबा व्‍याख्‍यान दिया। व्‍याख्‍यान जेएनयू में उनके सहपाठी रहे शिक्षाविद अनिल चौधरी की स्‍मृति में था। उस व्‍याख्‍यान का लिप्‍यंतरित, संक्षिप्‍त और संपादित रूप

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पिछले पचहत्तर वर्षों में बहुत सारी चीजें बदल गई हैं। पिछले पांच वर्षों में बहुत तेजी से बदलाव आया है। पूंजीवाद का स्वरूप बहुत तेजी से बदला है। उसको समझ पाना काफी कठिन होता जा रहा है। हम अकसर भ्रमित हो जाते हैं कि वास्तव में हो क्या रहा है। इसलिए रास्ता भी ढूंढना मुश्किल हो जाता है कि इस स्थिति का हम कैसे सामना करें और कैसे आगे बढ़ें।

इसीलिए मैंने सोचा कि शुरुआत यहीं से करूं कि पूंजीवाद तो एक संघर्ष है पूंजी और श्रम के बीच! पूंजी की प्रवृत्ति अर्थव्यवस्था में अपना हिस्सा बढ़ाने की होती है। पूंजी के सामने श्रमिक बहुत कमजोर होता है। इसीलिए उसको संगठित होने की आवश्यकता होती है। वह अगर संगठित नहीं होगा तो मोलभाव नहीं कर सकता। उसकी स्थिति खराब हो जाती है। भारत में 94 फीसद लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। सिर्फ छह फीसद लोग संगठित क्षेत्र में काम करते हैं। जब महामारी के दौरान लाखों-करोड़ों लोग पैदल चलने लगे भरी गर्मी में बच्चों को उठाए, अपना सामान खींचते हुए, तब सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को डांट लगाई कि आपको पता होना चाहिए कि असंगठित क्षेत्र में कितने लोग हैं। तब जाकर सरकार ने ई-श्रम पोर्टल बनाया। ई-श्रम पोर्टल के बारे में प्रधानमंत्री ने संसद में कहा कि तीस करोड़ लोग उस पर पंजीकृत हैं। जो श्रमिक ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत थे, उके पास कम-से-कम कंप्यूटर या डिजिटल माध्यमों तक कुछ पहुंच थी, लेकिन जो असली गरीब है उसके पास तो पहुंच ही नहीं है। वह दस हजार रुपये से भी काफी कम कमाता था। उकी स्थिति बहुत दयनीय है।  

हमने भारत में 2002-03 के बाद गरीबी की कोई रेखा तय नहीं की है। इसलिए हम विश्व बैंक की गरीबी रेखा के हिसाब से चलते हैं। पहले यह 1.9 डॉलर थी, फिर 2.15 डॉलर हुई और अब 3 डॉलर हो गई है। उसके हिसाब से अगर चलें, तो पांच लोगों के एक परिवार को जीने के लिए करीब 32000 रुपये चाहिए जबकि यहां तो दस हजार रुपये से कम कमाने वाले ज्यादा हैं। अगर दो लोग भी कमाने वाले हुए, तो बीस हजार रुपये से कम कमाने वाले हुए। यानी कि जो अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा है, जो विश्व बैंक की है, उसके हिसाब से हमारे देश में मेरा मानना है कि 90 फीसद लोग गरीब हैं। यह गरीबी बहुत ज्‍यादा है और उसकी वजह यह है कि जो आम श्रमिक है उसकी सौदेबाजी की कोई शक्ति नहीं है। उसे पूंजी दबा देती है।

अब इस पर जो पूंजीवादी अर्थशास्त्री हैं, वे कहते हैं कि भई देखो, मजदूरी का हिस्सा तो बहुत ज्‍यादा नहीं गिरा है। अर्थशास्‍त्री बरान ने अपनी विकास की किताब में यह बात रखी थी कि पूंजीपति की कोशिश हमेशा यह रहती है कि वह अपना मुनाफा कम करके दिखाए ताकि पूंजी के अनुपात में मजदूरी का हिस्‍सा ज्‍यादा गिरा हुआ न दिखे। वह ऐसा किस तरह से करता है?



कंपनियों में तरह-तरह के खर्चे किए जाते हैं, जैसे पांचसितारा संस्कृति और सातसितारा संस्कृति। ऐसे खर्चों को अकसर यह कहकर उचित ठहराया जाता है कि ये आवश्यक व्यावसायिक खर्च हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई प्रबंधक यात्रा करता है तो उसे आवश्यक यात्रा व्यय बताया जाता है। यदि वह मनोरंजन पर खर्च करता है तो उसे आवश्यक मनोरंजन व्यय कहा जाता है। इस प्रकार अनेक ऐसे खर्चे जुड़ जाते हैं जिन्हें सामाजिक अपव्यय कहा जा सकता है। यह सामाजिक अपव्यय ऐसा व्यय है जिससे आम जनता के कल्याण में कोई वास्तविक वृद्धि नहीं होती, लेकिन इससे कंपनी के मुनाफे का हिस्सा कम दिखाई देता है। एक तरह से यह आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण का ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से यह प्रदर्शित किया जाता है कि पूंजी का हिस्सा अपेक्षाकृत कम है और मजदूरी का हिस्सा बहुत अधिक नहीं घटा है जबकि वास्तव में समय के साथ समाज में इस प्रकार के खर्चों में लगातार वृद्धि हुई है। कॉर्पोरेट संस्कृति के विस्तार के साथ सामाजिक अपव्यय बहुत बढ़ा है। यह अपव्यय जितना अधिक बढ़ता है, उतना ही आम जनता के कल्याण पर उसका सकारात्मक प्रभाव कम होता जाता है। इसके विपरीत, कॉर्पोरेट क्षेत्र के हित और उसके मुनाफे में वृद्धि होती जाती है।

इसी संदर्भ में हमने एक पुस्तक पढ़ी थी जिसमें अमेरिका की 1980 के दशक की अर्थव्यवस्था का विश्लेषण किया गया था। उसमें यह तर्क दिया गया था कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में लगभग 50 फीसद उत्पादन सामाजिक दृष्टि से वेस्‍ट यानी बेकार है। यानी यदि कुल उत्पादन आधा भी रह जाए तब भी लोगों के वास्तविक कल्याण में कोई विशेष कमी नहीं आएगी। इसका अर्थ यह है कि अर्थव्यवस्था में अत्यधिक अपव्यय मौजूद है। जब हमने 2006-07 के आर्थिक सर्वेक्षण के लिए अध्ययन किया तो मैंने यह अनुमान लगाने का प्रयास किया कि भारत में इस प्रकार का अपव्यय कितना है। मेरे आकलन के अनुसार, उस समय भारत में लगभग 25 फीसद उत्पादन वेस्‍ट का था। यानी यदि यह 25 फीसद उत्पादन कम भी हो जाता तो पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता, स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों में सुधार होता और श्रमिकों के वास्तविक कल्याण में वृद्धि हो सकती थी। इसका मतलब कि उस समय भी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ऐसे उत्पादन में लगा हुआ था जो समाज के व्यापक हित में बहुत कम योगदान देता था। इसके बाद जिस प्रकार उपभोग की संस्कृति में परिवर्तन आया, दिखावटी खर्चों और संसाधनों के अपव्यय में वृद्धि हुई, उसे देखते हुए मेरा मानना है कि सामाजिक अपव्यय और भी बढ़ गया है। आज अर्थव्यवस्था का एक बड़ा भाग ऐसे उत्पादन और उपभोग में लग रहा है जो समाज के वास्तविक कल्याण की अपेक्षा मुनाफा कमाने और उपभोग को बढ़ाने पर अधिक केंद्रित है।

एक लेख मैंने देखा था काफी साल पहले। उसमें कहा गया था कि जो आज की टेक्नोलॉजी है, उसमें दो फीसद लोग उतना उत्पादन कर सकते हैं जितना हो रहा है यानी 98 फीसद को काम नहीं करना पड़ेगा। उतना काम दो फीसद लोग ही कर देंगे। मैं कई साल पहले की बात बता रहा हूं, लगभग 20 साल पहले की। तो हमारी जो वेस्ट है समाज में, उसकी वजह से आम आदमी की बेहतरी नहीं होती है। उससे जीडीपी बढ़ती है, लेकिन सामाजिक कल्याण नहीं बढ़ता। यह वेस्‍ट सरकार में हो रहा है, कॉर्पोरेट सेक्टर में हो रहा है, एनवायरनमेंट का वेस्ट है, हेल्थ सेक्टर का वेस्ट है। यह सारा वेस्ट अगर हम निकाल दें, तब हमें पता लगेगा कि असल में मजदूरी का हिस्‍सा और मुनाफे का हिस्सा किस अनुपात में है। नहीं तो हम भ्रम में पड़ जाएंगे।

1982 में मुंबई में कपड़ा मजदूरों की हड़ताल हुई थी। हड़ताल के बाद बड़ी संख्या में कपड़ा मजदूर पटरी पर आ गए थे। इस विषय का विश्लेषण करने वाले कई लोगों का कहना है कि वास्तव में पूंजीपति ही चाहते थे कि हड़ताल हो क्योंकि मिलें पहले से ही बीमार होती जा रही थीं और वे चाहते थे कि हड़ताल हो तो वह लंबी चले। हड़ताल लगभग 18 महीने तक चली और अंततः मिलें बंद हो गईं। इसके बाद जो लाभ होना था, वह पूंजीपतियों को मिला क्योंकि उन्होंने उन जमीनों को बाद में रियल एस्टेट के रूप में बहुत ऊंची कीमतों पर बेच दिया।


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इससे एक बात जो सामने आती है, वह यह है कि दुनिया की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाओं में औद्योगिक क्षेत्र अपेक्षाकृत कमजोर पड़ता गया है। कृषि क्षेत्र भी कमजोर हुआ है। इनकी कीमत पर सेवा क्षेत्र का विस्तार लगातार हुआ है। विकसित देशों में सेवा क्षेत्र का हिस्सा 80 से 85 फीसद तक पहुंच चुका है। कृषि की स्थिति यह है कि अमेरिका जैसे देशों में मुश्किल से एक फीसद लोग कृषि में कार्यरत हैं। सेवा क्षेत्र के विस्तार के साथ श्रमिकों को संगठित और लामबंद करना अधिक कठिन होता गया है। इसका एक कारण यह है कि वाइट कॉलर्ड और ब्‍लू कॉलर्ड श्रमिकों के बीच का अंतर बढ़ता गया है। सेवा क्षेत्र में कार्य करने वाले अनेक लोग स्वयं को श्रमिक के रूप में नहीं देखते। परिणामस्वरूप, प्रबंधकीय या वाइट कॉलर्ड श्रमिकों और सामान्य ब्‍लू कॉलर्ड श्रमिकों के बीच एक विभाजन पैदा हुआ है। सेवा क्षेत्र जितना बढ़ा है, यह विभाजन भी उतनी ही तेजी से बढ़ा है।

हमारी अर्थव्यवस्था में आज सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 55 फीसद है। दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र में रोजगार तो लगभग 45 फीसद लोगों को प्राप्त है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में उसका योगदान केवल लगभग 15 फीसद है। इस दृष्टि से उत्पादन में कृषि एक अपेक्षाकृत छोटा क्षेत्र बन गया है जबकि रोजगार के स्तर पर उसकी भूमिका अब भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। इसके विपरीत सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था का सबसे प्रभावशाली क्षेत्र बनता जा रहा है। इसके कारण लोगों को संगठित करने की प्रक्रिया में भी नई चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं। विशेष रूप से वाइट कॉलर्ड और ब्‍लू कॉलर्ड श्रमिकों के बीच का विभाजन लगातार बढ़ रहा है। इसलिए, जबकि मूल विभाजन पूंजी और श्रम के बीच है, उसके भीतर भी अनेक प्रकार के विभाजन विकसित हो गए हैं, जो श्रमिकों की एकजुटता को प्रभावित करते हैं।

एक बात यह फैलाई जाती है कि संगठित क्षेत्र के मजदूर और असंगठित क्षेत्र के मजदूर के बीच विरोधाभास है। संगठित क्षेत्र का मजदूर ज्‍यादा पाता है इसलिए असंगठित क्षेत्र का मजदूर कम पाता है। मेरा मानना है कि यह गलत बात फैलाई जाती है। असल विभाजन पूंजी और श्रम के बीच है, न कि संगठित और असंगठित क्षेत्र के श्रम के बीच और इससे जो गैर-बराबरी होती है वह तीन तरह की होती है। एक तो गैर-बराबरी होती है उपभोग में, दूसरी गैर-बराबरी होती है आय में और तीसरी गैर-बराबरी होती है संपत्ति में। उपभोग में गैर-बराबरी बहुत ज्‍यादा नहीं होती। जब सरकार आंकड़े पेश करती है या दूसरे अर्थशास्त्री आंकड़े प्रस्तुत करते हैं, तो वे उपभोग समानता की बात करते हैं क्योंकि हमारे देश में आय का डेटा इकट्ठा नहीं किया जाता। अगर मैं किसी मजदूर से हजार गुना ज्‍यादा कमाता हूं, तो मैं हजार गुना ज्‍यादा गेहूं नहीं खाऊंगा। मैं हजार गुना ज्‍यादा नमक नहीं खाऊंगा। मैं करीब-करीब उतना ही खाऊंगा। इसलिए उपभोग में असमानता सबसे कम होती है। उससे ज्‍यादा असमानता आय में होती है और सबसे ज्‍यादा असमानता संपत्ति में होती है।

गरीब आदमी के पास तो कोई बचत ही नहीं होती। जो दस हजार रुपये कमा रहा है उसके पास बचत कहां से होगी? बचत तो जितनी अधिक कोई व्यक्ति अमीर होता है, उतनी ही अधिक होती है। उतनी ही अधिक उसकी संपत्ति बनती है। जितनी संपत्ति बनती है उतनी ही उसकी आय बढ़ जाती है। इसलिए एक श्रेणीबद्ध संरचना है: उपभोग असमानता, उससे ज्‍यादा आय असमानता, और उससे ज्‍यादा संपत्ति असमानता। हमें यह देखना चाहिए कि इन तीनों स्तरों पर क्या हो रहा है।

यहां सबसे बड़ी बात काले धन की वह अर्थव्यवस्था है जो तीन फीसद लोगों के पास केंद्रित है। काले धन की अर्थव्यवस्था के चलते असमानता और भी अधिक बढ़ जाती है। आय असमानता और संपत्ति असमानता जितनी श्वेत अर्थव्यवस्था में दिखाई देती है, उससे कहीं अधिक वे काली अर्थव्यवस्था के कारण बढ़ती हैं। काली अर्थव्यवस्था के आंकड़े हमारे पास उपलब्ध नहीं होते। इसलिए हमारे देश में जो वास्तविक असमानताएं और गैर-बराबरियां हैं, वे पूरी तरह दिखाई नहीं देती हैं।

मेरा मानना है कि हमारे देश में गैर-बराबरी शायद ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से भी अधिक है। यदि हम काले धन की अर्थव्यवस्था को भी इसमें शामिल कर लें, तो यह और स्पष्ट होगा। लोग कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में बहुत अधिक गैर-बराबरी है, लेकिन मेरा मानना है कि भारत में सबसे अधिक गैर-बराबरी दिखाई देगी क्योंकि हमारे यहां जितना बड़ा असंगठित क्षेत्र है उतना बड़ा असंगठित क्षेत्र कहीं और नहीं है। आपने कहीं और नहीं देखा कि जब महामारी आई तो लाखों-करोड़ों लोग शहरों से गांवों की ओर पलायन करने लगे। यह दृश्य न चीन में दिखाई दिया, न ब्राजील में और न ही दक्षिण अफ्रीका में। यह केवल हमारे देश में दिखाई दिया। यह इस बात का संकेत है कि हमारा असंगठित क्षेत्र कितनी खराब स्थिति में है।

जब अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन ने अध्ययन किया, तो उसमें पाया गया कि लोगों के पास इतनी बचत भी नहीं थी कि यदि आज उनका काम चला जाए तो वे एक सप्ताह का भोजन और अन्य आवश्यक खर्च चला सकें। इसी कारण उन्हें पलायन करना पड़ा क्योंकि उनके पास कोई बचत नहीं थी। हां, कोई व्यक्ति उधार लेकर कुछ समय तक काम चला ले यह अलग बात है। इसलिए गैर-बराबरी का प्रश्न कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच की असमानता से भी जुड़ा हुआ है। कृषि क्षेत्र में आमदनी बहुत कम है जबकि गैर-कृषि क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक है। गैर-कृषि क्षेत्र में सेवा क्षेत्र भी शामिल है और औद्योगिक क्षेत्र भी। इसलिए वहां आय का स्तर अपेक्षाकृत अधिक है जबकि कृषि क्षेत्र में औसत आमदनी बहुत कम है।


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2017-18 के सर्वेक्षण में बताया गया था कि एक औसत किसान प्रति व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 27 रुपये कमाता है, जो गरीबी रेखा के आसपास की आय है। अधिकांश किसान, अर्थात लगभग 85 फीसद, पांच एकड़ से कम भूमि के स्वामी हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे किसानों की है जिनके पास आधा एकड़, एक एकड़ या दो एकड़ जैसी बहुत छोटी जोतें हैं। वास्तव में कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच की असमानता बहुत अधिक है। इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि आजादी के बाद हमने कृषि से अधिशेष निकालकर औद्योगीकरण और शहरीकरण को बढ़ावा देने का प्रयास किया। कृषि में जो भी अधिशेष उत्पन्न होता था, वह अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित होता गया। परिणामस्वरूप कृषि में पुनर्निवेश पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाया, जिससे कृषि की वृद्धि धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई।

कृषि में परेशानी क्या है? कृषि में करीब 11 करोड़ किसान हैं, इसलिए वहां कोई एकाधिकार की स्थिति नहीं है जबकि उद्योग में एकाधिकार मौजूद होता है। इसलिए जो मूल्य निर्धारण की शक्ति है, वह कृषि में कृषकों के पास नहीं होती। उद्योगों के पास मूल्य निर्धारण की शक्ति होती है। वे अपने उत्पादों का दाम तय कर लेते हैं, लेकिन कृषि में किसान अपना दाम तय नहीं कर पाते। इसी कारण कृषि में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की आवश्यकता पड़ती है। सरकार जब एमएसपी देती है, तभी कृषि में किसानों की आमदनी कुछ हद तक बढ़ पाती है। इसलिए यह मूल्य निर्धारण की शक्ति गैर-कृषि क्षेत्रों में है, कृषि में नहीं है। इसके चलते कृषि को बहुत नुकसान होता है क्योंकि वहां किसी प्रकार का एकाधिकार नहीं है जबकि उद्योग और सेवा क्षेत्रों में दाम निर्धारित कर लिए जाते हैं।

मेरा मानना है कि इस अंतर को हम आय संबंधी व्यापार शर्तों के रूप में समझ सकते हैं, अर्थात यदि आप उत्पादन कर रहे हैं तो आपकी आमदनी कितनी बढ़ रही है और गैर-कृषि क्षेत्रों में कार्य करने वालों की आमदनी कितनी बढ़ रही है। ये आय संबंधी व्यापार शर्तें कृषि के विरुद्ध चली गई हैं। कृषि में आमदनी अपेक्षाकृत कम बढ़ी है जबकि अन्य क्षेत्रों में अधिक बढ़ी है। इसी कारण कृषि का उत्पादन में योगदान घटकर लगभग 15 फीसद रह गया है जबकि आज़ादी के समय यह लगभग 55 फीसद था। दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र का योगदान लगातार बढ़ता गया है। इसलिए व्यापार की ये शर्तें कृषि के प्रतिकूल रही हैं।

कृषि में एक ओर कृषक है जिसके पास भूमि है और दूसरी ओर खेतिहर मजदूर है। इनके बीच भी एक प्रकार का विरोधाभास मौजूद है। किसान यह समझता है कि यदि वह मजदूर को कम भुगतान करेगा तो उसका मुनाफा कुछ बढ़ जाएगा। इसलिए कृषि में भी किसान और मजदूर के बीच एक विभाजन मौजूद है। मेरा मानना है कि वास्तव में दोनों के बीच समझौता और सहयोग होना चाहिए। दोनों को एक-दूसरे के सहयोगी होना चाहिए। जिस दिन मजदूर को जीवन-निर्वाह योग्य मजदूरी मिलेगी, जिसका वादा हमारा संविधान करता है, उस दिन भोजन की मांग भी बढ़ जाएगी। जब मांग बढ़ेगी, तो स्वाभाविक रूप से कीमतें एमएसपी से ऊपर जाएंगी। तब सरकार से एमएसपी की मांग करने की आवश्यकता भी कम पड़ जाएगी। अभी मांग कम होने के कारण कीमतें एमएसपी से नीचे चली जाती हैं और किसानों की आमदनी कम हो जाती है। इसलिए यदि खेतिहर मजदूरों और भूमि स्वामियों के बीच एक गठबंधन बन जाए, तो कृषि के लिए यह लाभकारी होगा। उनकी परिस्थितियों में स्वतः सुधार आ सकता है।

यहां एक बड़ी चुनौती यह है कि खेतिहर मजदूरों और किसानों को संगठित कैसे किया जाए। मैं कई बार कहता रहता हूं कि किसानों के सबसे स्वाभाविक सहयोगी खेतिहर मजदूर हैं। जिस दिन मजदूरों को उचित जीवन-निर्वाह योग्य मजदूरी मिलने लगेगी, उस दिन किसानों को भी उसका लाभ मिलेगा। यह जो चेतना है उसको बदलना बहुत जरूरी है। अगर किसान सूक्ष्म स्तर पर सोचते हुए मजदूर को ज्‍यादा तनख्‍वाह देगा, तो उसका मुनाफा कम हो जाएगा। व्यापक स्तर पर अगर सोचें, तो जब सभी मजदूरों की तनख्‍वाह बढ़ जाएगी तो उनके भोजन की मांग भी बढ़ जाएगी। उसका दाम बढ़ जाएगा। इसलिए अगर सूक्ष्म सोच से व्यापक सोच की ओर बढ़ा जाए, तो एक समग्र चेतना का विकास होगा और उससे दोनों को लाभ मिलेगा।

गैर-बराबरी के बाद जो एक चीज हमें समझनी है, वह यह है कि मजदूरी को कम करने के कितने रास्ते पूंजी के पास हैं। वह किस-किस तरह से अपने मुनाफे का हिस्सा बढ़ाती है।

सबसे पहले तो वह राजनीति पर कब्‍जा कर लेती है। वह यह निर्धारित कर लेती है कि किस तरह की नीतियां चलेंगी और किस प्रकार की विकास परियोजनाएं लागू होंगी जबकि जो श्रमिक है वह ऐसा नहीं कर पाता। जो पूंजी है, वह अपने आप को इस रूप में प्रस्तुत करती है कि वह पूरे समाज का हित कर रही है। पूंजी स्वयं को समाज के हितों के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करती है। यह बात लोगों के बीच फैलाई जाती है कि पूंजी ही सबके हितों का प्रतिनिधित्व कर रही है। यह धारणा जितनी अधिक स्वीकार की जाएगी, समाज में पूंजी का प्रभाव उतना ही बढ़ता जाएगा। इसलिए किस प्रकार की नीतियां हों, विकास नीतियां किस प्रकार की हों, इस पर उसका जो नियंत्रण है उसके बल पर वह अपने हित को ही राष्ट्रीय हित के रूप में प्रस्तुत कर देती है। कृषि का क्या हित है, मजदूर का क्या हित है, वह सब गौण हो जाता है।

इसलिए राजनीति पर पूंजी का नियंत्रण बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है। इसी के चलते हमने आजादी के बाद ट्रिकल-डाउन की नीति अपनाई थी। यानी ऊपर विकास होगा, तो उसका लाभ रिसकर नीचे तक पहुंच जाएगा। यह मॉडल 1830, 1840 और 1850 के यूरोप के लिए तो उपयुक्त हो सकता था, लेकिन 1950 के भारत के लिए उपयुक्त नहीं था। प्रौद्योगिकी का अंतर इतना अधिक था कि उन्नत और पिछड़े क्षेत्रों के बीच वह प्रक्रिया संभव नहीं थी, लेकिन उनका अपना स्वार्थ था कि उन्नत क्षेत्र और अधिक उन्नत होगा। उनका तर्क था कि जब उन्नत क्षेत्र आगे बढ़ेगा, तो पूरा समाज आगे बढ़ेगा। उन्होंने यह विचार दिया कि हम समाज का आधुनिकीकरण करेंगे। इस प्रकार समाज में यह धारणा बन गई कि पूंजी ही समाज को प्रगति की दिशा में ले जाएगी और बाकी तबके यह काम नहीं कर सकते। इससे पूंजी को बहुत लाभ पहुंचा।



इसके साथ एक और बात जुड़ी हुई थी। यदि आप देखें, तो 1944 में ठाकुरदास समिति और बॉम्बे प्लान आया था। उसमें पूंजीपति वर्ग ने कहा कि हमारे पास पर्याप्त पूंजी नहीं है। हम आधारभूत संरचना स्थापित नहीं कर सकते, इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र की आवश्यकता है। सार्वजनिक क्षेत्र होगा, तभी विकास संभव होगा। यह पूंजीपतियों का ही एक समूह था, जिसने यह तर्क रखा कि सार्वजनिक क्षेत्र होना आवश्यक है। उनका कहना था कि सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक है, तभी विकास हो सकेगा। इसी सोच के आधार पर आजादी के बाद सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में व्यापक निवेश किया। चाहे शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, सड़कें हों, रेलवे हो या अन्य विकास कार्य, सरकार ने उनमें निवेश किया। यह सहमति अधिक समय तक नहीं टिक सकी। बाद में पूंजीपति वर्ग को लगा कि वह अतिरिक्त मुनाफा कमा सकता है और वह भी ग़ैर-कानूनी तरीकों से, अर्थात काली कमाई और काली आय के सृजन के माध्यम से।

हमारे देश में 1955-56 में काली कमाई सकल घरेलू उत्पाद का लगभग चार फीसद थी। जब 1970 के दशक में वांचू समिति आई, तो उसने बताया कि यह बढ़कर सात फीसद हो गई थी। बाद में जिस समिति के साथ मैं जुड़ा हुआ था, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी, उसके आकलन के अनुसार 1980 तक यह 18 से 21 फीसद हो चुकी थी। फिर मैंने अपनी ब्लैक इकोनॉमी विषयक पुस्तक में अनुमान लगाया कि यह 30 से 40 फीसद तक पहुंच गई थी। इसके बाद 2016 में ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित मेरे शोधपत्र में मैंने बताया कि 2012 तक यह 62 फीसद हो चुकी थी। अर्थात काले धन की अर्थव्यवस्था अत्यंत तेजी से बढ़ी। आज यदि हमारी अर्थव्यवस्था लगभग 400 लाख करोड़ रुपये की है, तो उसमें लगभग 240 लाख करोड़ रुपये की काली कमाई शामिल है। प्रश्न यह है कि यह 240 लाख करोड़ रुपये किसके हाथ में है? यह मुख्यतः शीर्ष तीन फीसद लोगों के हाथ में है, अर्थात उन लोगों के हाथ में जो पूंजी के स्वामी हैं। इसलिए श्वेत अर्थव्यवस्था में दिखाई देने वाली गैर-बराबरी से कहीं अधिक असमानता तब दिखाई देती है, जब हम काली अर्थव्यवस्था को भी उसमें शामिल करते हैं। तब यह स्पष्ट होता है कि वास्तविक मुनाफे का हिस्सा कहां जा रहा है।

काली कमाई मुनाफे का हिस्सा क्यों बढ़ाती है? क्योंकि काली कमाई का प्रमुख तरीका अंडर-इनवॉयसिंग और ओवर-इनवॉयसिंग है। इन्हीं प्रक्रियाओं के माध्यम से काली कमाई पैदा की जाती है। उदाहरण के लिए, यदि श्रम पर होने वाले खर्च को बढ़ाकर दिखाया जाए, तो वास्तविक लाभ छुपाया जा सकता है। सत्यम का मामला इसका एक उदाहरण है। वहां दावा किया गया था कि 54,000 लोग काम करते हैं, जबकि जांच में पाया गया कि वास्तविक संख्या 42,000 थी। अर्थात 12,000 लोगों की मजदूरी के बराबर राशि कहीं और चली जाती थी। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति को 10,000 रुपये वेतन मिलता है और उससे कहा जाए कि वह 2,000 रुपये नकद वापस कर दे, तब भी वास्तविक मजदूरी कम हो जाती है और अतिरिक्त राशि मुनाफे में बदल जाती है। इसलिए मजदूरी को बढ़ाकर दिखाना भी मुनाफे को छुपाने का एक तरीका बन जाता है। परिणामस्वरूप श्वेत अर्थव्यवस्था में यह सही आकलन नहीं हो पाता कि मुनाफे का वास्तविक हिस्सा कितना है, लेकिन जब काली अर्थव्यवस्था को शामिल किया जाता है तब स्पष्ट होता है कि हमारी अर्थव्यवस्था में मुनाफे का हिस्सा कहीं अधिक बड़ा है। इसी कारण काले धन की अर्थव्यवस्था को शामिल करने पर गैर-बराबरी भी कहीं अधिक व्यापक दिखाई देती है।

हमारे निजी क्षेत्र ने आजादी के फौरन बाद पूंजी का प्रारंभिक संचय करना शुरू कर दिया था। पूंजी के प्रारंभिक संचय के चलते उन्होंने बहुत ज्‍यादा पूंजी जोड़ ली। इसके बाद जब नई आर्थिक नीतियां आईं, तो उन्होंने आधारभूत संरचना में भी प्रवेश किया। पहले आधारभूत संरचना में निजी क्षेत्र की एंट्री नहीं थी। फिर वह आधारभूत संरचना में भी आ गया क्योंकि उसके पास पूंजी बहुत हो गई थी। टेलिकॉम में और बाकी सब क्षेत्रों में उसका विस्तार बढ़ता चला गया। लेकिन काले धन की अर्थव्यवस्था के चलते क्या होता है कि आपकी नीतियां विफल हो जाती हैं। जो नीति-विफलता है, वह हमारे देश में बहुत बड़े स्तर पर होती है। नीतियां बनती हैं, लेकिन लागू नहीं होतीं। चाहे वह शिक्षा में हो, चाहे स्वास्थ्य में हो, चाहे बाकी क्षेत्रों में हो, हर जगह विफलता दिखाई देती है। तो इस विफलता के चलते निजी क्षेत्र का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र अक्षम है। इसलिए अगर हम आएंगे, तो हम उसको ज्‍यादा दक्ष बनाएंगे।

समाज में एक यह धारणा बनी हुई थी कि निजीकरण से पहले सार्वजनिक क्षेत्र ही अग्रणी क्षेत्र होना चाहिए। अब यह कहा जाने लगा कि निजी क्षेत्र अग्रणी क्षेत्र होना चाहिए। तो जितने भी निर्माण कार्य हैं, वे निजी क्षेत्र को मिलें, जिससे निजी क्षेत्र और आगे बढ़े। निजी क्षेत्र को विकास का एक अभिकर्ता माना गया। लोग मानने लगे कि वह विकास का अभिकर्ता है क्योंकि वही चीजें सही ढंग से करेगा। इसके चलते नीतियों पर उसका जो प्रभाव है, वह पूरी तरह स्थापित हो गया। इसलिए जैसे-जैसे निजी क्षेत्र बढ़ता गया, वैसे-वैसे विकल्प की जो बात थी वह और अधिक धीमी पड़ती चली गई। विकल्प के लिए जो लोग प्रयास कर रहे थे, उनकी आवाज कमजोर होती चली गई।


अच्छा और बुरा अर्थशास्त्र


दूसरा, प्रौद्योगिकी के चलते पूंजी अपना हिस्सा बढ़ा लेती है। क्यों? क्योंकि किसी चीज की एक इकाई का उत्पादन करने में अब आपको कम श्रमिकों की जरूरत होती है। प्रौद्योगिकी से उत्पादकता बढ़ रही है, तो श्रमिक का हिस्सा कम हो जाता है। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी बढ़ती है और जो आपके श्रमिक हैं, वे वास्तविक मजदूरी के लिए मोलभाव करते जाते हैं। वैसे तो वह मौद्रिक मजदूरी के लिए मोलभाव करता है, पर वास्तव में वह वास्तविक मजदूरी के लिए मोलभाव करता है और वास्तविक मजदूरी का मतलब यह है कि जब प्रौद्योगिकी बढ़ रही है तो आपका हिस्सा गिर जाएगा। जब आपकी प्रौद्योगिकी बढ़ रही है, आपकी उत्पादकता बढ़ रही है, तो वास्तविक मजदूरी के बढ़ते हुए भी आपका हिस्सा गिर जाएगा। इसलिए यहां पर देखना होगा कि श्रम कितना संगठित हो सकता है, कितना कर सकता है, तभी जाकर यह संभव होगा। होता क्या है कि जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी बढ़ती है, अतिउत्पादन भी होता है। अर्थव्यवस्था में अतिउत्पादन का मतलब है कि जितनी आपकी मांग है, उससे ज्‍यादा उत्पादन। अगर आपका उत्पादन ज्‍यादा है, मांग कम, तो गिरावट आ जाती है। तो अर्थव्यवस्था में जिसे हम व्यापार चक्र बोलते हैं, वे चलते रहते हैं। उसके चलते हुए कभी अर्थव्यवस्था ऊपर जाती है, कभी नीचे जाती है। जब गिरावट आती है तो निजी क्षेत्र कहता है कि जब आप हमें रियायतें देंगे तभी हम और ज्‍यादा निवेश करेंगे। सरकार फिर और रियायतें देती है। वास्तव में इससे बात संभलने वाली नहीं है, पर वे रियायतें और लेते जाते हैं, यानी हर गिरावट के समय वे समाज से और-और रियायतें प्राप्त करते हैं। तो प्रौद्योगिकी के होते हुए भी जो आम श्रमिक है, उसका हिस्सा अर्थव्यवस्था में कम हो जाता है।

एक और बड़ी चीज जो हुई है, वह यह है कि वैश्विक रणनीतिक परिवर्तन बहुत बड़े आए हैं। जो हमारा विकल्प है, वह अविश्वसनीय हो गया है क्योंकि जो वैश्विक रणनीतिक परिवर्तन हुए उनमें सोवियत संघ और चीन दोनों में बड़े बदलाव आए।

सोवियत संघ 1980 के दशक के बाद कमजोर होने लगा और चीन 1980 के दशक के मध्य से 180 डिग्री बदल गया। देंग शाओपिंग आ गए। उन्होंने कहा कि पूंजी का रंग मायने नहीं रखता, हमें बस विकास चाहिए, वह चाहे पूंजीवादी ढंग से हो, चाहे दूसरे ढंग से हो। इसका बहुत बड़ा असर हुआ कि एक विकल्प जो हो सकता था, वह अविश्वसनीय हो गया और एक धारणा बन गई कि अब तो पूंजीवाद ही चलेगा। इसके चलते पूंजी ने अपना दबाव अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दिया। इसे वॉशिंगटन सहमति कहा गया, जिसे 1989 में यह नाम दिया गया।

यह इस बात पर केंद्रित था कि कैसे बाजार को बढ़ाया जाए, कैसे बाजारीकरण को आगे बढ़ाया जाए। वॉशिंगटन सहमति समाज में एक दार्शनिक परिवर्तन ले आई। उस सहमति में यह था कि बाजार आगे चलना चाहिए और समाज पीछे। बाजार वस्तुगत है और समाज व्यक्तिनिष्ठ है, इसलिए बाजार को आगे बढ़ाना चाहिए और समाज पीछे रहे। इसके चलते आप देखें कि स्वचालन हुआ, हाशियाकरण भी हुआ। इसके साथ-साथ यह विचार आया कि हम तो सिर्फ आर्थिक दृष्टि से देखें। अर्थशास्त्र महत्वपूर्ण है, समाजशास्त्र महत्वपूर्ण नहीं है, इतिहास महत्वपूर्ण नहीं है, राजनीति महत्वपूर्ण नहीं है, सिर्फ अर्थशास्त्र पर हमें ध्यान देना है।

अगर अर्थशास्त्र पर ही ध्यान देना है, समाज की तरफ नहीं, तो फिर गैर-बराबरी का कोई मतलब ही नहीं है! यानी गैर-बराबरी बढ़ रही है तो ठीक ही है। इसके चलते हुए पूंजीवाद का एक नया चरण हमारे सामने आ गया कि पूंजीवाद में सिर्फ पूंजी जो कर रही है वही सही माना जाने लगा। बाकी जो सामाजिक पहलू और जो राजनीतिक पहलू हैं, उनका कोई मतलब नहीं रह गया। एक शोधपत्र था 1985 में सैमुएलसन साहब का जो अर्थशास्‍त्र में पहले नोबेल पुरस्कार विजेता थे। उन्होंने कहा कि आज का जो अर्थशास्त्र है वह गेम थ्योरी से शुरू होता है। उसके पहले क्या राजनीतिक अर्थशास्त्र था, क्या वहां पर एडम स्मिथ ने कहा या किसी और ने, इसका कोई मतलब नहीं है। उनके लिए तो अर्थशास्त्र सिर्फ गेम थ्योरी से शुरू होता है और वही अर्थशास्त्र है। उनके लिए तो केस स्टडी भी नहीं पढ़ाई जाती है।

तो जो ऐतिहासिक दृष्टिकोण था अर्थशास्त्र का, वह भी एक तरह से खत्म हो गया। अगर आप देखें, तो इन सबके चलते यह प्रेरणा दुनिया में बहुत तेजी से बढ़ी कि बाजार को आगे करो। उसके चलते आपने देखा कि गैट (जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड) को डब्‍ल्‍यूटीओ (विश्व व्यापार संगठन) में परिवर्तित किया गया। इसकी शुरुआत 1980 के दशक में हुई। 1982 में अमेरिकी राजदूत ने हमारे राजदूत से कहा कि हमें आपका कृषि बाजार अपने कब्‍जे में करना है, अब सोवियत संघ आपको मदद नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि हमारे पास कृषि में सरप्लस बहुत है इसलिए वे हमारा बाजार चाहते हैं।


भारत का ‘लेफ्ट’ और एजाज़ अहमद की तकलीफ


आप देखेंगे कि 1982 में यह बात हुई। उसके बाद जब उरुग्वे दौर की वार्ता हुई, तो उसमें सारे नए मुद्दे आ गए। पहले गैटमें सिर्फ व्यापार और उद्योग होता था। अब औद्योगिक वस्तुएं, व्यापार, कृषि आ गया, सेवाएं आ गईं, ट्रिप्स समझौता आ गया, विश्व व्यापार संगठन का गठन हुआ, विवाद निपटान तंत्र आया। सारे नए मुद्दे आए और डंकल प्रस्‍ताव बना 1991 में। डंकल ड्राफ्ट में सारे विकसित देशों की स्थिति प्राथमिक थी और विकासशील देश दोयम थे। ये सारे नए मुद्दे एक ग्लोबल वैश्विक रणनीतिक परिवर्तन की तरफ़ अर्थव्यवस्था को ले जा रहे थे। ये सारी योजनाएं विकासशील देशों के बाजार को कब्‍जाने के लिए बनीं।

अब जब ट्रम्प साहब आए, तो उन्होंने पूरा का पूरा पैटर्न ही खत्म कर दिया। डब्‍ल्‍यूटीओ में फिर भी एक दिखावा था कि वह एक बहुपक्षीय समझौता है। मतलब कि सबको मिला-जुलाकर समझौता हुआ है। अब यह द्विपक्षीय बन गया है। अब जो अमेरिका चाहता है, वही होगा। इसलिए जो पूंजीवाद है, उसका नंगा चेहरा और ज्‍यादा सामने आ गया। पहले यह था कि 1980 के दशक के बाद अब आपको पूंजी प्रवाह आकर्षित करना रियायतें देकर, पर अब यह भी नहीं है। अब यह है कि अमेरिका का सीधा-सीधा हित क्या है। अमेरिका सीधे-सीधे अपने सहयोगी देशों को भी दबा रहा है। वह कह रहा है कि आपका माल हमारे यहां आएगा तो हम उस पर 15 फीसद, 18 फीसद, 20 फीसद जो भी शुल्क होगा लगाएंगे। हमारा माल जो आपके पास आएगा उस पर आप शून्य प्रतिशत शुल्क नहीं लगा सकते। वह कह रहा है कि आपको 600 अरब डॉलर निवेश करना है। वह जापान से कह रहा है कि साढ़े पांच सौ अरब डॉलर निवेश करना है। भारत से कहा कि आपको 500 अरब डॉलर का व्यापार करना है। जो हमारा अधिशेष है, उसे खत्म करके संतुलित व्यापार करना है। यानी भारत को और सामान खरीदना पड़ेगा। वह सबको दबा रहा है।

यानी विश्व व्यापार संगठन के चलते जो बहुपक्षीय व्यवस्था का पर्दा था वह हट गया है। सीधे-सीधे पूंजीवाद का वास्तविक स्वरूप अब हमारे सामने आ गया है और पूंजीवाद को अमेरिका आगे बढ़ा रहा है। रोचक बात यह भी है कि युक्रेन युद्ध के समय से दो गुट निर्मित हो गए हैं। एक तरफ रूस, चीन, ईरान, उत्तर कोरिया जैसे देश हैं और एक तरफ़ अमेरिका और विकसित देश हैं। ये दोनों पूंजीवादी गुट हैं। यह जो लड़ाई है, वह वर्चस्व की है। अमेरिका नहीं चाहता कि चीन बहुत तेजी से आगे बढ़े और चीन कई मामलों में अमेरिका को टक्कर दे रहा है। चाहे वह AI में हो, प्रौद्योगिकी में हो, चीन उत्पादन का केंद्र बन गया है और अमेरिका नहीं चाहता कि वह गति जारी रहे। तो बाइडेन के समय ही चीन पर प्रतिबंध लगाए गए, कि उसको उन्नत कंप्यूटर चिप्स नहीं मिलेंगी और जितने भी वहां अमेरिका के सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ वगैरह थे उनको चीन से वापस बुला लिया गया। यह वास्तविक दबाव जो है, वह ट्रंप से पहले बाइडेन ने ही करना शुरू कर दिया था।

ट्रंप के पहले ही कार्यकाल में चीन पर प्रतिबंध लगाने की बात चल रही थी, पर चीन भी बड़ा रणनीतिक विचारक निकला। उसने पहले से ही अनुमान लगा लिया था कि ये प्रतिबंध वगैरह आएंगे, तो उसने अपने व्यापार में विविधता लाई। उसने अपना व्यापार अफ्रीका से, लैटिन अमेरिका से, यूरोप से बढ़ाया और अमेरिका पर अपनी व्यापारिक निर्भरता कम की। उसी तरह उसके जो भंडार थे, जो उसने अमेरिका में ट्रेजरी बॉन्ड्स वगैरह में रखे थे, उन्हें भी उसने कम किया। उसने सोने पर ज्‍यादा निवेश किया; उसने अन्य मुद्राओं पर ज्‍यादा ध्यान दिया। चीन ने एक बहुत ही रणनीतिक सोच रखते हुए ये सारे कदम उठाए।

अभी जो स्थिति है उसको मैं नई शीतयुद्ध की स्थिति कह रहा हूं। यह युक्रेन युद्ध के समय से जारी है। इसका असर यह होगा कि एक विभाजन पैदा हो रहा है। प्रौद्योगिकी में विभाजन पैदा हो रहा है, व्यापार में विभाजन पैदा हो रहा है, वित्त में विभाजन पैदा हो रहा है। इसके बहुत बड़े परिणाम आने वाले समय में होंगे। वैश्वीकरण का उलटना होगा या नहीं होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। वैश्वीकरण का उलटना किस प्रकार का होगा, यह भी अभी नहीं कहा जा सकता, पर इससे पूंजीवाद में बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा, जिसको हमें अभी समझना पड़ेगा। अब यह जो सारा कुछ हो रहा है, इसको मैं बोलता हूं कि एक नई वित्तीय संरचना निर्मित हो रही है- अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना। जो नई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना है, वह लाभ उत्पन्न करने का एक तरीका है। यह कानूनी भी है और गैर-कानूनी भी, या कहें कि कानूनी और गैर-कानूनी की सीमा के बीच यह संरचना काम करती है।

यह गैर-कानूनी कैसे है? दुनिया में लगभग 90 टैक्‍स हेवेन हैं जहां से पूंजी आसानी से स्थानांतरित हो जाती है और पैसा बाहर निकाल लिया जाता है। जैसे भारत से जो पैसा बाहर जाता है, उसका हवाला या अनौपचारिक माध्यम के जरिये निपटान होता है। पहले एक जगह पर रखा जाता है, फिर वहां पर कंपनी बंद करके दूसरी जगह ले जाया जाता है। फिर तीसरी, चौथी, पांचवीं, छठी जगह तक इसे स्थानांतरित किया जाता है, और अंततः किसी टैक्‍स हेवेन में रख दिया जाता है। जैसे स्विट्जरलैंड में भारतीयों का पैसा जमा बताया जाता है, तो आधिकारिक अनुमान अलग-अलग होते हैं। कोई कहता है यह सीमित है, कोई कहता है ज्‍यादा है। इसी तरह हर देश के लिए अलग-अलग अनुमान होते हैं। इस वैश्विक प्रणाली में सबसे ज्‍यादा वित्तीय गोपनीयता और पूंजी मार्ग पहले पश्चिमी वित्तीय केंद्रों के माध्यम से विकसित हुआ। यह पैसा अक्सर कई कानूनी क्षेत्रों से होकर गुजरता है, इसलिए उसके मूल स्रोत का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। यह पूरी तरह स्पष्ट गैर-कानूनी नहीं होता, बल्कि कानूनी और गैर-कानूनी की सीमा के बीच काम करता है, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। फिर राउंड ट्रिपिंग के जरिये यही पैसा वापस घरेलू अर्थव्यवस्था में आ सकता है, जैसे शेयर बाजार में निवेश के रूप में। इस तरह पूंजी बाहर भी जाती है, वापस भी आती है, और बीच में उसकी पहचान काफी हद तक धुंधली हो जाती है।



मेरा मानना है कि इस समय दुनिया में जो हो रहा है, उसमें पूंजी बहुत ज्‍यादा गतिशील हो गई है। उसकी गतिशीलता बहुत तेज हो गई है, जबकि श्रम की गतिशीलता नहीं है। इसलिए पूंजी–श्रम के बीच असंतुलन हो गया है। पिछले 40 साल में यह और बढ़ गया है। उसके चलते हुए जो पूंजी है वह रियायतें हासिल कर रही है। जैसे वह भारत से कहेगी कि अगर आपने यह रियायत नहीं दी, तो मैं दक्षिण कोरिया में निवेश कर लूंगी। अगर आपने यह रियायत नहीं दी, तो मैं दक्षिण-पूर्व एशिया में निवेश कर लूंगी। इसीलिए आपने देखा कि 2019 में हमने कॉर्पोरेट कर में भारी कटौती की और उससे कॉर्पोरेट क्षेत्र को 1.6 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ मिला, लेकिन हमारे कॉर्पोरेट क्षेत्र का निवेश नहीं बढ़ा। उन्होंने अपनी बैलेंस शीट साफ कर ली। यानी हम कॉर्पोरेट क्षेत्र को रियायत दे रहे हैं। क्यों?

क्योंकि हम कह रहे हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया में टैक्‍स रेट कम है, तो हमारी भी कम होनी चाहिए। दक्षिण कोरिया में कैपिटल गेन टैक्‍स कम है, तो हम भी कम कर रहे हैं। इससे सट्टेबाजी की गतिविधियां और बढ़ जाती हैं। तब पूंजी देशेां को प्रतिस्पर्धा करने पर मजबूर करती है। उससे हमारी जो स्थिति है, वह कमजोर पड़ जाती है। हमारे श्रमिकों की स्थिति और कमजोर पड़ जाती है। इसको हम बोलते हैं रेस टु द बॉटम। इसका मतलब है कि जब सोवियत ब्लॉक टूटा, तो जो ईस्ट यूरोप के देश थे उनके पास कैपिटल कम था, तब उन्होंने अपने टैक्स रेट घटाने शुरू कर दिए। जब उन्होंने टैक्स रेट घटाए, तो ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी को भी घटाने पड़े। जब उनके पास संसाधन कम हो गए, तो पब्लिक सेक्टर को उनको कमजोर करना पड़ा। पब्लिक सेक्टर को निजीकृत करना पड़ा। उससे मजदूर की हालत और खराब हो गई। फिर सारी दुनिया में रेस शुरू हो गई, मतलब सब जगह टैक्स रेट कम हो गया। सब जगह जब पब्लिक के पास जो पैसा था, सरकारों के पास जो पैसा था, वह कम हुआ तो पब्लिक सेक्टर कमजोर हुआ। इन सबके कारण मजदूरों को जो कल्याणकारी लाभ मिलते थे वे कमजोर हो गए।

पूंजी पिछले 40 साल में इतना हावी हो चुकी है कि वह नेशन स्टेट से रियायत लेती है और नेशन स्टेट के जो प्रांत/राज्‍य हैं उनसे भी रियायत ले रही है। जैसे कोई कंपनी बोलेगी कि उसे आंध्र में रियायत मिल रही है तो वहां चली जाऊंगी, इसके चलते उसे गुजरात भी रियायत देगा। इसके कारण राज्‍यों के पास भी संसाधन कम होते चले जा रहे हैं जिससे कि वे लोक कल्‍याण वगैरह कर सकें। सबसे ज्‍यादा आइटी सेक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर यह रियायत चाहते हैं ताकि वहां मजदूर यूनियन की गतिविधियां न चलें। हमारे यहां के आइटी सेक्टर, सॉफ्टवेयर सेक्टर वगैरह में ट्रेड यूनियन एक्टिविटी न के बराबर है। उससे श्रमिक और कमजोर पड़ जाते हैं।

तो यह जो चीज है, उसको मैं कहता हूं अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी का प्रभाव, कि जो नीतियां आप अपनाना चाहते हैं वे आप नहीं अपना पाते हैं। इसीलिए जो गरीबों के लिए नीति है, उसे जब आप अपनाना चाहते हैं तो सरकार कहती है कि राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी हमें डाउनग्रेड कर देगी, ब्याज ज्‍यादा देना पड़ेगा। सरकारों की नीति का निर्धारण अब क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों, आइएमएफ द्वारा होता है, न कि देश की जनता की आवश्यकताओं के अनुसार।

आज भारत की स्थिति को हमें इस वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखना पड़ेगा। हमारी जो रणनीतिक स्वायत्तता है, वह हमने खो दी है। हम चीन से दब जाते हैं, अमेरिका से भी दब जाते हैं और रूस से भी दब जाते हैं।

चीन के साथ हमारा 102 अरब डॉलर का व्‍यापार घाटा है यानी हम चीन को 102 अरब डॉलर की मदद दे रहे हैं। रूस से हमारे अहम रक्षा उपकरण जुड़े हुए हैं। हम रूस का भी साथ नहीं छोड़ सकते, अमेरिका का भी नहीं छोड़ सकते क्योंकि अमेरिका की तरफ तो 2005 से ही रणनीतिक झुकाव बढ़ता चला गया है जब से उसके साथ न्यूक्लियर डील हुई थी। इसलिए यह जो परिस्थिति है, इसमें हमारी स्‍वायत्तता कमजोर हुई है। उसके पीछे मेरा मानना है कि हमारा आरएंडडी बहुत कमजोर है। जब तक हम रिसर्च एंड डेवलपमेंट में तेज नहीं होंगे, हम दुनिया में प्रतिस्‍पर्धा नहीं कर सकते। रिसर्च एंड डेवलपमेंट में हम कमजोर क्यों हैं?

हमारे यहां रिसर्च एंड डेवलपमेंट का कल्चर नहीं है। देश में, हमारी यूनिवर्सिटीज में, हमारे इंस्टिट्यूट्स में वह क्वेश्चनिंग जो होनी चाहिए, जिसके आधार पर आप कोई एक्सपेरिमेंट करते हैं, जिसके आधार पर आप अपने विचारों को आगे विकसित करते हैं, वह पर्याप्त नहीं है। एक तरफ हमारा आरएंडडी पर खर्चा बहुत कम है। हम अपने जीडीपी का 0.65 फीसद खर्च करते हैं, जबकि चीन तीन फीसद खर्च करता है। अमेरिका भी तीन फीसद खर्च करता है। यानी चीन हमसे 22 गुना ज्‍यादा खर्च करता है और अमेरिका हमसे 100 गुना ज्‍यादा खर्च करता है। दूसरी तरफ हमारा कल्चर भी आरएंडडी का नहीं है। आरएंडडी के लिए जो प्रश्न पूछने की संस्कृति होना चाहिए, हम उसको दबा देते हैं, क्योंकि समाज बहुत ही सामंती है और हमारी शिक्षा प्रणाली बहुत कमजोर है। 2005 से एक एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट आ रही है। वह दिखाती है कि सरकारी स्‍कूलों में पांचवीं जमात के आधे बच्चे दूसरी जमात की पढ़ाई-लिखाई और गणित भी नहीं कर पाते हैं। अगर यह स्थिति रहेगी तो परेशानी तो बढ़ेगी क्योंकि जब बच्चा समझ नहीं पाएगा, उसकी रुचि नहीं होगी तो शिक्षा कैसे आगे बढ़ेगी? इसीलिए मेरा मानना है कि हमारी उच्‍च शिक्षा भी कमजोर रह जाती है क्योंकि स्कूली शिक्षा कमजोर है। इसीलिए हमारा रिसर्च एंड डेवलपमेंट बहुत कमजोर है।

हमारा समाज बहुत सामंतवादी है। सामंतवादी समाज शिक्षा का प्रसार नहीं करता। विक्रम सेठ ने ए सूटेबल बॉय में लिखा है कि 1950 के शक में हमारा नेतृत्‍व ज्‍यादातर भूस्‍वामी वर्ग से आया था। वे नहीं चाहते थे कि गरीब के बच्चे पढ़ाई करें। मैंने भी जब फिजिक्स छोड़कर इकोनॉमिक्स में जाने से पहले रूरल डेवलपमेंट, होशंगाबाद में साइंस टीचिंग एक्सपेरिमेंट में जॉइन किया था, तो वहां पर मैंने देखा कि जो जमींदार था वह हमें कहता था- “इन बच्चों को पढ़ा दोगे तो मेरे घर का काम कौन करेगा?” यह 1970 के दशक की बात है। तो हमारे देश में कभी भी हमने स्‍कूली शिक्षा की तरफ उस तरह ध्यान नहीं दिया जिस तरह देना चाहिए था। बच्चों को सही ढंग से पढ़ाकर उनको आगे बढ़ाने की जो जरूरत थी वह पूरी नहीं हुई। मेरा मानना है कि जब एक तरफ यह प्रवृत्ति है कि कुछ लोगों के हाथ में ही पढ़ाई लिखाई और कौशल रहे, तो उससे समाज का समग्र विकास रुक जाता है।

अगर सबके हाथ में स्किल आ जाएगी और बाकी लोग कमजोर नहीं रह जाएंगे, तो असंगठित क्षेत्र में मजदूरों को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाएगा। अगर सब सवाल करने लगेंगे, सारे मजदूर लड़ाकू हो जाएंगे, तो पूंजीपतियां का मुनाफा कम हो जाएगा। इसीलिए मुझे लगता है कि भारत का पूंजीपति वर्ग एक सीमित सोच के हिसाब से चल रहा है, जिसमें वह सोचता है कि कुछ ही लोगों को अच्छी शिक्षा मिले और बाकी लोगों को खराब मिलती रहे तो मिलती रहे। इससे उन्‍हें क्या फर्क पड़ता है? उन्‍हें तो कंट्रोल बनाए रखना है और यह देखना है कि किस प्रकार से यह कंट्रोल आगे बढ़ता चला जाए।


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हमने जो मॉडल अपनाया था, वह पश्चिमी आधुनिकता का है। वह बहुत ही ऊर्जा-सघन और पूंजी-सघन है। इसीलिए 1950 के दशक के बाद हमारी ऊर्जा की जरूरत बहुत बढ़ी है। जिस प्रकार से ऊर्जा का उपभोग देश में बढ़ा है, वह बहुत तेज है। इसलिए आप देखेंगे कि जब भी दुनिया में ऊर्जा संकट आया है, भारत की अर्थव्‍यवस्‍था में भी संकट आया है। हमारी ऊर्जा की जरूरत बहुत ज्‍यादा है और हमारे पास तेल और गैस नहीं है। नब्‍बे फीसद कच्चा तेल यहां बाहर से आ रहा है और सात फीसद गैस बाहर से आ रही है। इसलिए जैसे ही वहां पर कमी होगी या दाम बढ़ेंगे, हमारी अर्थव्यवस्था परेशानी में आ जाएगी।

दूसरी ओर पूंजी-सघनता बढ़ने से हमारा रोजगार सृजन कमजोर हो गया। आप बैंकिंग को ही ले लीजिए। 1990 में बैंकिंग के हर काम के लिए बैंक की शाखा के अंदर जाना पड़ता था। चेक लेना है, पैसे निकालने हैं, पासबुक भरवानी है, सबके लिए जाना पड़ता था। आज मोबाइल फोन पर सारे काम हो जाते हैं। आपको बैंक जाने की जरूरत नहीं है। बैंकों का काम हजार गुना बढ़ गया और जो उनका स्टाफ है वह आधा हो गया। हर क्षेत्र में यही स्थिति है। आप टाटा स्टील को ले लीजिए। 1980 में वह दो मिलियन टन स्टील का उत्‍पादन करता था और 88,000 लोग उसमें काम करते थे। 2015 में वह 15 मिलियन टन स्टील बना रहे थे और सिर्फ़ 30,000 लोग वहां रोजगाररत थे। इतना ऑटोमेशन है, इतना यंत्रीकरण है हमारे संगठित क्षेत्र में, कि वह नौकरिययां सृजित नहीं करेगा और हमारा 80 फीसद हमारा निवेश संगठित क्षेत्र में ही जा रहा है, असंगठित में नहीं। यहां तक कि कृषि में भी रोजगार सृजन अब नहीं हो रहा है। वहां भी बहुत मेकैनाइजेशन है, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, कम्बाइन, थ्रेशर सब आ गए हैं।

इसलिए मेरा मानना है कि हमारी जो एनर्जी इंटेंसिटी और कैपिटल इंटेंसिटी बढ़ रही है, उसके चलते हमारा असंगठित क्षेत्र पिट रहा है। अब सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम असंगठित क्षेत्र को कैसे आगे बढ़ाएं? असंगठित क्षेत्र एकदम हाशिये पर है। एक तरह से कहा जाए तो वह अवसाद में है। असंगठित क्षेत्र में क्या है? उसमें हमारा माइक्रो सेक्टर है जिसमें करीब 11.5 करोड़ लोग काम करते हैं। औसतन 1.7 व्यक्ति एक इकाई में काम करते हैं। कृषि में 85 फीसद किसान पांच एकड़ से कम जमीन वाले हैं। जहां पर भी बहुत कम रोजगार है, वहां भी यंत्रीकरण हो रहा है। कृषि में पांच एकड़ से कम वाले किसान माइक्रो सेक्टर- यही अधिकांश रोजगार देते हैं। यहीं पर आय बहुत कम है। अगर हम उसी का समर्थन नहीं करेंगे, उसी को खत्म करेंगे, तो हमारी समस्या बढ़ जाएगी।

ऐसे में हमारी सरकार क्या कह रही है? हम संगठित सेक्टर को आगे करेंगे और असंगठित सेक्टर को खत्म करेंगे, लेकिन उसका मानना है कि असंगठित सेक्टर संगठित नहीं हो सकता जहां एक इकाई में 1.7 व्यक्ति काम कर रहे हैं। वह क्या विपणन करेगा, क्या वित्त करेगा, क्या प्रौद्योगिकी विकास करेगा? वह नहीं कर सकता। उसी तरह कृषि में जो छोटे किसान हैं, उनको सरकार खत्म कर सकती है, उनको श्रमिक बना सकती है, लेकिन संगठित नहीं कर सकती। इसीलिए असंगठित क्षेत्र को सरकारी नीति में अदृश्य कर दिया गया है और आंकड़ों में भी अदृश्य कर दिया गया है। इसका आंकड़ा आता ही नहीं है। जब आंकड़ा नहीं आता, तो संगठित क्षेत्र के आधार पर हम बोलते हैं कि हमारी जीडीपी सात प्रतिशत बढ़ रही है, जबकि असल में अगर असंगठित क्षेत्र को सही ढंग से नापा जाए तो शायद दो फीसद वृद्धि हुई है जो कि बहुत कम दिखेगी।

अगर हम सन् 2000 से देखें, तो समस्याएं और ज्‍यादा बढ़ती चली जा रही हैं। तरह-तरह की समस्याओं से हम असंगठित क्षेत्र को और धराशायी करते जा रहे हैं। हमारी रणनीतिक स्वायत्तता, जैसे मैंने कहा, वह खत्म होती चली गई और हम परनिर्भर होते चले जा रहे हैं। सवाल है कि क्या हमारे पास साधनों की कमी है? यह कहा जाता है कि हमारे पास साधन नहीं हैं, लेकिन मेरा मानना है कि हमारे पास साधनों की कमी नहीं है। अगर जो बेरोजगार हैं, उनको हम रोजगार दें तो उससे जो उत्पादन होगा वह और ज्‍यादा बढ़ेगा। इसलिए साधनों की कमी नहीं है और हम साधन जुटा सकते हैं। जो बेरोजगारी और गरीबी है, वह व्यवस्था की देन है, न कि प्राकृतिक है। पूंजीवादी अर्थशास्त्री कहते हैं कि यह प्राकृतिक है। मेरा मानना है कि वास्तव में वह प्राकृतिक नहीं है। यह तो व्यवस्था की देन है, जिसकी वजह से यह हो रहा है।

सवाल है कि समाज में हम यह चेतना कैसे बदलें? हमारे समाज में बहुत तरह के बंटवारे हैं। जैसे मैंने कहा संगठित-असंगठित, कृषि और गैर-कृषि, और बाकी जो और बंटवारे हैं इन सभी का फ़ायदा पूंजीवादी व्यवस्था उठा रही है। यह और समस्याएं पैदा करता है और ध्यान भटकाने का काम करता है।


भ्रमित नैतिकता और खंडित नागरिकता के इस दौर में 


जैसे नई आर्थिक नीतियों और बाजारीकरण के चलते उपभोक्तावाद बहुत तेज हो गया है। मैं मानता हूं कि यह न्यू ओपियम ऑफ द मासेस (जनता का नया अफीम) है। संदेश यह दिया जाता है कि लोगों को उपभोक्तावाद में फंसाए रखो कि अभी यह आ जाएगा, बड़ी कार आ जाएगी, बड़ा टीवी आ जाएगा। उसी चमक-दमक में लोगों को रखा जाता है, जबकि आम आदमी वह सब कर नहीं सकता। उस पर से अब प्रधानमंत्री जी ने बोल दिया कि आपको कमखर्ची करना है, लेकिन गरीब आदमी कहां से कर सकता है? उसकी तो पहले से ही पेट और पीठ जुड़ी हुई है। अगर कमखर्ची कोई कर सकता है तो वह टॉप पांच फीसद लोग हैं। वही लोग काली अर्थव्यवस्था में लिप्त हैं। शासक वर्ग भी उसमें शामिल है। लेकिन वह तो ऐसा करने वाला नहीं है। तो कमखर्ची किसको करनी है, सरकार जब भी घोषणा करती है यह नहीं बताती।

फिर जो टेक्नोलॉजी है, वह बहुत तेजी से बदल रही है। उसके बारे में मेरा मानना है कि वह हमारे भविष्य को हमारी नजर में धुंधला कर रही है। हमें साफ़ दिखाई नहीं देता कि आगे क्या होने वाला है। अर्थशास्त्र में दूसरे नोबेल पुरस्कार विजेता ने कहा था कि टेक्नोलॉजी का भविष्य पहले से बता पाना बहुत मुश्किल है। बदलाव इतनी तेजी से हो रहा है कि आप देखिए, सन् 2000 में हमें नहीं पता था कि बैंकिंग, ई-कॉमर्स आदि इस तरह से बदल जाएंगे। तो इतनी तेजी से बदलाव आ रहा है उसके क्या परिणाम होंगे? उसका समाज पर क्या असर होगा? यह भी अभी साफ नहीं है। यानी टेक्नोलॉजी का जो चैलेंज है वह बहुत बड़ा चैलेंज है। मजदूरों के लिए यह बहुत बड़ा चैलेंज है। एक तरफ उनका काम जा रहा है, दूसरी तरफ हम किस दिशा में जा रहे हैं उसका कोई स्पष्ट आइडिया नहीं है। इसीलिए मजदूरों को संगठित करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

यह जो तेज गति से बदलाव हो रहा है, इससे शॉर्ट-टर्म में सोचने की आदत बहुत बढ़ रही है। हम लोग सब शॉर्ट टर्म में सोच रहे हैं। लंबी दूरी में समाज को किस दिशा में जाना चाहिए, उस तरफ हमारा ध्यान नहीं जा रहा है। इससे भ्रम बढ़ जाता है। यह जो भ्रम है, इसी के कारण लोगों को संगठित करना और मुश्किल हो रहा है। फिर आज जितनी जटिल वैश्विक और स्‍थानीय परिस्थितियां हैं, उनके चलते भी संगठित करना और मुश्किल होता जा रहा है।


[प्रो. अरुण कुमार द्वारा दिल्‍ली के हरकिशन सिंह सुरजीत भवन में 5 जून, 2026 को दिए दूसरे अनिल चौधरी स्‍मृति व्‍याख्‍यान का लिप्यंतरित, संक्षिप्‍त और संपादित संस्‍करण]


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